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256
गउड़ी
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- ठठा मनूआ ठाहहि नाही ॥ जो सगल तिआगि एकहि लपटाही ॥
- डंडउति बंदन अनिक बार सरब कला समरथ ॥
- डडा डेरा इहु नही जह डेरा तह जानु ॥
- ढाहन लागे धरम राइ किनहि न घालिओ बंध ॥
- ढढा ढूढत कह फिरहु ढूढनु इआ मन माहि ॥
- जह साधू गोबिद भजनु कीरतनु नानक नीत ॥
- णाणा रण ते सीझीऐ आतम जीतै कोइ ॥
- तनु मनु धनु अरपउ तिसै प्रभू मिलावै मोहि ॥
- तता ता सिउ प्रीति करि गुण निधि गोबिद राइ ॥
· बावन अखरी · राग गउड़ी
ठठा मनूआ ठाहहि नाही ॥ जो सगल तिआगि एकहि लपटाही ॥
पउड़ी ॥
ठठा मनूआ ठाहहि नाही ॥ जो सगल तिआगि एकहि लपटाही ॥
ठहकि ठहकि माइआ संगि मूए ॥
उआ कै कुसल न कतहू हूए ॥
ठांढि परी संतह संगि बसिआ ॥
अंम्रित नामु तहा जीअ रसिआ ॥
ठाकुर अपुने जो जनु भाइआ ॥
नानक उआ का मनु सीतलाइआ ॥28॥
ठठा मनूआ ठाहहि नाही ॥ जो सगल तिआगि एकहि लपटाही ॥
ठहकि ठहकि माइआ संगि मूए ॥
उआ कै कुसल न कतहू हूए ॥
ठांढि परी संतह संगि बसिआ ॥
अंम्रित नामु तहा जीअ रसिआ ॥
ठाकुर अपुने जो जनु भाइआ ॥
नानक उआ का मनु सीतलाइआ ॥28॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ जो मनुष्य (माया के) सारे (मोह) त्याग के सिर्फ प्रभू-चरणों में जुड़े रहते हें। वह (फिर मायावी पदार्थों की खातिर दूसरों से) वैर-विरोध बना बना के आत्मिक मौत सहेड़ते हैं। उनके अंदर कभी आत्मिक आनंद नहीं आ सकता। जो मनुष्य गुरमुखों की संगति में निवास रखता है। उसके मन में शीतलता बनी रहती है। प्रभू का आत्मिक अमरता देने वाला नाम उसकी जिंद में रच जाता है। हे नानक! जो मनुष्य प्यारे परमात्मा को अच्छा लगने लग जाता है। उसका मन (माया की तृष्णा रूपी आग में से बच के) सदा शांत रहता है। 28।
· बावन अखरी · राग गउड़ी
डंडउति बंदन अनिक बार सरब कला समरथ ॥
सलोकु ॥
डंडउति बंदन अनिक बार सरब कला समरथ ॥
डोलन ते राखहु प्रभू नानक दे करि हथ ॥1॥
डंडउति बंदन अनिक बार सरब कला समरथ ॥
डोलन ते राखहु प्रभू नानक दे करि हथ ॥1॥
हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ हे नानक! (ऐसे अरदास करें-) हे सारी ताकतें रखने वाले प्रभू! मैं अनेकों बार आपको नमस्कार करता हूँ। मुझे माया के मोह में फिसलने से अपना हाथ दे के बचा लें। 1।
· बावन अखरी · राग गउड़ी
डडा डेरा इहु नही जह डेरा तह जानु ॥
पउड़ी ॥
डडा डेरा इहु नही जह डेरा तह जानु ॥
उआ डेरा का संजमो गुर कै सबदि पछानु ॥
इआ डेरा कउ स्रमु करि घालै ॥
जा का तसू नही संगि चालै ॥
उआ डेरा की सो मिति जानै ॥
जा कउ द्रिसटि पूरन भगवानै ॥
डेरा निहचलु सचु साधसंग पाइआ ॥
नानक ते जन नह डोलाइआ ॥29॥
डडा डेरा इहु नही जह डेरा तह जानु ॥
उआ डेरा का संजमो गुर कै सबदि पछानु ॥
इआ डेरा कउ स्रमु करि घालै ॥
जा का तसू नही संगि चालै ॥
उआ डेरा की सो मिति जानै ॥
जा कउ द्रिसटि पूरन भगवानै ॥
डेरा निहचलु सचु साधसंग पाइआ ॥
नानक ते जन नह डोलाइआ ॥29॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ (हे भाई!) ये संसार आपके सदा टिके रहने वाली जगह नहीं। उस ठिकाने को पहिचान। जो असल पक्की रिहायश वाला घर है। गुरू के शबद में जुड़ के ये सूझ हासिल कर कि उस घर में सदा टिके रहने की क्या जुगति है। मनुष्य इस दुनियावी डेरे की खातिर बड़ी मेहनत करके कोशिशें करता है। पर (मौत आने पर) इनमें से कुछ भी रक्ती भर भी इसके साथ नहीं जाता। उस सदीवी ठिकाने की रीत-मर्यादा की सिर्फ उस मनुष्य को समझ पड़ती है। जिस पर पूरन प्रभू की मेहर की नजर होती है। हे नानक! साध-संगति में आ के जो मनुष्य सदीवी अटल आत्मिक आनंद वाला ठिकाना ढूँढ लेते हैं। उनका मन (इस नाशवंत संसार के घरों आदि खातिर) नहीं डोलता।
· बावन अखरी · राग गउड़ी
ढाहन लागे धरम राइ किनहि न घालिओ बंध ॥
सलोकु ॥
ढाहन लागे धरम राइ किनहि न घालिओ बंध ॥
नानक उबरे जपि हरी साधसंगि सनबंध ॥1॥
ढाहन लागे धरम राइ किनहि न घालिओ बंध ॥
नानक उबरे जपि हरी साधसंगि सनबंध ॥1॥
हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ उन (के आत्मिक जीवन की इमारत) को विकारों के बाढ़ से नुकसान नहीं होता। कोई भी विकार उनके जीवन राह में रोक नहीं डाल सकता। हे नानक! जिन लोगों ने साध-संगति में नाता जोड़ा। वह हरी का नाम जप के (विकारों के हड़ में से) बच निकले। 1।
· बावन अखरी · राग गउड़ी
ढढा ढूढत कह फिरहु ढूढनु इआ मन माहि ॥
पउड़ी ॥
ढढा ढूढत कह फिरहु ढूढनु इआ मन माहि ॥
संगि तुहारै प्रभु बसै बनु बनु कहा फिराहि ॥
ढेरी ढाहहु साधसंगि अहंबुधि बिकराल ॥
सुखु पावहु सहजे बसहु दरसनु देखि निहाल ॥
ढेरी जामै जमि मरै गरभ जोनि दुख पाइ ॥
मोह मगन लपटत रहै हउ हउ आवै जाइ ॥
ढहत ढहत अब ढहि परे साध जना सरनाइ ॥
दुख के फाहे काटिआ नानक लीए समाइ ॥30॥
ढढा ढूढत कह फिरहु ढूढनु इआ मन माहि ॥
संगि तुहारै प्रभु बसै बनु बनु कहा फिराहि ॥
ढेरी ढाहहु साधसंगि अहंबुधि बिकराल ॥
सुखु पावहु सहजे बसहु दरसनु देखि निहाल ॥
ढेरी जामै जमि मरै गरभ जोनि दुख पाइ ॥
मोह मगन लपटत रहै हउ हउ आवै जाइ ॥
ढहत ढहत अब ढहि परे साध जना सरनाइ ॥
दुख के फाहे काटिआ नानक लीए समाइ ॥30॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ ओर कहाँ तलाशते फिरते हैं? खोज इस मन में ही (करनी है)। (हे भाई!) प्रभू आपके साथ (हृदय में) बस रहा है। आप उसे जंगल जंगल कहाँ ढूँढते फिरते हैं? साध-संगत में (पहुँच के) भयानक अहंकार वाली मति की बनी हुई ढेरी को गिरा दें (इस तरह अंदर ही प्रभू का दर्शन हो जाएगा। प्रभू का) दर्शन करके आत्मा खिल उठेगी। आत्मिक आनंद मिलेगा। अडोल अवस्था में टिक जाएँगे। जब तक अंदर अहंकार का ढेर बना रहता है। आदमी पैदा होता मरता है। जूनियों के चक्कर में दुख भोगता है। मोह में मस्त हो के (माया के साथ) चिपका रहता है। अहं के कारन जनम मरन में पड़ा रहता है। हे नानक! जो लोग इस जनम में साध जनों की शरण आ पड़ते हैं। उनकी (मोह से उपजी) दुखों की फाहियां (जंजीरें) काटी जाती हैं। उन्हें प्रभू अपने चरणों में जोड़ लेता है। 30।
· बावन अखरी · राग गउड़ी
जह साधू गोबिद भजनु कीरतनु नानक नीत ॥
सलोकु ॥
जह साधू गोबिद भजनु कीरतनु नानक नीत ॥
णा हउ णा तूं णह छुटहि निकटि न जाईअहु दूत ॥1॥
जह साधू गोबिद भजनु कीरतनु नानक नीत ॥
णा हउ णा तूं णह छुटहि निकटि न जाईअहु दूत ॥1॥
हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ (धर्मराज कहता है) हे मेरे दूतो! जहाँ साध जन परमात्मा का भजन कर रहे हों। जहाँ नित्य कीर्तन हो रहा है। आप उस जगह के पास ना जाएँ। (अगर आप वहां चले गए तो इस खुनामी से) ना मैं बचूँगा। ना आप बचेंगे। 1।
· बावन अखरी · राग गउड़ी
णाणा रण ते सीझीऐ आतम जीतै कोइ ॥
पउड़ी ॥
णाणा रण ते सीझीऐ आतम जीतै कोइ ॥
हउमै अन सिउ लरि मरै सो सोभा दू होइ ॥
मणी मिटाइ जीवत मरै गुर पूरे उपदेस ॥
मनूआ जीतै हरि मिलै तिह सूरतण वेस ॥
णा को जाणै आपणो एकहि टेक अधार ॥
रैणि दिणसु सिमरत रहै सो प्रभु पुरखु अपार ॥
रेण सगल इआ मनु करै एऊ करम कमाइ ॥
हुकमै बूझै सदा सुखु नानक लिखिआ पाइ ॥31॥
णाणा रण ते सीझीऐ आतम जीतै कोइ ॥
हउमै अन सिउ लरि मरै सो सोभा दू होइ ॥
मणी मिटाइ जीवत मरै गुर पूरे उपदेस ॥
मनूआ जीतै हरि मिलै तिह सूरतण वेस ॥
णा को जाणै आपणो एकहि टेक अधार ॥
रैणि दिणसु सिमरत रहै सो प्रभु पुरखु अपार ॥
रेण सगल इआ मनु करै एऊ करम कमाइ ॥
हुकमै बूझै सदा सुखु नानक लिखिआ पाइ ॥31॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ इस जगत रण-भूमि में अहंकार से हो रही जंग से तभी कामयाब हो सकते हैं। अगर मनुष्य अपने आप को जीत ले। जो मनुष्य अहंकार व द्वैत से मुकाबला करके अहंकार की ओर से मर जाता है। वही बड़ा शूरबीर है। जो मनुष्य गुरू की शिक्षा ले के अहंकार को खत्म कर लेता है। संसारिक वासना से अजेय हो जाता है। अपने मन को अपने वश में कर लेता है। वह मनुष्य परमात्मा को मिल जाता है (संसारिक रणभूमि में) उसी की पोशाक शूरवीरों वाली समझें। हे नानक! जो मनुष्य एक परमात्मा का ही आसरा-सहारा लेता है। किसी और को अपना आसरा नहीं समझता। सर्व-व्यापक बेअंत प्रभू को दिन रात हर वक्त सिमरता रहता है। अपने इस मन को सभी की चरण-धूड़ बनाता है, जो मनुष्य ये कर्म कमाता है। वह परमात्मा की रजा को समझ लेता है। सदा आत्मिक आनंद पाता है। पिछले किए कर्मों के लेख उसके माथे पर प्रगट हो जाते हैं। 31।
· बावन अखरी · राग गउड़ी
तनु मनु धनु अरपउ तिसै प्रभू मिलावै मोहि ॥
सलोकु ॥
तनु मनु धनु अरपउ तिसै प्रभू मिलावै मोहि ॥
नानक भ्रम भउ काटीऐ चूकै जम की जोह ॥1॥
तनु मनु धनु अरपउ तिसै प्रभू मिलावै मोहि ॥
नानक भ्रम भउ काटीऐ चूकै जम की जोह ॥1॥
हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ हे नानक! (कहें) जो मनुष्य मुझे ईश्वर से मिला दे। मैं उसके आगे अपना तन-मन-धन सब कुछ भेट कर दूँ। (क्योंकि प्रभू को मिल के) मन की भटकना और सहम दूर हो जाते हैं। जम की नजर भी खत्म हो जाती है। (मौत का सहम भी खत्म हो जाता है)। 1।
· बावन अखरी · राग गउड़ी
तता ता सिउ प्रीति करि गुण निधि गोबिद राइ ॥
पउड़ी ॥
तता ता सिउ प्रीति करि गुण निधि गोबिद राइ ॥
फल पावहि मन बाछते तपति तुहारी जाइ ॥
तता ता सिउ प्रीति करि गुण निधि गोबिद राइ ॥
फल पावहि मन बाछते तपति तुहारी जाइ ॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ (हे भाई!) उस गोबिंद राय के साथ प्यार डाल जो सारे गुणों का खजाना है। मन-इच्छित फल हासिल करेगा। आपके मन की (तृष्णा की आग) तपश दूर हो जाएगी।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 256 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।