ठठा मनूआ ठाहहि नाही ॥ जो सगल तिआगि एकहि लपटाही ॥
ठहकि ठहकि माइआ संगि मूए ॥
उआ कै कुसल न कतहू हूए ॥
ठांढि परी संतह संगि बसिआ ॥
अंम्रित नामु तहा जीअ रसिआ ॥
ठाकुर अपुने जो जनु भाइआ ॥
नानक उआ का मनु सीतलाइआ ॥28॥
डंडउति बंदन अनिक बार सरब कला समरथ ॥
डोलन ते राखहु प्रभू नानक दे करि हथ ॥1॥
डडा डेरा इहु नही जह डेरा तह जानु ॥
उआ डेरा का संजमो गुर कै सबदि पछानु ॥
इआ डेरा कउ स्रमु करि घालै ॥
जा का तसू नही संगि चालै ॥
उआ डेरा की सो मिति जानै ॥
जा कउ द्रिसटि पूरन भगवानै ॥
डेरा निहचलु सचु साधसंग पाइआ ॥
नानक ते जन नह डोलाइआ ॥29॥
ढाहन लागे धरम राइ किनहि न घालिओ बंध ॥
नानक उबरे जपि हरी साधसंगि सनबंध ॥1॥
ढढा ढूढत कह फिरहु ढूढनु इआ मन माहि ॥
संगि तुहारै प्रभु बसै बनु बनु कहा फिराहि ॥
ढेरी ढाहहु साधसंगि अहंबुधि बिकराल ॥
सुखु पावहु सहजे बसहु दरसनु देखि निहाल ॥
ढेरी जामै जमि मरै गरभ जोनि दुख पाइ ॥
मोह मगन लपटत रहै हउ हउ आवै जाइ ॥
ढहत ढहत अब ढहि परे साध जना सरनाइ ॥
दुख के फाहे काटिआ नानक लीए समाइ ॥30॥
जह साधू गोबिद भजनु कीरतनु नानक नीत ॥
णा हउ णा तूं णह छुटहि निकटि न जाईअहु दूत ॥1॥
णाणा रण ते सीझीऐ आतम जीतै कोइ ॥
हउमै अन सिउ लरि मरै सो सोभा दू होइ ॥
मणी मिटाइ जीवत मरै गुर पूरे उपदेस ॥
मनूआ जीतै हरि मिलै तिह सूरतण वेस ॥
णा को जाणै आपणो एकहि टेक अधार ॥
रैणि दिणसु सिमरत रहै सो प्रभु पुरखु अपार ॥
रेण सगल इआ मनु करै एऊ करम कमाइ ॥
हुकमै बूझै सदा सुखु नानक लिखिआ पाइ ॥31॥
तनु मनु धनु अरपउ तिसै प्रभू मिलावै मोहि ॥
नानक भ्रम भउ काटीऐ चूकै जम की जोह ॥1॥
तता ता सिउ प्रीति करि गुण निधि गोबिद राइ ॥
फल पावहि मन बाछते तपति तुहारी जाइ ॥
गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 9 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “पउड़ी- जो मनुष्य (माया के) सारे (मोह) त्याग के सिर्फ प्रभू-चरणों में जुड़े रहते हें।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।