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अंग 256

अंग
256
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
पउड़ी ॥
ठठा मनूआ ठाहहि नाही ॥ जो सगल तिआगि एकहि लपटाही ॥
ठहकि ठहकि माइआ संगि मूए ॥
उआ कै कुसल न कतहू हूए ॥
ठांढि परी संतह संगि बसिआ ॥
अंम्रित नामु तहा जीअ रसिआ ॥
ठाकुर अपुने जो जनु भाइआ ॥
नानक उआ का मनु सीतलाइआ ॥28॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी- जो मनुष्य (माया के) सारे (मोह) त्याग के सिर्फ प्रभू-चरणों में जुड़े रहते हें। वह (फिर मायावी पदार्थों की खातिर दूसरों से) वैर-विरोध बना बना के आत्मिक मौत सहेड़ते हैं। उनके अंदर कभी आत्मिक आनंद नहीं आ सकता। जो मनुष्य गुरमुखों की संगति में निवास रखता है। उसके मन में शीतलता बनी रहती है। प्रभू का आत्मिक अमरता देने वाला नाम उसकी जिंद में रच जाता है। हे नानक ! जो मनुष्य प्यारे परमात्मा को अच्छा लगने लग जाता है। उसका मन (माया की तृष्णा रूपी आग में से बच के) सदा शांत रहता है। 28।
सलोकु ॥
डंडउति बंदन अनिक बार सरब कला समरथ ॥
डोलन ते राखहु प्रभू नानक दे करि हथ ॥1॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ हे नानक ! (ऐसे अरदास कर-) हे सारी ताकतें रखने वाले प्रभू ! मैं अनेकों बार आपको नमस्कार करता हूँ। मुझे माया के मोह में फिसलने से अपना हाथ दे के बचा ले।1।
पउड़ी ॥
डडा डेरा इहु नही जह डेरा तह जानु ॥
उआ डेरा का संजमो गुर कै सबदि पछानु ॥
इआ डेरा कउ स्रमु करि घालै ॥
जा का तसू नही संगि चालै ॥
उआ डेरा की सो मिति जानै ॥
जा कउ द्रिसटि पूरन भगवानै ॥
डेरा निहचलु सचु साधसंग पाइआ ॥
नानक ते जन नह डोलाइआ ॥29॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी- (हे भाई !) ये संसार आपके सदा टिके रहने वाली जगह नहीं। उस ठिकाने को पहिचान। जो असल पक्की रिहायश वाला घर है। गुरू के शबद में जुड़ के ये सूझ हासिल कर कि उस घर में सदा टिके रहने की क्या जुगति है। मनुष्य इस दुनियावी डेरे की खातिर बड़ी मेहनत करके कोशिशें करता है। पर (मौत आने पर) इनमें से कुछ भी रक्ती भर भी इसके साथ नहीं जाता। उस सदीवी ठिकाने की रीत-मर्यादा की सिर्फ उस मनुष्य को समझ पड़ती है। जिस पर पूरन प्रभू की मेहर की नजर होती है। हे नानक ! साध-संगति में आ के जो मनुष्य सदीवी अटल आत्मिक आनंद वाला ठिकाना ढूँढ लेते हैं। उनका मन (इस नाशवंत संसार के घरों आदि खातिर) नहीं डोलता।
सलोकु ॥
ढाहन लागे धरम राइ किनहि न घालिओ बंध ॥
नानक उबरे जपि हरी साधसंगि सनबंध ॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ उन (के आत्मिक जीवन की इमारत) को विकारों के बाढ़ से नुकसान नहीं होता। कोई भी विकार उनके जीवन राह में रोक नहीं डाल सकता। हे नानक ! जिन लोगों ने साध-संगति में नाता जोड़ा। वह हरी का नाम जप के (विकारों के हड़ में से) बच निकले।1।
पउड़ी ॥
ढढा ढूढत कह फिरहु ढूढनु इआ मन माहि ॥
संगि तुहारै प्रभु बसै बनु बनु कहा फिराहि ॥
ढेरी ढाहहु साधसंगि अहंबुधि बिकराल ॥
सुखु पावहु सहजे बसहु दरसनु देखि निहाल ॥
ढेरी जामै जमि मरै गरभ जोनि दुख पाइ ॥
मोह मगन लपटत रहै हउ हउ आवै जाइ ॥
ढहत ढहत अब ढहि परे साध जना सरनाइ ॥
दुख के फाहे काटिआ नानक लीए समाइ ॥30॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी- ओर कहाँ तलाशते फिरते हैं? खोज इस मन में ही (करनी है)। (हे भाई !) प्रभू आपके साथ (हृदय में) बस रहा है। आप उसे जंगल जंगल कहाँ ढूँढते फिरते हैं? साध-संगत में (पहुँच के) भयानक अहंकार वाली मति की बनी हुई ढेरी को गिरा दो (इस तरह अंदर ही प्रभू का दर्शन हो जाएगा। प्रभू का) दर्शन करके आत्मा खिल उठेगी। आत्मिक आनंद मिलेगा। अडोल अवस्था में टिक जाएँगे। जब तक अंदर अहंकार का ढेर बना रहता है। आदमी पैदा होता मरता है। जूनियों के चक्कर में दुख भोगता है। मोह में मस्त हो के (माया के साथ) चिपका रहता है। अहं के कारन जनम मरन में पड़ा रहता है। हे नानक ! जो लोग इस जनम में साध जनों की शरण आ पड़ते हैं। उनकी (मोह से उपजी) दुखों की फाहियां (जंजीरें) काटी जाती हैं। उन्हें प्रभू अपने चरणों में जोड़ लेता है। 30।
सलोकु ॥
जह साधू गोबिद भजनु कीरतनु नानक नीत ॥
णा हउ णा तूं णह छुटहि निकटि न जाईअहु दूत ॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ (धर्मराज कहता है) हे मेरे दूतो ! जहाँ साध जन परमात्मा का भजन कर रहे हों। जहाँ नित्य कीर्तन हो रहा हैं। आप उस जगह के पास ना जाना। (अगर आप वहां चले गए तो इस खुनामी से) ना मैं बचूँगा। ना आप बचोगे। 1।
पउड़ी ॥
णाणा रण ते सीझीऐ आतम जीतै कोइ ॥
हउमै अन सिउ लरि मरै सो सोभा दू होइ ॥
मणी मिटाइ जीवत मरै गुर पूरे उपदेस ॥
मनूआ जीतै हरि मिलै तिह सूरतण वेस ॥
णा को जाणै आपणो एकहि टेक अधार ॥
रैणि दिणसु सिमरत रहै सो प्रभु पुरखु अपार ॥
रेण सगल इआ मनु करै एऊ करम कमाइ ॥
हुकमै बूझै सदा सुखु नानक लिखिआ पाइ ॥31॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी- इस जगत रण-भूमि में अहंकार से हो रही जंग से तभी कामयाब हो सकते हैं। अगर मनुष्य अपने आप को जीत ले। जो मनुष्य अहंकार व द्वैत से मुकाबला करके अहंकार की ओर से मर जाता है। वही बड़ा शूरबीर है। जो मनुष्य गुरू की शिक्षा ले के अहंकार को खत्म कर लेता है। संसारिक वासना से अजेय हो जाता है। अपने मन को अपने वश में कर लेता है। वह मनुष्य परमात्मा को मिल जाता है (संसारिक रणभूमि में) उसी की पोशाक शूरवीरों वाली समझो। हे नानक ! जो मनुष्य एक परमात्मा का ही आसरा-सहारा लेता है। किसी और को अपना आसरा नहीं समझता। सर्व-व्यापक बेअंत प्रभू को दिन रात हर वक्त सिमरता रहता है। अपने इस मन को सभी की चरण-धूड़ बनाता है -जो मनुष्य ये कर्म कमाता है। वह परमात्मा की रजा को समझ लेता है। सदा आत्मिक आनंद पाता है। पिछले किए कर्मों के लेख उसके माथे पर प्रगट हो जाते हैं। 31।
सलोकु ॥
तनु मनु धनु अरपउ तिसै प्रभू मिलावै मोहि ॥
नानक भ्रम भउ काटीऐ चूकै जम की जोह ॥1॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ हे नानक ! (कह) जो मनुष्य मुझे ईश्वर से मिला दे। मैं उसके आगे अपना तन-मन-धन सब कुछ भेट कर दूँ। (क्योंकि प्रभू को मिल के) मन की भटकना और सहम दूर हो जाते हैं। जम की नजर भी खत्म हो जाती है। (मौत का सहम भी खत्म हो जाता है)। 1।
पउड़ी ॥
तता ता सिउ प्रीति करि गुण निधि गोबिद राइ ॥
फल पावहि मन बाछते तपति तुहारी जाइ ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी- (हे भाई !) उस गोबिंद राय के साथ प्यार डाल जो सारे गुणों का खजाना है। मन-इच्छित फल हासिल करेगा। आपके मन की (तृष्णा की आग) तपश दूर हैं जाएगी।

गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 9 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “पउड़ी- जो मनुष्य (माया के) सारे (मोह) त्याग के सिर्फ प्रभू-चरणों में जुड़े रहते हें।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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