गनि मिनि देखहु मनै माहि सरपर चलनो लोग ॥
आस अनित गुरमुखि मिटै नानक नाम अरोग ॥1॥
गगा गोबिद गुण रवहु सासि सासि जपि नीत ॥
कहा बिसासा देह का बिलम न करिहो मीत ॥
नह बारिक नह जोबनै नह बिरधी कछु बंधु ॥
ओह बेरा नह बूझीऐ जउ आइ परै जम फंधु ॥
गिआनी धिआनी चतुर पेखि रहनु नही इह ठाइ ॥
छाडि छाडि सगली गई मूड़ तहा लपटाहि ॥
गुर प्रसादि सिमरत रहै जाहू मसतकि भाग ॥
नानक आए सफल ते जा कउ प्रिअहि सुहाग ॥19॥
घोखे सासत्र बेद सभ आन न कथतउ कोइ ॥
आदि जुगादी हुणि होवत नानक एकै सोइ ॥1॥
घघा घालहु मनहि एह बिनु हरि दूसर नाहि ॥
नह होआ नह होवना जत कत ओही समाहि ॥
घूलहि तउ मन जउ आवहि सरना ॥
नाम ततु कलि महि पुनहचरना ॥
घालि घालि अनिक पछुतावहि ॥
बिनु हरि भगति कहा थिति पावहि ॥
घोलि महा रसु अंम्रितु तिह पीआ ॥
नानक हरि गुरि जा कउ दीआ ॥20॥
ङणि घाले सभ दिवस सास नह बढन घटन तिलु सार ॥
जीवन लोरहि भरम मोह नानक तेऊ गवार ॥1॥
ङंङा ङ्रासै कालु तिह जो साकत प्रभि कीन ॥
अनिक जोनि जनमहि मरहि आतम रामु न चीन ॥
ङिआन धिआन ताहू कउ आए ॥
करि किरपा जिह आपि दिवाए ॥
ङणती ङणी नही कोऊ छूटै ॥
काची गागरि सरपर फूटै ॥
सो जीवत जिह जीवत जपिआ ॥
प्रगट भए नानक नह छपिआ ॥21॥
चिति चितवउ चरणारबिंद ऊध कवल बिगसांत ॥
प्रगट भए आपहि गोुबिंद नानक संत मतांत ॥1॥
चचा चरन कमल गुर लागा ॥ धनि धनि उआ दिन संजोग सभागा ॥
चारि कुंट दह दिसि भ्रमि आइओ ॥
भई क्रिपा तब दरसनु पाइओ ॥
चार बिचार बिनसिओ सभ दूआ ॥
साधसंगि मनु निरमल हूआ ॥
चिंत बिसारी एक द्रिसटेता ॥
नानक गिआन अंजनु जिह नेत्रा ॥22॥
छाती सीतल मनु सुखी छंत गोबिद गुन गाइ ॥
ऐसी किरपा करहु प्रभ नानक दास दसाइ ॥1॥
छछा छोहरे दास तुमारे ॥
दास दासन के पानीहारे ॥
छछा छारु होत तेरे संता ॥
गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 10 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सलोकु ॥ (हे भाई !) मन में अच्छी तरह विचार के देख लो।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।