Lulla Family

अंग 254

अंग
254
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सलोकु ॥
गनि मिनि देखहु मनै माहि सरपर चलनो लोग ॥
आस अनित गुरमुखि मिटै नानक नाम अरोग ॥1॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ (हे भाई !) मन में अच्छी तरह विचार के देख लो। सारा जगत जरूर (अपनी अपनी बारी यहाँ से) चला जाएगा (फिर नाशवंत के लिए आस क्यूँ?) हे नानक ! प्रभू का नाम मनुष्य के मन को (आशा आदि के) रोगों से बचा लेता है। गुरू की शरण पड़ने से नाश-वंत पदार्थों की आस मिट जाती है। 1।
पउड़ी ॥
गगा गोबिद गुण रवहु सासि सासि जपि नीत ॥
कहा बिसासा देह का बिलम न करिहो मीत ॥
नह बारिक नह जोबनै नह बिरधी कछु बंधु ॥
ओह बेरा नह बूझीऐ जउ आइ परै जम फंधु ॥
गिआनी धिआनी चतुर पेखि रहनु नही इह ठाइ ॥
छाडि छाडि सगली गई मूड़ तहा लपटाहि ॥
गुर प्रसादि सिमरत रहै जाहू मसतकि भाग ॥
नानक आए सफल ते जा कउ प्रिअहि सुहाग ॥19॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ (हे मित्र !) श्वास-श्वास सदा गोबिंद का नाम जपो। प्रभू के गुण चेते करते रहो। (देखना) ढील ना करनी। इस शरीर का कोई भरोसा नहीं। बालपन हो। जवानी हो या बुढ़ापा हो (मौत के आने में किसी भी वक्त) कोई रुकावट नहीं। उस वक्त का पता नहीं लग सकता। जब जम का फंदा (गले में) आ पड़ता है। देखो ! ज्ञानवान हो। सुरति जोड़ने वाले हों। चाहे समझदार (सियाणे) हों। किसी ने भी सदा इस जगह टिके नहीं रहना। मूर्ख ही उन पदार्थों को जफ्फा मारते हैं जिन्हें (अपनी अपनी बारी) सारी दुनिया छोड़ गई। जिस मनुष्य के माथे पर भाग्यों के लेख अंकुरित हों। वह गुरू की कृपा से सदा प्रभू का नाम सिमरता रहता है। हे नानक ! जिन्होंने प्यारे प्रभू का सुहाग (खसमाना) नसीब है। उनका ही जगत में आना मुबारक है। 19।
सलोकु ॥
घोखे सासत्र बेद सभ आन न कथतउ कोइ ॥
आदि जुगादी हुणि होवत नानक एकै सोइ ॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक सारे वेद-शास्त्र विचार के देख लिए हैं। इनमें से कोई भी ये नहीं कहता कि परमातमा के बिना कोई और भी सदा स्थिर रहने वाला है। हे नानक ! एक परमात्मा ही है जो जगत के शुरू से है। युगों के आरम्भ से है। अब भी है और आगे भी रहेगा। 1।
पउड़ी ॥
घघा घालहु मनहि एह बिनु हरि दूसर नाहि ॥
नह होआ नह होवना जत कत ओही समाहि ॥
घूलहि तउ मन जउ आवहि सरना ॥
नाम ततु कलि महि पुनहचरना ॥
घालि घालि अनिक पछुतावहि ॥
बिनु हरि भगति कहा थिति पावहि ॥
घोलि महा रसु अंम्रितु तिह पीआ ॥
नानक हरि गुरि जा कउ दीआ ॥20॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। (हे भाई !) अपने मन में (ये सच्चाई) अच्छी तरह बैठा लो कि प्रभू के बिना और कोई सदा स्थिर नहीं। ना कोई अब तक हुआ है ना ही होंगे। हर जगह वह प्रभू ही मौजूद है। हे मन ! अगर आप उस सदा स्थिर हरी की शरण पड़े। तो ही रस पाएगा। इस मानस जनम में एक प्रभू का नाम ही है जो किये विकारों का प्रभाव मिटा सकता है। अनेकों ही लोग (हरी सिमरन के बिना) विभिन्न तरह की मेहनत कर करके आखिर में पछताते ही हैं। परमात्मा की भक्ती के बिना और कहीं भी मन को शान्ति नहीं मिलती। उसने महा = रस वाला (अत्यंत स्वादिष्ट) नाम = अमृत घोल के पी लिया (भाव। उसने बड़े प्रेम के साथ नाम जपा जिस में से ऐसा स्वाद आया जैसे किसी अति मीठे शर्बत आदि में से)। हे नानक ! गुरू ने जिस को हरी-नाम की दाति दे दी। 20।
सलोकु ॥
ङणि घाले सभ दिवस सास नह बढन घटन तिलु सार ॥
जीवन लोरहि भरम मोह नानक तेऊ गवार ॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: श्लोक (जीव की उम्र के) सारा दिन श्वास गिन के ही (जीव को जगत में) भेजता है। (उस गिनती से) एक तिल जितना भी कम-ज्यादा नहीं होता। हे नानक ! वे लोग मूर्ख हैं जो मोह की भटकना में पड़ कर (प्रभू द्वारा मिली उम्र से ज्यादा) जीने की तमन्ना रखते हैं। 1।
पउड़ी ॥
ङंङा ङ्रासै कालु तिह जो साकत प्रभि कीन ॥
अनिक जोनि जनमहि मरहि आतम रामु न चीन ॥
ङिआन धिआन ताहू कउ आए ॥
करि किरपा जिह आपि दिवाए ॥
ङणती ङणी नही कोऊ छूटै ॥
काची गागरि सरपर फूटै ॥
सो जीवत जिह जीवत जपिआ ॥
प्रगट भए नानक नह छपिआ ॥21॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी मौत का डर उन लोगों को ग्रसता है जिन्हें प्रभू ने अपने से विछोड़ दिया है। उन्होंने व्यापक प्रभू को नहीं पहिचाना। और वे अनेक जूनियों में जन्म लेते मरते रहते हैं। (मौत का सहम उतार के) प्रभू के साथ सांझ उन्होंने ही डाली। प्रभू से सुरति उन्होंने ही जोड़ी। जिन्हें प्रभू ने मेहर करके ये दाति दी। सोचें सोचने से (भी इस होनी से) कोई बच नहीं सकता। (ये शरीर) कच्चा घड़ा है इसने जरूर टूटना है। (पर) हे नानक ! (कोई लम्बी उम्र जी गया। कोई थोड़ी) उसी को जीना समझो जिसने जीते-जी परमात्मा का सिमरन किया है। सिमरन करने वाला मनुष्य छुपा नहीं रहता। जगत में नाम भी कमाता है। 21।
सलोकु ॥
चिति चितवउ चरणारबिंद ऊध कवल बिगसांत ॥
प्रगट भए आपहि गोुबिंद नानक संत मतांत ॥1॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ (मैं तो अपने) चित्त में प्रभू सुंदर चरण टिकाता हूँ (जो जीव ये काम करता है उसका माया की ओर) उल्टा हुआ मन (सीधा हो के) कमल फूल की तरह खिल जाता है। हे नानक ! गुरू की शिक्षा से गोबिंद स्वयं ही उस हृदय में आ प्रगट होता है। 1।
पउड़ी ॥
चचा चरन कमल गुर लागा ॥ धनि धनि उआ दिन संजोग सभागा ॥
चारि कुंट दह दिसि भ्रमि आइओ ॥
भई क्रिपा तब दरसनु पाइओ ॥
चार बिचार बिनसिओ सभ दूआ ॥
साधसंगि मनु निरमल हूआ ॥
चिंत बिसारी एक द्रिसटेता ॥
नानक गिआन अंजनु जिह नेत्रा ॥22॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी जब (किसी जीव का माथा) गुरू के सुंदर चरणों से लगे, वह समय भाग्यशाली समझो (प्रभू के दीदार की खातिर जीव) चारों तरफ दसों दिशाओं में भी भटक आए (तब भी सफलता नहीं मिलती) दीदार तभी होता है। जब उसकी मेहर हो (और मेहर होने से ही गुरू की संगति मिलती है)। आचार – विचार स्वच्छ हो जाते हैं। माया का सारा प्यार समाप्त हो जाता है। गुरू की संगति में मन पवित्र हो जाता है। उसे (हर जगह) एक परमात्मा के ही दर्शन होते हैं। वह और सभी चितवनें (सोचें) विसार देता है (और एक परमात्मा को ही चितवता रहता है)। हे नानक ! (गुरू की बख्शी) सूझ का अंजन जिसकी आँखों में पड़ता है। 22।
सलोकु ॥
छाती सीतल मनु सुखी छंत गोबिद गुन गाइ ॥
ऐसी किरपा करहु प्रभ नानक दास दसाइ ॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ आपकी सिफत सालाह की बाणी गा के मेरे दिल में ठंड पड़ जाए। मेरा मन सुखी हैं जाए। हे नानक ! (कह) हे प्रभू ! मैं आपके दासों का दास हूँ। मुझ पर ऐसी मेहर कर 1।
पउड़ी ॥
छछा छोहरे दास तुमारे ॥
दास दासन के पानीहारे ॥
छछा छारु होत तेरे संता ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। मैं आपका दास हूँ। आपका बच्चा हूँ (मेहर कर) आपके दासों के दासों का मैं पानी भरने वाला बनूँ (उनकी सेवा में मुझे आनंद प्रतीत हो)। मैं आपके संतजनों की चरणधूड़ हैं जाऊँ।

गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 10 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सलोकु ॥ (हे भाई !) मन में अच्छी तरह विचार के देख लो।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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