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252
गउड़ी
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- रे मन बिनु हरि जह रचहु तह तह बंधन पाहि ॥
- टूटे बंधन जासु के होआ साधू संगु ॥
- रारा रंगहु इआ मनु अपना ॥
- लालच झूठ बिकार मोह बिआपत मूड़े अंध ॥
- लला लपटि बिखै रस राते ॥
- लाल गुपाल गोबिंद प्रभ गहिर गंभीर अथाह ॥
- लला ता कै लवै न कोऊ ॥
- आतम रसु जिह जानिआ हरि रंग सहजे माणु ॥
- आइआ सफल ताहू को गनीऐ ॥
- यासु जपत मनि होइ अनंदु बिनसै दूजा भाउ ॥ दूख दरद त्रिसना बुझै नानक नामि समाउ ॥1॥
· बावन अखरी · राग गउड़ी
रे मन बिनु हरि जह रचहु तह तह बंधन पाहि ॥
पउड़ी ॥
रे मन बिनु हरि जह रचहु तह तह बंधन पाहि ॥
जिह बिधि कतहू न छूटीऐ साकत तेऊ कमाहि ॥
हउ हउ करते करम रत ता को भारु अफार ॥
प्रीति नही जउ नाम सिउ तउ एऊ करम बिकार ॥
बाधे जम की जेवरी मीठी माइआ रंग ॥
भ्रम के मोहे नह बुझहि सो प्रभु सदहू संग ॥
लेखै गणत न छूटीऐ काची भीति न सुधि ॥
जिसहि बुझाए नानका तिह गुरमुखि निरमल बुधि ॥9॥
रे मन बिनु हरि जह रचहु तह तह बंधन पाहि ॥
जिह बिधि कतहू न छूटीऐ साकत तेऊ कमाहि ॥
हउ हउ करते करम रत ता को भारु अफार ॥
प्रीति नही जउ नाम सिउ तउ एऊ करम बिकार ॥
बाधे जम की जेवरी मीठी माइआ रंग ॥
भ्रम के मोहे नह बुझहि सो प्रभु सदहू संग ॥
लेखै गणत न छूटीऐ काची भीति न सुधि ॥
जिसहि बुझाए नानका तिह गुरमुखि निरमल बुधि ॥9॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ हे मेरे मन! प्रभू के बिना और जहां जहां प्रेम डालेगा। वहां वहां माया के बंधन पड़ेंगे। हरी से विछुड़े लोग वही काम करते हैं कि उस तरीके से कहीं भी इन बंधनों से खलासी ना हो सके। (तीर्थ, दान अदिक) कर्मों के प्रेमी (ये कर्म करके, इनके किए का) गुमान करते फिरते हैं। इस अहंकार का भार भी असहि होता है। अगर प्रभू के नाम से प्यार नहीं बना, तो ये कर्म विकार रूप हो जाते हैं। मीठी माया के चमत्कारों में (फस के जीव) जम की फासी में बंध जाते हैं। भटकनों में फंसे हुओं को ये समझ नही आती कि प्रभू सदा हमारे साथ है। (हम जीव इतने माया-ग्रसे हुए हैं कि हमारे किए कुकर्मों का) लेखा करने से हम बरी नहीं हो सकते। (पानी से धोने पर) गारे की दीवार की सफाई नहीं हो सकती (और और गारा बनता जाएगा)। हे नानक! (कहें) प्रभू जिस मनुष्य को सूझ बख्शता है। गुरू की शरण पड़ कर उसकी बुद्धि पवित्र हो जाती है। 9।
· बावन अखरी · राग गउड़ी
टूटे बंधन जासु के होआ साधू संगु ॥
सलोकु ॥
टूटे बंधन जासु के होआ साधू संगु ॥
जो राते रंग एक कै नानक गूड़ा रंगु ॥1॥
टूटे बंधन जासु के होआ साधू संगु ॥
जो राते रंग एक कै नानक गूड़ा रंगु ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ जिस मनुष्य के माया के बंधन टूटने पर आते हैं। उसे गुरू की संगति प्राप्त होती है। हे नानक! (गुरू की संगति में रह के) जो एक प्रभू के प्यार रंग में रंगे जाते हैं। वह रंग ऐसा गाढ़ा होता है (कि मजीठ के रंग की तरह कभी उतरता नहीं)। 1।
· बावन अखरी · राग गउड़ी
रारा रंगहु इआ मनु अपना ॥
पउड़ी ॥
रारा रंगहु इआ मनु अपना ॥
हरि हरि नामु जपहु जपु रसना ॥
रे रे दरगह कहै न कोऊ ॥
आउ बैठु आदरु सुभ देऊ ॥
उआ महली पावहि तू बासा ॥
जनम मरन नह होइ बिनासा ॥
मसतकि करमु लिखिओ धुरि जा कै ॥
हरि संपै नानक घरि ता कै ॥10॥
रारा रंगहु इआ मनु अपना ॥
हरि हरि नामु जपहु जपु रसना ॥
रे रे दरगह कहै न कोऊ ॥
आउ बैठु आदरु सुभ देऊ ॥
उआ महली पावहि तू बासा ॥
जनम मरन नह होइ बिनासा ॥
मसतकि करमु लिखिओ धुरि जा कै ॥
हरि संपै नानक घरि ता कै ॥10॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ (इस तरह) अपने इस मन को (प्रभू के नाम रंग में) रंगें! (हे भाई!) जीभ से सदा हरी के नाम का जाप जपें। प्रभू की हजूरी में आपको कोई अनादरी के बोल नहीं बोलेगा। (बल्कि) बढ़िया आदर-सत्कार मिलेगा। (कहेंगे): आएँ बैठें! (हे भाई!) अगर आप नाम में मन रंग लें तो आपको प्रभू की हजूरी में ठिकाना मिल जाएगा। ना जनम मरन का चक्कर रह जाएगा। और ना ही कभी आत्मिक मौत होगी। पर हे नानक! धुर से ही जिस मनुष्य के माथे पर प्रभू की मेहर का लेख लिखा (उघड़ता) है। उसके ही हृदय-घर में ये नाम-धन इकट्ठा होता है। 10।
· बावन अखरी · राग गउड़ी
लालच झूठ बिकार मोह बिआपत मूड़े अंध ॥
सलोकु ॥
लालच झूठ बिकार मोह बिआपत मूड़े अंध ॥
लागि परे दुरगंध सिउ नानक माइआ बंध ॥1॥
लालच झूठ बिकार मोह बिआपत मूड़े अंध ॥
लागि परे दुरगंध सिउ नानक माइआ बंध ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक ॥ उन ज्ञान-हीन मूर्खों पर लालच झूठ विकार मोह आदि जोर डाल लेते हैं। और वह बुरे काम में लगे रहते हैं। हे नानक! जो मनुष्य माया के मोह के बंधनों में फंस जाते हैं। 1।
· बावन अखरी · राग गउड़ी
लला लपटि बिखै रस राते ॥
पउड़ी ॥
लला लपटि बिखै रस राते ॥
अहंबुधि माइआ मद माते ॥
इआ माइआ महि जनमहि मरना ॥
जिउ जिउ हुकमु तिवै तिउ करना ॥
कोऊ ऊन न कोऊ पूरा ॥
कोऊ सुघरु न कोऊ मूरा ॥
जितु जितु लावहु तितु तितु लगना ॥
नानक ठाकुर सदा अलिपना ॥11॥
लला लपटि बिखै रस राते ॥
अहंबुधि माइआ मद माते ॥
इआ माइआ महि जनमहि मरना ॥
जिउ जिउ हुकमु तिवै तिउ करना ॥
कोऊ ऊन न कोऊ पूरा ॥
कोऊ सुघरु न कोऊ मूरा ॥
जितु जितु लावहु तितु तितु लगना ॥
नानक ठाकुर सदा अलिपना ॥11॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ पजो मनुष्य माया के नशे में मस्त रहते हैं। जिनकी बुद्धि पर अहंकार का पर्दा पड़ जाता है। वे मनुष्य विषियों के स्वादों से चिपके रहते हैं। और इस माया में फस के जनम मरन (के चक्कर में पड़ जाते हैं)। (पर जीव के भी क्या वश?) जैसे जैसे प्रभू की रजा होती है, वैसे वैसे ही जीव कर्म करते हैं। (अपनी चतुराई से) ना कोई जीव पूर्ण बन सकता है। ना कोई कमजोर रह सकता है। ना कोई (अपने बूते पर) समझदार हो गया है। ना कोई मूर्ख रह गया है। हे प्रभू! जिस जिस तरफ आप जीवों को प्रेरते हैं। उधर उधर ही ये लग पड़ते हैं। हे नानक! (कैसी आश्चर्यजनक खेल है! सब जीवों में बैठ के पालणहार प्रभू प्रेरना कर रहा है। फिर भी) प्रभू खुद स्वयं माया के प्रभाव से परे है। 11।
· बावन अखरी · राग गउड़ी
लाल गुपाल गोबिंद प्रभ गहिर गंभीर अथाह ॥
सलोकु ॥
लाल गुपाल गोबिंद प्रभ गहिर गंभीर अथाह ॥
दूसर नाही अवर को नानक बेपरवाह ॥1॥
लाल गुपाल गोबिंद प्रभ गहिर गंभीर अथाह ॥
दूसर नाही अवर को नानक बेपरवाह ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक ॥ परमात्मा सब का प्यारा है। सृष्टि कर रक्षक है। सब की जानने वाला है उसका भेद नहीं पाया जा सकता। बड़े जिगरे वाला है। उसे एक ऐसा समुंद्र समझें। जिसकी गहराई व आकार समझ से परे है। कोई चिंता-फिक्र उसके नजदीक नहीं फटकते। हे नानक! उस जैसा और कोई दूसरा नहीं। 1।
· बावन अखरी · राग गउड़ी
लला ता कै लवै न कोऊ ॥
पउड़ी ॥
लला ता कै लवै न कोऊ ॥
एकहि आपि अवर नह होऊ ॥
होवनहारु होत सद आइआ ॥
उआ का अंतु न काहू पाइआ ॥
कीट हसति महि पूर समाने ॥
प्रगट पुरख सभ ठाऊ जाने ॥
जा कउ दीनो हरि रसु अपना ॥
नानक गुरमुखि हरि हरि तिह जपना ॥12॥
लला ता कै लवै न कोऊ ॥
एकहि आपि अवर नह होऊ ॥
होवनहारु होत सद आइआ ॥
उआ का अंतु न काहू पाइआ ॥
कीट हसति महि पूर समाने ॥
प्रगट पुरख सभ ठाऊ जाने ॥
जा कउ दीनो हरि रसु अपना ॥
नानक गुरमुखि हरि हरि तिह जपना ॥12॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ उस परमात्मा के बराबर का और कोई नहीं। (अपने जैसा) वह खुद ही है स्वयं ही है (उस जैसा) और कोई नही। सदा से ही वह प्रभू अस्तित्व वाला चला आ रहा है। किसी ने उस (की) हस्ती का आखिरी छोर नहीं पाया। कीड़ी से लेकर हाथी तक सब में पूण तौर पर प्रभू व्यापक है। वह सर्व-व्यापक परमात्मा हर जगह प्रत्यक्ष प्रतीत हो रहा है। हे नानक! जिस आदमी को प्रभू ने अपने नाम का स्वाद बख्शा है। वह बंदा गुरू की शरण पड़ कर सदा उसे जपता है। 12।
· बावन अखरी · राग गउड़ी
आतम रसु जिह जानिआ हरि रंग सहजे माणु ॥
सलोकु ॥
आतम रसु जिह जानिआ हरि रंग सहजे माणु ॥
नानक धनि धनि धंनि जन आए ते परवाणु ॥1॥
आतम रसु जिह जानिआ हरि रंग सहजे माणु ॥
नानक धनि धनि धंनि जन आए ते परवाणु ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ हे नानक! जो लोग अडोल अवस्था में टिक के प्रभू की याद का स्वाद लेते हैं। जिन्होंने इस आत्मिक आनंद के साथ सांझ डाली है। वे भाग्यशाली है। उनका ही जगत में पैदा सफल है। 1।
· बावन अखरी · राग गउड़ी
आइआ सफल ताहू को गनीऐ ॥
पउड़ी ॥
आइआ सफल ताहू को गनीऐ ॥
जासु रसन हरि हरि जसु भनीऐ ॥
आइ बसहि साधू कै संगे ॥
अनदिनु नामु धिआवहि रंगे ॥
आवत सो जनु नामहि राता ॥
जा कउ दइआ मइआ बिधाता ॥
एकहि आवन फिरि जोनि न आइआ ॥
नानक हरि कै दरसि समाइआ ॥13॥
आइआ सफल ताहू को गनीऐ ॥
जासु रसन हरि हरि जसु भनीऐ ॥
आइ बसहि साधू कै संगे ॥
अनदिनु नामु धिआवहि रंगे ॥
आवत सो जनु नामहि राता ॥
जा कउ दइआ मइआ बिधाता ॥
एकहि आवन फिरि जोनि न आइआ ॥
नानक हरि कै दरसि समाइआ ॥13॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ (जगत में) उसी मनुष्य का आना सफल हुआ जानें। जिस की जीभ सदा परमात्मा की सिफत सालाह करती है। (जो लोग) गुरू की हजूरी में आ टिकते हैं। वह हर वक्त प्यार से प्रभू का नाम सिमरते हैं। वह सदा परमात्मा के नाम में मस्त रहता है। जिस मनुष्य पर सृजनहार की मेहर की किरपा हुई। (जगत में) उसका जनम एक ही बार होता है। वह मुड़ मुड़ जूनियों में नहीं आता। (जगत में वही) आया समझें। हे नानक! जो मनुष्य परमात्मा के दीदार में लीन रहता है। 13।
· बावन अखरी · राग गउड़ी
यासु जपत मनि होइ अनंदु बिनसै दूजा भाउ ॥ दूख दरद त्रिसना बुझै नानक नामि समाउ ॥1॥
सलोकु ॥
यासु जपत मनि होइ अनंदु बिनसै दूजा भाउ ॥ दूख दरद त्रिसना बुझै नानक नामि समाउ ॥1॥
यासु जपत मनि होइ अनंदु बिनसै दूजा भाउ ॥ दूख दरद त्रिसना बुझै नानक नामि समाउ ॥1॥
हिन्दी अर्थ: शलोक॥ हे नानक! जिस प्रभू का नाम जपने से मन में आनंद पैदा होता है। (प्रभू से अलग) किसी और का मोह दूर हो सकता है। माया का लालच (और लालच से पैदा हुआ) दुख-कलेश मिट जाता है। उसके नाम में टिके रहें। 1।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 252 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।