यया जारउ दुरमति दोऊ ॥
तिसहि तिआगि सुख सहजे सोऊ ॥
यया जाइ परहु संत सरना ॥
जिह आसर इआ भवजलु तरना ॥
यया जनमि न आवै सोऊ ॥ एक नाम ले मनहि परोऊ ॥
यया जनमु न हारीऐ गुर पूरे की टेक ॥
नानक तिह सुखु पाइआ जा कै हीअरै एक ॥14॥
अंतरि मन तन बसि रहे ईत ऊत के मीत ॥
गुरि पूरै उपदेसिआ नानक जपीऐ नीत ॥1॥
अनदिनु सिमरहु तासु कउ जो अंति सहाई होइ ॥
इह बिखिआ दिन चारि छिअ छाडि चलिओ सभु कोइ ॥
का को मात पिता सुत धीआ ॥
ग्रिह बनिता कछु संगि न लीआ ॥
ऐसी संचि जु बिनसत नाही ॥
पति सेती अपुनै घरि जाही ॥
साधसंगि कलि कीरतनु गाइआ ॥
नानक ते ते बहुरि न आइआ ॥15॥
अति सुंदर कुलीन चतुर मुखि ङिआनी धनवंत ॥
मिरतक कहीअहि नानका जिह प्रीति नही भगवंत ॥1॥
ङंङा खटु सासत्र होइ ङिआता ॥
पूरकु कुंभक रेचक करमाता ॥
ङिआन धिआन तीरथ इसनानी ॥
सोमपाक अपरस उदिआनी ॥
राम नाम संगि मनि नही हेता ॥
जो कछु कीनो सोऊ अनेता ॥
उआ ते ऊतमु गनउ चंडाला ॥
नानक जिह मनि बसहि गुपाला ॥16॥
कुंट चारि दह दिसि भ्रमे करम किरति की रेख ॥
सूख दूख मुकति जोनि नानक लिखिओ लेख ॥1॥
कका कारन करता सोऊ ॥
लिखिओ लेखु न मेटत कोऊ ॥
नही होत कछु दोऊ बारा ॥
करनैहारु न भूलनहारा ॥
काहू पंथु दिखारै आपै ॥
काहू उदिआन भ्रमत पछुतापै ॥
आपन खेलु आप ही कीनो ॥
जो जो दीनो सु नानक लीनो ॥17॥
खात खरचत बिलछत रहे टूटि न जाहि भंडार ॥
हरि हरि जपत अनेक जन नानक नाहि सुमार ॥1॥
खखा खूना कछु नही तिसु संम्रथ कै पाहि ॥
जो देना सो दे रहिओ भावै तह तह जाहि ॥
खरचु खजाना नाम धनु इआ भगतन की रासि ॥
खिमा गरीबी अनद सहज जपत रहहि गुणतास ॥
खेलहि बिगसहि अनद सिउ जा कउ होत क्रिपाल ॥
सदीव गनीव सुहावने राम नाम ग्रिहि माल ॥
खेदु न दूखु न डानु तिह जा कउ नदरि करी ॥
नानक जो प्रभ भाणिआ पूरी तिना परी ॥18॥
गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 9 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “पउड़ी- (हे भाई !) बुरी मति और माया का प्यार जला दो।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।