लुल्ला परिवारLULLA FAMILY, शुरुआतEnglish
सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 253 · गउड़ी

इस पृष्ठ पर
अंग
253
गउड़ी
अंग बदलें या अंश चुनें · 9 अंश

1 से 1430 तक कोई अंक लिखिए।

  1. यया जारउ दुरमति दोऊ ॥
  2. अंतरि मन तन बसि रहे ईत ऊत के मीत ॥
  3. अनदिनु सिमरहु तासु कउ जो अंति सहाई होइ ॥
  4. अति सुंदर कुलीन चतुर मुखि ङिआनी धनवंत ॥
  5. ङंङा खटु सासत्र होइ ङिआता ॥
  6. कुंट चारि दह दिसि भ्रमे करम किरति की रेख ॥
  7. पवड़ी ॥
  8. खात खरचत बिलछत रहे टूटि न जाहि भंडार ॥
  9. खखा खूना कछु नही तिसु संम्रथ कै पाहि ॥

गुरु अर्जन देव जी · बावन अखरी · राग गउड़ी

यया जारउ दुरमति दोऊ ॥

पउड़ी ॥
यया जारउ दुरमति दोऊ ॥
तिसहि तिआगि सुख सहजे सोऊ ॥
यया जाइ परहु संत सरना ॥
जिह आसर इआ भवजलु तरना ॥
यया जनमि न आवै सोऊ ॥ एक नाम ले मनहि परोऊ ॥
यया जनमु न हारीऐ गुर पूरे की टेक ॥
नानक तिह सुखु पाइआ जा कै हीअरै एक ॥14॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ (हे भाई!) बुरी मति और माया का प्यार जला दें। इसे त्याग के ही सुख में अडोल अवस्था में टिके रहेंगे। जा के संतों की शरण पड़ें। इसी आसरे इस संसार-समुंद्र में से (सही सलामत) पार लांघ सकते हैं। वह बारंबार जन्मों में नहीं आता। जो बंदा एक प्रभू का नाम ले के अपने मन में परो लेता है। पूरे गुरू का आसरा लेने से मानस जनम व्यर्थ नहीं जाता। हे नानक! जिस मनुष्य के हृदय में एक प्रभू बस गया है। उसने आत्मिक आनंद हासिल कर लिया है। 14।

गुरु अर्जन देव जी · बावन अखरी · राग गउड़ी

अंतरि मन तन बसि रहे ईत ऊत के मीत ॥

सलोकु ॥
अंतरि मन तन बसि रहे ईत ऊत के मीत ॥
गुरि पूरै उपदेसिआ नानक जपीऐ नीत ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ जिस मनुष्य को पूरा गुरू लोक-परलोक में साथ देने वाला परमात्मा नजदीक दिखा देता है। परमात्मा उस मनुष्य के मन में तन में हर समय आ बसता है। हे नानक! पूर्ण गुरु उपदेश देता है, ऐसे प्रभू को सदा सिमरना चाहिए। 1।

गुरु अर्जन देव जी · बावन अखरी · राग गउड़ी

अनदिनु सिमरहु तासु कउ जो अंति सहाई होइ ॥

पउड़ी ॥
अनदिनु सिमरहु तासु कउ जो अंति सहाई होइ ॥
इह बिखिआ दिन चारि छिअ छाडि चलिओ सभु कोइ ॥
का को मात पिता सुत धीआ ॥
ग्रिह बनिता कछु संगि न लीआ ॥
ऐसी संचि जु बिनसत नाही ॥
पति सेती अपुनै घरि जाही ॥
साधसंगि कलि कीरतनु गाइआ ॥
नानक ते ते बहुरि न आइआ ॥15॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ जो प्रभू आखिर में सहायता करता है। उसे हर वक्त याद रखें। ये माया तो दस दिनों की साथिन है। हरेक जीव इसे यहीं छोड़ के चला जाता है। माता, पिता, पुत्र। पुत्री कोई भी किसी का साथी नहीं। घर-स्त्री कोई भी चीज कोई जीव यहाँ से साथ ले के नहीं जा सकता। (हे भाई!) ऐसी राशि-पूंजी इकट्ठी करें जिसका कभी नाश ना हो। और इज्जत से उस घर में जा सकें। जहाँ से कोई निकाल ना सके। हे नानक! जिन लोगों ने मानस जनम ले के सत्संग में प्रभू की सिफत-सालाह की। वे बार-बार जनम-मरण के चक्कर में नहीं आए। 15।

गुरु अर्जन देव जी · बावन अखरी · राग गउड़ी

अति सुंदर कुलीन चतुर मुखि ङिआनी धनवंत ॥

सलोकु ॥
अति सुंदर कुलीन चतुर मुखि ङिआनी धनवंत ॥
मिरतक कहीअहि नानका जिह प्रीति नही भगवंत ॥1॥

हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ यदि कोई बड़ा सुंदर। अच्छे कुल वाला। समझदार, ज्ञानवान व धनवान भी हो। पर, हे नानक! जिन के अंदर भगवान की प्रीति नहीं। वे मुर्दे ही कहे जाते हैं (भाव, विकारों में मरी हुई आत्मा वाले)। 1।

गुरु अर्जन देव जी · बावन अखरी · राग गउड़ी

ङंङा खटु सासत्र होइ ङिआता ॥

पउड़ी ॥
ङंङा खटु सासत्र होइ ङिआता ॥
पूरकु कुंभक रेचक करमाता ॥
ङिआन धिआन तीरथ इसनानी ॥
सोमपाक अपरस उदिआनी ॥
राम नाम संगि मनि नही हेता ॥
जो कछु कीनो सोऊ अनेता ॥
उआ ते ऊतमु गनउ चंडाला ॥
नानक जिह मनि बसहि गुपाला ॥16॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ कोई मनुष्य छे शास्त्रों को जानने वाला हो। (प्राणयाम के अभ्यास में) श्वास ऊपर चढ़ाने। रोक के रखने व नीचे उतारने के कर्म करता हैं। धार्मिक चर्चा करता हैं। समाधियां लगाता हैं। (स्वच्छता की खातिर) अपने हाथों से रोटी पकाता हैं। जंगलों में रहता हैं। पर यदि उसके मन में परमात्मा के नाम का ध्यान नहीं, तो उसने जो कुछ किया व्यर्थ ही किया। हे नानक! (कहें) जिस मनुष्य के मन में प्रभू जी नहीं बसते। उससे मैं एक नीच जाति के आदमी को बेहतर समझता हूँ। 16।

गुरु अर्जन देव जी · बावन अखरी · राग गउड़ी

कुंट चारि दह दिसि भ्रमे करम किरति की रेख ॥

सलोकु ॥
कुंट चारि दह दिसि भ्रमे करम किरति की रेख ॥
सूख दूख मुकति जोनि नानक लिखिओ लेख ॥1॥

हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ हे नानक! जीव अपने किए कर्मों के संस्कारों के अनुसार चारों तरफ दसों दिशाओं में भटकते हैं। लिखे लेखों के मुताबिक ही सुख-दुख-मुक्ति अथवा जनम-मरण के चक्कर मिलते हैं। 1। 2।

गुरु अर्जन देव जी · बावन अखरी · राग गउड़ी

पवड़ी ॥

पवड़ी ॥
कका कारन करता सोऊ ॥
लिखिओ लेखु न मेटत कोऊ ॥
नही होत कछु दोऊ बारा ॥
करनैहारु न भूलनहारा ॥
काहू पंथु दिखारै आपै ॥
काहू उदिआन भ्रमत पछुतापै ॥
आपन खेलु आप ही कीनो ॥
जो जो दीनो सु नानक लीनो ॥17॥

हिन्दी अर्थ: पवड़ी ॥ करतार स्वयं ही (जगत के कार्य-व्यवहार का) सबब बनाने वाला है। कोई जीव उसके द्वारा लिखे लेख को मिटा नहीं सकता। कोई काम उसे दूसरी बार (ठीक करके) नहीं करना पड़ता। सृजनहार भूलने वाला नहीं। (जो भी काम वह करता है। उसमें गलती नहीं रह जाती।) किसी जीव को खुद ही (जिंदगी का सही) रास्ता दिखाता है। किसी को खुद ही जंगल में भटका के पछुतावे की ओर ले जाता है। ये सारा जगत-खेल प्रभू ने स्वयं ही बनाया है। हे नानक! जो कुछ वह जीवों को देता है। वही उन्हें मिलता है। 17।

गुरु अर्जन देव जी · बावन अखरी · राग गउड़ी

खात खरचत बिलछत रहे टूटि न जाहि भंडार ॥

सलोकु ॥
खात खरचत बिलछत रहे टूटि न जाहि भंडार ॥
हरि हरि जपत अनेक जन नानक नाहि सुमार ॥1॥

हिन्दी अर्थ: सलोकु ॥ (भक्तो के पास सिफत सालाह के इतने खजाने इकट्ठे हो जाते हैं कि) वे उन खजानों को खाते-खरचते-भोगते हैं, पर वह कभी खत्म नहीं होते। हे नानक! अनेकों जीव। जिनकी गिनती नहीं की जा सकती। परमात्मा का नाम जपते हैं। 1।

गुरु अर्जन देव जी · बावन अखरी · राग गउड़ी

खखा खूना कछु नही तिसु संम्रथ कै पाहि ॥

पउड़ी ॥
खखा खूना कछु नही तिसु संम्रथ कै पाहि ॥
जो देना सो दे रहिओ भावै तह तह जाहि ॥
खरचु खजाना नाम धनु इआ भगतन की रासि ॥
खिमा गरीबी अनद सहज जपत रहहि गुणतास ॥
खेलहि बिगसहि अनद सिउ जा कउ होत क्रिपाल ॥
सदीव गनीव सुहावने राम नाम ग्रिहि माल ॥
खेदु न दूखु न डानु तिह जा कउ नदरि करी ॥
नानक जो प्रभ भाणिआ पूरी तिना परी ॥18॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ प्रभू सब ताकतों का मालिक है। उसके पास किसी भी चीज की कमी नहीं। उसके भक्त जन उसकी रजा में चलते हैं। उन्हें वह सब कुछ देता है। प्रभू का नाम-धन भक्तों की राशि पूँजी है। इसी खजाने को वे सदा इस्तेमाल करते हैं। वे सदा गुणों के खजाने प्रभू को सिमरते हैं और इससे उनके अंदर क्षमा-निम्रता-आत्मिक आनंद व अडोलता (आदि गुण प्रफुल्लित होते हैं)। वह जिन पर कृपा करता है। वह आत्मिक आनंद से जीवन की खेल खेलते हैं और सदा खिले रहते हैं। वे सदा ही धनवान हैं। उनके माथे चमकते हैं। उनके हृदय में बेअंत नाम-धन है। उनकी आत्मा को कोई कलेश नहीं। कोई दुख नहीं (जीवन-वणज में उन्हें कोई जिंमेदारी) बोझ नहीं लगती। जिन पर प्रभू मेहर की नजर करता है। हे नानक! जो मनुष्य प्रभू को अच्छे लगते हैं। (जीवन-व्यापार में) वह कामयाब हो जाते हैं। 18।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 253 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।