अंग
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गउड़ी
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- नाम बिहूने नानका होत जात सभु धूर ॥1॥
- पवड़ी ॥
- अनिक भेख अरु ङिआन धिआन मनहठि मिलिअउ न कोइ ॥
- ङंङा ङिआनु नही मुख बातउ ॥
- आवन आए स्रिसटि महि बिनु बूझे पसु ढोर ॥
- या जुग महि एकहि कउ आइआ ॥
- आवत हुकमि बिनास हुकमि आगिआ भिंन न कोइ ॥
- एऊ जीअ बहुतु ग्रभ वासे ॥
- किरत कमावन सुभ असुभ कीने तिनि प्रभि आपि ॥
- एकहि आपि करावनहारा ॥
- राचि रहे बनिता बिनोद कुसम रंग बिख सोर ॥
नाम बिहूने नानका होत जात सभु धूर ॥1॥
नाम बिहूने नानका होत जात सभु धूर ॥1॥
हिन्दी अर्थ: हे नानक ! नाम से विहीन रहके सारा जगत ही व्यर्थ जीवन गुजार जाता है। 1।
पवड़ी ॥
पवड़ी ॥
धधा धूरि पुनीत तेरे जनूआ ॥
धनि तेऊ जिह रुच इआ मनूआ ॥
धनु नही बाछहि सुरग न आछहि ॥
अति प्रिअ प्रीति साध रज राचहि ॥
धंधे कहा बिआपहि ताहू ॥ जो एक छाडि अन कतहि न जाहू ॥
जा कै हीऐ दीओ प्रभ नाम ॥
नानक साध पूरन भगवान ॥4॥
धधा धूरि पुनीत तेरे जनूआ ॥
धनि तेऊ जिह रुच इआ मनूआ ॥
धनु नही बाछहि सुरग न आछहि ॥
अति प्रिअ प्रीति साध रज राचहि ॥
धंधे कहा बिआपहि ताहू ॥ जो एक छाडि अन कतहि न जाहू ॥
जा कै हीऐ दीओ प्रभ नाम ॥
नानक साध पूरन भगवान ॥4॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे प्रभू ! आपके सेवकों के चरणों की धूड़ पवित्र (करने वाली होती) है। वह लोग भाग्यशाली हैं। जिनके मन में इस धूड़ की तमन्ना है। (ऐसे मनुष्य इस चरन-धूड़ के मुकाबले में दुनिया वाला) धन नहीं चाहते। स्वर्ग की भी चाहत नहीं रखते। वे तो अपने अति प्यारे प्रभू की प्रीति में और गुरमुखों की चरण-धूड़ में ही मस्त रहते हैं। माया के कोई जंजाल उन पर जोर नहीं डाल सकते। जो मनुष्य एक परमात्मा की ओट छोड़ के किसी और तरफ नहीं जाते। हे नानक ! प्रभू ने जिनके हृदय में अपना नाम बसा दिया है। वह भगवान का रूप पूरे संत हैं। 4।
अनिक भेख अरु ङिआन धिआन मनहठि मिलिअउ न कोइ ॥
सलोक ॥
अनिक भेख अरु ङिआन धिआन मनहठि मिलिअउ न कोइ ॥
कहु नानक किरपा भई भगतु ङिआनी सोइ ॥1॥
अनिक भेख अरु ङिआन धिआन मनहठि मिलिअउ न कोइ ॥
कहु नानक किरपा भई भगतु ङिआनी सोइ ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ अनेकों धार्मिक भेष धारण करने से। धर्म-चर्चा करने से। मन के हठ से समाधियां लगाने से कोई मनुष्य परमात्मा से नहीं मिल सकता। हे नानक ! कह,जिस पर प्रभू की मेहर हो। वही भगत बन सकता है। वही परमात्मा के साथ गहरी सांझ डाल सकता है। 1।
ङंङा ङिआनु नही मुख बातउ ॥
पउड़ी ॥
ङंङा ङिआनु नही मुख बातउ ॥
अनिक जुगति सासत्र करि भातउ ॥
ङिआनी सोइ जा कै द्रिड़ सोऊ ॥
कहत सुनत कछु जोगु न होऊ ॥
ङिआनी रहत आगिआ द्रिड़ु जा कै ॥
उसन सीत समसरि सभ ता कै ॥
ङिआनी ततु गुरमुखि बीचारी ॥
नानक जा कउ किरपा धारी ॥5॥
ङंङा ङिआनु नही मुख बातउ ॥
अनिक जुगति सासत्र करि भातउ ॥
ङिआनी सोइ जा कै द्रिड़ सोऊ ॥
कहत सुनत कछु जोगु न होऊ ॥
ङिआनी रहत आगिआ द्रिड़ु जा कै ॥
उसन सीत समसरि सभ ता कै ॥
ङिआनी ततु गुरमुखि बीचारी ॥
नानक जा कउ किरपा धारी ॥5॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी- निरी मुंह से की गई बातों से। शास्त्रों की अनेकों किस्म की युक्तियों के इस्तेमाल से परमात्मा से जान-पहिचान नहीं हो सकती। परमात्मा के साथ वही जान-पहिचान डाल सकता है। जिसके हृदय में प्रभू का पक्का निवास बने। निरी प्रभू मिलाप की बातें कहने-सुनने से प्रभू-मिलाप नहीं हो सकता। जिसके दिल में परमात्मा की रजा पक्की टिकी रहे। वही असल ज्ञानी है। उसे सारा दुख-सुख एक समान प्रतीत होता है। जो गुरू के द्वारा जगत के मूल प्रभू के गुणों का विचारवान बन जाए। हे नानक ! जिस मनुष्य पर प्रभू कृपा करे। उसकी सांझ परमात्मा के साथ बनती है। 5।
आवन आए स्रिसटि महि बिनु बूझे पसु ढोर ॥
सलोकु ॥
आवन आए स्रिसटि महि बिनु बूझे पसु ढोर ॥
नानक गुरमुखि सो बुझै जा कै भाग मथोर ॥1॥
आवन आए स्रिसटि महि बिनु बूझे पसु ढोर ॥
नानक गुरमुखि सो बुझै जा कै भाग मथोर ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक ॥ जगत में उन लोगों ने सिर्फ कहने मात्र को ही मानस जन्म लिया। पर जीवन का सही रास्ता समझे बिना वे पशु ही रहे (पशुओं वाली जिंदगी ही गुजारते रहे)। हे नानक ! वह मनुष्य गुरू के द्वारा जीवन का सही रास्ता समझता है। जिसके माथे पर (पूबर्लि कर्मों के अच्छे कर्मों के) भाग्य जाग पड़ें। 1।
या जुग महि एकहि कउ आइआ ॥
पउड़ी ॥
या जुग महि एकहि कउ आइआ ॥
जनमत मोहिओ मोहनी माइआ ॥
गरभ कुंट महि उरध तप करते ॥
सासि सासि सिमरत प्रभु रहते ॥
उरझि परे जो छोडि छडाना ॥
देवनहारु मनहि बिसराना ॥
धारहु किरपा जिसहि गुसाई ॥ इत उत नानक तिसु बिसरहु नाही ॥6॥
या जुग महि एकहि कउ आइआ ॥
जनमत मोहिओ मोहनी माइआ ॥
गरभ कुंट महि उरध तप करते ॥
सासि सासि सिमरत प्रभु रहते ॥
उरझि परे जो छोडि छडाना ॥
देवनहारु मनहि बिसराना ॥
धारहु किरपा जिसहि गुसाई ॥ इत उत नानक तिसु बिसरहु नाही ॥6॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी- मनुष्य इस जन्म में सिर्फ परमात्मा का सिमरन करने के लिए जन्मा है। पर पैदा होते ही इसे ठगनी माया ठॅग लेती है। (ये आम प्रचलित विचार है कि) जीव माँ के पेट में उल्टे लटके हुए परमात्मा का भजन करते रहते हैं। वहां श्वास-श्वास प्रभू को सिमरते रहते हैं (पर प्रभू की अजब माया है कि) जिस माया को अवश्य ही छोड़ जाना है उससे सारी जिंदगी फसे रहते हैं। पर जो प्रभू सारे पदार्थ देने वाला है उसे मन से भुला देते हैं। हे नानक ! (कह) हे मालिक प्रभू ! जिस मनुष्य पर आप कृपा करते हैं। उसके मन से आप लोक-परलोक में कभी नहीं बिसरता। 6।
आवत हुकमि बिनास हुकमि आगिआ भिंन न कोइ ॥
सलोकु ॥
आवत हुकमि बिनास हुकमि आगिआ भिंन न कोइ ॥
आवन जाना तिह मिटै नानक जिह मनि सोइ ॥1॥
आवत हुकमि बिनास हुकमि आगिआ भिंन न कोइ ॥
आवन जाना तिह मिटै नानक जिह मनि सोइ ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ जीव प्रभू के हुकम में पैदा होता है। हुकम में ही मरता है। कोई भी जीव प्रभू के हुकम से आकी नहीं हो सकता। हे नानक ! (सिर्फ) उस जीव का जन्म मरण (का चक्कर) खत्म होता है जिस के मन में वह (हुकम का मालिक प्रभू) बसता है। 1।
एऊ जीअ बहुतु ग्रभ वासे ॥
पउड़ी ॥
एऊ जीअ बहुतु ग्रभ वासे ॥
मोह मगन मीठ जोनि फासे ॥
इनि माइआ त्रै गुण बसि कीने ॥
आपन मोह घटे घटि दीने ॥
ए साजन कछु कहहु उपाइआ ॥
जा ते तरउ बिखम इह माइआ ॥
करि किरपा सतसंगि मिलाए ॥
नानक ता कै निकटि न माए ॥7॥
एऊ जीअ बहुतु ग्रभ वासे ॥
मोह मगन मीठ जोनि फासे ॥
इनि माइआ त्रै गुण बसि कीने ॥
आपन मोह घटे घटि दीने ॥
ए साजन कछु कहहु उपाइआ ॥
जा ते तरउ बिखम इह माइआ ॥
करि किरपा सतसंगि मिलाए ॥
नानक ता कै निकटि न माए ॥7॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी- ये जीव अनेकों जूनियों में वास लेते हैं। मीठे मोह में मस्त हो के जूनियों के चक्कर में फंस जाते हैं। इस माया ने (जीवों को अपने) तीन गुणों के वश में कर रखा है। हरेक जीव के हृदय में इसने अपना मोह टिका दिया है। हे सज्जन ! कोई ऐसा इलाज बता। जिससे मैं इस मुश्किल माया (के मोह-रूप समुंद्र) में से पार लांघ सकूँ। हे नानक ! (कह) प्रभू अपनी मेहर करके जिस जीव को सत्संग में मिलाता है। माया उसके नजदीक नहीं (फटक सकती)। 7।
किरत कमावन सुभ असुभ कीने तिनि प्रभि आपि ॥
सलोकु ॥
किरत कमावन सुभ असुभ कीने तिनि प्रभि आपि ॥
पसु आपन हउ हउ करै नानक बिनु हरि कहा कमाति ॥1॥
किरत कमावन सुभ असुभ कीने तिनि प्रभि आपि ॥
पसु आपन हउ हउ करै नानक बिनु हरि कहा कमाति ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ (हरेक जीव में बैठ के) सब अच्छे बुरे काम वह स्वयं ही कर रहा है (प्रभू ने खुद किए हैं)। पर हे नानक ! मूर्ख मनुष्य गुमान करता है कि मैं करता हूँ। प्रभू की प्रेरणा के बिना जीव कुछ भी नहीं कर सकता। 1।
एकहि आपि करावनहारा ॥
पउड़ी ॥
एकहि आपि करावनहारा ॥
आपहि पाप पुंन बिसथारा ॥
इआ जुग जितु जितु आपहि लाइओ ॥
सो सो पाइओ जु आपि दिवाइओ ॥
उआ का अंतु न जानै कोऊ ॥
जो जो करै सोऊ फुनि होऊ ॥
एकहि ते सगला बिसथारा ॥
नानक आपि सवारनहारा ॥8॥
एकहि आपि करावनहारा ॥
आपहि पाप पुंन बिसथारा ॥
इआ जुग जितु जितु आपहि लाइओ ॥
सो सो पाइओ जु आपि दिवाइओ ॥
उआ का अंतु न जानै कोऊ ॥
जो जो करै सोऊ फुनि होऊ ॥
एकहि ते सगला बिसथारा ॥
नानक आपि सवारनहारा ॥8॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी- (जीवों से अच्छे बुरे काम) कराने वाला प्रभू सिर्फ खुद ही है। उस ने खुद ही अच्छे बुरे कामों का पसारा पसारा हुआ है। इस मानस जनम में (भाव। जनम दे के) जिस जिस तरफ प्रभू खुद लगाता है (उधर ही जीव लगते हैं)। जो (मति) प्रभू खुद जीवों को देता है। वही वे ग्रहण करते हैं। उस प्रभू के गुणों का कोई अंत नहीं जान सकता। (जगत में) वही कुछ हो रहा है जो प्रभू खुद करता है। हे नानक ! ये सारा जगत पसारा प्रभू का ही पसारा हुआ है। वह स्वयं ही जीवों को सीधे रास्ते पर डालने वाला है। 8।
राचि रहे बनिता बिनोद कुसम रंग बिख सोर ॥
सलोकु ॥
राचि रहे बनिता बिनोद कुसम रंग बिख सोर ॥
नानक तिह सरनी परउ बिनसि जाइ मै मोर ॥1॥
राचि रहे बनिता बिनोद कुसम रंग बिख सोर ॥
नानक तिह सरनी परउ बिनसि जाइ मै मोर ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक ॥ (हम जीव) स्त्री आदि के रंग-तमाशों में मस्त हो रहे हैं। पर ये माया की फूं-फां कुसंभ के रंग की तरह (क्षिण भंगुर ही है।) हे नानक ! (कह) मैं तो उस प्रभू की शरण पड़ता हूँ (जिसकी मेहर से) अहंकार और ममता दूर हो जाती है। 1।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग २५१ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।