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अंग २२७ · गउड़ी

अंग
227
गउड़ी
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  1. हउमै बंधन बंधि भवावै ॥
  2. प्रथमे ब्रहमा कालै घरि आइआ ॥
  3. बोलहि साचु मिथिआ नही राई ॥

हउमै बंधन बंधि भवावै ॥

अंग २२६ से चला आ रहा अंश

हउमै बंधन बंधि भवावै ॥
नानक राम भगति सुखु पावै ॥8॥13॥

हिन्दी अर्थ: अहंकार (जीवों को मोह के) बंधनों में बाँध के जनम मरण के चक्कर में डालती है। जो मनुष्य परमात्मा की भगती करता है (वह अहंकार से बचा रहता है, और) सुख पाता है। 8। 13।

प्रथमे ब्रहमा कालै घरि आइआ ॥

गउड़ी महला 1 ॥
प्रथमे ब्रहमा कालै घरि आइआ ॥
ब्रहम कमलु पइआलि न पाइआ ॥
आगिआ नही लीनी भरमि भुलाइआ ॥1॥
जो उपजै सो कालि संघारिआ ॥
हम हरि राखे गुर सबदु बीचारिआ ॥1॥ रहाउ ॥
माइआ मोहे देवी सभि देवा ॥
कालु न छोडै बिनु गुर की सेवा ॥
ओहु अबिनासी अलख अभेवा ॥2॥
सुलतान खान बादिसाह नही रहना ॥
नामहु भूलै जम का दुखु सहना ॥
मै धर नामु जिउ राखहु रहना ॥3॥
चउधरी राजे नही किसै मुकामु ॥
साह मरहि संचहि माइआ दाम ॥
मै धनु दीजै हरि अंम्रित नामु ॥4॥
रयति महर मुकदम सिकदारै ॥
निहचलु कोइ न दिसै संसारै ॥
अफरिउ कालु कूड़ु सिरि मारै ॥5॥
निहचलु एकु सचा सचु सोई ॥
जिनि करि साजी तिनहि सभ गोई ॥
ओहु गुरमुखि जापै तां पति होई ॥6॥
काजी सेख भेख फकीरा ॥
वडे कहावहि हउमै तनि पीरा ॥
कालु न छोडै बिनु सतिगुर की धीरा ॥7॥
कालु जालु जिहवा अरु नैणी ॥
कानी कालु सुणै बिखु बैणी ॥
बिनु सबदै मूठे दिनु रैणी ॥8॥
हिरदै साचु वसै हरि नाइ ॥ कालु न जोहि सकै गुण गाइ ॥
नानक गुरमुखि सबदि समाइ ॥9॥14॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 1 ॥ (और जीवों की तो बात ही क्या करनी है) सबसे पहले ब्रहमा ही आत्मिक मौत की जंजीर में फंस गया। (विष्णु की नाभि से उगे हुए जिस कमल में से ब्रहमा पैदा हुआ था, उस का अंत लेने के लिए) पाताल में (जा पहुँचा) पर ब्रहम् कमल (का अंत) ना ढूँढ सका (और शर्मिंदा होना पड़ा। ये अहंकार ही मौत है)। उसने अपने गुरू की आज्ञा पर गौर ना किया, (इस अहंकार में आ के मैं इतना बड़ा हूँ कि मैं कैसे कमल की डंडी में से पैदा हो सकता हूँ) भटकना में पड़ कर गलत रास्ते पर पड़ गया । 1। (जगत में) जो जो जीव जनम लेता है (और गुरू का शबद अपने हृदय में नहीं बसाता) मौत (के सहम) ने उस उस का आत्मिक जीवन प्रफुल्लित नहीं होने दिया। मेरे आत्मिक जीवन को परमात्मा ने खुद बचा लिया, (क्योंकि उसकी मेहर से) मैंने गुरू के शबद को अपने हृदय में बसा लिया। 1। रहाउ। सारे देवियां और देवते माया के मोह में फंसे हुए हैं (यही है आत्मिक मौत, ये आत्मिक) मौत गुरू की बताई हुई सेवा किए बिना खलासी नहीं करती। (इस आत्मिक) मौत से बचा हुआ सिर्फ एक परमातमा है जिसके गुण बयान नहीं हो सकते, जिसका भेद पाया नहीं जा सकता। 2। (वैसे तो) सुल्तान हों, खान हों, बादशाह हों, किसी ने भी सदा यहाँ टिके नहीं रहना, पर परमातमा के नाम से जो जो वंचित रहता है वह जम का दुख सहता है (वह अपनी आत्मिक मौत भी सहेड़ लेता है, इस करके, हे प्रभू !) मुझे आपका नाम ही सहारा है (मैं यही अरदास करता हूँ) जैसे हो सके मुझे अपने नाम में जोड़े रख, मैं आपके नाम में ही टिका रहूँ। 3। चौधरी हों, राजे हों, किसी का भी यहाँ पक्का डेरा नहीं। पर (जो) शाह निरी माया ही जोड़ते हैं, सिर्फ पैसे ही एकत्र करते हैं, वे आत्मिक मौत मर जाते हैं। हे हरी ! मुझे आत्मिक जीवन देने वाला अपना नाम-धन बख्श। 4। प्रजा, प्रजा के मुखिए, चौधरी, सरदार - कोई भी ऐसा नहीं दिखता जो संसार में सदा टिका रह सके। पर बली काल उसके सिर पर चोट मारता है (उसे आत्मिक मौत मारता है) जिसके हृदय में माया का मोह है। 5। सदा अटॅल रहने वाला केवल एक ही एक परमात्मा ही है, जिस ने यह सारी सृष्टि रची बनाई है, वह खुद ही इसे (अपने अंदर) लय कर लेता है। जब गुरू की शरण पड़ने से वह परमात्मा हर जगह दिखाई दे जाए (तो जीव का आत्मिक जीवन प्रफुल्लित होता है) तब (इसे प्रभू की हजूरी में) आदर मिलता है। 6। काजी कहलाएं, शेख कहलवाएं, बड़े बड़े भेषों वाले फ़कीर कहलाएं, (दुनिया में अपने आप को) बड़े बड़े कहलवाएं; पर अगर शरीर में अहंकार की पीड़ा है, तो मौत खलासी नहीं करती (आत्मिक मौत खलासी नहीं करती, आत्मिक जीवन प्रफुल्लित नहीं होता)। सतिगुरू से मिले (नाम-) आधार के बिना (ये आत्मिक मौत टिकी ही रहती है)। 7। (निंदा आदि के कारण) जीभ से, (पराया रूप देखने के कारण) आँखों द्वारा, और कानों से (क्योंकि जीव) आत्मिक मौत लाने वाले (निंदा आदि के) बचन सुनता है आत्मिक मौत (का) जाल (जीवों के सिर पर सदैव तना रहता है)। गुरू के शबद (का आसरा लिए) बिना जीव दिन रात (आत्मिक जीवन के गुणों से) लूटे जा रहे हैं। 8। जिस मनुष्य के हृदय में सदा-स्थिर प्रभू (सदा) बसा रहता है, जो मनुष्य परमात्मा के नाम में (सदा) टिका रहता है, आत्मिक मौत (मौत का सहम) उसकी तरफ कभी देख भी नहीं सकती (क्योंकि वह सदा प्रभू के) गुण गाता है। हे नानक ! वह मनुष्य गुरू के सन्मुख हो के गुरू के शबद के द्वारा (प्रभू के चरणों में सदा) लीन रहता है। 9। 14।

बोलहि साचु मिथिआ नही राई ॥

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गउड़ी महला 1 ॥
बोलहि साचु मिथिआ नही राई ॥
चालहि गुरमुखि हुकमि रजाई ॥
रहहि अतीत सचे सरणाई ॥1॥
सच घरि बैसै कालु न जोहै ॥
मनमुख कउ आवत जावत दुखु मोहै ॥1॥ रहाउ ॥
अपिउ पीअउ अकथु कथि रहीऐ ॥
निज घरि बैसि सहज घरु लहीऐ ॥
हरि रसि माते इहु सुखु कहीऐ ॥2॥
गुरमति चाल निहचल नही डोलै ॥
गुरमति साचि सहजि हरि बोलै ॥
पीवै अंम्रितु ततु विरोलै ॥3॥
सतिगुरु देखिआ दीखिआ लीनी ॥
मनु तनु अरपिओ अंतर गति कीनी ॥
गति मिति पाई आतमु चीनी ॥4॥
भोजनु नामु निरंजन सारु ॥
परम हंसु सचु जोति अपार ॥
जह देखउ तह एकंकारु ॥5॥
रहै निरालमु एका सचु करणी ॥
परम पदु पाइआ सेवा गुर चरणी ॥
मन ते मनु मानिआ चूकी अहं भ्रमणी ॥6॥
इन बिधि कउणु कउणु नही तारिआ ॥
हरि जसि संत भगत निसतारिआ ॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 1 ॥ वे सदा अटॅल रहने वाले बोल ही बोलते हैं, इस वास्ते वो रत्ती भर भी झूठ नहीं बोलते, जो मनुष्य गुरू के सन्मुख रह के रजा के मालिक प्रभू के हुकम में चलते हैं, वे सदा स्थिर प्रभू की शरण में रह के माया के प्रभाव से ऊपर रहते हैं । 1। जो मनुष्य सदा स्थिर प्रभू के चरणों में टिका रहता है, उसे मौत का सहम छू नहीं सकता (उसके आत्मिक जीवन को कोई खतरा नहीं होता) पर अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य को मोह (में फंसे होने) के कारण जनम मरण का दुख (दबाए रखता) है। 1। रहाउ। कोई भी जीव नाम-रस पीए (और पी के देख ले), बेअंत गुणों के मालिक प्रभू की सिफत सालाह करके (“निज घर में”) टिके रह सकते हैं, और उस स्वै-स्वरूप में बैठ के आत्मिक अडोलता का ठिकाना ढूँढ सकते हैं। हरि-नाम-रस में मस्त होने से ये कह सकते हैं कि यही है असल आत्मिक सुख। 2। गुरू की मति पर चलने वाली जीवन-जुगति (ऐसी है कि इसे) माया का मोह हिला नहीं सकता, माया के मोह में ये डोल नहीं सकती। जो मनुष्य गुरू की मति धारण करके सहजता से परमेश्वर का नाम लेता है वह नाम-रस पीता है, वह अस्लियत को मथ कर तलाश लेता है। 3। जिस मनुष्य ने (पूरे) गुरू के दर्शन कर लिए और गुरू की शिक्षा ग्रहण कर ली, अपने अंतरात्मे बसा ली और (उस शिक्षा की खातिर) अपना मन और अपना तन भेट कर दिया, (और जिस मनुष्य ने इस शिक्षा की बरकति से सदा स्थिर प्रभू के चरणों में जुड़ना आरम्भ कर दिया) उसने अपनी अस्लियत को पहिचान लिया, उसे समझ आ गई कि परमात्मा सबसे उच्च आत्मिक अवस्था वाला है और बेअंत वडियाई वाला है। 4। जो मनुष्य (सदा स्थिर प्रभू के चरणों में जुड़ता है) निरंजन के श्रेष्ठ नाम को अपनी आत्मिक खुराक बनाता है, वह सदा स्थिर रहने वाला परम हंस बन जाता है। बेअंत (प्रभू) की ज्योति (उसके अंदर चमक पड़ती है)। बेशक किसी भी तरफ वह देख ले, उसे हर जगह वह एक परमात्मा ही दिखाई देता है। 5। (‘सच घर’ में बैठने वाला) वह मनुष्य माया (के प्रभाव) से निर्लिप रहता है, सदा स्थिर प्रभू का सिमरन ही उसकी नित्य की करनी हो जाती है। गुरू की बताई सेवा करके गुरू के चरणों में टिका रह के वह सबसे ऊँचा आत्मिक दर्जा हासिल कर लेता है। अंदर अंदर से उसका मन सिमरन में रच-मिच जाता है, अहंकार वाली उसकी भटकना समाप्त हो जाती है। 6। (‘सच घर’ में बैठे रहने की) इस विधी ने किस किस को (संसार समुंद्र से) पार नहीं लंघाया? परमात्मा की सिफत सालाह ने सारे संतों को भक्तों को पार लंघा दिया है।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला १: गुरु नानक देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग २२७ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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