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अंग 228

अंग
228
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
प्रभ पाए हम अवरु न भारिआ ॥7॥
साच महलि गुरि अलखु लखाइआ ॥
निहचल महलु नही छाइआ माइआ ॥
साचि संतोखे भरमु चुकाइआ ॥8॥
जिन कै मनि वसिआ सचु सोई ॥
तिन की संगति गुरमुखि होई ॥
नानक साचि नामि मलु खोई ॥9॥15॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: जिस जिस ने यश किया, उसे प्रभू जी मिल गए। (मैं भी प्रभू की सिफत सालाह ही करता हूँ और) उसके बिना किसी और को नहीं ढूँढता। 7। सदा स्थिर प्रभू के महल में (पहुँचा के) गुरू ने जिस मनुष्य को अलख प्रभू का स्वरूप (हृदय में) प्रत्यक्ष कर दिया है, उसे वह अटल ठिकाना (सदा के लिए प्राप्त हो जाता है) जिस पर माया का प्रभाव नहीं पड़ता। जो जो लोग सदा स्थिर प्रभू में जुड़ के माया की ओर से तृप्त हो जाते हैं, उनकी भटकना समाप्त हो जाती है। 8। जिन मनुष्यों के मन में वह सदा स्थिर रहने वाला परमात्मा बस पड़ता है, उनकी संगति जिस मनुष्य को गुरू की संगति पड़ कर प्राप्त होती है। हे नानक ! वह मनुष्य प्रभू के सदा-स्थिर नाम में जुड़ के (अपने मन की विकारों की) मैल साफ कर लेता है। 9। 15।
गउड़ी महला 1 ॥
रामि नामि चितु रापै जा का ॥
उपजंपि दरसनु कीजै ता का ॥1॥
राम न जपहु अभागु तुमारा ॥
जुगि जुगि दाता प्रभु रामु हमारा ॥1॥ रहाउ ॥
गुरमति रामु जपै जनु पूरा ॥
तितु घट अनहत बाजे तूरा ॥2॥
जो जन राम भगति हरि पिआरि ॥
से प्रभि राखे किरपा धारि ॥3॥
जिन कै हिरदै हरि हरि सोई ॥
तिन का दरसु परसि सुखु होई ॥4॥
सरब जीआ महि एको रवै ॥
मनमुखि अहंकारी फिरि जूनी भवै ॥5॥
सो बूझै जो सतिगुरु पाए ॥
हउमै मारे गुर सबदे पाए ॥6॥
अरध उरध की संधि किउ जानै ॥
गुरमुखि संधि मिलै मनु मानै ॥7॥
हम पापी निरगुण कउ गुणु करीऐ ॥
प्रभ होइ दइआलु नानक जन तरीऐ ॥8॥16॥
सोलह असटपदीआ गुआरेरी गउड़ी कीआ ॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 1 ॥ जिस मनुष्य का मन परमात्मा के नाम (-रंग) में रंगा हुआ है, उसका दर्शन नित्य सवेरे उठते हुए ही करना चाहिए (ऐसे भाग्यशाली मनुष्य की संगति से परमात्मा का नाम याद आता है)। 1। हे भाई ! (अगर) आप परमात्मा का नाम नहीं सिमरते, तो ये आपकी बद्किस्मती है। परमात्मा प्रभू सदा से ही हमें (सभी जीवों को) दातें देता चला (ऐसे दाते को भुलाना दुर्भाग्यपूर्ण है)। 1। रहाउ। जो मनुष्य गुरू की शिक्षा ले के परमात्मा का नाम जपता है, वह पूर्ण हो जाता है (उसका मन माया के मोह में डोलता नहीं)। उस (के) हृदय में (प्रसन्नता ही प्रसन्नता बनी रहती है, जैसे) एक-रस तुर्मा आदि बाजे बजते रहते हैं। 2। जो लोग हरि परमात्मा की भक्ति और प्यार में (जुड़ते) हैं, उन्हें प्रभू ने मेहर करके (अहंकार आदि से) बचा लिया है। 3। जिन मनुष्यों के हृदय में वह (दया-निधि) परमात्मा बसता है, उसका दर्शन करने से (आत्मिक) आनंद मिलता है। 4। सब जीवों के अंदर एक परमात्मा ही व्यापक है। (पर) मन का मुरीद (मन के पीछे चलने वाला) मनुष्य (ये बात नहीं समझता, वह इन में ईश्वर बसता नहीं देखता, वह) जीवों के साथ अहंकार भरा बर्ताव करता है, और मुड़ मुड़ के जूनियों में भ्रमित होता है। 5। जिस मनुष्य को सतिगुरू मिलता है वह समझ लेता है (कि सब जीवों में परमात्मा ही बसता है, इस वास्ते) वह (अपने अंदर से) अहंकार मारता है, गुरू के शबद में जुड़ के वह (परमात्मा का मेल) प्राप्त कर लेता है। 6। (सिमरन से वंचित रहने से मनुष्य को) जीवात्मा और परमात्मा के मिलाप की पहिचान नहीं आ सकती, (वही पहिचानता है) जो गुरमुखों की संगति में मिलता है, और उसका मन (सिमरन में) लग जाता है। 7। हे प्रभू ! हम जीव विकारी हैं, गुण-हीन हैं (अपना नाम सिमरने का) गुण आप खुद बख्श। हे नानक ! (कह) हे प्रभू ! आप दयाल हैं के (जब नाम की दाति बख्शता है, तब) आपके दास (संसार समुंद्र से) पार लांघ सकते हैं। 8। 16। सोलह असटपदीआ गुआरेरी गउड़ी कीआ ॥
गउड़ी बैरागणि महला 1
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जिउ गाई कउ गोइली राखहि करि सारा ॥ अहिनिसि पालहि राखि लेहि आतम सुखु धारा ॥1॥
इत उत राखहु दीन दइआला ॥
तउ सरणागति नदरि निहाला ॥1॥ रहाउ ॥
जह देखउ तह रवि रहे रखु राखनहारा ॥
तूं दाता भुगता तूंहै तूं प्राण अधारा ॥2॥
किरतु पइआ अध ऊरधी बिनु गिआन बीचारा ॥
बिनु उपमा जगदीस की बिनसै न अंधिआरा ॥3॥
जगु बिनसत हम देखिआ लोभे अहंकारा ॥
गुर सेवा प्रभु पाइआ सचु मुकति दुआरा ॥4॥
निज घरि महलु अपार को अपरंपरु सोई ॥
बिनु सबदै थिरु को नही बूझै सुखु होई ॥5॥
किआ लै आइआ ले जाइ किआ फासहि जम जाला ॥
डोलु बधा कसि जेवरी आकासि पताला ॥6॥
गुरमति नामु न वीसरै सहजे पति पाईऐ ॥
अंतरि सबदु निधानु है मिलि आपु गवाईऐ ॥7॥
नदरि करे प्रभु आपणी गुण अंकि समावै ॥
नानक मेलु न चूकई लाहा सचु पावै ॥8॥1॥17॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी बैरागणि महला 1 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। जैसे ग्वाला गायों की रक्षा करता है, वैसे ही आप संभाल करके (जीवों की) रक्षा करता है, आप दिन रात जीवों को पालता है, रक्षा करता है और, आत्मिक सुख बख्शता है। 1। हे दीनों पर दया करने वाले प्रभू !लोक परलोक में (मेरी) रक्षा कर। (मैं) आपकी शरण आया हूँ, मेहर की निगाह से (मेरी ओर) देख !। 1। रहाउ। हे राखनहार प्रभू ! मैं जिधर देखता हूँ, उधर ही (हर जगह) आप मौजूद है, और सब का रक्षक है, आप स्वयं ही जीवों को दातें देने वाला है और (सब जीवों में व्यापक हैं के) खुद ही भोगने वाला है, आप ही सबकी जिंदगी का आसरा है। 2। (इस) ज्ञान के बिना, विचार के बिना, जीव अपने किए कर्मों के इकट्ठे हुए संस्कारों के तहत कभी पाताल में गिरता है और कभी आकाश की ओर चढ़ता है (कभी दुखी तो कभी सुखी)। प्रभू की सिफत सालाह किए बिना जीव की अज्ञानता नहीं मिटती। 3। रोजाना देखते हैं कि जगत लोभ व अहंकार के वश हो के आत्मिक मौत मरता रहता है। गुरू की बताई सेवा करने से सदा स्थिर प्रभू मिल जाता है, और (लोभ व अहंकार से) मुक्ति का रास्ता मिल जाता है। 4। बेअंत परमात्मा का ठिकाना अपने आप में है, वह प्रभू (लोभ व अहंकार के प्रभाव से) परे से परे है। कोई भी जीव गुरू के शबद (में जुड़े) बिना (उस स्वरूप में) सदा स्थिर नहीं हो सकता। जो मनुष्य गुरू के शबद को समझता है, उसे आत्मिक आनंद प्राप्त होता है। 5। हे जीव ! ना आप कोई धन-पदार्थ अपने साथ ले के (जगत में) आया था, और ना ही (यहां से कोई माल धन) ले कर जाएगा। (व्यर्थ ही माया मोह के कारण) जम के जाल में फंस रहा है। जैसे रस्सी से बंधा हुआ डोल (कभी कूएं में जाता है कभी बाहर आ जाता है, वैसे ही आप कभी) आकाश में चढ़ता है कभी पाताल में गिरता है। 6। (हे जीव !) अगर गुरू की मति ले कर कभी परमात्मा का नाम ना भूले, तो (नाम की बरकति से) अडोल अवस्था में टिक के (प्रभू के दर पर) इज्जत प्राप्त कर लेते हैं। जिस मनुष्य के हृदय में गुरू का शबद रूपी खजाना है (वह प्रभू को मिल जाता है)। (प्रभू को) मिल के स्वैभाव गवा सकते हैं। 7। जिस जीव पर प्रभू अपनी मेहर की नजर करता है (उसे अपने) गुण (बख्शता है, और गुणों की बरकति से वह प्रभू के) अंक में लीन हो जाता है। हे नानक ! उस जीव का परमात्मा से बना मिलाप कभी टूटता नहीं, वह जीव प्रभू की सिफत सालाह कमा लेता हैं8। 1। 17।

गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जिस जिस ने यश किया, उसे प्रभू जी मिल गए।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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