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अंग 226

अंग
226
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
पर घरि चीतु मनमुखि डोलाइ ॥
गलि जेवरी धंधै लपटाइ ॥
गुरमुखि छूटसि हरि गुण गाइ ॥5॥
जिउ तनु बिधवा पर कउ देई ॥
कामि दामि चितु पर वसि सेई ॥
बिनु पिर त्रिपति न कबहूं होई ॥6॥
पड़ि पड़ि पोथी सिंम्रिति पाठा ॥ बेद पुराण पड़ै सुणि थाटा ॥
बिनु रस राते मनु बहु नाटा ॥7॥
जिउ चात्रिक जल प्रेम पिआसा ॥
जिउ मीना जल माहि उलासा ॥
नानक हरि रसु पी त्रिपतासा ॥8॥11॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य पराए घर में अपने चित्त को डुलाता है (नतीजा ये निकलता है कि विकारों के) जंजाल में वह फंसता है और उसके गले में विकारों की जंजीर (पक्की होती जाती है)। जो मनुष्य गुरू के बताए रास्ते पर चलता है, वह परमात्मा की सिफत सालाह करके इस जंजाल में से बच निकलता है। 5। जैसे विधवा अपना शरीर पराए मनुष्य के हवाले करती है, काम वासना में (फस के) पैसे (के लालच) में (फस के) वह अपना मन (भी) पराए मनुष्य के वश में करती है, पर पति के बिना उसे कभी भी शांति नसीब नहीं हो सकती (ऐसे ही पति प्रभू को भुलाने वाली जीव स्त्री अपना आप विकारों के अधीन करती है, पर पति प्रभू के बिना आत्मिक सुख कभी नहीं मिल सकता)। 6। (विद्वान पंडित) वेद-पुराण-स्मृतियां आदिक धर्म पुस्तकें बारंबार पढ़ता है, उनकी (काव्य) रचना बार बार सुनता है, पर जब तक उसका मन परमात्मा के नाम रस का रसिया नहीं बनता, तब तक (माया के हाथों पर ही) नाच करता है। 7। जैसे पपीहे का (वर्षा-) जल से प्रेम है, (वर्षा-) जल की उसे प्यास है। जैसे मछली पानी में बहुत प्रसन्न रहती है, वैसे ही, हे नानक ! परमात्मा का भगत परमात्मा का नाम-रस पी के तृप्त हो जाता है। 8। 11।
गउड़ी महला 1 ॥
हठु करि मरै न लेखै पावै ॥
वेस करै बहु भसम लगावै ॥
नामु बिसारि बहुरि पछुतावै ॥1॥
तूं मनि हरि जीउ तूं मनि सूख ॥
नामु बिसारि सहहि जम दूख ॥1॥ रहाउ ॥
चोआ चंदन अगर कपूरि ॥
माइआ मगनु परम पदु दूरि ॥
नामि बिसारिऐ सभु कूड़ो कूरि ॥2॥
नेजे वाजे तखति सलामु ॥
अधकी त्रिसना विआपै कामु ॥
बिनु हरि जाचे भगति न नामु ॥3॥
वादि अहंकारि नाही प्रभ मेला ॥
मनु दे पावहि नामु सुहेला ॥
दूजै भाइ अगिआनु दुहेला ॥4॥
बिनु दम के सउदा नही हाट ॥
बिनु बोहिथ सागर नही वाट ॥
बिनु गुर सेवे घाटे घाटि ॥5॥
तिस कउ वाहु वाहु जि वाट दिखावै ॥
तिस कउ वाहु वाहु जि सबदु सुणावै ॥
तिस कउ वाहु वाहु जि मेलि मिलावै ॥6॥
वाहु वाहु तिस कउ जिस का इहु जीउ ॥
गुर सबदी मथि अंम्रितु पीउ ॥
नाम वडाई तुधु भाणै दीउ ॥7॥
नाम बिना किउ जीवा माइ ॥
अनदिनु जपतु रहउ तेरी सरणाइ ॥
नानक नामि रते पति पाइ ॥8॥12॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 1 ॥ (अगर कोई मनुष्य मन का हठ करके धूणियां आदि तपा के) शारीरिक मुश्कलें बर्दाश्त करता है, तो उसका ये कष्ट सहना किसी गिनती में नहीं गिना जाता। अगर कोई मनुष्य (शरीर पर) राख मलता है और (योग आदि के) कई भेस करता है (ये भी व्यर्थ जाते हैं)। परमात्मा का नाम भुला के वह अंत को पछताता है (कि इन उद्यमों में जीवन व्यर्थ गवाया)। 1। (हे भाई !) आप (अपने) मन में प्रभू जी को (बसा ले, और इस तरह) आप (अपने) मन में (आत्मिक) आनंद (ले)। (याद रख) परमात्मा के नाम को भुला के आप जमों के दुख सहेगा। 1। रहाउ। (दूसरी तरफ अगर कोई मनुष्य) इत्र, चंदन, अगर, कपूर (आदि सुगंधियों के प्रयोग में) मस्त है, माया के मोह में मस्त है, तो उच्च आत्मिक अवस्था (उससे भी) दूर है। अगर प्रभू का नाम भुला दिया जाय, तो ये सारा (दुनिया वाली ऐश भी) व्यर्थ है (सुख नहीं मिलता, मनुष्य सुख के) व्यर्थ प्रयत्नों में रहता है। 2। (अगर कोई मनुष्य राजा भी बन जाए) तख्त पर (बैठे हुए को) नेजा-बरदार फौजी व बाजे वाले सलामें करें, तो भी माया की तृष्णा ही बढ़ती है, काम-वासना जोर डालती है (इनमें आत्मिक सुख नहीं है ! सुख है केवल प्रभू के नाम में भक्ति में)। पर प्रभू के दर से मांगे बिना ना तो भक्ति मिलती है ना ही नाम मिलता है। 3। (विद्या के बल पर धार्मिक पुस्तकों की चर्चा के) झगड़े में (पड़ने से) (व विद्या के) अहंकार में (भी) परमात्मा का मिलाप नहीं होता। (हे भाई !) अपना मन दे के (ही, अहंकार गवा के ही) सुखों का श्रोत प्रभू नाम प्राप्त करेगा। (प्रभू को बिसार के) और ही प्यार में रहने से दुखद अज्ञान ही बढ़ेगा। 4। जैसे रास पूंजी के बिना दुकान का सौदा नहीं लिया जा सकता, वैसे ही जहाज के बिना समुंद्र का सफर नहीं हो सकता, वैसे ही गुरू की शरण पड़े बिना (जीवन सफर में आत्मिक राशि-पूँजी की तरफ से) घाटे ही घाटे में रहना पड़ता है। 5। (हे भाई !) उस पूरे गुरू को धन्य-धन्य कह जो सही जीवन राह दिखाता है, जो परमात्मा की सिफत सालाह के शबद सुनाता है, और (इस तरह) जो परमात्मा के मिलाप में मिला देता है। 6। हे भाई ! उस परमात्मा की सिफत सालाह कर जिसकी (दी हुई) ये जिंद है। गुरू के शबद के द्वारा (परमात्मा के गुणों को) बार बार विचार के आत्मिक जीवन देने वाला नाम रस पी। वह प्रभू आपको अपनी रजा में नाम जपने का बड़प्पन देगा। 7। हे मेरी माँ ! परमात्मा के नाम के बिना मैं (आत्मिक जीवन) जी नहीं सकता। हे प्रभू ! मैं आपकी शरण आया हूँ, (मेहर कर) मैं दिन रात आपका ही नाम जपता रहूँ। हे नानक ! अगर प्रभू के नाम-रंग में रंगे रहें, तभी (लोक-परलोक में) आदर-मान मिलता है। 8। 12।
गउड़ी महला 1 ॥
हउमै करत भेखी नही जानिआ ॥
गुरमुखि भगति विरले मनु मानिआ ॥1॥
हउ हउ करत नही सचु पाईऐ ॥
हउमै जाइ परम पदु पाईऐ ॥1॥ रहाउ ॥
हउमै करि राजे बहु धावहि ॥
हउमै खपहि जनमि मरि आवहि ॥2॥
हउमै निवरै गुर सबदु वीचारै ॥
चंचल मति तिआगै पंच संघारै ॥3॥
अंतरि साचु सहज घरि आवहि ॥
राजनु जाणि परम गति पावहि ॥4॥
सचु करणी गुरु भरमु चुकावै ॥
निरभउ कै घरि ताड़ी लावै ॥5॥
हउ हउ करि मरणा किआ पावै ॥
पूरा गुरु भेटे सो झगरु चुकावै ॥6॥
जेती है तेती किहु नाही ॥
गुरमुखि गिआन भेटि गुण गाही ॥7॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 1 ॥ (“मैं धर्मी हूँ मैं धर्मी हूँ” ये) मैं मैं करते हुए (निरे) धार्मिक भेष से कभी किसी ने परमात्मा के साथ गहरी सांझ नहीं डाली। गुरू की शरण पड़ कर ही (भाव, गुरू के आगे स्वैभाव त्याग के ही) परमात्मा की भक्ति में मन रमता है। पर, ऐसा स्वैभाव त्यागने वाला कोई एक-आध ही होता है। 1। (मैं बड़ा धर्मी हूँ, मैं बड़ा राजा हूँ, ऐसी) मैं मैं करते हुए (कभी) सदा कायम रहने वाला परमात्मा मिल नहीं सकता। जब ये अहंकार दूर हो, तब ही सबसे ऊँचा आत्मिक दर्जा हासिल कर सकते हैं। 1। रहाउ। (‘हम बड़े राजा है”, इसी) अहंकार के कारण ही राजे एक दूसरे के (देशों पर) कई बार हमले करते रहते हैं अपने बड़प्पन के गुमान में दुखी होते हैं (नतीजा ये निकलता है कि प्रभू की याद भुला के) जनम मरण के चक्कर में पड़े रहते हैं। 2। जो (भाग्यशाली) मनुष्य गुरू का शबद विचारता है (अपने सोच मण्डल में टिकाता है) उसका अहंकार दूर हो जाता है, वह (भटकना में डालने वाली अपनी) होछी मति त्यागता है, और कामादिक पाँचों वैरियों का नाश करता है। 3। जिन लोगों के हृदय में सदा कायम रहने वाला परमात्मा (बसता) है, वे अडोल आत्मिक अवस्था में टिके रहते हैं। सारी सृष्टि के मालिक प्रभू के साथ गहरी सांझ डाल के वे सबसे ऊँची आत्मिक अवस्था हासिल करते हैं। 4। जिस मनुष्य के मन की भटकन गुरू दूर करता है, सदा स्थिर प्रभू का सिमरन उस का नित्य कर्म बन जाता है, वह निर्भव प्रभू के चरणों में सदा अपनी सुरति जोड़े रखता है। 5। “हउ हउ, मैं मैं” के कारण आत्मिक मौत ही मिलती है, इससे और कोई आत्मिक गुण नहीं मिलता। जिस मनुष्य को पूरा गुरू मिल जाता है, वह अहंकार के इस मसले को अंदर से खत्म कर लेता है। 6। अहंकार के आसरे जितनी भी दौड़ भाग है ये सारी दौड़भाग कोई आत्मिक लाभ नहीं पहुँचाती। गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य (गुरू से) ज्ञान प्राप्त करके परमात्मा के गुण गाते हैं। 7।

गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य पराए घर में अपने चित्त को डुलाता है (नतीजा ये निकलता है कि विकारों के) जंजाल में वह फंसता है और उसके गले में विकारों की जंजीर (पक्की होती जाती है)।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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