अंग 175

अंग
175
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
वडभागी मिलु संगती मेरे गोविंदा जन नानक नाम सिधि काजै जीउ ॥4॥4॥30॥68॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: हे दास नानक ! आप भी संगति में मिल (हरी प्रभू का नाम जप, और) भाग्यशाली बन। नाम की बरकति से ही जीवन उद्देश्य सफल होता है। 4। 4। 30। 68।
गउड़ी माझ महला 4 ॥
मै हरि नामै हरि बिरहु लगाई जीउ ॥
मेरा हरि प्रभु मितु मिलै सुखु पाई जीउ ॥
हरि प्रभु देखि जीवा मेरी माई जीउ ॥
मेरा नामु सखा हरि भाई जीउ ॥1॥
गुण गावहु संत जीउ मेरे हरि प्रभ केरे जीउ ॥
जपि गुरमुखि नामु जीउ भाग वडेरे जीउ ॥
हरि हरि नामु जीउ प्रान हरि मेरे जीउ ॥
फिरि बहुड़ि न भवजल फेरे जीउ ॥2॥
किउ हरि प्रभ वेखा मेरै मनि तनि चाउ जीउ ॥
हरि मेलहु संत जीउ मनि लगा भाउ जीउ ॥
गुर सबदी पाईऐ हरि प्रीतम राउ जीउ ॥
वडभागी जपि नाउ जीउ ॥3॥
मेरै मनि तनि वडड़ी गोविंद प्रभ आसा जीउ ॥
हरि मेलहु संत जीउ गोविद प्रभ पासा जीउ ॥
सतिगुर मति नामु सदा परगासा जीउ ॥
जन नानक पूरिअड़ी मनि आसा जीउ ॥4॥5॥31॥69॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी माझ महला 4 ॥ (हे संत जनो !) हरी ने मुझे (मेरे अंदर) हरी नाम की बिरह लगा दी है, मैं (अब तब ही) आनंद का अनुभव कर सकता हूँ जब मुझे मेरा मित्र हरी-प्रभू मिल जाए। हे माँ ! हरी-प्रभू को देख के मेरे अंदर आत्मिक जीवन पैदा होता है (मुझे दृढ़ हो गया है कि) हरि-नाम (ही) मेरा मित्र है मेरा वीर है। 1। हे संत जनो ! आप मेरे हरी-प्रभू के गुण गाओ। गुरू की शरण पड़ कर हरि नाम जपने से भाग्य जाग जाते हैं। (हे संत जनो !) हरि का नाम (अब) मेरी जिंदगी का आसरा है। (जो मनुष्य हरि नाम जपता है उसे) दुबारा संसार समुंद्र के (जनम मरण के) चक्र नहीं पड़ते। 2। हे संत जनो ! मेरे मन में, मेरे हृदय में चाव बना रहता है कि कैसे हरि प्रभू का दर्शन कर सकूँ। हे संत जनो ! मेरे मन में (हरि प्रभू के दर्शन की) चाहत बन गई है, मुझे हरि प्रभु मिला दो। (हे संत जनों !) गुरू के शबद के द्वारा बड़े भाग्यों से हरि नाम जप के ही हरी प्रीतम को मिल सकते हैं। 3। हे संत जनो ! मेरे मन में, मेरे हृदय में गोविंद प्रभू (के मिलाप) की बड़ी आस लगी हुई है। हे संत जनो ! मुझे वह गोबिंद प्रभू मिला दो जो मेरे अंदर बसता है। हे दास नानक ! गुरू की मति पे चलने से ही सदा (जीव के अंदर) हरी के नाम का प्रकाश होता है (जिस को गुरू की मति प्राप्त होती है उसके) मन में (पैदा हुई प्रभू मिलाप की) आशा पूरी हो जाती है। 4। 5। 31। 69।
गउड़ी माझ महला 4 ॥
मेरा बिरही नामु मिलै ता जीवा जीउ ॥
मन अंदरि अंम्रितु गुरमति हरि लीवा जीउ ॥
मनु हरि रंगि रतड़ा हरि रसु सदा पीवा जीउ ॥
हरि पाइअड़ा मनि जीवा जीउ ॥1॥
मेरै मनि तनि प्रेमु लगा हरि बाणु जीउ ॥
मेरा प्रीतमु मित्रु हरि पुरखु सुजाणु जीउ ॥
गुरु मेले संत हरि सुघड़ु सुजाणु जीउ ॥
हउ नाम विटहु कुरबाणु जीउ ॥2॥
हउ हरि हरि सजणु हरि मीतु दसाई जीउ ॥
हरि दसहु संतहु जी हरि खोजु पवाई जीउ ॥
सतिगुरु तुठड़ा दसे हरि पाई जीउ ॥
हरि नामे नामि समाई जीउ ॥3॥
मै वेदन प्रेमु हरि बिरहु लगाई जीउ ॥
गुर सरधा पूरि अंम्रितु मुखि पाई जीउ ॥
हरि होहु दइआलु हरि नामु धिआई जीउ ॥
जन नानक हरि रसु पाई जीउ ॥4॥6॥20॥18॥32॥70॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी माझ महला 4 ॥ मैं तब ही आत्मिक जीवन प्राप्त कर सकता हूँ जब मुझे (मुझसे) विछुड़ा हुआ मेरा हरी नाम (मित्र) मिल जाए। आत्मिक जीवन देने वाला नाम जल (मेरे) मन में ही (बसता है, पर) वह हरी-नाम-अमृत गुरू की मति के द्वारा ही मैं ले सकता हूँ। (अगर मेरा) मन (गुरू की मेहर से) परमात्मा के (प्रेम-) रंग में रंगा जाए, तो मैं सदा हरि नाम का रस पीता रहूँ। जब (गुरू की कृपा से मुझे) हरी मिल जाए तो मैं अपने मन में जीअ पड़ता हूँ। 1। (हे भाई !) मेरे मन में, मेरे हृदय में परमात्मा का प्रेम-तीर भेदा हुआ है (मुझे यकीन बन गया है कि) सुजान हरी पुरख ही मेरा प्रीतम है, मेरा मित्र है। गुरू ही वह संत सुजान सुघड़ हरी के साथ मिलाता है, और तब मैं हरी नाम के सदके जाता हूँ। 2। हे संत जनो ! मैं (आपसे) हरी-सज्जन हरी-मित्र (का पता) पूछता हूँ। हे संत जनो ! (मुझे उसका पता) बताओ, मैं उस हरी-सज्जन की तलाश करता फिरता हूँ। हे संत जनों ! मैं तभी हरी-मित्र को मिल सकता हूँ जब प्रसन्न हुआ सत्गुरू उसका पता बताए। तभी, मैं सदा उस हरी नाम में लीन हो सकता हूँ। 3। हे सत्गुरू ! मेरे अंदर प्रभू से विछोड़े की पीड़ उठ रही है। मेरे अंदर प्रभू का प्रेम जाग उठा है। मेरे अंदर हरि के मिलन की आग पैदा हो रही है। हे गुरू ! मेरी श्रद्धा पूरी कर (ता कि) मैं उसका नाम-अंमृत (अपने) मुंह में डालूं। हे दास नानक ! (कह) हे हरी ! मेरे पर दयाल हो। मैं आपका हरी नाम ध्याऊँ, और मैं आपका हरी-नाम-रस प्राप्त करूँ। 4। 6। 20। 18। 32। 70।
महला 5 रागु गउड़ी गुआरेरी चउपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
किन बिधि कुसलु होत मेरे भाई ॥
किउ पाईऐ हरि राम सहाई ॥1॥ रहाउ ॥
कुसलु न ग्रिहि मेरी सभ माइआ ॥
ऊचे मंदर सुंदर छाइआ ॥
झूठे लालचि जनमु गवाइआ ॥1॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: महला 5 रागु गउड़ी गुआरेरी चउपदे ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे मेरे वीर ! (मनुष्य के अंदर) आत्मिक आनंद किन तरीको से (पैदा) हो सकता है? (असल) मित्र हरी-परमात्मा कैसे मिल सकता है?। 1। रहाउ। घर (के मोह) में आत्मिक सुख नहीं है, ये समझने में भी आत्मिक सुख नहीं हैकि ये सारी माया मेरी है। ऊँचे महल-माढ़ियों और सुंदर बागों की छाया भोगने में भी आनंद नहीं। (जिस मनुष्य ने उनमें आत्मिक सुख समझा है उसने) झूठे लालच में (अपना मानस) जनम गवा लिया है।

गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे दास नानक ! आप भी संगति में मिल (हरी प्रभू का नाम जप, और) भाग्यशाली बन।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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