मै हरि नामै हरि बिरहु लगाई जीउ ॥
मेरा हरि प्रभु मितु मिलै सुखु पाई जीउ ॥
हरि प्रभु देखि जीवा मेरी माई जीउ ॥
मेरा नामु सखा हरि भाई जीउ ॥1॥
गुण गावहु संत जीउ मेरे हरि प्रभ केरे जीउ ॥
जपि गुरमुखि नामु जीउ भाग वडेरे जीउ ॥
हरि हरि नामु जीउ प्रान हरि मेरे जीउ ॥
फिरि बहुड़ि न भवजल फेरे जीउ ॥2॥
किउ हरि प्रभ वेखा मेरै मनि तनि चाउ जीउ ॥
हरि मेलहु संत जीउ मनि लगा भाउ जीउ ॥
गुर सबदी पाईऐ हरि प्रीतम राउ जीउ ॥
वडभागी जपि नाउ जीउ ॥3॥
मेरै मनि तनि वडड़ी गोविंद प्रभ आसा जीउ ॥
हरि मेलहु संत जीउ गोविद प्रभ पासा जीउ ॥
सतिगुर मति नामु सदा परगासा जीउ ॥
जन नानक पूरिअड़ी मनि आसा जीउ ॥4॥5॥31॥69॥
मेरा बिरही नामु मिलै ता जीवा जीउ ॥
मन अंदरि अंम्रितु गुरमति हरि लीवा जीउ ॥
मनु हरि रंगि रतड़ा हरि रसु सदा पीवा जीउ ॥
हरि पाइअड़ा मनि जीवा जीउ ॥1॥
मेरै मनि तनि प्रेमु लगा हरि बाणु जीउ ॥
मेरा प्रीतमु मित्रु हरि पुरखु सुजाणु जीउ ॥
गुरु मेले संत हरि सुघड़ु सुजाणु जीउ ॥
हउ नाम विटहु कुरबाणु जीउ ॥2॥
हउ हरि हरि सजणु हरि मीतु दसाई जीउ ॥
हरि दसहु संतहु जी हरि खोजु पवाई जीउ ॥
सतिगुरु तुठड़ा दसे हरि पाई जीउ ॥
हरि नामे नामि समाई जीउ ॥3॥
मै वेदन प्रेमु हरि बिरहु लगाई जीउ ॥
गुर सरधा पूरि अंम्रितु मुखि पाई जीउ ॥
हरि होहु दइआलु हरि नामु धिआई जीउ ॥
जन नानक हरि रसु पाई जीउ ॥4॥6॥20॥18॥32॥70॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
किन बिधि कुसलु होत मेरे भाई ॥
किउ पाईऐ हरि राम सहाई ॥1॥ रहाउ ॥
कुसलु न ग्रिहि मेरी सभ माइआ ॥
ऊचे मंदर सुंदर छाइआ ॥
झूठे लालचि जनमु गवाइआ ॥1॥
गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे दास नानक ! आप भी संगति में मिल (हरी प्रभू का नाम जप, और) भाग्यशाली बन।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।