अंग 176

अंग
176
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
हसती घोड़े देखि विगासा ॥
लसकर जोड़े नेब खवासा ॥
गलि जेवड़ी हउमै के फासा ॥2॥
राजु कमावै दह दिस सारी ॥
माणै रंग भोग बहु नारी ॥
जिउ नरपति सुपनै भेखारी ॥3॥
एकु कुसलु मो कउ सतिगुरू बताइआ ॥
हरि जो किछु करे सु हरि किआ भगता भाइआ ॥
जन नानक हउमै मारि समाइआ ॥4॥
इनि बिधि कुसल होत मेरे भाई ॥
इउ पाईऐ हरि राम सहाई ॥1॥ रहाउ दूजा ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: मनुष्य हाथी, घोड़े देख के खुशी (महिसूस करता है), फौजें एकत्र करता है, मंत्री और शाही नौकर रखता है, पर उसके गले में अहंकार की रस्सी, अहम् के फाहे ही पड़ते हैं। 2। (राजा बन के मनुष्य) दसों दिशाओं में धरती का राज कमाता है, मौजें करता है, सि्त्रयां भोगता है (पर ये सब कुछ ऐसे ही है) जैसे कोई राजा मंगता बन जाता है (और दुखी होता है, आत्मिक सुख की जगह राज में व भोगों में भी दुख ही दुख है)। 3। सत्गुरू ने मुझे असल आत्मिक सुख (का मूल्य) बताया है (वह है परमात्मा की रजा में राजी रहना)। जो कुछ परमात्मा करता है उसके भक्तों को वह मीठा लगता है (और वे इस तरह आत्मिक सुख प्राप्त करते हैं)। हे दास नानक ! अहंकार मार के (भाग्यशाली मनुष्य परमात्मा में ही) लीन रहता है। 4। हे मेरे वीर ! इस तरीके से (भाव, रजा में रहने से) आत्मिक आनंद पैदा होता है, इस तरह (ही) असल मित्र हरी-परमात्मा मिलता है। 1। रहाउ दूजा।
गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥
किउ भ्रमीऐ भ्रमु किस का होई ॥
जा जलि थलि महीअलि रविआ सोई ॥
गुरमुखि उबरे मनमुख पति खोई ॥1॥
जिसु राखै आपि रामु दइआरा ॥
तिसु नही दूजा को पहुचनहारा ॥1॥ रहाउ ॥
सभ महि वरतै एकु अनंता ॥
ता तूं सुखि सोउ होइ अचिंता ॥
ओहु सभु किछु जाणै जो वरतंता ॥2॥
मनमुख मुए जिन दूजी पिआसा ॥
बहु जोनी भवहि धुरि किरति लिखिआसा ॥
जैसा बीजहि तैसा खासा ॥3॥
देखि दरसु मनि भइआ विगासा ॥
सभु नदरी आइआ ब्रहमु परगासा ॥
जन नानक की हरि पूरन आसा ॥4॥2॥71॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥ तब मन भटकने से हट जाता है और किसी मायावी पदार्थ के लिए भटकना रहती ही नहीं। जब (ये यकीन बन जाए कि) वह प्रभू ही जल में धरती में आकाश में व्यापक है (पर तृष्णा के प्रभाव से) गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य (ही) बचते हैं। अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य (तृष्णा में फंस के अपनी) इज्जत गवा लेते हैं (क्योंकि वे आत्मिक जीवन के स्तर से नीचे हो जाते हैं)। 1। (हे भाई !) जिस मनुष्य को दयाल प्रभू खुद (तृष्णा से) बचाता है (उसका जीवन इतना ऊँचा हो जाता है कि) कोई और मनुष्य उसकी बराबरी नहीं कर सकता। 1। रहाउ। (जब आपको ये निश्चय हैं जाए कि) एक बेअंत प्रभू ही सब में व्यापक है, (हे भाई !) आप तभी चिंता-रहित हैं के आत्मिक आनंद में लीन रह सकता है और, जो कुछ जगत में घटित हो रहा है वह परमात्मा सब कुछ जानता है। 2। जिन मनुष्यों को माया की तृष्णा चिपकी रहती है, वे अपने मन के मुरीद मनुष्य आत्मिक मौत से मरे रहते हैं क्योंकि वे जैसा (कर्म बीज) बीजते हैं वैसा ही (फल) खाते हैं। उनके किए कर्मों के अनुसार धुर से ही उनके माथे पर ऐसे लेख लिखे होते हैं कि वे अनेकों योनियों में भटकते फिरते हैं। 3। (हर जगह) परमात्मा का दर्शन करके जिस मनुष्य के मन में खिड़ाव (प्रसन्नता) पैदा होता है, उसे हर जगह परमात्मा का ही प्रकाश नजर आता है, हे नानक ! उस दास की परमात्मा (हरेक) आशा पूरी करता है। 4। 2। 71।
गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥
कई जनम भए कीट पतंगा ॥
कई जनम गज मीन कुरंगा ॥
कई जनम पंखी सरप होइओ ॥
कई जनम हैवर ब्रिख जोइओ ॥1॥
मिलु जगदीस मिलन की बरीआ ॥
चिरंकाल इह देह संजरीआ ॥1॥ रहाउ ॥
कई जनम सैल गिरि करिआ ॥
कई जनम गरभ हिरि खरिआ ॥
कई जनम साख करि उपाइआ ॥
लख चउरासीह जोनि भ्रमाइआ ॥2॥
साधसंगि भइओ जनमु परापति ॥
करि सेवा भजु हरि हरि गुरमति ॥
तिआगि मानु झूठु अभिमानु ॥
जीवत मरहि दरगह परवानु ॥3॥
जो किछु होआ सु तुझ ते होगु ॥
अवरु न दूजा करणै जोगु ॥
ता मिलीऐ जा लैहि मिलाइ ॥
कहु नानक हरि हरि गुण गाइ ॥4॥3॥72॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥ (हे भाई !) आप कई जन्मों में कीड़े-पतंगे बना रहा, कई जन्मों में हाथी मॅछ हिरन बनता रहा। कई जन्मों में आप पंछी और साँप बना, कई जन्मों में आप घोड़े बैल बनके हाँका गया। 1। (हे भाई !) चिरंकाल के बाद आपको ये (मानुस) शरीर मिला है, जगत के मालिक प्रभू को (अब) मिल, (यही मानुष जनम प्रभू को) मिलने का समय है। 1। रहाउ। (हे भाई !) कई जन्मों में आपको पत्थर की चट्टान बनाया गया, कई जन्मों में (आपकी माँ का) गर्भ ही छनता रहा। कई जन्मों में आपको (विभिन्न प्रकार के) वृक्ष बना के पैदा किया गया, और इस तरह (चौरासी लाख) जूनियों में आपको घुमाया गया। 2। (हे भाई ! अब आपको) मानस जन्म मिला है, साध-संगति में आ, गुरू की मति ले के (ख़लकत की) सेवा कर और परमात्मा का भजन कर। अभिमान, झूठ व अहंकार त्याग दे। आप (परमात्मा की) दरगाह में (तब ही) कबूल होंगे अगर आप जीवन जीते हुए ही स्वैभाव को मार लेगा। 3। हे नानक ! (प्रभू के आगे अरदास कर और) कह, (हे प्रभू आपका सिमरन करने की जीव की क्या स्मर्था हैं सकती है?) जो कुछ (जगत में) होता है वह आपके (हुकम) से ही होता है। (आपके बिना) अन्य कोई भी कुछ करने की स्मर्था वाला नहीं। हे प्रभू ! आपको तभी मिला जा सकता है अगर आप खुद जीव को (अपने चरणों में) मिला ले, तभी जीव हरि गुण गा सकता है। 4। 3।72
गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥
करम भूमि महि बोअहु नामु ॥
पूरन होइ तुमारा कामु ॥
फल पावहि मिटै जम त्रास ॥
नित गावहि हरि हरि गुण जास ॥1॥
हरि हरि नामु अंतरि उरि धारि ॥
सीघर कारजु लेहु सवारि ॥1॥ रहाउ ॥
अपने प्रभ सिउ होहु सावधानु ॥
ता तूं दरगह पावहि मानु ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥ (हे भाई !) कर्म बीजने वाली धरती में (मानव शरीर में) परमात्मा का नाम बीज इस तरह आपका (मानस जीवन का) मनोरथ सिरे चढ़ जाएगा। आपकी आत्मिक मौत का खतरा मिट जाएगा, ऐसा फल आपको मिलेगा (हे भाई !) अगर आप नित्य परमात्मा के गुण गाए। 1। (हे भाई !) अपने अंदर अपने हृदय में परमात्मा का नाम संभाल के रख और (इस तरह) अपना मानस जीवन का मनोरथ संभाल ले। 1। रहाउ। (हे भाई !) (संत जनों की बरकति के सदका) अपने परमात्मा के साथ (परमात्मा की याद में) सुचेत रह (जब आप ये उद्यम करेगा) तब आप परमात्मा की हजूरी में आदर-मान प्राप्त करेगा

गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “मनुष्य हाथी, घोड़े देख के खुशी (महिसूस करता है), फौजें एकत्र करता है, मंत्री और शाही नौकर रखता है, पर उसके गले में अहंकार की रस्सी, अहम् के फाहे ही पड़ते हैं।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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