लसकर जोड़े नेब खवासा ॥
गलि जेवड़ी हउमै के फासा ॥2॥
राजु कमावै दह दिस सारी ॥
माणै रंग भोग बहु नारी ॥
जिउ नरपति सुपनै भेखारी ॥3॥
एकु कुसलु मो कउ सतिगुरू बताइआ ॥
हरि जो किछु करे सु हरि किआ भगता भाइआ ॥
जन नानक हउमै मारि समाइआ ॥4॥
इनि बिधि कुसल होत मेरे भाई ॥
इउ पाईऐ हरि राम सहाई ॥1॥ रहाउ दूजा ॥
किउ भ्रमीऐ भ्रमु किस का होई ॥
जा जलि थलि महीअलि रविआ सोई ॥
गुरमुखि उबरे मनमुख पति खोई ॥1॥
जिसु राखै आपि रामु दइआरा ॥
तिसु नही दूजा को पहुचनहारा ॥1॥ रहाउ ॥
सभ महि वरतै एकु अनंता ॥
ता तूं सुखि सोउ होइ अचिंता ॥
ओहु सभु किछु जाणै जो वरतंता ॥2॥
मनमुख मुए जिन दूजी पिआसा ॥
बहु जोनी भवहि धुरि किरति लिखिआसा ॥
जैसा बीजहि तैसा खासा ॥3॥
देखि दरसु मनि भइआ विगासा ॥
सभु नदरी आइआ ब्रहमु परगासा ॥
जन नानक की हरि पूरन आसा ॥4॥2॥71॥
कई जनम भए कीट पतंगा ॥
कई जनम गज मीन कुरंगा ॥
कई जनम पंखी सरप होइओ ॥
कई जनम हैवर ब्रिख जोइओ ॥1॥
मिलु जगदीस मिलन की बरीआ ॥
चिरंकाल इह देह संजरीआ ॥1॥ रहाउ ॥
कई जनम सैल गिरि करिआ ॥
कई जनम गरभ हिरि खरिआ ॥
कई जनम साख करि उपाइआ ॥
लख चउरासीह जोनि भ्रमाइआ ॥2॥
साधसंगि भइओ जनमु परापति ॥
करि सेवा भजु हरि हरि गुरमति ॥
तिआगि मानु झूठु अभिमानु ॥
जीवत मरहि दरगह परवानु ॥3॥
जो किछु होआ सु तुझ ते होगु ॥
अवरु न दूजा करणै जोगु ॥
ता मिलीऐ जा लैहि मिलाइ ॥
कहु नानक हरि हरि गुण गाइ ॥4॥3॥72॥
करम भूमि महि बोअहु नामु ॥
पूरन होइ तुमारा कामु ॥
फल पावहि मिटै जम त्रास ॥
नित गावहि हरि हरि गुण जास ॥1॥
हरि हरि नामु अंतरि उरि धारि ॥
सीघर कारजु लेहु सवारि ॥1॥ रहाउ ॥
अपने प्रभ सिउ होहु सावधानु ॥
ता तूं दरगह पावहि मानु ॥
गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “मनुष्य हाथी, घोड़े देख के खुशी (महिसूस करता है), फौजें एकत्र करता है, मंत्री और शाही नौकर रखता है, पर उसके गले में अहंकार की रस्सी, अहम् के फाहे ही पड़ते हैं।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।