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गउड़ी
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· शबद · राग गउड़ी
हसती घोड़े देखि विगासा ॥
हसती घोड़े देखि विगासा ॥
लसकर जोड़े नेब खवासा ॥
गलि जेवड़ी हउमै के फासा ॥2॥
राजु कमावै दह दिस सारी ॥
माणै रंग भोग बहु नारी ॥
जिउ नरपति सुपनै भेखारी ॥3॥
एकु कुसलु मो कउ सतिगुरू बताइआ ॥
हरि जो किछु करे सु हरि किआ भगता भाइआ ॥
जन नानक हउमै मारि समाइआ ॥4॥
इनि बिधि कुसल होत मेरे भाई ॥
इउ पाईऐ हरि राम सहाई ॥1॥ रहाउ दूजा ॥
लसकर जोड़े नेब खवासा ॥
गलि जेवड़ी हउमै के फासा ॥2॥
राजु कमावै दह दिस सारी ॥
माणै रंग भोग बहु नारी ॥
जिउ नरपति सुपनै भेखारी ॥3॥
एकु कुसलु मो कउ सतिगुरू बताइआ ॥
हरि जो किछु करे सु हरि किआ भगता भाइआ ॥
जन नानक हउमै मारि समाइआ ॥4॥
इनि बिधि कुसल होत मेरे भाई ॥
इउ पाईऐ हरि राम सहाई ॥1॥ रहाउ दूजा ॥
हिन्दी अर्थ: मनुष्य हाथी, घोड़े देख के खुशी (महिसूस करता है), फौजें एकत्र करता है, मंत्री और शाही नौकर रखता है, पर उसके गले में अहंकार की रस्सी, अहम् के फाहे ही पड़ते हैं। 2। (राजा बन के मनुष्य) दसों दिशाओं में धरती का राज कमाता है, मौजें करता है, सि्त्रयां भोगता है (पर ये सब कुछ ऐसे ही है) जैसे कोई राजा मंगता बन जाता है (और दुखी होता है, आत्मिक सुख की जगह राज में व भोगों में भी दुख ही दुख है)। 3। सत्गुरू ने मुझे असल आत्मिक सुख (का मूल्य) बताया है (वह है परमात्मा की रजा में राजी रहना)। जो कुछ परमात्मा करता है उसके भक्तों को वह मीठा लगता है (और वे इस तरह आत्मिक सुख प्राप्त करते हैं)। हे दास नानक ! अहंकार मार के (भाग्यशाली मनुष्य परमात्मा में ही) लीन रहता है। 4। हे मेरे वीर ! इस तरीके से (भाव, रजा में रहने से) आत्मिक आनंद पैदा होता है, इस तरह (ही) असल मित्र हरी-परमात्मा मिलता है। 1। रहाउ दूजा।
· शबद · राग गउड़ी
किउ भ्रमीऐ भ्रमु किस का होई ॥
गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥
किउ भ्रमीऐ भ्रमु किस का होई ॥
जा जलि थलि महीअलि रविआ सोई ॥
गुरमुखि उबरे मनमुख पति खोई ॥1॥
जिसु राखै आपि रामु दइआरा ॥
तिसु नही दूजा को पहुचनहारा ॥1॥ रहाउ ॥
सभ महि वरतै एकु अनंता ॥
ता तूं सुखि सोउ होइ अचिंता ॥
ओहु सभु किछु जाणै जो वरतंता ॥2॥
मनमुख मुए जिन दूजी पिआसा ॥
बहु जोनी भवहि धुरि किरति लिखिआसा ॥
जैसा बीजहि तैसा खासा ॥3॥
देखि दरसु मनि भइआ विगासा ॥
सभु नदरी आइआ ब्रहमु परगासा ॥
जन नानक की हरि पूरन आसा ॥4॥2॥71॥
किउ भ्रमीऐ भ्रमु किस का होई ॥
जा जलि थलि महीअलि रविआ सोई ॥
गुरमुखि उबरे मनमुख पति खोई ॥1॥
जिसु राखै आपि रामु दइआरा ॥
तिसु नही दूजा को पहुचनहारा ॥1॥ रहाउ ॥
सभ महि वरतै एकु अनंता ॥
ता तूं सुखि सोउ होइ अचिंता ॥
ओहु सभु किछु जाणै जो वरतंता ॥2॥
मनमुख मुए जिन दूजी पिआसा ॥
बहु जोनी भवहि धुरि किरति लिखिआसा ॥
जैसा बीजहि तैसा खासा ॥3॥
देखि दरसु मनि भइआ विगासा ॥
सभु नदरी आइआ ब्रहमु परगासा ॥
जन नानक की हरि पूरन आसा ॥4॥2॥71॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥ तब मन भटकने से हट जाता है और किसी मायावी पदार्थ के लिए भटकना रहती ही नहीं। जब (ये यकीन बन जाए कि) वह प्रभू ही जल में धरती में आकाश में व्यापक है (पर तृष्णा के प्रभाव से) गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य (ही) बचते हैं। अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य (तृष्णा में फंस के अपनी) इज्जत गवा लेते हैं (क्योंकि वे आत्मिक जीवन के स्तर से नीचे हो जाते हैं)। 1। (हे भाई !) जिस मनुष्य को दयाल प्रभू खुद (तृष्णा से) बचाता है (उसका जीवन इतना ऊँचा हो जाता है कि) कोई और मनुष्य उसकी बराबरी नहीं कर सकता। 1। रहाउ। (जब आपको ये निश्चय हो जाए कि) एक बेअंत प्रभू ही सब में व्यापक है, (हे भाई !) आप तभी चिंता-रहित हो के आत्मिक आनंद में लीन रह सकते हैं और, जो कुछ जगत में घटित हो रहा है वह परमात्मा सब कुछ जानता है। 2। जिन मनुष्यों को माया की तृष्णा चिपकी रहती है, वे अपने मन के मुरीद मनुष्य आत्मिक मौत से मरे रहते हैं क्योंकि वे जैसा (कर्म बीज) बीजते हैं वैसा ही (फल) खाते हैं। उनके किए कर्मों के अनुसार धुर से ही उनके माथे पर ऐसे लेख लिखे होते हैं कि वे अनेकों योनियों में भटकते फिरते हैं। 3। (हर जगह) परमात्मा का दर्शन करके जिस मनुष्य के मन में खिड़ाव (प्रसन्नता) पैदा होता है, उसे हर जगह परमात्मा का ही प्रकाश नजर आता है, हे नानक ! उस दास की परमात्मा (हरेक) आशा पूरी करता है। 4। 2। 71।
· शबद · राग गउड़ी
कई जनम भए कीट पतंगा ॥
गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥
कई जनम भए कीट पतंगा ॥
कई जनम गज मीन कुरंगा ॥
कई जनम पंखी सरप होइओ ॥
कई जनम हैवर ब्रिख जोइओ ॥1॥
मिलु जगदीस मिलन की बरीआ ॥
चिरंकाल इह देह संजरीआ ॥1॥ रहाउ ॥
कई जनम सैल गिरि करिआ ॥
कई जनम गरभ हिरि खरिआ ॥
कई जनम साख करि उपाइआ ॥
लख चउरासीह जोनि भ्रमाइआ ॥2॥
साधसंगि भइओ जनमु परापति ॥
करि सेवा भजु हरि हरि गुरमति ॥
तिआगि मानु झूठु अभिमानु ॥
जीवत मरहि दरगह परवानु ॥3॥
जो किछु होआ सु तुझ ते होगु ॥
अवरु न दूजा करणै जोगु ॥
ता मिलीऐ जा लैहि मिलाइ ॥
कहु नानक हरि हरि गुण गाइ ॥4॥3॥72॥
कई जनम भए कीट पतंगा ॥
कई जनम गज मीन कुरंगा ॥
कई जनम पंखी सरप होइओ ॥
कई जनम हैवर ब्रिख जोइओ ॥1॥
मिलु जगदीस मिलन की बरीआ ॥
चिरंकाल इह देह संजरीआ ॥1॥ रहाउ ॥
कई जनम सैल गिरि करिआ ॥
कई जनम गरभ हिरि खरिआ ॥
कई जनम साख करि उपाइआ ॥
लख चउरासीह जोनि भ्रमाइआ ॥2॥
साधसंगि भइओ जनमु परापति ॥
करि सेवा भजु हरि हरि गुरमति ॥
तिआगि मानु झूठु अभिमानु ॥
जीवत मरहि दरगह परवानु ॥3॥
जो किछु होआ सु तुझ ते होगु ॥
अवरु न दूजा करणै जोगु ॥
ता मिलीऐ जा लैहि मिलाइ ॥
कहु नानक हरि हरि गुण गाइ ॥4॥3॥72॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥ (हे भाई !) आप कई जन्मों में कीड़े-पतंगे बने रहे, कई जन्मों में हाथी मॅछ हिरन बनते रहे। कई जन्मों में आप पंछी और साँप बने, कई जन्मों में आप घोड़े बैल बनके हाँके गए। 1। (हे भाई !) चिरंकाल के बाद आपको ये (मानुस) शरीर मिला है, जगत के मालिक प्रभू को (अब) मिलें, (यही मानुष जनम प्रभू को) मिलने का समय है। 1। रहाउ। (हे भाई !) कई जन्मों में आपको पत्थर की चट्टान बनाया गया, कई जन्मों में (आपकी माँ का) गर्भ ही छनता रहा। कई जन्मों में आपको (विभिन्न प्रकार के) वृक्ष बना के पैदा किया गया, और इस तरह (चौरासी लाख) जूनियों में आपको घुमाया गया। 2। (हे भाई ! अब आपको) मानस जन्म मिला है, साध-संगति में आएँ, गुरू की मति ले के (ख़लकत की) सेवा करें और परमात्मा का भजन करें। अभिमान, झूठ व अहंकार त्याग दें। आप (परमात्मा की) दरगाह में (तब ही) कबूल होंगे अगर आप जीवन जीते हुए ही स्वैभाव को मार लेंगे। 3। हे नानक ! (प्रभू के आगे अरदास करें और) कहें, (हे प्रभू आपका सिमरन करने की जीव की क्या स्मर्था हो सकती है?) जो कुछ (जगत में) होता है वह आपके (हुकम) से ही होता है। (आपके बिना) अन्य कोई भी कुछ करने की स्मर्था वाला नहीं। हे प्रभू ! आपको तभी मिला जा सकता है अगर आप खुद जीव को (अपने चरणों में) मिला लें, तभी जीव हरि गुण गा सकता है। 4। 3।72
· शबद · राग गउड़ी
करम भूमि महि बोअहु नामु ॥
गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥
करम भूमि महि बोअहु नामु ॥
पूरन होइ तुमारा कामु ॥
फल पावहि मिटै जम त्रास ॥
नित गावहि हरि हरि गुण जास ॥1॥
हरि हरि नामु अंतरि उरि धारि ॥
सीघर कारजु लेहु सवारि ॥1॥ रहाउ ॥
अपने प्रभ सिउ होहु सावधानु ॥
ता तूं दरगह पावहि मानु ॥
करम भूमि महि बोअहु नामु ॥
पूरन होइ तुमारा कामु ॥
फल पावहि मिटै जम त्रास ॥
नित गावहि हरि हरि गुण जास ॥1॥
हरि हरि नामु अंतरि उरि धारि ॥
सीघर कारजु लेहु सवारि ॥1॥ रहाउ ॥
अपने प्रभ सिउ होहु सावधानु ॥
ता तूं दरगह पावहि मानु ॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥ (हे भाई !) कर्म बीजने वाली धरती में (मानव शरीर में) परमात्मा का नाम बीज इस तरह आपका (मानस जीवन का) मनोरथ सिरे चढ़ जाएगा। आपकी आत्मिक मौत का खतरा मिट जाएगा, ऐसा फल आपको मिलेगा (हे भाई !) अगर आप नित्य परमात्मा के गुण गाए। 1। (हे भाई !) अपने अंदर अपने हृदय में परमात्मा का नाम संभाल के रखें और (इस तरह) अपना मानस जीवन का मनोरथ संभाल लें। 1। रहाउ। (हे भाई !) (संत जनों की बरकति के सदका) अपने परमात्मा के साथ (परमात्मा की याद में) सुचेत रहें (जब आप ये उद्यम करेंगे) तब आप परमात्मा की हजूरी में आदर-मान प्राप्त करेंगे
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 176 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।