अंग
174
गउड़ी
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संत जना मिलि पाइआ मेरे गोविदा मेरा हरि प्रभु सजणु सैणी जीउ ॥
संत जना मिलि पाइआ मेरे गोविदा मेरा हरि प्रभु सजणु सैणी जीउ ॥
हरि आइ मिलिआ जगजीवनु मेरे गोविंदा मै सुखि विहाणी रैणी जीउ ॥2॥
मै मेलहु संत मेरा हरि प्रभु सजणु मै मनि तनि भुख लगाईआ जीउ ॥
हउ रहि न सकउ बिनु देखे मेरे प्रीतम मै अंतरि बिरहु हरि लाईआ जीउ ॥
हरि राइआ मेरा सजणु पिआरा गुरु मेले मेरा मनु जीवाईआ जीउ ॥
मेरै मनि तनि आसा पूरीआ मेरे गोविंदा हरि मिलिआ मनि वाधाईआ जीउ ॥3॥
वारी मेरे गोविंदा वारी मेरे पिआरिआ हउ तुधु विटड़िअहु सद वारी जीउ ॥
मेरै मनि तनि प्रेमु पिरंम का मेरे गोविदा हरि पूंजी राखु हमारी जीउ ॥
सतिगुरु विसटु मेलि मेरे गोविंदा हरि मेले करि रैबारी जीउ ॥
हरि नामु दइआ करि पाइआ मेरे गोविंदा जन नानकु सरणि तुमारी जीउ ॥4॥3॥29॥67॥
हरि आइ मिलिआ जगजीवनु मेरे गोविंदा मै सुखि विहाणी रैणी जीउ ॥2॥
मै मेलहु संत मेरा हरि प्रभु सजणु मै मनि तनि भुख लगाईआ जीउ ॥
हउ रहि न सकउ बिनु देखे मेरे प्रीतम मै अंतरि बिरहु हरि लाईआ जीउ ॥
हरि राइआ मेरा सजणु पिआरा गुरु मेले मेरा मनु जीवाईआ जीउ ॥
मेरै मनि तनि आसा पूरीआ मेरे गोविंदा हरि मिलिआ मनि वाधाईआ जीउ ॥3॥
वारी मेरे गोविंदा वारी मेरे पिआरिआ हउ तुधु विटड़िअहु सद वारी जीउ ॥
मेरै मनि तनि प्रेमु पिरंम का मेरे गोविदा हरि पूंजी राखु हमारी जीउ ॥
सतिगुरु विसटु मेलि मेरे गोविंदा हरि मेले करि रैबारी जीउ ॥
हरि नामु दइआ करि पाइआ मेरे गोविंदा जन नानकु सरणि तुमारी जीउ ॥4॥3॥29॥67॥
हिन्दी अर्थ: हे मेरे गोबिंद ! मेरा हरी प्रभू मेरा (असली) सज्जन-मित्र (जिन्होंने भी ढूँढा है) संत जनों को मिल के ही ढूँढा है। हे मेरे गोबिंद ! (संत जनों की मेहर से ही) मुझे (भी) वह हरी आ मिला है जो सारे जगत के जीवन का आसरा है। अब मेरी (जिंदगी रूप) रात आनंद में व्यतीत हो रही है। 2। हे संत जनों !मुझे मेरा सज्जन हरी-प्रभू मिला दो। मेरे मन में मेरे हृदय में उससे मिलने की तमन्ना पैदा हो रही है। मैं अपने प्रीतम को देखे बिना धैर्य नहीं पा सकता, मेरे अंदर उसके विछोड़े का दर्द उॅठ रहा है। परमात्मा ही मेरा राजा है मेरा प्यारा सज्जन है। जब (उससे) गुरू (मुझे) मिला देता है तो मेरा मन जी उठता है। हे मेरे गोबिंद ! जब आप हरी मुझे मिल जाते हैं, मेरे मन में मेरे दिल में (चिरंकाल से टिकी हुई) आस पूरी हो जाती है, और मेरे मन में चढ़दी कला (उत्साह, उमंग) पैदा हो जाती है। 3। हे मेरे गोबिंद ! हे मेरे प्यारे ! मैं सदके, मैं आपसे सदा सदके। हे मेरे गोबिंद ! मेरे मन में मेरे हृदय में आपके प्रति प्रेम जाग उठा है (मैं आपकी शरण आया हूँ)। मेरी इस (प्रेम की) राशि की आप रक्षा करें। हे मेरे गोबिंद ! मुझे विचोला गुरू मिलाएँ, जो मेरे (जीवन की) अगुवाई करके मुझे आप हरी से मिला दें। हे मेरे गोबिंद ! मैं दास नानक आपकी शरण आया हूँ । आपकी दया के सदके ही मुझे आपका हरी-नाम प्राप्त हुआ है। 4। 3। 29। 67।
चोजी मेरे गोविंदा चोजी मेरे पिआरिआ हरि प्रभु मेरा चोजी जीउ ॥
गउड़ी माझ महला 4 ॥
चोजी मेरे गोविंदा चोजी मेरे पिआरिआ हरि प्रभु मेरा चोजी जीउ ॥
हरि आपे कान॑ु उपाइदा मेरे गोविदा हरि आपे गोपी खोजी जीउ ॥
हरि आपे सभ घट भोगदा मेरे गोविंदा आपे रसीआ भोगी जीउ ॥
हरि सुजाणु न भुलई मेरे गोविंदा आपे सतिगुरु जोगी जीउ ॥1॥
आपे जगतु उपाइदा मेरे गोविदा हरि आपि खेलै बहु रंगी जीउ ॥
इकना भोग भोगाइदा मेरे गोविंदा इकि नगन फिरहि नंग नंगी जीउ ॥
आपे जगतु उपाइदा मेरे गोविदा हरि दानु देवै सभ मंगी जीउ ॥
भगता नामु आधारु है मेरे गोविंदा हरि कथा मंगहि हरि चंगी जीउ ॥2॥
हरि आपे भगति कराइदा मेरे गोविंदा हरि भगता लोच मनि पूरी जीउ ॥
आपे जलि थलि वरतदा मेरे गोविदा रवि रहिआ नही दूरी जीउ ॥
हरि अंतरि बाहरि आपि है मेरे गोविदा हरि आपि रहिआ भरपूरी जीउ ॥
हरि आतम रामु पसारिआ मेरे गोविंदा हरि वेखै आपि हदूरी जीउ ॥3॥
हरि अंतरि वाजा पउणु है मेरे गोविंदा हरि आपि वजाए तिउ वाजै जीउ ॥
हरि अंतरि नामु निधानु है मेरे गोविंदा गुर सबदी हरि प्रभु गाजै जीउ ॥
आपे सरणि पवाइदा मेरे गोविंदा हरि भगत जना राखु लाजै जीउ ॥
चोजी मेरे गोविंदा चोजी मेरे पिआरिआ हरि प्रभु मेरा चोजी जीउ ॥
हरि आपे कान॑ु उपाइदा मेरे गोविदा हरि आपे गोपी खोजी जीउ ॥
हरि आपे सभ घट भोगदा मेरे गोविंदा आपे रसीआ भोगी जीउ ॥
हरि सुजाणु न भुलई मेरे गोविंदा आपे सतिगुरु जोगी जीउ ॥1॥
आपे जगतु उपाइदा मेरे गोविदा हरि आपि खेलै बहु रंगी जीउ ॥
इकना भोग भोगाइदा मेरे गोविंदा इकि नगन फिरहि नंग नंगी जीउ ॥
आपे जगतु उपाइदा मेरे गोविदा हरि दानु देवै सभ मंगी जीउ ॥
भगता नामु आधारु है मेरे गोविंदा हरि कथा मंगहि हरि चंगी जीउ ॥2॥
हरि आपे भगति कराइदा मेरे गोविंदा हरि भगता लोच मनि पूरी जीउ ॥
आपे जलि थलि वरतदा मेरे गोविदा रवि रहिआ नही दूरी जीउ ॥
हरि अंतरि बाहरि आपि है मेरे गोविदा हरि आपि रहिआ भरपूरी जीउ ॥
हरि आतम रामु पसारिआ मेरे गोविंदा हरि वेखै आपि हदूरी जीउ ॥3॥
हरि अंतरि वाजा पउणु है मेरे गोविंदा हरि आपि वजाए तिउ वाजै जीउ ॥
हरि अंतरि नामु निधानु है मेरे गोविंदा गुर सबदी हरि प्रभु गाजै जीउ ॥
आपे सरणि पवाइदा मेरे गोविंदा हरि भगत जना राखु लाजै जीउ ॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी माझ महला 4 ॥ हे मेरे प्यारे ! हे मेरे गोबिंद ! आप अपनी मर्जी के काम करने वाले मेरे हरि-प्रभु हैं। हरी स्वयं ही कृष्ण को पैदा करने वाला है। हरी स्वयं ही (कृष्ण को) तलाशने वाली ग्वालनि है। सब शरीरों में व्यापक हो के हरी खुद ही सब पदार्थों को भोगता है। हरी खुद ही सारे मायावी पदार्थों का रस लेने वाला है, स्वयं ही भोगने वाला है।वह हरी खुद ही भोगों से निर्लिप सत्गुरू है। 1। हरी प्रभू खुद ही जगत पैदा करता है। हरी स्वयं ही अनेकों रंगों में (जगत का खेल) खेल रहा है। हरी स्वयं ही अनेकों जीवों से मायावी पदार्थों के भोग भोगाता है (भाव, अनेकों को पेट भर के पदार्थ बख्शता है, पर) अनेक जीव ऐसे हैं जो नंगे घूमते हैं (जिनके तन पर कपड़ा भी नहीं)। हरी खुद ही सारे जगत को पैदा करता है। सारी दुनिया उससे मांगती रहती है। वह सभी को दातें देता है। उसकी भक्ति करने वाले लोगों को उसके नाम का ही आसरा है, वे हरी से उसकी श्रेष्ठ सिफत सालाह ही मांगते हैं। 2। हरी खुद ही (अपने भक्तों से) अपनी भक्ति करवाता है, भक्तों के मन में (पैदा हुई भक्ति की) तमन्ना खुद ही पूरी करता है। जल में, धरती में, (सब जगह) हरी खुद ही बस रहा है, (सब जीवों में) व्यापक है (किसी जीव से वह हरी) दूर नहीं। सब जीवों के अंदर व बाहर सारे जगत में हरी खुद ही बसता है, हर जगह हरी स्वयं ही भरपूर है। सर्व-व्यापक राम खुद ही इस जगत-पसारे को पसार रहा है, हरेक के अंग-संग रह के हरी खुद ही सब की संभाल करता है। 3। सब जीवों के अंदर प्राण-रूप हो के हरी स्वयं ही बाजा (बजा रहा) है। (हरेक जीव का, मानो, बाजा है) जैसे वह हरेक जीव-बाजे को बजाता है तैसे हरेक जीव बाजा बजता है। हरेक जीव के अंदर हरी का नाम खजाना मौजूद है, पर गुरू के शबद के द्वारा ही हरी-प्रभू (जीव के अंदर) प्रगट होता है। हरी स्वयं ही जीव को पे्ररित करके अपनी शरण में लाता है, हरी खुद ही भगतों की इज्जत का रखवाला बनता है (भाव, भक्तों को विकारों में गिरने से बचाता है)।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ४: गुरु राम दास जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग १७४ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।