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अंग 173

अंग
173
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
वडभागी मिलु रामा ॥1॥
गुरु जोगी पुरखु मिलिआ रंगु माणी जीउ ॥
गुरु हरि रंगि रतड़ा सदा निरबाणी जीउ ॥
वडभागी मिलु सुघड़ सुजाणी जीउ ॥
मेरा मनु तनु हरि रंगि भिंना ॥2॥
आवहु संतहु मिलि नामु जपाहा ॥
विचि संगति नामु सदा लै लाहा जीउ ॥
करि सेवा संता अंम्रितु मुखि पाहा जीउ ॥
मिलु पूरबि लिखिअड़े धुरि करमा ॥3॥
सावणि वरसु अंम्रिति जगु छाइआ जीउ ॥
मनु मोरु कुहुकिअड़ा सबदु मुखि पाइआ ॥
हरि अंम्रितु वुठड़ा मिलिआ हरि राइआ जीउ ॥
जन नानक प्रेमि रतंना ॥4॥1॥27॥65॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: हे जिंदे ! मिल राम को, आपके भाग्य अच्छे हैं गए हैं। 1। (हे भाई !) प्रभू का रूप जोगी-रूप गुरू मुझे मिल गया है (उसकी कृपा से) मैं आत्मिक आनंद माणता हूँ। गुरू सदा परमात्मा के नाम-रंग में रंगा रहता है, और गुरू सदा वासना-रहित है। हे बड़े भाग्यों वाले ! डस सुंदर जीवन वाले सुजान गुरू को मिल। (गुरू की कृपा से ही) मेरा मन, मेरा तन, परमात्मा के प्रेम रंग में भीग गया है। 2। हे संत जनों ! आओ, हम मिल के परमात्मा का नाम जपें। (हे भाई !) साध-संगति में मिल के सदा हरि-नाम की कमाई कर। (हे भाई ! आओ, साध-संगति में) गुरमुखों की सेवा करके अपने मुंह में आत्मिक जीवन देने वाला नाम-भोजन करें। (हे जिंदे !) मिल प्रभू को, प्रभू की दरगाह से उस की बख्शिश के पूर्बले समय के लेख जाग पड़े हैं। 3। (जैसे) सावन (के महीने) में बादल (बरसता है और) जगत को (धरती को) जल से भरपूर कर देता है (उस बादल को देख देख के) मोर अपनी मीठी बोली बोलता है, (वैसे गुरू) नाम-अमृत से जगत को प्रभावित करता है। (जिस भाग्यशाली पर मेहर होती है उसका) मन उछाले मारता है (वह मनुष्य गुरू के) शबद को अपने मुंह में डालता है। हे दास नानक ! (जिस मनुष्य के हृदय में) नाम अमृत आ बसता है (जिसे) परमात्मा मिल जाता है वह प्रभू प्रेम में रंगा जाता है। 4। 1। 27। 65।
गउड़ी माझ महला 4 ॥
आउ सखी गुण कामण करीहा जीउ ॥
मिलि संत जना रंगु माणिह रलीआ जीउ ॥
गुर दीपकु गिआनु सदा मनि बलीआ जीउ ॥
हरि तुठै ढुलि ढुलि मिलीआ जीउ ॥1॥
मेरै मनि तनि प्रेमु लगा हरि ढोले जीउ ॥
मै मेले मित्रु सतिगुरु वेचोले जीउ ॥
मनु देवां संता मेरा प्रभु मेले जीउ ॥
हरि विटड़िअहु सदा घोले जीउ ॥2॥
वसु मेरे पिआरिआ वसु मेरे गोविदा हरि करि किरपा मनि वसु जीउ ॥
मनि चिंदिअड़ा फलु पाइआ मेरे गोविंदा गुरु पूरा वेखि विगसु जीउ ॥
हरि नामु मिलिआ सोहागणी मेरे गोविंदा मनि अनदिनु अनदु रहसु जीउ ॥
हरि पाइअड़ा वडभागीई मेरे गोविंदा नित लै लाहा मनि हसु जीउ ॥3॥
हरि आपि उपाए हरि आपे वेखै हरि आपे कारै लाइआ जीउ ॥
इकि खावहि बखस तोटि न आवै इकना फका पाइआ जीउ ॥
इकि राजे तखति बहहि नित सुखीए इकना भिख मंगाइआ जीउ ॥
सभु इको सबदु वरतदा मेरे गोविदा जन नानक नामु धिआइआ जीउ ॥4॥2॥28॥66॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी माझ महला 4 ॥ हे (सत्संगी जीव स्त्री) सहेली ! आ, हम प्रभू के गुणों के टूणे-जादू तैयार करें (और प्रभू-पति को वश करें), संत-जनों को मिल के प्रभू के मिलाप का आनंद लें। (हे सखिए ! आ, हम अपने) मन में गुरू का दिया ज्ञान-दीपक जलाएं, (इस तरह) अगर प्रभू प्रसन्न हो जाए तो शुक्रगुजार हो के (उसके चरणों में) मिल जाएं। 1। (हे सखिए !) मेरे मन में मेरे दिल में हरी मित्र के लिए प्यार पैदा हो चुका है (मेरे अंदर चाह है कि) कि विचोला गुरू मुझे वह मित्र-प्रभू मिला दे। (हे सखिए !) मैं अपना मन उन गुरमुखों के हवाले कर दूँ, जो मुझे मेरा प्रभू मिला दें। मैं हरी-प्रभू से सदा कुर्बान सदा कुर्बान जाती हूँ। 2। हे मेरे प्यारे गोबिंद ! मेहर कर के मेरे मन में आ बस। हे मेरे गोबिंद ! पूरे गुरू का दर्शन करके जिस सोहागन के हृदय में उल्लास पैदा होता है वह अपने मन में चितवे हुए (प्रभू मिलाप के) फल को पा लेती है। हे मेरे गोबिंद ! जिस सोहागन जीव स्त्री को हरी-नाम मिल जाता है, उसके मन में हर वक्त आनंद बना रहता है चाव बना रहता है। हे मेरे गोबिंद ! जिन भाग्यशाली जीव सि्त्रयों ने हरी का मिलाप हासिल कर लिया है, वे हरी नाम की कमाई कर के मन में नित्य आत्मिक आनंद लेते हैं। 3। हे सखिए ! प्रभू खुद ही जीवों को पैदा करता है। खुद ही (सबकी) संभाल करता है और स्वयं ही (सब को) काम में लगाता है। अनेकों जीव ऐसे हैं जो उसके बख्शे हुए पदार्थ बरतते रहते हैं और वह पदार्थ कभी खत्म नहीं होते। अनेकों जीव ऐसे हैं जिन्हें वह देता ही थोड़ा सा है। अनेकों ऐसे हैं जो (उसकी मेहर से) राजे (बन के) तख्त पर बैठते हैं और सदा सुखी रहते हैं। अनेकों ऐसे हैं जिनसे वह (दर-दर की) भीख मंगाता है। हे दास नानक ! (कह) हे मेरे गोबिंद ! हर जगह एक आपका ही हुकम बर्त रहा है, (जिस पर आपकी मेहर होती है वह) आपका नाम सिमरता है। 4। 2। 28। 66।
गउड़ी माझ महला 4 ॥
मन माही मन माही मेरे गोविंदा हरि रंगि रता मन माही जीउ ॥
हरि रंगु नालि न लखीऐ मेरे गोविदा गुरु पूरा अलखु लखाही जीउ ॥
हरि हरि नामु परगासिआ मेरे गोविंदा सभ दालद दुख लहि जाही जीउ ॥
हरि पदु ऊतमु पाइआ मेरे गोविंदा वडभागी नामि समाही जीउ ॥1॥
नैणी मेरे पिआरिआ नैणी मेरे गोविदा किनै हरि प्रभु डिठड़ा नैणी जीउ ॥
मेरा मनु तनु बहुतु बैरागिआ मेरे गोविंदा हरि बाझहु धन कुमलैणी जीउ ॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी माझ महला 4 ॥ हे मेरे गोबिंद ! (जिस पर आपकी मेहर होती है, वह मनुष्य अपने) मन में ही, मन में ही, मन में ही, हरी नाम के रंग में रंगा रहता हैं। हे मेरे गोबिंद ! हरी नाम का आनंद हरेक जीव के साथ (उसके अंदर मौजूद) है, पर ये आनंद (हरेक जीव) नहीं ले सकता। जिन मनुष्यों को पूरा गुरू मिल जाता है वे उस अदृश्य परमात्मा को ढूँढ लेते हैं। हे मेरे गोबिंद ! जिनके अंदर आप हरी-नाम का प्रकाश करता है, उनके सारे दुख-दरिद्र दूर हो जाते हैं। हे मेरे गोबिंद ! जिन मनुष्यों को हरी-मिलाप की उच्च अवस्था प्राप्त हो जाती है, वह भाग्यशाली मनुष्य हरी-नाम में लीन रहते हैं। 1। हे मेरे प्यारे गोबिंद ! आप हरी-प्रभू को किसी विरले (भाग्यशाली ने अपनी) आँखों से देखा है। हे मेरे गोबिंद ! (आपके विछोड़े में) मेरा मन, मेरा हृदय बहुत वैरागवान हो रहा है। हे हरी ! आपके बिना मैं जीव-स्त्री कुम्हलायी हुई हूँ।

गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे जिंदे ! मिल राम को, आपके भाग्य अच्छे हैं गए हैं।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।