गुरु जोगी पुरखु मिलिआ रंगु माणी जीउ ॥
गुरु हरि रंगि रतड़ा सदा निरबाणी जीउ ॥
वडभागी मिलु सुघड़ सुजाणी जीउ ॥
मेरा मनु तनु हरि रंगि भिंना ॥2॥
आवहु संतहु मिलि नामु जपाहा ॥
विचि संगति नामु सदा लै लाहा जीउ ॥
करि सेवा संता अंम्रितु मुखि पाहा जीउ ॥
मिलु पूरबि लिखिअड़े धुरि करमा ॥3॥
सावणि वरसु अंम्रिति जगु छाइआ जीउ ॥
मनु मोरु कुहुकिअड़ा सबदु मुखि पाइआ ॥
हरि अंम्रितु वुठड़ा मिलिआ हरि राइआ जीउ ॥
जन नानक प्रेमि रतंना ॥4॥1॥27॥65॥
आउ सखी गुण कामण करीहा जीउ ॥
मिलि संत जना रंगु माणिह रलीआ जीउ ॥
गुर दीपकु गिआनु सदा मनि बलीआ जीउ ॥
हरि तुठै ढुलि ढुलि मिलीआ जीउ ॥1॥
मेरै मनि तनि प्रेमु लगा हरि ढोले जीउ ॥
मै मेले मित्रु सतिगुरु वेचोले जीउ ॥
मनु देवां संता मेरा प्रभु मेले जीउ ॥
हरि विटड़िअहु सदा घोले जीउ ॥2॥
वसु मेरे पिआरिआ वसु मेरे गोविदा हरि करि किरपा मनि वसु जीउ ॥
मनि चिंदिअड़ा फलु पाइआ मेरे गोविंदा गुरु पूरा वेखि विगसु जीउ ॥
हरि नामु मिलिआ सोहागणी मेरे गोविंदा मनि अनदिनु अनदु रहसु जीउ ॥
हरि पाइअड़ा वडभागीई मेरे गोविंदा नित लै लाहा मनि हसु जीउ ॥3॥
हरि आपि उपाए हरि आपे वेखै हरि आपे कारै लाइआ जीउ ॥
इकि खावहि बखस तोटि न आवै इकना फका पाइआ जीउ ॥
इकि राजे तखति बहहि नित सुखीए इकना भिख मंगाइआ जीउ ॥
सभु इको सबदु वरतदा मेरे गोविदा जन नानक नामु धिआइआ जीउ ॥4॥2॥28॥66॥
मन माही मन माही मेरे गोविंदा हरि रंगि रता मन माही जीउ ॥
हरि रंगु नालि न लखीऐ मेरे गोविदा गुरु पूरा अलखु लखाही जीउ ॥
हरि हरि नामु परगासिआ मेरे गोविंदा सभ दालद दुख लहि जाही जीउ ॥
हरि पदु ऊतमु पाइआ मेरे गोविंदा वडभागी नामि समाही जीउ ॥1॥
नैणी मेरे पिआरिआ नैणी मेरे गोविदा किनै हरि प्रभु डिठड़ा नैणी जीउ ॥
मेरा मनु तनु बहुतु बैरागिआ मेरे गोविंदा हरि बाझहु धन कुमलैणी जीउ ॥
गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे जिंदे ! मिल राम को, आपके भाग्य अच्छे हैं गए हैं।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।