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अंग १३२६ · कल्याण

अंग
1326
कल्याण
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  1. तनि मनि सांति होइ अधिकाई रोगु काटै सूखि सवीजै ॥3॥
  2. रामा हम दासन दास करीजै ॥
  3. छका 1 ॥

तनि मनि सांति होइ अधिकाई रोगु काटै सूखि सवीजै ॥3॥

अंग १३२५ से चला आ रहा अंश

तनि मनि सांति होइ अधिकाई रोगु काटै सूखि सवीजै ॥3॥
जिउ सूरजु किरणि रविआ सरब ठाई सभ घटि घटि रामु रवीजै ॥
साधू साध मिले रसु पावै ततु निज घरि बैठिआ पीजै ॥4॥
जन कउ प्रीति लगी गुर सेती जिउ चकवी देखि सूरीजै ॥
निरखत निरखत रैनि सभ निरखी मुखु काढै अंम्रितु पीजै ॥5॥
साकत सुआन कहीअहि बहु लोभी बहु दुरमति मैलु भरीजै ॥
आपन सुआइ करहि बहु बाता तिना का विसाहु किआ कीजै ॥6॥
साधू साध सरनि मिलि संगति जितु हरि रसु काढि कढीजै ॥
परउपकार बोलहि बहु गुणीआ मुखि संत भगत हरि दीजै ॥7॥
तू अगम दइआल दइआ पति दाता सभ दइआ धारि रखि लीजै ॥
सरब जीअ जगजीवनु एको नानक प्रतिपाल करीजै ॥8॥5॥

हिन्दी अर्थ: (ताकि) तन में मन में बहुत शांति पैदा हो जाए। (गुरू का शबद जीवों के हरेक) रोग काट देता है। (गुरू के शबद की बरकति से) आत्मिक आनंद में मगन रह सकते हैं। 3। हे भाई ! जैसे सूरज (अपनी) किरण के द्वारा सब जगह पहुँचा हुआ है। (वैसे ही) परमात्मा सारी लुकाई में हरेक शरीर में व्यापक है। जिस मनुष्य को संत जन मिल जाते हैं। वह (मिलाप के) स्वाद को भोगता है। हे भाई ! (संत जनों की संगति से) प्रभू-चरणों में लीन हो के नाम-रस पीया जा सकता है। 4। हे भाई ! (परमात्मा के) भगत को गुरू से (इस प्रकार) प्रीति बनी रहती है। जैसे सूरज (के उदय होने) का इन्तजार कर-कर के चकवी (विछोड़े की रात गुजारती है)। देखते-देखते (चकवी) सारी रात देखती रहती है। (जब सूरज) मुँह दिखाता है (तब चकवे का मिलाप हासिल करती है। इसी तरह जब गुरू दर्शन देता है। तब सेवक) आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल पी सकता है। 5। हे भाई ! परमात्मा से टूटे हुए मनुष्य बहुत लोभी होते हैं। कुत्ते (के स्वभाव वाले) कहे जाते हैं। (उनके अंदर) दुर्मति की मैल (सदा) भरी रहती है। (साकत मनुष्य) अपने स्वार्थ के लिए बहुत सारी बातें करते हैं। पर उनका ऐतबार नहीं करना चाहिए। 6। हे हरी ! (मुझे अपने) संतजनों की भक्ति दे। संत जन (अपने) मुँह से दूसरों की भलाई के वचन बोलते रहते हैं। संत जन अनेकों गुणों वाले होते हैं। हे भाई ! संत जनों की संगति में मिल के परमात्मा का नाम रस प्राप्त किया जा सकता है। 7। हे प्रभू ! आप अपहुँच हैं। दया का श्रोत है। दया का मालिक है सब जीवों को दातें देने वाला है। मेहर कर के सब जीवों की रक्षा करें। हे नानक ! (कह- हे प्रभू !) सारे जीव आपके हैं। आप ही सारे जगत का सहारा हैं। (सबकी) पालना करें। 8। 5।

रामा हम दासन दास करीजै ॥

कलिआनु महला 4 ॥
रामा हम दासन दास करीजै ॥
जब लगि सासु होइ मन अंतरि साधू धूरि पिवीजै ॥1॥ रहाउ ॥
संकरु नारदु सेखनाग मुनि धूरि साधू की लोचीजै ॥
भवन भवन पवितु होहि सभि जह साधू चरन धरीजै ॥1॥
तजि लाज अहंकारु सभु तजीऐ मिलि साधू संगि रहीजै ॥
धरम राइ की कानि चुकावै बिखु डुबदा काढि कढीजै ॥2॥
भरमि सूके बहु उभि सुक कहीअहि मिलि साधू संगि हरीजै ॥
ता ते बिलमु पलु ढिल न कीजै जाइ साधू चरनि लगीजै ॥3॥
राम नाम कीरतन रतन वथु हरि साधू पासि रखीजै ॥
जो बचनु गुर सति सति करि मानै तिसु आगै काढि धरीजै ॥4॥
संतहु सुनहु सुनहु जन भाई गुरि काढी बाह कुकीजै ॥
जे आतम कउ सुखु सुखु नित लोड़हु तां सतिगुर सरनि पवीजै ॥5॥
जे वड भागु होइ अति नीका तां गुरमति नामु द्रिड़ीजै ॥
सभु माइआ मोहु बिखमु जगु तरीऐ सहजे हरि रसु पीजै ॥6॥
माइआ माइआ के जो अधिकाई विचि माइआ पचै पचीजै ॥
अगिआनु अंधेरु महा पंथु बिखड़ा अहंकारि भारि लदि लीजै ॥7॥
नानक राम रम रमु रम रम रामै ते गति कीजै ॥
सतिगुरु मिलै ता नामु द्रिड़ाए राम नामै रलै मिलीजै ॥8॥6॥

हिन्दी अर्थ: कलिआन महला 4 ॥ हे राम ! हमें (अपने) दासों का दास बनाए रख। हे भाई ! जब तक शरीर में साँसें आ रही हैं। तब तक संतजनों की चरण-धूड़ पीते रहना चाहिए (निम्रता से संत जनों की संगति में रह के उनसे नाम-अमृत पीते रहना चाहिए)। 1। रहाउ। हे भाई ! शिव। नारद। शेषनाग (आदि हरेक ऋषि-) मुनि संत जनों के चरनों की धूड़ की तमन्ना करता रहा है। हे भाई ! जहाँ संत-जन चरण रखते हैं। वे सारे भवन सारी जगहें पवित्र हो जाती हैं। 1। हे भाई ! लोक-लाज छोड़ के (अपने अंदर से किसी बड़प्पन का) सारा माण छोड़ देना चाहिए। और संत-जनों की संगति में मिल के रहना चाहिए। (जो मनुष्य संत जनों की संगति में रहता है। वह) धर्मराज का सहम खत्म कर लेता है। आत्मिक मौत लाने वाले जहरीले संसार-समुंद्र में डूबते हुए को (संत-जन) निकाल लेते हैं। 2। हे भाई ! (जो मनुष्य माया की) भटकना में पड़ कर आत्मिक जीवन की तरावट समाप्त कर लेते हैं। वे मनुष्य उन वृक्षों जैसे कहे जाते हैं। जो खड़े-खड़े सूख जाते हैं (पर ऐसे सूखे जीवन वाले मनुष्य भी) संत-जनों की संगति में मिल के हरे हो जाते हैं। इसलिए (हे भाई !) एक पल भर भी देर नहीं करनी चाहिए। (जल्दी) जा के संत जनों के चरणों में लगना चाहिए। 3। हे भाई ! परमात्मा का नाम। परमात्मा की सिफत-सालाह एक कीमती पदार्थ है। यह पदार्थ परमात्मा ने संत-जनों के पास रखा होता है। जो मनुष्य गुरू के उपदेश को पूरी श्रद्धा के साथ मानता है। (गुरू यह कीमती पदार्थ) उसके आगे निकाल के रख देता है। 4। हे संत जनो ! हे भाईयो ! गुरू ने (अपनी) बाँह ऊँची की हुई है और आवाज मार रहा है (उसकी बात) ध्यान से सुनो। हे संत जनो ! अगर आप अपनी जिंद के लिए सदा का सुख चाहते हैं। तो गुरू की शरण पड़े रहना चाहिए। 5। हे भाई ! अगर किसी मनुष्य की बहुत बड़ी किस्मत हो। तो वह गुरू की मति ले के (अपने अंदर) परमात्मा का नाम दृढ़ करता है। हे भाई ! माया का मोह- यह सारा बहुत ही मुश्किल संसार-समुंद्र है (नाम की बरकति से यह) तैरा जा सकता है। (इस वास्ते) आत्मिक अडोलता में टिक के परमात्मा का नाम-रस पीना चाहिए। 6। हे भाई ! जो मनुष्य सिर्फ माया के ही बहुत प्रेमी हैं (वे सदा दुखी होते हैं। माया का प्रेमी मनुष्य तो) हर वक्त माया (की तृष्णा की आग) में जलता रहता है। (ऐसे मनुष्य के लिए) आत्मिक जीवन की ओर से बेसमझी एक घुप अंधेरा (बन जाता है। उस मनुष्य के लिए जिंदगी का) रास्ता मुश्किल हो जाता है (क्योंकि वह मनुष्य) अहंकार (-रूप) भार से लदा रहता है। 7। हे नानक ! सदा व्यापक राम का नाम सिमरता रह। व्यापक राम के नाम से ही उच्च आत्मिक अवस्था हासिल की जा सकती है। जब गुरू मिलता है वह (वह मनुष्य के हृदय में परमात्मा का) नाम दृढ़ करता है। (मनुष्य) परमात्मा के नाम में सदा के लिए लीन हो जाता है। 8। 6। छका = छक्का। छे अष्टपदियों का समूह।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ४: गुरु राम दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग १३२६ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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