अंग
1325
कल्याण
अंग बदलें या अंश चुनें · ३ अंश
महा अभाग अभाग है जिन के तिन साधू धूरि न पीजै ॥
महा अभाग अभाग है जिन के तिन साधू धूरि न पीजै ॥
तिना तिसना जलत जलत नही बूझहि डंडु धरम राइ का दीजै ॥6॥
सभि तीरथ बरत जग्य पुंन कीए हिवै गालि गालि तनु छीजै ॥
अतुला तोलु राम नामु है गुरमति को पुजै न तोल तुलीजै ॥7॥
तव गुन ब्रहम ब्रहम तू जानहि जन नानक सरनि परीजै ॥
तू जल निधि मीन हम तेरे करि किरपा संगि रखीजै ॥8॥3॥
तिना तिसना जलत जलत नही बूझहि डंडु धरम राइ का दीजै ॥6॥
सभि तीरथ बरत जग्य पुंन कीए हिवै गालि गालि तनु छीजै ॥
अतुला तोलु राम नामु है गुरमति को पुजै न तोल तुलीजै ॥7॥
तव गुन ब्रहम ब्रहम तू जानहि जन नानक सरनि परीजै ॥
तू जल निधि मीन हम तेरे करि किरपा संगि रखीजै ॥8॥3॥
हिन्दी अर्थ: हे भाई ! जिन लोगों के भाग्य बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण होते हैं। उनको संत-जनों के चरणों की चरण-धूल नसीब नहीं होती। उनके अंदर तृष्णा की आग लगी रहती है। (उस आग में) हर वक्त जलते हुए के अंदर ठंढ नहीं पड़ती। (यह उनको) धर्मराज की सजा मिलती है। 6। हे भाई ! अगर सारे तीर्थों के स्नान। अनेकों व्रत। यज्ञ और (इस तरह के) पुन्य-दान किए जाएं। (पहाड़ों की खुंदरों में) बर्फ में गला-गला के शरीर नाश किया जाए। (तो भी इन सारे साधनों में से) कोई भी साधन परमात्मा के नाम की बराबरी नहीं कर सकता। परमात्मा का नाम ऐसा है कि कोई भी तोल उसको तोल नहीं सकता। वह मिलता है गुरू की मति पर चलने से। 7। हे दास नानक ! (कह-) हे प्रभू ! आपके गुण आप (स्वयं ही) जानते हैं (मेहर कर। हम जीव आपकी ही) शरण पड़े रहें। आप (हमारा) समुंद्र हैं। हमज ीव आपकी मछलियाँ हैं। मेहर करके (हमें अपने) साथ ही रखे रखें। 8। 3।
रामा रम रामो पूज करीजै ॥
कलिआन महला 4 ॥
रामा रम रामो पूज करीजै ॥
मनु तनु अरपि धरउ सभु आगै रसु गुरमति गिआनु द्रिड़ीजै ॥1॥ रहाउ ॥
ब्रहम नाम गुण साख तरोवर नित चुनि चुनि पूज करीजै ॥
आतम देउ देउ है आतमु रसि लागै पूज करीजै ॥1॥
बिबेक बुधि सभ जग महि निरमल बिचरि बिचरि रसु पीजै ॥
गुर परसादि पदारथु पाइआ सतिगुर कउ इहु मनु दीजै ॥2॥
निरमोलकु अति हीरो नीको हीरै हीरु बिधीजै ॥
मनु मोती सालु है गुर सबदी जितु हीरा परखि लईजै ॥3॥
संगति संत संगि लगि ऊचे जिउ पीप पलास खाइ लीजै ॥
सभ नर महि प्रानी ऊतमु होवै राम नामै बासु बसीजै ॥4॥
निरमल निरमल करम बहु कीने नित साखा हरी जड़ीजै ॥
धरमु फुलु फलु गुरि गिआनु द्रिड़ाइआ बहकार बासु जगि दीजै ॥5॥
एक जोति एको मनि वसिआ सभ ब्रहम द्रिसटि इकु कीजै ॥
आतम रामु सभ एकै है पसरे सभ चरन तले सिरु दीजै ॥6॥
नाम बिना नकटे नर देखहु तिन घसि घसि नाक वढीजै ॥
साकत नर अहंकारी कहीअहि बिनु नावै ध्रिगु जीवीजै ॥7॥
जब लगु सासु सासु मन अंतरि ततु बेगल सरनि परीजै ॥
नानक क्रिपा क्रिपा करि धारहु मै साधू चरन पखीजै ॥8॥4॥
रामा रम रामो पूज करीजै ॥
मनु तनु अरपि धरउ सभु आगै रसु गुरमति गिआनु द्रिड़ीजै ॥1॥ रहाउ ॥
ब्रहम नाम गुण साख तरोवर नित चुनि चुनि पूज करीजै ॥
आतम देउ देउ है आतमु रसि लागै पूज करीजै ॥1॥
बिबेक बुधि सभ जग महि निरमल बिचरि बिचरि रसु पीजै ॥
गुर परसादि पदारथु पाइआ सतिगुर कउ इहु मनु दीजै ॥2॥
निरमोलकु अति हीरो नीको हीरै हीरु बिधीजै ॥
मनु मोती सालु है गुर सबदी जितु हीरा परखि लईजै ॥3॥
संगति संत संगि लगि ऊचे जिउ पीप पलास खाइ लीजै ॥
सभ नर महि प्रानी ऊतमु होवै राम नामै बासु बसीजै ॥4॥
निरमल निरमल करम बहु कीने नित साखा हरी जड़ीजै ॥
धरमु फुलु फलु गुरि गिआनु द्रिड़ाइआ बहकार बासु जगि दीजै ॥5॥
एक जोति एको मनि वसिआ सभ ब्रहम द्रिसटि इकु कीजै ॥
आतम रामु सभ एकै है पसरे सभ चरन तले सिरु दीजै ॥6॥
नाम बिना नकटे नर देखहु तिन घसि घसि नाक वढीजै ॥
साकत नर अहंकारी कहीअहि बिनु नावै ध्रिगु जीवीजै ॥7॥
जब लगु सासु सासु मन अंतरि ततु बेगल सरनि परीजै ॥
नानक क्रिपा क्रिपा करि धारहु मै साधू चरन पखीजै ॥8॥4॥
हिन्दी अर्थ: कलिआन महला 4 ॥ हे भाई ! सदा सर्व-व्यापक परमात्मा की भक्ति करनी चाहिए। अगर कोई मेरे हृदय में गुरमति के द्वारा परमात्मा के नाम का आनंद और आत्मिक जीवन की सूझ पक्की कर दे तो मैं अपना मन अपना तन सब कुछ उसके आगे भेटा रख दूँ। 1। रहाउ। हे भाई ! परमात्मा ही (पूजनीय) देवता है। (परमात्मा के नाम-) रस में लग के परमात्मा की ही भगती करनी चाहिए। परमात्मा का नाम परमात्मा के गुण ही वृक्ष की शाखाएं हैं (जिनसे नाम और सिफत-सालाह के फूल ही) चुन-चुन के परमात्मा-देव की पूजा करनी चाहिए। 1। हे भाई ! (अन्य सभी चतुराईयों से) जगत में अच्छे-बुरे कर्म की परख कर सकने वाली बुद्धि (बिबेक) ही सबसे पवित्र है। (इसकी सहायता से परमात्मा के गुण मन में) बसा-बसा के (आत्मिक-जीवन देने वाला नाम-) रस पीना चाहिए। ये नाम-पदार्थ गुरू की कृपा से (ही) मिलता है। अपना ये मन गुरू के हवाले कर देना चाहिए। 2। हे भाई ! परमात्मा का नाम हीरा बहुत कीमती है बहुत ही सुंदर है। इस नाम-हीरे से (अपने मन-) हीरे को सदा परो के रखना चाहिए। गुरू के शबद से ये मन श्रेष्ठ मोती बन सकता है। क्योंकि शबद की बरकति से नाम-हीरे की कदर-कीमत की समझ पड़ जाती है। 3। हे भाई ! संत-जनों की संगति में रह के संत-जनों के चरणों में लग के ऊँचे जीवन वाले बना जा सकता है। जैसे छिछरे को पीपल अपने में लीन कर (के अपने जैसा ही बना) लेता है। (इसी तरह मनुष्य में) परमात्मा के नाम की सुगंधि बस जाती है। वह मनुष्य सब प्राणियों में से ऊँचे जीवन वाला बन जाता है। 4। हे भाई ! (गुरमति की बरकति से जिस मनुष्य ने) विकारों की मैल से बचाने वाले काम नित्य करने शुरू कर दिए। (उसके जीवन-वृक्ष पर। मानो। यह) हरी शाखा सदा उगती रहती है। (जिसको) धर्म-रूप फूल लगता रहता है। और गुरू से मिली आत्मिक जीवन की सूझ (का) फल लगता है। (इस फूल की) महक सुगन्धि (सारे) जगत में बिखरती है। 5। हे भाई ! (सारे जगत में) एक (परमात्मा) की ज्योति (ही बसती है)। एक परमात्मा ही (सबके) मन में बसता है। सारी लुकाई में सिर्फ परमात्मा को देखने वाली निगाह ही बनानी चाहिए। सारी सृष्टि में एक परमात्मा ही पसारा पसार रहा है। (इसलिए) सबके चरणों तले (अपना) सिर रखना चाहिए। 6। हे भाई ! देखो। जो मनुष्य परमात्मा के नाम से वंचित रहते हैं वे निरादरी ही करवाते हैं। उनकी नाक सदा कटती ही रहती है। परमात्मा से टूटे हुए मनुष्य अहंकारी ही कहे जाते हैं। नाम के बिना जीया हुआ जीवन धिक्कारयोग्य ही होता है। 7। हे भाई ! जब तक मन में (भाव। शरीर में) एक साँस भी । तब तक पूरी श्रद्धा से परमात्मा के चरणों में पड़े रहना चाहिए। हे नानक ! (कह- हे प्रभू ! मेरे पर) मेहर कर। मेहर कर। मैं आपके संत-जनों के चरण धोता रहूँ। 8। 4।
रामा मै साधू चरन धुवीजै ॥
कलिआन महला 4 ॥
रामा मै साधू चरन धुवीजै ॥
किलबिख दहन होहि खिन अंतरि मेरे ठाकुर किरपा कीजै ॥1॥ रहाउ ॥
मंगत जन दीन खरे दरि ठाढे अति तरसन कउ दानु दीजै ॥
त्राहि त्राहि सरनि प्रभ आए मो कउ गुरमति नामु द्रिड़ीजै ॥1॥
काम करोधु नगर महि सबला नित उठि उठि जूझु करीजै ॥
अंगीकारु करहु रखि लेवहु गुर पूरा काढि कढीजै ॥2॥
अंतरि अगनि सबल अति बिखिआ हिव सीतलु सबदु गुर दीजै ॥
रामा मै साधू चरन धुवीजै ॥
किलबिख दहन होहि खिन अंतरि मेरे ठाकुर किरपा कीजै ॥1॥ रहाउ ॥
मंगत जन दीन खरे दरि ठाढे अति तरसन कउ दानु दीजै ॥
त्राहि त्राहि सरनि प्रभ आए मो कउ गुरमति नामु द्रिड़ीजै ॥1॥
काम करोधु नगर महि सबला नित उठि उठि जूझु करीजै ॥
अंगीकारु करहु रखि लेवहु गुर पूरा काढि कढीजै ॥2॥
अंतरि अगनि सबल अति बिखिआ हिव सीतलु सबदु गुर दीजै ॥
हिन्दी अर्थ: कलिआन महला 4 ॥ हे मेरे राम ! मैं गुरू के चरण (नित्य) धोता रहूँ (गुरू की शरण पड़े रहने पर) एक छिन में सारे पाप जल जाते हैं, हे मेरे ठाकुर ! मेरे ऊपर मेहर कर। 1। रहाउ। हे प्रभू ! (आपके दर के) निमाणे मँगते (आपके) दर पर खड़े हुए हैं। बहुत तरस रहों को (यह) ख़ैर डाल। हे प्रभू ! (इन पापों से) बचा ले। बचा ले। (हम आपकी) शरण आए हैं। हे प्रभू ! गुरू की मति से (अपना) नाम मेरे अंदर पक्का कर। 1। हे प्रभू ! (हम जीवों के शरीर-) नगर में काम-क्रोध (आदि हरेक विकार) बलवान हुआ रहता है। हमेशा उठ-उठ के (इनके साथ) युद्ध करना पड़ता है। हे प्रभू ! सहायता कर। (इनसे) बचा ले। पूरा गुरू (मिला के इनके पँजे में से) निकाल ले। 2। हे भाई ! (जीवों के) अंदर माया (की तृष्णा) की आग बहुत भड़क रही है। बर्फ जैसे गुरू के शीतलता भरे शबद दे।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ४: गुरु राम दास जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग १३२५ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।