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1327
प्रभाती
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नाइ तेरै तरणा नाइ पति पूज ॥
ੴ सतिनामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि ॥
रागु परभाती बिभास महला 1 चउपदे घरु 1 ॥
नाइ तेरै तरणा नाइ पति पूज ॥
नाउ तेरा गहणा मति मकसूदु ॥
नाइ तेरै नाउ मंने सभ कोइ ॥
विणु नावै पति कबहु न होइ ॥1॥
अवर सिआणप सगली पाजु ॥
जै बखसे तै पूरा काजु ॥1॥ रहाउ ॥
नाउ तेरा ताणु नाउ दीबाणु ॥
नाउ तेरा लसकरु नाउ सुलतानु ॥
नाइ तेरै माणु महत परवाणु ॥
तेरी नदरी करमि पवै नीसाणु ॥2॥
नाइ तेरै सहजु नाइ सालाह ॥
नाउ तेरा अंम्रितु बिखु उठि जाइ ॥
नाइ तेरै सभि सुख वसहि मनि आइ ॥
बिनु नावै बाधी जम पुरि जाइ ॥3॥
नारी बेरी घर दर देस ॥
मन कीआ खुसीआ कीचहि वेस ॥
जां सदे तां ढिल न पाइ ॥
नानक कूड़ु कूड़ो होइ जाइ ॥4॥1॥
रागु परभाती बिभास महला 1 चउपदे घरु 1 ॥
नाइ तेरै तरणा नाइ पति पूज ॥
नाउ तेरा गहणा मति मकसूदु ॥
नाइ तेरै नाउ मंने सभ कोइ ॥
विणु नावै पति कबहु न होइ ॥1॥
अवर सिआणप सगली पाजु ॥
जै बखसे तै पूरा काजु ॥1॥ रहाउ ॥
नाउ तेरा ताणु नाउ दीबाणु ॥
नाउ तेरा लसकरु नाउ सुलतानु ॥
नाइ तेरै माणु महत परवाणु ॥
तेरी नदरी करमि पवै नीसाणु ॥2॥
नाइ तेरै सहजु नाइ सालाह ॥
नाउ तेरा अंम्रितु बिखु उठि जाइ ॥
नाइ तेरै सभि सुख वसहि मनि आइ ॥
बिनु नावै बाधी जम पुरि जाइ ॥3॥
नारी बेरी घर दर देस ॥
मन कीआ खुसीआ कीचहि वेस ॥
जां सदे तां ढिल न पाइ ॥
नानक कूड़ु कूड़ो होइ जाइ ॥4॥1॥
हिन्दी अर्थ: परमात्मा एक हैं। उनका नाम ‘सत्’ है, यानी सदा अस्तित्व में रहने वाला। वे सृष्टि के रचयिता हैं और सबमें व्याप्त हैं। वे भय और वैर से रहित हैं। उनका स्वरूप काल से परे है। वे जन्म नहीं लेते और स्वयं प्रकाशमान हैं। उन्हें सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। रागु परभाती बिभास महला 1 चउपदे घरु 1 ॥ हे प्रभू ! आपके नाम में जुड़ के ही (संसार-समुंद्र के विकारों से) पार लांघा जाता है। आपके नाम के द्वारा ही इज्जत-आदर मिलता है। आपका नाम (इन्सानी जीवन को श्रृंगारने के लिए) गहना है। मानवीय-बुद्धि का मकसद यही है (कि मनुष्य आपका नाम सिमरे)। हे प्रभू ! आपके नाम में टिक के ही हर कोई (नाम सिमरन वाले की) इज्जत करता है। परमेश्वर के नाम बिना कभी इज्जत प्राप्त नहीं होती। 1। (प्रभू का सिमरन छोड़ के दुनिया में आदर हासिल करने के लिए) और-और चतुराईयों (के काम निरे) लोक-दिखावा हैं (वह पाज उघड़ जाता है और हासिल की हुई इज्जत भी खत्म हो जाती है)। जिस जीव पर प्रभू बख्शिश करता है (उसको अपने नाम की दाति देता है। और उस जीव का) जिंदगी का असल उद्देश्य सफल होता है। 1। रहाउ। (मनुष्य दुनियावी ताकत। हकूमत, फौजों की सरदारी और बादशाहियत के लिए दौड़ता-फिरता है। फिर ये सब कुछ नाशवंत है) हे प्रभू ! आपका नाम ही (असल) ताकत है। आपका नाम ही (असल) हकूमत है। आपका नाम ही फौजों (की सरदारी) है। जिसके पल्ले आपका नाम है वही बादशाह है। हे प्रभू ! आपके नाम में जुड़ने से ही असल आदर मिलता है इज्जत मिलती है। जो मनुष्य आपके नाम में मस्त है वही जगत में जाना-माना हुआ है। पर। आपकी मेहर की नज़र से ही आपकी बख्शिश से ही (जीव-यात्री को इस जीवन-यात्रा में) यह परवाना (राहदारी) मिलता है। 2। हे प्रभू ! आपके नाम में जुड़ने से ही मन की शांति मिलती है। आपके नाम में जुड़ने से आपकी सिफत-सालाह करने की आदत बनती है। आपका नाम ही आत्मिक जीवन देने वाला ऐसा पवित्र जल है (जिसकी बरकति से मनुष्य मन में से विषौ-विकारों का सारा) जहर धुल जाता है। आपके नाम में जुड़ने से सारे सुख मन में आ बसते हैं। नाम से टूट के दुनिया (विकारों की जंजीरों में) बँधी हुई जम की नगरी में जाती है। 3। हे नानक ! स्त्री (का प्यार) घरों को जमीन-जायदादों की मल्कियत - ये सब कुछ (जीव-यात्री के पैरों में) बेड़ियाँ (पड़ी हुई) हैं (जो इसको सही जीवन-यात्रा में चलने नहीं देतीं)। मन की प्रसन्नता के लिए अनेकों पहरावे पहनते है। (ये खुशियाँ व चाव भी बेड़ियाँ ही हैं)। जब (परमात्मा जीव को) मौत का बुलावा भेजता है (उसके बुलावे पर) रक्ती भर भी ढील नहीं हो सकती। (तब समझ आती है कि) झूठे पदार्थों का साथ झूठा ही निकलता है। 4। 1।
तेरा नामु रतनु करमु चानणु सुरति तिथै लोइ ॥
प्रभाती महला 1 ॥
तेरा नामु रतनु करमु चानणु सुरति तिथै लोइ ॥
अंधेरु अंधी वापरै सगल लीजै खोइ ॥1॥
इहु संसारु सगल बिकारु ॥
तेरा नामु दारू अवरु नासति करणहारु अपारु ॥1॥ रहाउ ॥
पाताल पुरीआ एक भार होवहि लाख करोड़ि ॥
तेरे लाल कीमति ता पवै जां सिरै होवहि होरि ॥2॥
तेरा नामु रतनु करमु चानणु सुरति तिथै लोइ ॥
अंधेरु अंधी वापरै सगल लीजै खोइ ॥1॥
इहु संसारु सगल बिकारु ॥
तेरा नामु दारू अवरु नासति करणहारु अपारु ॥1॥ रहाउ ॥
पाताल पुरीआ एक भार होवहि लाख करोड़ि ॥
तेरे लाल कीमति ता पवै जां सिरै होवहि होरि ॥2॥
हिन्दी अर्थ: प्रभाती महला 1 ॥ (हे प्रभू !) जिस (मानस) सुरति में आपका नाम-रत्न (जड़ा हुआ) है। आपकी बख्शिश रौशनी कर रही है उस सुरति के अंदर (आपके ज्ञान का) प्रकाश हो रहा है। (माया के मोह में) अंधी हो रही सृष्टि पर अज्ञानता का अंधेरा प्रभाव डाल रहा है। (इस अंधेरे में) सारी आत्मिक राशि-पूँजी गवा ली जाती है। 1। (हे प्रभू ! आपके नाम से टूट के) ये सारा जगत विकार ही विकार (सहेड़ रहा) है। (इस विकार रोग की) दवाई (सिर्फ) आपका नाम ही है। (आपके नाम के बिना) कोई और दवा-दारू नहीं। (जगत को और जगत के रोगों की दवाई को) बनाने वाले आप बेअंत प्रभू स्वयं ही हैं। 1। रहाउ। अगर सृष्टि की सारी पाताल और पुरियाँ (आपस में बँध के) एक गठड़ी बन जाएं। और अगर इस तरह की और लाखों-करोड़ों गठड़ियां भी हो जाएं (तो ये सारे मिल के भी परमात्मा के नाम की बराबरी नहीं कर सकते)। हे प्रभू ! आपके कीमती नाम का मूल्य तब ही पड़ सकता है जब नाम को तोलने के लिए तकड़ी के दूसरे छाबे में (सारी दुनिया के धन-पदार्थों को छोड़ के) कोई और पदार्थ हों (भाव। आपकी सिफतों के खजाने हों ! आपके नाम जैसा कीमती नाम ही है। आपकी सिफतें-सालाहें ही हैं)। 2।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 1: गुरु नानक देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1327 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।