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अंग १२९९ · कानड़ा

अंग
1299
कानड़ा
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  1. जा कउ सतिगुरु मइआ करेही ॥2॥
  2. भगति भगतन हूं बनि आई ॥
  3. तेरो जनु हरि जसु सुनत उमाहिओ ॥1॥ रहाउ ॥
  4. संतन पहि आपि उधारन आइओ ॥1॥ रहाउ ॥
  5. बिसरि गई सभ ताति पराई ॥
  6. ठाकुर जीउ तुहारो परना ॥

जा कउ सतिगुरु मइआ करेही ॥2॥

अंग १२९८ से चला आ रहा अंश

जा कउ सतिगुरु मइआ करेही ॥2॥
अगिआन भरमु बिनसै दुख डेरा ॥
जा कै ह्रिदै बसहि गुर पैरा ॥3॥
साधसंगि रंगि प्रभु धिआइआ ॥
कहु नानक तिनि पूरा पाइआ ॥4॥4॥

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! जिस मनुष्य पर गुरू जी कृपा करते हैं (वह मनुष्य परमात्मा से साध-संगति का मिलाप और हरी-नाम का सिमरन माँगता है) । 2। उसके अंदर आत्मिक जीवन की ओर से बेसमझी दूर हो जाती है; सारे दुखों का डेरा ही उठ जाता है। हे भाई ! जिस मनुष्य के हृदय में गुरू के चरण बसते हैं।3। (हे भाई !) जिस (मनुष्य) ने गुरू की संगति में (टिक के) प्यार से परमात्मा का सिमरन किया है। हे नानक ! कह- उसने उस पूरन परमात्मा का मिलाप हासिल कर लिया है। 4। 4।

भगति भगतन हूं बनि आई ॥

कानड़ा महला 5 ॥
भगति भगतन हूं बनि आई ॥
तन मन गलत भए ठाकुर सिउ आपन लीए मिलाई ॥1॥ रहाउ ॥
गावनहारी गावै गीत ॥
ते उधरे बसे जिह चीत ॥1॥
पेखे बिंजन परोसनहारै ॥
जिह भोजनु कीनो ते त्रिपतारै ॥2॥
अनिक स्वांग काछे भेखधारी ॥
जैसो सा तैसो द्रिसटारी ॥3॥
कहन कहावन सगल जंजार ॥
नानक दास सचु करणी सार ॥4॥5॥

हिन्दी अर्थ: कानड़ा महला 5 ॥ हे भाई ! (परमात्मा की) भगती भक्त-जनों से ही हो सकती है। उनके तन उनके मन परमात्मा की याद में मस्त रहते हैं। उनको प्रभू अपने साथ मिलाए रखता है। 1। रहाउ। हे भाई ! दुनिया रिवाजी तौर पर ही (सिफतसालाह के) गीत गाती है। पर संसार-समुंद्र से पार वही लांघते हैं। जिनके हृदय में बसते हैं। 1। हे भाई ! औरों के आगे (खाना) परोसने वाले ने (तो सदा) स्वादिष्ट खाने देखे हैं। पर तृप्त वही हैं जिन्होंने वह खाए। 2। हे भाई ! भेष धारी (स्वांग रचने वाला) मनुष्य (माया की खातिर) अनेकों मन-इच्छित स्वांग बनाता है। पर जैसा वह (असल में) है। वैसा ही (उनको) दिखता है (जो उसको जानते हैं)। 3। हे भाई ! (हरी-नाम सिमरन के बिना) और-और बातें कहनी-कहलवानी- ये सारे प्रयास माया के मोह के फंदों के मूल हैं। हे दास नानक ! परमात्मा का नाम सिमरना ही सबसे श्रेष्ठ कर्तव्य है। 4। 5।

तेरो जनु हरि जसु सुनत उमाहिओ ॥1॥ रहाउ ॥

कानड़ा महला 5 ॥
तेरो जनु हरि जसु सुनत उमाहिओ ॥1॥ रहाउ ॥
मनहि प्रगासु पेखि प्रभ की सोभा जत कत पेखउ आहिओ ॥1॥
सभ ते परै परै ते ऊचा गहिर गंभीर अथाहिओ ॥2॥
ओति पोति मिलिओ भगतन कउ जन सिउ परदा लाहिओ ॥3॥
गुर प्रसादि गावै गुण नानक सहज समाधि समाहिओ ॥4॥6॥

हिन्दी अर्थ: कानड़ा महला 5 ॥ हे प्रभू ! आपका सेवक आपकी सिफतसालाह सुनते हुए उमाह में आ जाता है। 1। रहाउ। हे भाई ! प्रभू की महिमा देख के (मेरे) मन में (आत्मिक जीवन का) प्रकाश हो जाता है। मैं जिधर-किधर भी देखता हूँ। (मुझे वह हर तरफ) मौजूद (दिखाई देता) है। 1। हे भाई ! परमात्मा सब जीवों से बड़ा और सब जीवों से ऊँचा है; गहरा (समुंद्र) है। बड़े जिगरे वाला है। उसकी थाह नहीं लगाई जा सकती। 2। हे भाई ! (जैसे) ताने में पेटे में (धागा मिला हुआ होता है। वैसे) परमात्मा अपने भगतों को मिला हुआ होता है। हे भाई ! अपने सेवकों से उसने ओहला (पर्दा) दूर किया होता है। 3। हे नानक ! गुरू की कृपा से (जो मनुष्य परमात्मा के) गुण गाता रहता है वह आत्मिक अडोलता की समाधि में लीन रहता है। 4। 6।

संतन पहि आपि उधारन आइओ ॥1॥ रहाउ ॥

कानड़ा महला 5 ॥
संतन पहि आपि उधारन आइओ ॥1॥ रहाउ ॥
दरसन भेटत होत पुनीता हरि हरि मंत्रु द्रिड़ाइओ ॥1॥
काटे रोग भए मन निरमल हरि हरि अउखधु खाइओ ॥2॥
असथित भए बसे सुख थाना बहुरि न कतहू धाइओ ॥3॥
संत प्रसादि तरे कुल लोगा नानक लिपत न माइओ ॥4॥7॥

हिन्दी अर्थ: कानड़ा महला 5 ॥ हे भाई ! (जगत के जीवों को) विकारों से बचाने के लिए (परमात्मा) स्वयं संत-जनों के हृदय में बसता है। 1। रहाउ। हे भाई ! (जीव गुरू का) दर्शन करते हुए पवित्र जीवन वाले हो जाते हैं। (गुरू उनके हृदय में) परमात्मा का नाम दृढ़ कर देता है। 1। हे भाई ! (जो मनुष्य गुरू से) हरी-नाम की दवाई (ले के) खाते हैं (उनके) सारे रोग काटे जाते हैं; (उनके) मन पवित्र हो जाते हैं। 2। हे भाई ! (गुरू से दवाई ले के खाने वाले मनुष्य) अडोल-चित्त हो जाते हैं। आत्मिक आनंद में टिके रहते हैं। (इस आनंद को छोड़ के वे) दोबारा किसी और तरफ़ नहीं भटकते। 3। हे नानक ! गुरू की कृपा से (नाम-दवाई खा के वे सिर्फ खुद ही नहीं तैरते। उनकी) कुल के लोग भी (संसार-समुंद्र से पार) लांघ जाते हैं। उन पर माया का प्रभाव नहीं पड़ता। 4। 7।

बिसरि गई सभ ताति पराई ॥

कानड़ा महला 5 ॥
बिसरि गई सभ ताति पराई ॥
जब ते साधसंगति मोहि पाई ॥1॥ रहाउ ॥
ना को बैरी नही बिगाना सगल संगि हम कउ बनि आई ॥1॥
जो प्रभ कीनो सो भल मानिओ एह सुमति साधू ते पाई ॥2॥
सभ महि रवि रहिआ प्रभु एकै पेखि पेखि नानक बिगसाई ॥3॥8॥

हिन्दी अर्थ: कानड़ा महला 5 ॥ (तब से) दूसरों का सुख देख के अंदर-अंदर से जलने की आदत भूल गई है - हे भाई ! जब से मैंने गुरू की संगति प्राप्त की है। 1। रहाउ। हे भाई ! (अब) मुझे कोई वैरी नहीं दिखता। कोई पराया नहीं दिखता; सबके साथ मेरा प्यार बना हुआ है। 1। हे भाई ! (अब) जो कुछ परमात्मा करता है। मैं उसको (सब जीवों के लिए) भला मानता हूँ। ये सुमति मैंने (अपने) गुरू से सीखी है। 2। हे नानक ! (कह- जब से साध-संगति मिली है। मुझे ऐसा दिखता है कि) एक परमात्मा ही सब जीवों में मौजूद है (तभी सबको) देख-देख के खुश होता हूँ। 3। 8।

ठाकुर जीउ तुहारो परना ॥

कानड़ा महला 5 ॥
ठाकुर जीउ तुहारो परना ॥
मानु महतु तुम॑ारै ऊपरि तुम॑री ओट तुम॑ारी सरना ॥1॥ रहाउ ॥
तुम॑री आस भरोसा तुम॑रा तुमरा नामु रिदै लै धरना ॥
तुमरो बलु तुम संगि सुहेले जो जो कहहु सोई सोई करना ॥1॥
तुमरी दइआ मइआ सुखु पावउ होहु क्रिपाल त भउजलु तरना ॥
अभै दानु नामु हरि पाइओ सिरु डारिओ नानक संत चरना ॥2॥9॥

हिन्दी अर्थ: कानड़ा महला 5 ॥ हे प्रभू जी ! (मुझे) आपका ही आसरा है। मुझे आपके ऊपर ही माण है; फखर है। मुझे आपकी ही ओट है। मैं आपकी ही शरण आ पड़ा हूँ। 1। रहाउ। हे प्रभू जी ! मुझे आपकी ही आस है। आपके ऊपर ही भरोसा है। मैंने आपका ही नाम (अपने) हृदय में टिकाया हुआ है। मुझे आपका ही ताण है। आपके चरणों में मैं सुखी रहता हूँ। जो कुछ आप कहते हैं। मैं वही कुछ कर सकता हूँ। 1। हे प्रभू ! आपकी मेहर से। आपकी कृपा से ही मैं सुख पाता हूँ। अगर आप दयावान हैं। तो मैं इस संसार-समुंद्र को पार लांघ सकता हूँ। हे नानक ! (कह- हे भाई !) निर्भयता का दान देने वाला। हरी-नाम मैंने (गुरू से) हासिल कर लिया है (इसलिए) मैंने अपना सिर गुरू के चरणों पर रखा हुआ है। 2। 9।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग १२९९ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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