Lulla Family

अंग 1300

अंग
1300
राग कान्हड़ा
राग: कान्हड़ा · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
कानड़ा महला 5 ॥
साध सरनि चरन चितु लाइआ ॥
सुपन की बात सुनी पेखी सुपना नाम मंत्रु सतिगुरू द्रिड़ाइआ ॥1॥ रहाउ ॥
नह त्रिपतानो राज जोबनि धनि बहुरि बहुरि फिरि धाइआ ॥
सुखु पाइआ त्रिसना सभ बुझी है सांति पाई गुन गाइआ ॥1॥
बिनु बूझे पसू की निआई भ्रमि मोहि बिआपिओ माइआ ॥
साधसंगि जम जेवरी काटी नानक सहजि समाइआ ॥2॥10॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (कह- हे भाई !) निर्भयता का दान देने वाला। हरी-नाम मैंने (गुरू से) हासिल कर लिया है (इसलिए) मैंने अपना सिर गुरू के चरणों पर रखा हुआ है। 2। 9। कानड़ा महला 5 ॥ हे भाई ! (जब से) गुरू की शरण पड़ कर प्रभू के चरणों में चित्त जोड़ा है। (जब से) गुरू ने परमात्मा का नाम-मंत्र (मेरे दिल में) दृढ़ कर के टिकाया है (तब से उस जगत को) सपना ही (आँखों से) देख लिया जिसके सपने की बात सुनी हुई थी। 1। रहाउ। हे भाई ! (ये मन) राज-जोबन-धन से नहीं तृप्त होता। बार-बार (इन पदार्थों के पीछे) भटकता फिरता है। पर। जब मनुष्य परमात्मा के गुण गाता है। और माया की सारी तृष्णा बुझ जाती है। आत्मिक आनंद मिल जाता है। शांति प्राप्त हो जाती है। 1। हे भाई ! (आत्मिक जीवन की) सूझ के बिना मनुष्य पशू-समान ही रहता है। माया की भटकना में माया के मोह में फंसा रहता है। पर।
कानड़ा महला 5 ॥
हरि के चरन हिरदै गाइ ॥
सीतला सुख सांति मूरति सिमरि सिमरि नित धिआइ ॥1॥ रहाउ ॥
सगल आस होत पूरन कोटि जनम दुखु जाइ ॥1॥
पुंन दान अनेक किरिआ साधू संगि समाइ ॥
ताप संताप मिटे नानक बाहुड़ि कालु न खाइ ॥2॥11॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! साध-संगति में बसने से जमों वाला फंदा कट जाता है। मनुष्य आत्मिक अडोलता में लीन हो जाता है। 2। 10। कानड़ा महला 5 ॥ हे भाई ! परमात्मा के चरण हृदय में (टिका के; उसके गुण) गाया कर। उस प्रभू का सदा ध्यान धरा कर। उस प्रभू का सदा सिमरन किया कर जो शांति-स्वरूप है जो सुख-स्वरूप है जो शीतल-स्वरूप है। 1। रहाउ। हे भाई ! (सिमरन की बरकति से मनुष्य की) सारी आशाएं पूरी हो जाती हैं। करोड़ों जन्मों के दुख दूर हो जाते हैं। 1। हे नानक ! (कह- हे भाई !) गुरू की संगति में टिका रह- यही है अनेकों किस्म के पुन्य-दान आदि कर्म।
कानड़ा महला 5 घरु 3
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
कथीऐ संतसंगि प्रभ गिआनु ॥
पूरन परम जोति परमेसुर सिमरत पाईऐ मानु ॥1॥ रहाउ ॥
आवत जात रहे स्रम नासे सिमरत साधू संगि ॥
पतित पुनीत होहि खिन भीतरि पारब्रहम कै रंगि ॥1॥
जो जो कथै सुनै हरि कीरतनु ता की दुरमति नास ॥
सगल मनोरथ पावै नानक पूरन होवै आस ॥2॥1॥12॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: (संगति की बरकति से सारे) दुख-कलेश मिट जाते हें। आत्मिक मौत (आत्मिक जीवन को) फिर नहीं खा सकती। 2। 11। कानड़ा महला 5 घरु 3 सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! संतजनों की संगति में (टिक के) परमात्मा के गुणों की बात चलानी चाहिए। हे भाई ! सर्व-व्यापक सबसे ऊँचे नूर परमेश्वर का (नाम) सिमरते हुए (लोक-परलोक में) इज्जत हासिल की जाती है। 1। रहाउ। हे भाई ! गुरू की संगति में (हरी-नाम) सिमरते हुए जनम-मरण के चक्कर समाप्त हो जाते हैं (भटकनों की) थकावट का नाश हो जाता है। परमात्मा के प्रेम-रंग की बरकति से विकारी मनुष्य भी एक छिन में स्वच्छ जीवन वाले हो जाते हैं। 1। हे भाई ! जो जो मनुष्य परमात्मा की सिफतसालाह उचारता है सुनता है। उसकी खोटी-मति का नाश हो जाता है।
कानड़ा महला 5 ॥
साधसंगति निधि हरि को नाम ॥
संगि सहाई जीअ कै काम ॥1॥ रहाउ ॥
संत रेनु निति मजनु करै ॥
जनम जनम के किलबिख हरै ॥1॥
संत जना की ऊची बानी ॥
सिमरि सिमरि तरे नानक प्रानी ॥2॥2॥13॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! वह मनुष्य सारी मनो-कामनाएं हासिल कर लेता है। उसकी हरेक आशा पूरी हो जाती है। 2। 1। 12। कानड़ा महला 5 ॥ हे भाई ! गुरू की संगति में (रहने से) परमात्मा का नाम-खजाना (मिल जाता है। जो जीव के) साथ (सदा) साथी बना रहता है जो जिंद के (सदा) काम आता है। 1। रहाउ। हे नानक ! जो मनुष्य संत-जनों की चरण-धूल में सदा स्नान करता है। वह अपने अनेकों जन्मों के पाप दूर कर लेता है। 1। संत जनों की (मनुष्य के जीवन को) ऊँचा करने वाली बाणी को
कानड़ा महला 5 ॥
साधू हरि हरे गुन गाइ ॥
मान तनु धनु प्रान प्रभ के सिमरत दुखु जाइ ॥1॥ रहाउ ॥
ईत ऊत कहा लोुभावहि एक सिउ मनु लाइ ॥1॥
महा पवित्र संत आसनु मिलि संगि गोबिदु धिआइ ॥2॥
सगल तिआगि सरनि आइओ नानक लेहु मिलाइ ॥3॥3॥14॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! – सिमर-सिमर के अनेकों ही प्राणी संसार-समुंद्र से पार लांघते आ रहे हैं। 2। 2। 13। कानड़ा महला 5 ॥ (आप) गुरू (की शरण पड़ कर) उस प्रभू के गुण गाया कर। हे भाई ! ये मन। ये तन। ये धन। ये जिंद। (जिस) प्रभू के (दिए हुए हैं। उसका नाम) सिमरने से (हरेक) दुख दूर हो जाता है। 1। रहाउ। हे भाई ! आप इधर-उधर क्यों लोभ में फंस रहा है। एक परमात्मा के साथ अपना मन जोड़। 1। हे भाई ! गुरू का ठिकाना (जीवन को) बहुत सुच्चा बनाने वाला है। गुरू को मिल के गोबिंद को (अपने मन में) ध्याया कर। 2।
कानड़ा महला 5 ॥
पेखि पेखि बिगसाउ साजन प्रभु आपना इकांत ॥1॥ रहाउ ॥
आनदा सुख सहज मूरति तिसु आन नाही भांति ॥1॥
सिमरत इक बार हरि हरि मिटि कोटि कसमल जांति ॥2॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (कह- हे प्रभू !) सारे (आसरे) छोड़ के मैं भी आपकी शरण आया हूँ मुझे अपने चरणों में जोड़े रख। 3। 3। 14। कानड़ा महला 5 ॥ हे भाई ! मैं अपने सज्जन प्रभू को (हर जगह बसता) देख-देख के खुश हो जाता हूँ। (वह सर्व-व्यापक होते हुए भी माया के प्रभाव से) अलग रहता है। 1। रहाउ। हे भाई ! वह सज्जन प्रभू आनंद-रूप है। सुख-स्वरूप है। आत्मिक अडोलता का स्वरूप है। उस जैसा और कोई नहीं। 1।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। जैजावंती राग ग्रंथ में सबसे बाद में जोड़ा गया, गुरु तेग बहादुर (1621-1675) के समय का।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! (कह- हे भाई !) निर्भयता का दान देने वाला।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।