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अंग १३०० · कानड़ा

अंग
1300
कानड़ा
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  1. साध सरनि चरन चितु लाइआ ॥
  2. हरि के चरन हिरदै गाइ ॥
  3. कथीऐ संतसंगि प्रभ गिआनु ॥
  4. साधसंगति निधि हरि को नाम ॥
  5. साधू हरि हरे गुन गाइ ॥
  6. पेखि पेखि बिगसाउ साजन प्रभु आपना इकांत ॥1॥ रहाउ ॥

साध सरनि चरन चितु लाइआ ॥

कानड़ा महला 5 ॥
साध सरनि चरन चितु लाइआ ॥
सुपन की बात सुनी पेखी सुपना नाम मंत्रु सतिगुरू द्रिड़ाइआ ॥1॥ रहाउ ॥
नह त्रिपतानो राज जोबनि धनि बहुरि बहुरि फिरि धाइआ ॥
सुखु पाइआ त्रिसना सभ बुझी है सांति पाई गुन गाइआ ॥1॥
बिनु बूझे पसू की निआई भ्रमि मोहि बिआपिओ माइआ ॥
साधसंगि जम जेवरी काटी नानक सहजि समाइआ ॥2॥10॥

हिन्दी अर्थ: कानड़ा महला 5 ॥ हे भाई ! (जब से) गुरू की शरण पड़ कर प्रभू के चरणों में चित्त जोड़ा है। (जब से) गुरू ने परमात्मा का नाम-मंत्र (मेरे दिल में) दृढ़ कर के टिकाया है (तब से उस जगत को) सपना ही (आँखों से) देख लिया जिसके सपने की बात सुनी हुई थी। 1। रहाउ। हे भाई ! (ये मन) राज-जोबन-धन से नहीं तृप्त होता। बार-बार (इन पदार्थों के पीछे) भटकता फिरता है। पर। जब मनुष्य परमात्मा के गुण गाता है। और माया की सारी तृष्णा बुझ जाती है। आत्मिक आनंद मिल जाता है। शांति प्राप्त हो जाती है। 1। हे भाई ! (आत्मिक जीवन की) सूझ के बिना मनुष्य पशू-समान ही रहता है। माया की भटकना में माया के मोह में फंसा रहता है। पर। हे नानक ! साध-संगति में बसने से जमों वाला फंदा कट जाता है। मनुष्य आत्मिक अडोलता में लीन हो जाता है। 2। 10।

हरि के चरन हिरदै गाइ ॥

कानड़ा महला 5 ॥
हरि के चरन हिरदै गाइ ॥
सीतला सुख सांति मूरति सिमरि सिमरि नित धिआइ ॥1॥ रहाउ ॥
सगल आस होत पूरन कोटि जनम दुखु जाइ ॥1॥
पुंन दान अनेक किरिआ साधू संगि समाइ ॥
ताप संताप मिटे नानक बाहुड़ि कालु न खाइ ॥2॥11॥

हिन्दी अर्थ: कानड़ा महला 5 ॥ हे भाई ! परमात्मा के चरण हृदय में (टिका के; उसके गुण) गाया कर। उस प्रभू का सदा ध्यान धरा कर। उस प्रभू का सदा सिमरन किया कर जो शांति-स्वरूप है जो सुख-स्वरूप है जो शीतल-स्वरूप है। 1। रहाउ। हे भाई ! (सिमरन की बरकति से मनुष्य की) सारी आशाएं पूरी हो जाती हैं। करोड़ों जन्मों के दुख दूर हो जाते हैं। 1। हे नानक ! (कह- हे भाई !) गुरू की संगति में टिका रह- यही है अनेकों किस्म के पुन्य-दान आदि कर्म। (संगति की बरकति से सारे) दुख-कलेश मिट जाते हें। आत्मिक मौत (आत्मिक जीवन को) फिर नहीं खा सकती। 2। 11।

कथीऐ संतसंगि प्रभ गिआनु ॥

कानड़ा महला 5 घरु 3
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
कथीऐ संतसंगि प्रभ गिआनु ॥
पूरन परम जोति परमेसुर सिमरत पाईऐ मानु ॥1॥ रहाउ ॥
आवत जात रहे स्रम नासे सिमरत साधू संगि ॥
पतित पुनीत होहि खिन भीतरि पारब्रहम कै रंगि ॥1॥
जो जो कथै सुनै हरि कीरतनु ता की दुरमति नास ॥
सगल मनोरथ पावै नानक पूरन होवै आस ॥2॥1॥12॥

हिन्दी अर्थ: कानड़ा महला 5 घरु 3 सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! संतजनों की संगति में (टिक के) परमात्मा के गुणों की बात चलानी चाहिए। हे भाई ! सर्व-व्यापक सबसे ऊँचे नूर परमेश्वर का (नाम) सिमरते हुए (लोक-परलोक में) इज्जत हासिल की जाती है। 1। रहाउ। हे भाई ! गुरू की संगति में (हरी-नाम) सिमरते हुए जनम-मरण के चक्कर समाप्त हो जाते हैं (भटकनों की) थकावट का नाश हो जाता है। परमात्मा के प्रेम-रंग की बरकति से विकारी मनुष्य भी एक छिन में स्वच्छ जीवन वाले हो जाते हैं। 1। हे भाई ! जो जो मनुष्य परमात्मा की सिफतसालाह उचारता है सुनता है। उसकी खोटी-मति का नाश हो जाता है। हे नानक ! वह मनुष्य सारी मनो-कामनाएं हासिल कर लेता है। उसकी हरेक आशा पूरी हो जाती है। 2। 1। 12।

साधसंगति निधि हरि को नाम ॥

कानड़ा महला 5 ॥
साधसंगति निधि हरि को नाम ॥
संगि सहाई जीअ कै काम ॥1॥ रहाउ ॥
संत रेनु निति मजनु करै ॥
जनम जनम के किलबिख हरै ॥1॥
संत जना की ऊची बानी ॥
सिमरि सिमरि तरे नानक प्रानी ॥2॥2॥13॥

हिन्दी अर्थ: कानड़ा महला 5 ॥ हे भाई ! गुरू की संगति में (रहने से) परमात्मा का नाम-खजाना (मिल जाता है। जो जीव के) साथ (सदा) साथी बना रहता है जो जिंद के (सदा) काम आता है। 1। रहाउ। हे नानक ! जो मनुष्य संत-जनों की चरण-धूल में सदा स्नान करता है। वह अपने अनेकों जन्मों के पाप दूर कर लेता है। 1। संत जनों की (मनुष्य के जीवन को) ऊँचा करने वाली बाणी को हे नानक ! - सिमर-सिमर के अनेकों ही प्राणी संसार-समुंद्र से पार लांघते आ रहे हैं। 2। 2। 13।

साधू हरि हरे गुन गाइ ॥

कानड़ा महला 5 ॥
साधू हरि हरे गुन गाइ ॥
मान तनु धनु प्रान प्रभ के सिमरत दुखु जाइ ॥1॥ रहाउ ॥
ईत ऊत कहा लोुभावहि एक सिउ मनु लाइ ॥1॥
महा पवित्र संत आसनु मिलि संगि गोबिदु धिआइ ॥2॥
सगल तिआगि सरनि आइओ नानक लेहु मिलाइ ॥3॥3॥14॥

हिन्दी अर्थ: कानड़ा महला 5 ॥ (आप) गुरू (की शरण पड़ कर) उस प्रभू के गुण गाया कर। हे भाई ! ये मन। ये तन। ये धन। ये जिंद। (जिस) प्रभू के (दिए हुए हैं। उसका नाम) सिमरने से (हरेक) दुख दूर हो जाता है। 1। रहाउ। हे भाई ! आप इधर-उधर क्यों लोभ में फंस रहे हैं। एक परमात्मा के साथ अपना मन जोड़ें। 1। हे भाई ! गुरू का ठिकाना (जीवन को) बहुत सुच्चा बनाने वाला है। गुरू को मिल के गोबिंद को (अपने मन में) ध्याया कर। 2। हे नानक ! (कह- हे प्रभू !) सारे (आसरे) छोड़ के मैं भी आपकी शरण आया हूँ मुझे अपने चरणों में जोड़े रख। 3। 3। 14।

पेखि पेखि बिगसाउ साजन प्रभु आपना इकांत ॥1॥ रहाउ ॥

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कानड़ा महला 5 ॥
पेखि पेखि बिगसाउ साजन प्रभु आपना इकांत ॥1॥ रहाउ ॥
आनदा सुख सहज मूरति तिसु आन नाही भांति ॥1॥
सिमरत इक बार हरि हरि मिटि कोटि कसमल जांति ॥2॥

हिन्दी अर्थ: कानड़ा महला 5 ॥ हे भाई ! मैं अपने सज्जन प्रभू को (हर जगह बसता) देख-देख के खुश हो जाता हूँ। (वह सर्व-व्यापक होते हुए भी माया के प्रभाव से) अलग रहता है। 1। रहाउ। हे भाई ! वह सज्जन प्रभू आनंद-रूप है। सुख-स्वरूप है। आत्मिक अडोलता का स्वरूप है। उस जैसा और कोई नहीं। 1। हे भाई ! उस हरी प्रभू का नाम सदा सिमरने से करोड़ों पाप मिट जाते हैं। 2।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग १३०० खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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