साध सरनि चरन चितु लाइआ ॥
सुपन की बात सुनी पेखी सुपना नाम मंत्रु सतिगुरू द्रिड़ाइआ ॥1॥ रहाउ ॥
नह त्रिपतानो राज जोबनि धनि बहुरि बहुरि फिरि धाइआ ॥
सुखु पाइआ त्रिसना सभ बुझी है सांति पाई गुन गाइआ ॥1॥
बिनु बूझे पसू की निआई भ्रमि मोहि बिआपिओ माइआ ॥
साधसंगि जम जेवरी काटी नानक सहजि समाइआ ॥2॥10॥
हरि के चरन हिरदै गाइ ॥
सीतला सुख सांति मूरति सिमरि सिमरि नित धिआइ ॥1॥ रहाउ ॥
सगल आस होत पूरन कोटि जनम दुखु जाइ ॥1॥
पुंन दान अनेक किरिआ साधू संगि समाइ ॥
ताप संताप मिटे नानक बाहुड़ि कालु न खाइ ॥2॥11॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
कथीऐ संतसंगि प्रभ गिआनु ॥
पूरन परम जोति परमेसुर सिमरत पाईऐ मानु ॥1॥ रहाउ ॥
आवत जात रहे स्रम नासे सिमरत साधू संगि ॥
पतित पुनीत होहि खिन भीतरि पारब्रहम कै रंगि ॥1॥
जो जो कथै सुनै हरि कीरतनु ता की दुरमति नास ॥
सगल मनोरथ पावै नानक पूरन होवै आस ॥2॥1॥12॥
साधसंगति निधि हरि को नाम ॥
संगि सहाई जीअ कै काम ॥1॥ रहाउ ॥
संत रेनु निति मजनु करै ॥
जनम जनम के किलबिख हरै ॥1॥
संत जना की ऊची बानी ॥
सिमरि सिमरि तरे नानक प्रानी ॥2॥2॥13॥
साधू हरि हरे गुन गाइ ॥
मान तनु धनु प्रान प्रभ के सिमरत दुखु जाइ ॥1॥ रहाउ ॥
ईत ऊत कहा लोुभावहि एक सिउ मनु लाइ ॥1॥
महा पवित्र संत आसनु मिलि संगि गोबिदु धिआइ ॥2॥
सगल तिआगि सरनि आइओ नानक लेहु मिलाइ ॥3॥3॥14॥
पेखि पेखि बिगसाउ साजन प्रभु आपना इकांत ॥1॥ रहाउ ॥
आनदा सुख सहज मूरति तिसु आन नाही भांति ॥1॥
सिमरत इक बार हरि हरि मिटि कोटि कसमल जांति ॥2॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। जैजावंती राग ग्रंथ में सबसे बाद में जोड़ा गया, गुरु तेग बहादुर (1621-1675) के समय का।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! (कह- हे भाई !) निर्भयता का दान देने वाला।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।