उसतति करहि प्रभ तेरीआ मिलि साधू साध जना गुर सतिगुरू भगवान ॥1॥
जिन कै हिरदै तू सुआमी ते सुख फल पावहि ते तरे भव सिंधु ते भगत हरि जान ॥
तिन सेवा हम लाइ हरे हम लाइ हरे जन नानक के हरि तू तू तू तू तू भगवान ॥2॥6॥12॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
गाईऐ गुण गोपाल क्रिपा निधि ॥
दुख बिदारन सुखदाते सतिगुर जा कउ भेटत होइ सगल सिधि ॥1॥ रहाउ ॥
सिमरत नामु मनहि साधारै ॥
कोटि पराधी खिन महि तारै ॥1॥
जा कउ चीति आवै गुरु अपना ॥
ता कउ दूखु नही तिलु सुपना ॥2॥
जा कउ सतिगुरु अपना राखै ॥
सो जनु हरि रसु रसना चाखै ॥3॥
कहु नानक गुरि कीनी मइआ ॥
हलति पलति मुख ऊजल भइआ ॥4॥1॥
आराधउ तुझहि सुआमी अपने ॥
ऊठत बैठत सोवत जागत सासि सासि सासि हरि जपने ॥1॥ रहाउ ॥
ता कै हिरदै बसिओ नामु ॥
जा कउ सुआमी कीनो दानु ॥1॥
ता कै हिरदै आई सांति ॥
ठाकुर भेटे गुर बचनांति ॥2॥
सरब कला सोई परबीन ॥ नाम मंत्रु जा कउ गुरि दीन ॥3॥
कहु नानक ता कै बलि जाउ ॥
कलिजुग महि पाइआ जिनि नाउ ॥4॥2॥
कीरति प्रभ की गाउ मेरी रसनां ॥
अनिक बार करि बंदन संतन ऊहां चरन गोबिंद जी के बसना ॥1॥ रहाउ ॥
अनिक भांति करि दुआरु न पावउ ॥
होइ क्रिपालु त हरि हरि धिआवउ ॥1॥
कोटि करम करि देह न सोधा ॥
साधसंगति महि मनु परबोधा ॥2॥
त्रिसन न बूझी बहु रंग माइआ ॥
नामु लैत सरब सुख पाइआ ॥3॥
पारब्रहम जब भए दइआल ॥
कहु नानक तउ छूटे जंजाल ॥4॥3॥
ऐसी मांगु गोबिद ते ॥
टहल संतन की संगु साधू का हरि नामां जपि परम गते ॥1॥ रहाउ ॥
पूजा चरना ठाकुर सरना ॥
सोई कुसलु जु प्रभ जीउ करना ॥1॥
सफल होत इह दुरलभ देही ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। जैजावंती राग ग्रंथ में सबसे बाद में जोड़ा गया, गुरु तेग बहादुर (1621-1675) के समय का।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे प्रभू ! आपके सेवक एक-मन एक चित्त हैं के आपका ध्यान करते हैं।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।