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अंग 1298

अंग
1298
राग कान्हड़ा
राग: कान्हड़ा · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
तेरे जन धिआवहि इक मनि इक चिति ते साधू सुख पावहि जपि हरि हरि नामु निधान ॥
उसतति करहि प्रभ तेरीआ मिलि साधू साध जना गुर सतिगुरू भगवान ॥1॥
जिन कै हिरदै तू सुआमी ते सुख फल पावहि ते तरे भव सिंधु ते भगत हरि जान ॥
तिन सेवा हम लाइ हरे हम लाइ हरे जन नानक के हरि तू तू तू तू तू भगवान ॥2॥6॥12॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: हे प्रभू ! आपके सेवक एक-मन एक चित्त हैं के आपका ध्यान करते हैं। सुखों का खजाना आपका नाम जप-जप के वे गुरमुख मनुष्य आत्मिक आनंद लेते हैं। हे प्रभू ! हे भगवान ! आपके संत जन गुरू सतिगुरू को मिल के आपकी सिफतसालह करते रहते हैं। 1। हे मालिक ! जिनके हृदय में आप बस जाता है। वे आत्मिक आनंद का फल हासिल करते है। वे संसार-समुंद्र को पार कर जाते हैं। हे भाई ! उनको भी हरी के भगत जानो। हे हरी ! हे दास नानक के भगवान ! मुझे (अपने) उन संत-जनों की सेवा में लगाए रख। सेवा में लगाए रख। 2। 6। 12।
कानड़ा महला 5 घरु 2
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
गाईऐ गुण गोपाल क्रिपा निधि ॥
दुख बिदारन सुखदाते सतिगुर जा कउ भेटत होइ सगल सिधि ॥1॥ रहाउ ॥
सिमरत नामु मनहि साधारै ॥
कोटि पराधी खिन महि तारै ॥1॥
जा कउ चीति आवै गुरु अपना ॥
ता कउ दूखु नही तिलु सुपना ॥2॥
जा कउ सतिगुरु अपना राखै ॥
सो जनु हरि रसु रसना चाखै ॥3॥
कहु नानक गुरि कीनी मइआ ॥
हलति पलति मुख ऊजल भइआ ॥4॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: कानड़ा महला 5 घरु 2 सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! मिल के माया के खजाने गोपाल के गुण गाया करें। उस दुखों के नाश करने वाले और सुखों के देने वाले गुरू को, जिस गुरू को मिलके (जिंदगी) सारी सफल हो जाती है। 1। रहाउ। हे भाई ! नाम सिमरने से नाम (मनुष्य के) मन को (विकारों के मुकाबले में) सहारा देता है। हरी-नाम करोड़ों पापियों को एक छिन में (संसार-समुंद्र से) पार लंघा लेता है। 1। हे भाई ! जिस मनुष्य को अपना सतिगुरू चेते रहता है (वह मनुष्य सदा हरी-नाम जपता है। जिसकी बरकति से) उसको सपने में भी रक्ती भर भी कोई दुख पोह नहीं सकता। 2। हे भाई ! प्यारा गुरू जिस मनुष्य की रक्षा करता है। वह मनुष्य (अपनी) जीभ से परमात्मा का नाम-रस चखता रहता है। 3। हे नानक ! कह- (जिन मनुष्यों पर) गुरू ने मेहर की। उनके मुँह इस लोक में और परलोक में उज्जवल हो गए। 4। 1।
कानड़ा महला 5 ॥
आराधउ तुझहि सुआमी अपने ॥
ऊठत बैठत सोवत जागत सासि सासि सासि हरि जपने ॥1॥ रहाउ ॥
ता कै हिरदै बसिओ नामु ॥
जा कउ सुआमी कीनो दानु ॥1॥
ता कै हिरदै आई सांति ॥
ठाकुर भेटे गुर बचनांति ॥2॥
सरब कला सोई परबीन ॥ नाम मंत्रु जा कउ गुरि दीन ॥3॥
कहु नानक ता कै बलि जाउ ॥
कलिजुग महि पाइआ जिनि नाउ ॥4॥2॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: कानड़ा महला 5 ॥ हे (मेरे) अपने मालिक ! मैं (सदा) आपको ही याद करता रहता हूं। हे हरी ! उठते। बैठते। सोते। जागते। हरेक सांस के साथ मैं आपका ही नाम जपता हूँ। 1। रहाउ। हे भाई ! मालिक-प्रभू जिस मनुष्य को (नाम की) दाति बख्शता है। उसके हृदय में (उस मालिक का) नाम टिक जाता है। 1। उसके दिल में (विकारों की अग्नि) ठंडी पड़ जाती है। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू के उपदेश पर चल कर मालिक-प्रभू को मिल जाता है। 2। वही है सारी आत्मिक ताकतों में प्रवीण। हे भाई ! जिस (मनुष्य) को गुरू ने परमात्मा का नाम-मंत्र दे दिया।3। मैं उस (मनुष्य) से बलिहार जाता हूँ।
कानड़ा महला 5 ॥
कीरति प्रभ की गाउ मेरी रसनां ॥
अनिक बार करि बंदन संतन ऊहां चरन गोबिंद जी के बसना ॥1॥ रहाउ ॥
अनिक भांति करि दुआरु न पावउ ॥
होइ क्रिपालु त हरि हरि धिआवउ ॥1॥
कोटि करम करि देह न सोधा ॥
साधसंगति महि मनु परबोधा ॥2॥
त्रिसन न बूझी बहु रंग माइआ ॥
नामु लैत सरब सुख पाइआ ॥3॥
पारब्रहम जब भए दइआल ॥
कहु नानक तउ छूटे जंजाल ॥4॥3॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! कह- जिस मनुष्य ने इस बखेड़ों भरे जगत में परमात्मा का नाम-खजाना पा लिया।4। 7। कानड़ा महला 5 ॥ हे मेरी जीभ ! परमात्मा की सिफतसालाह के गीत गाया कर। हे भाई ! संत-जनों के चरणों पे अनेकों बार नमस्कार किया कर। संत-जनों के दिल में सदा परमात्मा के चरण बसते हैं। 1। रहाउ। हे भाई ! अनेकों ढंग इस्तेमाल करके भी मैं परमात्मा का दर नहीं ढूँढ सकता। अगर परमात्मा स्वयं ही दयावान होए तो मैं उसका ध्यान धर सकता हूँ। 1। हे भाई ! (तीर्थ-यात्रा आदिक) करोड़ों ही (मिथे हुए धार्मिक) कर्म करके (मनुष्य का) शरीर पवित्र नहीं हो सकता। मनुष्य का मन साध-संगति में ही (माया के मोह की नींद में से) जागता है। 2। हे भाई ! (करोड़ों कर्म करके भी इस) बहु-रंगी माया की तृष्णा नहीं मिटती। पर परमात्मा का नाम सिमरते हुए सारे सुख मिल जाते हैं। 3। हे नानक ! कह- (हे भाई !) जब (किसी प्राणी पर) प्रभू जी दयावान होते हैं।
कानड़ा महला 5 ॥
ऐसी मांगु गोबिद ते ॥
टहल संतन की संगु साधू का हरि नामां जपि परम गते ॥1॥ रहाउ ॥
पूजा चरना ठाकुर सरना ॥
सोई कुसलु जु प्रभ जीउ करना ॥1॥
सफल होत इह दुरलभ देही ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: तब (परमात्मा का नाम सिमर के उस मनुष्य की) माया के मोह के (सारे) फंदे टूट जाते हैं। 4। 3। कानड़ा महला 5 ॥ हे भाई ! परमात्मा से ऐसी (दाति) माँग (कि मुझे) संत जनों की टहल (करने का मौका मिलता रहे। मुझे) गुरू का साथ (मिला रहे। और) हरी-नाम जप के (मैं) सबसे ऊँची आत्मिक अवस्था (प्राप्त कर सकूँ)। 1। रहाउ। (हे भाई ! ये माँग प्रभू से मांग कि मैं) प्रभू-चरणों की भगती करता रहूँ। प्रभू की शरण पड़ा रहूँ (यह माँग कि) जो कुछ प्रभू जी करते हैं। उसको मैं सुख समझूँ। 1।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। जैजावंती राग ग्रंथ में सबसे बाद में जोड़ा गया, गुरु तेग बहादुर (1621-1675) के समय का।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे प्रभू ! आपके सेवक एक-मन एक चित्त हैं के आपका ध्यान करते हैं।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।