लुल्ला परिवारLulla Family
English
सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 1196 · बसंत

इस पृष्ठ पर
अंग
1196
बसंत
अंग बदलें या अंश चुनें · 5 अंश

1 से 1430 तक कोई अंक लिखिए।

  1. नाराइणु सुप्रसंन होइ त सेवकु नामा ॥3॥1॥
  2. लोभ लहरि अति नीझर बाजै ॥
  3. सहज अवलि धूड़ि मणी गाडी चालती ॥
  4. बसंतु बाणी रविदास जी की
  5. बसंतु कबीर जीउ

नाराइणु सुप्रसंन होइ त सेवकु नामा ॥3॥1॥

अंग 1195 से चला आ रहा अंश

नाराइणु सुप्रसंन होइ त सेवकु नामा ॥3॥1॥

हिन्दी अर्थ: हे नामदेव ! भगत वही है जिस पर प्रभू स्वयं प्रसन्न हो जाए (और अपने नाम की दाति दे)। 3। 1।

लोभ लहरि अति नीझर बाजै ॥

लोभ लहरि अति नीझर बाजै ॥
काइआ डूबै केसवा ॥1॥
संसारु समुंदे तारि गोुबिंदे ॥
तारि लै बाप बीठुला ॥1॥ रहाउ ॥
अनिल बेड़ा हउ खेवि न साकउ ॥
तेरा पारु न पाइआ बीठुला ॥2॥
होहु दइआलु सतिगुरु मेलि तू मो कउ ॥
पारि उतारे केसवा ॥3॥
नामा कहै हउ तरि भी न जानउ ॥
मो कउ बाह देहि बाह देहि बीठुला ॥4॥2॥

हिन्दी अर्थ: (इस संसार-समुंद्र में) लोभ की लहरें ज़ोर से उठ रही हैं। हे सुंदर केशों वाले प्रभू ! मेरा शरीर इनमें डूबता जा रहा है। 1। मुझे संसार-समुंद्र में से पार लंघा लें हे बीठल पिता ! हे गोबिंद ! । 1। रहाउ। हे बीठल ! (मेरी जिंदगी की) नाव आँधी में (फस गई है)। मैं इसको चप्पू लगाने के योग्य नहीं हूँ; हे प्रभू ! आपके (इस संसार-समुंद्र का) मुझे परला छोर नहीं मिलता। 2। हे केशव ! मेरे पर दया करें। मुझे गुरू मिलाएँ। और (इस समुंद्र में से) पार लंघाएँ। 3। (आपका) नामदेव। हे बीठल ! बिनती करता है- (समुंद्र में लहरें उठ रही हैं। मेरी नाव आँधी में फंस गई है। और) मैं तो तैरना भी नहीं जानता। मुझे अपनी बाँह पकड़ाएँ। दाता ! बाँह पकड़ाएँ। 4। 1। 2।

सहज अवलि धूड़ि मणी गाडी चालती ॥

सहज अवलि धूड़ि मणी गाडी चालती ॥
पीछै तिनका लै करि हांकती ॥1॥
जैसे पनकत थ्रूटिटि हांकती ॥
सरि धोवन चाली लाडुली ॥1॥ रहाउ ॥
धोबी धोवै बिरह बिराता ॥
हरि चरन मेरा मनु राता ॥2॥
भणति नामदेउ रमि रहिआ ॥
अपने भगत पर करि दइआ ॥3॥3॥

हिन्दी अर्थ: (जैसे) पहले (भाव। आगे-आगे) मैले कपड़ों से लादी हुई गाड़ी सहजे-सहजे चलती जाती है। और पीछे-पीछे (धोबिन) डंडी ले के हाँकती जाती है; (वैसे ही पहले ये आलसी शरीर सहजे-सहजे चलता है। पर 'लाडुली' इसको प्रेम आदि से प्रेरती है)। 1। जैसे (धोबिन) (उस गाड़ी को) पानी के घाट की तरफ 'थ्रूटिटि' कह-कह के हाँकती है। सर पर (धोबी की) लाडली (स्त्री) (कपड़े) धोने के लिए जाती है। वैसे ही प्रेमिका (जीव-स्त्री) सत्संग सरोवर पर (मन को) धोने के लिए जाती है। 1। रहाउ। प्यार में रंगा हुआ धोबी, अर्थात् गुरू, सरोवर पर आई जिज्ञासू स्त्रियों के मन पवित्र कर देता है; (उसी गुरू-धोबी की मेहर सदका) मेरा मन (भी) अकाल-पुरख के चरणों में रंगा गया है। 2। नामदेव कहता है- वह अकाल-पुरख सब जगह व्यापक है। और अपने भक्तों पर (इस तरह। भाव। गुरू के माध्यम से) मेहर करता रहता है। 3।

बसंतु बाणी रविदास जी की

बसंतु बाणी रविदास जी की
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
तुझहि सुझंता कछू नाहि ॥
पहिरावा देखे ऊभि जाहि ॥
गरबवती का नाही ठाउ ॥
तेरी गरदनि ऊपरि लवै काउ ॥1॥
तू कांइ गरबहि बावली ॥
जैसे भादउ खूंबराजु तू तिस ते खरी उतावली ॥1॥ रहाउ ॥
जैसे कुरंक नही पाइओ भेदु ॥
तनि सुगंध ढूढै प्रदेसु ॥
अप तन का जो करे बीचारु ॥
तिसु नही जमकंकरु करे खुआरु ॥2॥
पुत्र कलत्र का करहि अहंकारु ॥
ठाकुरु लेखा मगनहारु ॥
फेड़े का दुखु सहै जीउ ॥
पाछे किसहि पुकारहि पीउ पीउ ॥3॥
साधू की जउ लेहि ओट ॥
तेरे मिटहि पाप सभ कोटि कोटि ॥
कहि रविदास जोु जपै नामु ॥
तिसु जाति न जनमु न जोनि कामु ॥4॥1॥

हिन्दी अर्थ: बसंतु बाणी रविदास जी की ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। (हे काया !) आप अपने ठाठ देख के अकड़ती हैं। (इस अकड़ में) आपको कुछ भी सुरति नहीं रही। (देखें) अहंकार की कोई जगह नहीं (होती)। आपके बुरे दिन आए हुए हैं (कि आप झूठा मान कर रही हैं)। 1। हे मेरी कमली काया ! आप क्यों गुमान करती हैं। आप तो उस कुकरमुत्ते से भी जल्दी नाश हो जाने वाली हैं जो भाद्रों में (उगता है)। 1। रहाउ। (हे काया !) जैसे हिरन को ये पता नहीं होता (भेद नहीं मिलता) कि कस्तूरी की सुगंधि उसके अपने शरीर में से (आती है)। पर वह परदेस में ढूँढता फिरता है (वैसे ही आपको ये समझ नहीं आती कि सुखों का मूल प्रभू आपके अपने अंदर ही है)। जो जीव अपने शरीर की विचार करता है (कि ये सदा-स्थिर रहने वाला नहीं)। उसको जम-दूत दुखी नहीं करता। 2। (हे काया !) आप पुत्र और पत्नी का गुमान करती हैं (और प्रभू को भुला बैठी हैं। याद रखें) मालिक प्रभू (किए हुए कर्मों का) लेखा माँगता है जीव अपने किए हुए दुष्कर्मों के कारण दुख सहता है। (हे काया ! प्राणों के निकल जाने के बाद) आप किस को 'प्यारा। प्यारा' कह के आवाजें मारेंगी। 3। (हे काया !) अगर आप गुरू का आसरा लें, तो आपके करोड़ों पाप सारे के सारे नाश हो जाएँ। रविदास कहता है-जो मनुष्य नाम जपता है। उसकी (नीच, निम्न श्रेणी) जाति समाप्त हो जाती है। उसका जन्म मिट जाता है। जूनियों से उसका वास्ता नहीं रहता। 4। 1। (भाव: शरीर आदि का अभिमान झूठा है। यहाँ सदा नहीं रहना है।)

बसंतु कबीर जीउ

बसंतु कबीर जीउ
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सुरह की जैसी तेरी चाल ॥
तेरी पूंछट ऊपरि झमक बाल ॥1॥
इस घर महि है सु तू ढूंढि खाहि ॥
अउर किस ही के तू मति ही जाहि ॥1॥ रहाउ ॥
चाकी चाटहि चूनु खाहि ॥
चाकी का चीथरा कहां लै जाहि ॥2॥
छीके पर तेरी बहुतु डीठि ॥
मतु लकरी सोटा तेरी परै पीठि ॥3॥
कहि कबीर भोग भले कीन ॥
मति कोऊ मारै ईंट ढेम ॥4॥1॥

हिन्दी अर्थ: बसंतु कबीर जीउ ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। (हे कुत्ते !) गाय जैसी (भोली-भाली) आपकी चाल है। आपकी पूँछ पर बाल भी सुंदर चमक रहे हैं (हे कुत्ता-स्वभाव जीव ! शरीफों जैसी आपकी सूरति और आपका पहरावा है)। 1। (हे कुत्ते के स्वभाव वाले जीव !) जो कुछ अपनी हक की कमाई है। उसी को निसंग हो के इस्तेमाल करें। किसी बेगाने माल की लालसा ना करें। 1। रहाउ। (हे कुत्ते !) आप चक्की चाटते हैं। और आटा खाते हैं। पर (जाते हुए) परोला (चक्की का कपड़ा) कहाँ ले के जाएँगे। (हे जीव ! जो माया रोजाना इस्तेमाल करते हैं ये तो भले बरतते रहें। पर जोड़-जोड़ के आखिर कहाँ ले कर जाएँगे।)। 2। (हे स्वान !) आप छिक्के की ओर बहुत झाँक रहे हैं। देखें, कहीं कमर पर डण्डा ना बजे। (जो जीव। बेगाने घरों की ओर ताकता है; इस में से उपाधि ही निकलेगी)। 3। कबीर कहता है- (हे श्वान !) आपने बहुत कुछ खाया-उजाड़ा है। पर ध्यान रखें, कहीं कोई ईट-ढेला आपके सिर पर ना मार दे। (हे जीव ! आप जो यह भोग भोगने में व्यस्त हुए पड़े हैं। इनका अंत दुखद ही होता है)। 4। 1।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: भगत कबीर जी; भगत नामदेव जी; भगत रविदास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1196 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।