अंग
1195
बसंत
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जिह घटै मूलु नित बढै बिआजु ॥ रहाउ ॥
जिह घटै मूलु नित बढै बिआजु ॥ रहाउ ॥
सात सूत मिलि बनजु कीन ॥
करम भावनी संग लीन ॥
तीनि जगाती करत रारि ॥
चलो बनजारा हाथ झारि ॥2॥
पूंजी हिरानी बनजु टूट ॥
दह दिस टांडो गइओ फूटि ॥
कहि कबीर मन सरसी काज ॥
सहज समानो त भरम भाज ॥3॥6॥
सात सूत मिलि बनजु कीन ॥
करम भावनी संग लीन ॥
तीनि जगाती करत रारि ॥
चलो बनजारा हाथ झारि ॥2॥
पूंजी हिरानी बनजु टूट ॥
दह दिस टांडो गइओ फूटि ॥
कहि कबीर मन सरसी काज ॥
सहज समानो त भरम भाज ॥3॥6॥
हिन्दी अर्थ: जिस वणज के करने से मूल घटता जाए और ब्याज बढ़ता जाए (भाव। ज्यों-ज्यों उम्र गुजरे त्यों-त्यों विकारों का भार बढ़ता जाए)। रहाउ। (ये ज्ञान-इन्द्रियाँ) मिल के कई किस्मों के सूत्र (भाव। विकारों) का वणज कर रहे हैं। किए हुए कर्मों के संस्कारों को इन्होंने (अपनी सहायता के लिए) साथ ले लिया है (भाव। ये पिछले संस्कार और भी विकारों की तरफ़ प्रेरते जा रहे हैं)। तीन गुण (-रूपी) मसूलिए (और) झगड़ा बढ़ाते हैं। (नतीजा ये निकलता है कि) वणजारा (जीव) खाली हाथ चला जाता है। 2। जब (श्वासों की) राशि छिन जाती है। तब वणज समाप्त हो जाता है। और काफ़िला (शरीर) दसों दिशाओं में बिखर जाता है। कबीर कहता है - हे मन ! आपका काम सँवर जाएगा यदि आप सहज अवस्था में लीन हो जाए और आपकी भटकना समाप्त हो जाए तो । 3। 6।
माता जूठी पिता भी जूठा जूठे ही फल लागे ॥
बसंतु हिंडोलु घरु 2
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
माता जूठी पिता भी जूठा जूठे ही फल लागे ॥
आवहि जूठे जाहि भी जूठे जूठे मरहि अभागे ॥1॥
कहु पंडित सूचा कवनु ठाउ ॥
जहां बैसि हउ भोजनु खाउ ॥1॥ रहाउ ॥
जिहबा जूठी बोलत जूठा करन नेत्र सभि जूठे ॥
इंद्री की जूठि उतरसि नाही ब्रहम अगनि के लूठे ॥2॥
अगनि भी जूठी पानी जूठा जूठी बैसि पकाइआ ॥
जूठी करछी परोसन लागा जूठे ही बैठि खाइआ ॥3॥
गोबरु जूठा चउका जूठा जूठी दीनी कारा ॥
कहि कबीर तेई नर सूचे साची परी बिचारा ॥4॥1॥7॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
माता जूठी पिता भी जूठा जूठे ही फल लागे ॥
आवहि जूठे जाहि भी जूठे जूठे मरहि अभागे ॥1॥
कहु पंडित सूचा कवनु ठाउ ॥
जहां बैसि हउ भोजनु खाउ ॥1॥ रहाउ ॥
जिहबा जूठी बोलत जूठा करन नेत्र सभि जूठे ॥
इंद्री की जूठि उतरसि नाही ब्रहम अगनि के लूठे ॥2॥
अगनि भी जूठी पानी जूठा जूठी बैसि पकाइआ ॥
जूठी करछी परोसन लागा जूठे ही बैठि खाइआ ॥3॥
गोबरु जूठा चउका जूठा जूठी दीनी कारा ॥
कहि कबीर तेई नर सूचे साची परी बिचारा ॥4॥1॥7॥
हिन्दी अर्थ: बसंतु हिंडोलु घरु 2 सतिगुर प्रसादि ॥ माँ अपवित्र। पिता अपवित्र। इनके द्वारा पैदा किए हुए बाल-बच्चे भी अपवित्र; (जगत में जो भी) पैदा होते हैं वह अपवित्र। जो मरते हैं वे भी अपवित्र; अभागे जीव अपवित्र ही मर जाते हैं। 1। हे पंडित ! बता। वह कौन सी जगह है जो पवित्र है। जहाँ बैठ के मैं रोटी खा सकूँ (ता कि पूरी तरह से पवित्रता बनी रह सके) । 1। रहाउ। (मनुष्य की) जीभ मैली। बोल भी बुरे। कान आँखें सारे अपवित्र। (इसने ज्यादा) काम-चेष्टा (ऐसी है जिस) की मैल उतरती ही नहीं। हे ब्राहमण-पन के अहंकार की अग्नि में जले हुए ! (बता। पवित्र कौन सी चीज़ हुई।)। 2। आग झूठी। पानी झूठा। पकाने वाली झूठी। कड़छी झूठी जिससे (सब्ज़ी आदि) बाँटता है। वह प्राणी भी झूठा जो बैठ के खाता है। 3। गोबर झूठा। चौका झूठा। झूठी ही उस चौके के चारों तरफ़ डाली हुई (हदबंदी की) लकीरें। कबीर कहता है- सिर्फ वही मनुष्य पवित्र हैं जिन्हें परमात्मा की समझ आ गई है। 4। 1। 7।
कत जाईऐ रे घर लागो रंगु ॥
रामानंद जी घरु 1
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
कत जाईऐ रे घर लागो रंगु ॥
मेरा चितु न चलै मनु भइओ पंगु ॥1॥ रहाउ ॥
एक दिवस मन भई उमंग ॥
घसि चंदन चोआ बहु सुगंध ॥
पूजन चाली ब्रहम ठाइ ॥
सो ब्रहमु बताइओ गुर मन ही माहि ॥1॥
जहा जाईऐ तह जल पखान ॥
तू पूरि रहिओ है सभ समान ॥
बेद पुरान सभ देखे जोइ ॥
ऊहां तउ जाईऐ जउ ईहां न होइ ॥2॥
सतिगुर मै बलिहारी तोर ॥
जिनि सकल बिकल भ्रम काटे मोर ॥
रामानंद सुआमी रमत ब्रहम ॥
गुर का सबदु काटै कोटि करम ॥3॥1॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
कत जाईऐ रे घर लागो रंगु ॥
मेरा चितु न चलै मनु भइओ पंगु ॥1॥ रहाउ ॥
एक दिवस मन भई उमंग ॥
घसि चंदन चोआ बहु सुगंध ॥
पूजन चाली ब्रहम ठाइ ॥
सो ब्रहमु बताइओ गुर मन ही माहि ॥1॥
जहा जाईऐ तह जल पखान ॥
तू पूरि रहिओ है सभ समान ॥
बेद पुरान सभ देखे जोइ ॥
ऊहां तउ जाईऐ जउ ईहां न होइ ॥2॥
सतिगुर मै बलिहारी तोर ॥
जिनि सकल बिकल भ्रम काटे मोर ॥
रामानंद सुआमी रमत ब्रहम ॥
गुर का सबदु काटै कोटि करम ॥3॥1॥
हिन्दी अर्थ: रामानंद जी घरु 1 सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! और कहाँ जाऐं। (अब) हृदय-घर में ही मौज बन गई है; मेरा मन अब डोलता नहीं। स्थिर हो गया है। 1। रहाउ। एक दिन मेरे मन में भी यह चाहत पैदा हुई थी। मैंने चंदन घिसा के इत्र व अन्य कई सुगंधियाँ ले लीं। और मैं मन्दिर में पूजा करने चल पड़ी। पर अब तो मुझे वह परमात्मा (जिसको मैं मन्दिर में रहता समझती थी) मेरे गुरू ने मेरे मन में ही बसता दिखा दिया है। 1। (तीर्थों पर जाऐं चाहे मन्दिरों में जाऐं) जहाँ भी जाऐं वहाँ पानी है अथवा पत्थर हैं। हे प्रभू ! आप तो हर जगह एक समान भरपूर (व्यापक) हैं। वेद-पुराण आदि धर्म-पुस्तकें भी खोज के देख ली हैं। सो तीर्थों पर मन्दिरों में तब ही जाने की जरूरत है अगर परमात्मा मेरे मन में ना बसता हैं। 2। हे सतिगुरू ! मैं आपसे सदके जाता हूँ। जिसने मेरे सारे मुश्किल भुलेखे दूर कर दिए हैं। रामानंद का मालिक प्रभू हर जगह मौजूद है (और। गुरू के माध्यम से मिलता है। क्योंकि) गुरू का शबद करोड़ों (किए हुए बुरे) कर्मों का नाश कर देता है। 3। 1।
बसंतु बाणी नामदेउ जी की
बसंतु बाणी नामदेउ जी की
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
साहिबु संकटवै सेवकु भजै ॥
चिरंकाल न जीवै दोऊ कुल लजै ॥1॥
तेरी भगति न छोडउ भावै लोगु हसै ॥
चरन कमल मेरे हीअरे बसैं ॥1॥ रहाउ ॥
जैसे अपने धनहि प्रानी मरनु मांडै ॥
तैसे संत जनां राम नामु न छाडैं ॥2॥
गंगा गइआ गोदावरी संसार के कामा ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
साहिबु संकटवै सेवकु भजै ॥
चिरंकाल न जीवै दोऊ कुल लजै ॥1॥
तेरी भगति न छोडउ भावै लोगु हसै ॥
चरन कमल मेरे हीअरे बसैं ॥1॥ रहाउ ॥
जैसे अपने धनहि प्रानी मरनु मांडै ॥
तैसे संत जनां राम नामु न छाडैं ॥2॥
गंगा गइआ गोदावरी संसार के कामा ॥
हिन्दी अर्थ: बसंतु बाणी नामदेउ जी की सतिगुर प्रसादि ॥ अगर मालिक अपने नौकर को कष्ट दे। और नौकर (उस कष्ट से डरता) भाग जाए। (जिंद को कष्टों से बचाने के लिए भागता) नौकर सदा तो जीवित नहीं रहता। पर (मालिक को पीठ दे के) अपनी दोनों कुलें बदनाम कर लेता है। (हे प्रभू ! लोगों के इस ठॅठे-मजाक से डर के मैंने आपके दर से भाग नहीं जाना)। 1। (अब) जगत चाहे मजाक उड़ाता रहे। मैं आपकी भक्ति नहीं छोड़ूँगा। हे प्रभू ! कमल फूल जैसे कामल आपके चरण मेरे हृदय में बसते हैं। (और मुझे बहुत अच्छे लगते हैं।) 1। रहाउ। जैसे अपना धन बचाने की खातिर मनुष्य मरने पर भी तुल जाता है। वैसे ही प्रभू के भगत भी प्रभू का नाम (धन) नहीं छोड़ते (उनके पास भी प्रभू का नाम ही धन है)। 2। गंगा। गया। गोदावरी (आदि तीर्थों पर जाना- ये) दुनिया को ही खुश करने वाले काम हैं; पर।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: भगत कबीर जी; भगत नामदेव जी; भगत रामानन्द जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ११९५ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।