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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 1194 · बसंत

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अंग
1194
बसंत
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  1. हणवंतु जागै धरि लंकूरु ॥
  2. जोइ खसमु है जाइआ ॥
  3. प्रहलाद पठाए पड़न साल ॥
  4. इसु तन मन मधे मदन चोर ॥
  5. नाइकु एकु बनजारे पाच ॥

भगत कबीर जी · शबद · राग बसंत

हणवंतु जागै धरि लंकूरु ॥

अंग 1193 से चला आ रहा अंश

हणवंतु जागै धरि लंकूरु ॥
संकरु जागै चरन सेव ॥
कलि जागे नामा जैदेव ॥2॥
जागत सोवत बहु प्रकार ॥
गुरमुखि जागै सोई सारु ॥
इसु देही के अधिक काम ॥
कहि कबीर भजि राम नाम ॥3॥2॥

हिन्दी अर्थ: जागता रहा हनुमान पूँछ धारण करके भी (भाव, लोग उसको पूँछ वाला ही कहते हैं)। प्रभू-चरणों की सेवा करके जागा शिव जी। जागते रहे (अब के समय) कलियुग में जागते रहे भगत नामदेव और जैदेव जी। 2। जागना और सोए रहना (भी) कई किस्मों का है (चोर भी तो रात को जागते ही हैं)। वह जागना श्रेष्ठ है जो गुरमुखों का जागना है (भाव, जो मनुष्य गुरू के सन्मुख रहके माया के हमलों की तरफ से सचेत रहता है। वही जाग रहा है)। कबीर कहता है: हे भाई! प्रभू का नाम सिमर के सचेत रहें। यह सिमरन जीव के बहुत काम आता है। 3। 2।

भगत कबीर जी · शबद · राग बसंत

जोइ खसमु है जाइआ ॥

जोइ खसमु है जाइआ ॥
पूति बापु खेलाइआ ॥
बिनु स्रवणा खीरु पिलाइआ ॥1॥
देखहु लोगा कलि को भाउ ॥
सुति मुकलाई अपनी माउ ॥1॥ रहाउ ॥
पगा बिनु हुरीआ मारता ॥
बदनै बिनु खिर खिर हासता ॥
निद्रा बिनु नरु पै सोवै ॥
बिनु बासन खीरु बिलोवै ॥2॥
बिनु असथन गऊ लवेरी ॥
पैडे बिनु बाट घनेरी ॥
बिनु सतिगुर बाट न पाई ॥
कहु कबीर समझाई ॥3॥3॥

हिन्दी अर्थ: स्त्री ने पति को जन्म दिया है (भाव, जिस मन को माया ने जन्म दिया है। वही इसको भोगने वाला बन जाता है)। मन-पुत्र ने पिता-जीवात्मा को खेलने लगा दिया है। (यह मन) थनों के बिना ही (जीवात्मा को) दूध पिला रहा है (भाव, नाशवंत पदार्थों के स्वाद में डाल रहा है)। 1। हे लोगो! देखें, कलियुग का अजीब प्रभाव पड़ रहा है (भाव, प्रभू से विछुड़ने के कारण जीव पर अजीब दबाव पड़ रहा है)। (मन-रूप) पुत्र ने अपनी माँ (-माया) को ब्याह लिया है। 1। रहाउ। (इस मन के) कोई पैर नहीं हैं। पर छलांगे लगाता फिरता है; (इसका) मुँह नहीं। पर खिलखिलाकर हँसता फिरता है। (जीव का असल तो ऐसा है कि इसको माया की) नींद नहीं व्याप सकती थी। पर ('कलि को भाउ' देखें) जीव लंबी तान के सोया हुआ है; और बर्तन के बग़ैर ही दूध मथ रहा है (भाव, शेखचिल्ली की तरह सपने संजोता रहता है)। 2। (इस माया-रूप) गाय से सुख तो नहीं मिल सकते। पर यह (मन को) झूठे पदार्थों-रूप दूध में मोह रही है। (अपनी असल बिरती के मुताबिक तो इस जीव को कोई भटकना नहीं होनी चाहिए। पर 'कलि का भाउ' देखें) लंबे रास्ते (चौरासी के चक्करों में) पड़ा हुआ है। हे कबीर! (इस जगत को) समझा के बताएँ कि सतिगुरू के बिना जीवन-सफर का सही रास्ता नहीं मिल सकता। 3। 3।

भगत कबीर जी · शबद · राग बसंत

प्रहलाद पठाए पड़न साल ॥

प्रहलाद पठाए पड़न साल ॥
संगि सखा बहु लीए बाल ॥
मो कउ कहा पड़॑ावसि आल जाल ॥
मेरी पटीआ लिखि देहु स्री गोुपाल ॥1॥
नही छोडउ रे बाबा राम नाम ॥
मेरो अउर पड़॑न सिउ नही कामु ॥1॥ रहाउ ॥
संडै मरकै कहिओ जाइ ॥
प्रहलाद बुलाए बेगि धाइ ॥
तू राम कहन की छोडु बानि ॥
तुझु तुरतु छडाऊ मेरो कहिओ मानि ॥2॥
मो कउ कहा सतावहु बार बार ॥
प्रभि जल थल गिरि कीए पहार ॥
इकु रामु न छोडउ गुरहि गारि ॥
मो कउ घालि जारि भावै मारि डारि ॥3॥
काढि खड़गु कोपिओ रिसाइ ॥
तुझ राखनहारो मोहि बताइ ॥
प्रभ थंभ ते निकसे कै बिसथार ॥
हरनाखसु छेदिओ नख बिदार ॥4॥
ओइ परम पुरख देवाधि देव ॥
भगति हेति नरसिंघ भेव ॥
कहि कबीर को लखै न पार ॥
प्रहलाद उधारे अनिक बार ॥5॥4॥

हिन्दी अर्थ: प्रहलाद को (उसके पिता हर्णाकश्यप ने) पाठशाला में पढ़ने भेजा। (प्रहलाद ने अपने) साथ कई बालक साथ ले लिए। (जब अध्यापक कुछ और आल-जंजाल पढ़ाने लगा, तो प्रहलाद ने कहा। हे बाबा!) मुझे उल-जलूल क्यों पढ़ाते हैं। मेरी इस पट्टी पर 'श्री गोपाल श्री गोपाल' लिख दें। 1। हे बाबा! मैं परमात्मा का नाम सिमरना नहीं छोड़ूँगा। नाम के बिना कोई और बात पढ़ने से मेरा कोई वास्ता नहीं। 1। रहाउ। (प्रहलाद के अध्यापक) संडे और मरके (अमरक) ने जाकर (हर्णाकश्यप को यह बात) कह दी। उसने जल्दी से प्रहलाद को बुला लिया। (अध्यापक ने प्रहलाद को समझाया) आप परमात्मा के नाम के सिमरन की आदत को छोड़ दें। मेरी बात मान लें; मैं आपको तुरंत छुड़वा लूँगा। 2। (प्रहलाद ने उत्तर दिया। ये बात कह कर) मुझे क्यों बार-बार परेशान करते हैं। जिस प्रभू ने पानी। धरती। पहाड़ आदि सारी सृष्टि बनाई। मैं उस राम को सिमरना नहीं छोड़ूँगा। (उसको छोड़ने से) मेरे गुरू को गाली लगती है (भाव, मेरे गुरू की बदनामी होती है)। मुझे चाहे जला भी दें। चाहे मार दें। 3। (हर्णाकश्यप) खिझ के क्रोध में आया। तलवार (म्यान से) निकाल के (कहने लगा-) मुझे वह बताएँ जो आपको बचाने वाला है। प्रभू भयानक रूप धार के खम्भे में से निकल आया। और उसने अपने नाखूनों से चीर के हर्णाकश्यप को मार दिया। 4। कबीर कहता है: प्रभू जी परम-पुरख हैं। देवताओं के भी बड़े देवता हैं। प्रहलाद की भक्ति से प्रसन्न होकर प्रभू ने नरसिंघ का रूप धारा। कोई जीव उस प्रभू की ताकत का अंत नहीं पा सकता। प्रहलाद को अनेकों कष्टों से बचाया। 5। 4।

भगत कबीर जी · शबद · राग बसंत

इसु तन मन मधे मदन चोर ॥

इसु तन मन मधे मदन चोर ॥
जिनि गिआन रतनु हिरि लीन मोर ॥
मै अनाथु प्रभ कहउ काहि ॥
को को न बिगूतो मै को आहि ॥1॥
माधउ दारुन दुखु सहिओ न जाइ ॥
मेरो चपल बुधि सिउ कहा बसाइ ॥1॥ रहाउ ॥
सनक सनंदन सिव सुकादि ॥
नाभि कमल जाने ब्रहमादि ॥
कबि जन जोगी जटाधारि ॥
सभ आपन अउसर चले सारि ॥2॥
तू अथाहु मोहि थाह नाहि ॥
प्रभ दीना नाथ दुखु कहउ काहि ॥
मोरो जनम मरन दुखु आथि धीर ॥
सुख सागर गुन रउ कबीर ॥3॥5॥

हिन्दी अर्थ: (मेरी 'चंचल बुधि' के कारण। अब) मेरे इस तन-मन में कामदेव चोर आ बसा है। जिसने ज्ञान-रूप मेरा रत्न (मेरे अंदर से) चुरा लिया है (भाव, जिसने मेरी समझ बिगाड़ दी है)। हे प्रभू! मैं (बड़ा) आजिज़ हो गया हूँ। (अपना दुख आपके बिना और) किसको बताऊँ। (इस काम के हाथ से) कौन-कौन दुखी नहीं हुआ। मुझ (गरीब) की क्या बिसात है। 1। हे मेरे माधो! अपनी चंचल मति के आगे मेरी कोई पेश नहीं चलती। यह अति-भयंकर दुख (अब) मुझसे सहा नहीं जाता। 1। रहाउ। सनक, सनंदन, शिव, शुकदेव जैसे (बड़े-बड़े ऋषि-तपस्वी) कमल की नाभि से जन्मे ब्रहमा आदि। कवि लोग, जोगी और जटाधारी साधू, ये सब (काम से डरते-डरते) अपने-अपने समय में दिन-काट कर चले गए। 2। आप बड़े गहरे जिगरे वाले हैं। मैं (आपके गंभीर समुंदर जैसे महा विशाल दिल की) थाह नहीं लगा सकता। हे दीनानाथ प्रभू! दुख दूर करें। मेरे जन्म-मरण का दुख निवृत्त करके शान्ति प्रदान करें। हे कबीर! (काम आदि से बचने के लिए एक ही प्रभू का आसरा है। उसके आगे इस तरह अरजोई करें-) हे सुखों के सागर प्रभू! मैं और किस के आगे अरज़ोई करूँ। माया से पैदा हुआ यह मेरा सारी उम्र का दुख दूर करें। ता कि मैं आपके गुण याद कर सकूँ। 3। 5।

भगत कबीर जी · शबद · राग बसंत

नाइकु एकु बनजारे पाच ॥

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नाइकु एकु बनजारे पाच ॥
बरध पचीसक संगु काच ॥
नउ बहीआं दस गोनि आहि ॥
कसनि बहतरि लागी ताहि ॥1॥
मोहि ऐसे बनज सिउ नहीन काजु ॥

हिन्दी अर्थ: जीव (मानो) एक शाह है। पाँच ज्ञान इन्द्रियाँ (इस शाह के) बनजारे हैं। पच्चीस प्रकृतियाँ (काफ़िले के) बैल हैं। पर ये सारा साथ कच्चा ही है। नौ दरवाजे (मानो) बहियाँ हैं। दस इन्द्रियाँ छटें हैं। बहत्तर नाड़ियाँ (छटों को सीने के लिए) रस्सियाँ हैं जो इन (इन्द्रिय-रूपी छटों) को लगी हुई हैं। 1। मुझे ऐसा व्यापार करने की आवश्यकता नहीं।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: भगत कबीर जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1194 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।