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अंग ११९३ · बसंत

अंग
1193
बसंत
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  1. जा कै कीन॑ै होत बिकार ॥
  2. बसंत की वार महलु 5
  3. बसंतु बाणी भगतां की ॥
  4. मउली धरती मउलिआ अकासु ॥
  5. पंडित जन माते पड़ि॑ पुरान ॥

जा कै कीन॑ै होत बिकार ॥

अंग ११९२ से चला आ रहा अंश

जा कै कीन॑ै होत बिकार ॥
से छोडि चलिआ खिन महि गवार ॥5॥
माइआ मोहि बहु भरमिआ ॥
किरत रेख करि करमिआ ॥
करणैहारु अलिपतु आपि ॥
नही लेपु प्रभ पुंन पापि ॥6॥
राखि लेहु गोबिंद दइआल ॥
तेरी सरणि पूरन क्रिपाल ॥
तुझ बिनु दूजा नही ठाउ ॥
करि किरपा प्रभ देहु नाउ ॥7॥
तू करता तू करणहारु ॥
तू ऊचा तू बहु अपारु ॥
करि किरपा लड़ि लेहु लाइ ॥
नानक दास प्रभ की सरणाइ ॥8॥2॥

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! जिन पदार्थां को इकट्ठा करने से (मनुष्य के मन में अनेकों तरह के) विकार पैदा होते हैं (जब अंत समय आता है। तब) मूर्ख एक पल में ही उन (पदार्थां) को छोड़ के (यहाँ से) चल पड़ता है। 5। हे भाई ! (परमात्मा का सिमरन भुला के मनुष्य) माया के मोह के कारण बहुत भटकता फिरता है। (पिछले) किए कर्मों के संस्कारों के अनुसार (मनुष्य वैसे ही) कर्म करता जाता है। हे भाई ! सब कुछ कर सकने के समर्थ परमात्मा स्वयं निर्लिप है (उसके ऊपर माया का प्रभाव नहीं पड़ सकता)। प्रभू पर ना तो (जीवों द्वारा मिथे हुए) पुन्य कर्मों (के किए जाने से पैदा होने वाले अहंकार आदि) का असर होता है। ना किसी पाप के कारण (भाव। उस प्रभू को ना अहंकार ना विकार अपने असर तले ला सकता है)। 6। मेरी रक्षा कर। हे दया के श्रोत गोबिंद ! हे सर्व-व्यापक ! हे कृपालु ! मैं आपकी शरण आया हॅूँ। आपके बिना मेरी और कोई जगह नहीं। हे प्रभू ! मेहर करके मुझे अपना नाम बख्श। 7। (हे प्रभू !) आप (सब जीवों को) पैदा करने वाले हैं। आप सब कुछ कर सकने की समर्था रखते हैं। आप सबसे ऊँचे हैं। आप बेअंत हैं। मेहर कर (हमें) अपने पल्ले से लगाए रख। हे नानक ! प्रभू के दास प्रभू की शरण में पड़े रहते हैं 8। 2।

बसंत की वार महलु 5

बसंत की वार महलु 5
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि का नामु धिआइ कै होहु हरिआ भाई ॥
करमि लिखंतै पाईऐ इह रुति सुहाई ॥
वणु त्रिणु त्रिभवणु मउलिआ अंम्रित फलु पाई ॥
मिलि साधू सुखु ऊपजै लथी सभ छाई ॥
नानकु सिमरै एकु नामु फिरि बहुड़ि न धाई ॥1॥
पंजे बधे महाबली करि सचा ढोआ ॥
आपणे चरण जपाइअनु विचि दयु खड़ोआ ॥
रोग सोग सभि मिटि गए नित नवा निरोआ ॥
दिनु रैणि नामु धिआइदा फिरि पाइ न मोआ ॥
जिस ते उपजिआ नानका सोई फिरि होआ ॥2॥
किथहु उपजै कह रहै कह माहि समावै ॥
जीअ जंत सभि खसम के कउणु कीमति पावै ॥
कहनि धिआइनि सुणनि नित से भगत सुहावै ॥
अगमु अगोचरु साहिबो दूसरु लवै न लावै ॥
सचु पूरै गुरि उपदेसिआ नानकु सुणावै ॥3॥1॥

हिन्दी अर्थ: बसंत की वार महलु 5 सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! परमात्मा का नाम सिमर के आत्मिक जीवन वाला बन जा (जैसे पानी मिलने से वृक्ष हरा-भरा हो जाता है)। (नाम जपने से मनुष्य-जन्म का) ये खूबसूरत समय (पूर्बले किए कर्मों के अनुसार प्रभू द्वारा) लिखे बख्शिश के लेखों के अंकुरित होने से ही मिलता है। (जैसे वर्षा से) जंगल बनस्पति सारा जगत खिल उठता है। (वैसे ही उस मनुष्य का रोम-रोम खिल उठता है जो) अमृत-नाम रूपी फल हासिल कर लेता है। गुरू को मिल के (उसके हृदय में) सुख पैदा होता है। उसके मन की मैल उतर जाती है। नानक (भी) प्रभू का ही नाम सिमरता है (और जो मनुष्य सिमरता है उसको) बार-बार जनम-मरण के चक्करों में भटकना नहीं पड़ता। 1। जिस मनुष्य ने (प्रभू का सिमरन रूपी) सच्ची भेटा (प्रभू की हजूरी में) पेश की है। प्रभू ने उसके कामादिक पाँचों ही बड़े बली विकार बाँध दिए हैं। प्रभु सुख दुख में साथ देकर अपने चरणों का ही जाप करवाता है। (जिसके कारण) उसके सारे ही रोग मिट जाते हैं। वह सदा पवित्र-आत्मा और अरोग रहता है। वह मनुष्य दिन-रात परमात्मा का नाम सिमरता है। उसको जनम-मरण का चक्कर नहीं लगाना पड़ता। हे नानक ! जिस परमात्मा से वह पैदा हुआ था (सिमरन की बरकति से) उसी का रूप हो जाता है। 2। (कोई नहीं बता सकता कि) प्रभू कहाँ से पैदा होता है कहाँ रहता है और कहाँ लीन हो जाता है। सारे जीव पति-प्रभू के पैदा किए हुए हैं। कोई भी (अपने पैदा करने वाले के गुणों का) मूल्य नहीं डाल सकता। जो जो उस प्रभू के गुण उचारते हैं याद करते हैं वे भगत सुंदर (जीवन वाले) हो जाते हैं। परमात्मा अपहुँच है। इन्द्रियों की पहुँच से परे है सबका मालिक है। कोई उसकी बराबरी नहीं कर सकता। नानक उस सदा-स्थिर प्रभू की सिफत-सालाह सुनाता है। पूरे गुरू ने वह प्रभू नज़दीक दिखा दिया है (अंदर बसता दिखा दिया है)। 3। 1।

बसंतु बाणी भगतां की ॥

बसंतु बाणी भगतां की ॥

हिन्दी अर्थ: बसंतु बाणी भगतां की ॥

मउली धरती मउलिआ अकासु ॥

कबीर जी घरु 1
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मउली धरती मउलिआ अकासु ॥
घटि घटि मउलिआ आतम प्रगासु ॥1॥
राजा रामु मउलिआ अनत भाइ ॥
जह देखउ तह रहिआ समाइ ॥1॥ रहाउ ॥
दुतीआ मउले चारि बेद ॥
सिंम्रिति मउली सिउ कतेब ॥2॥
संकरु मउलिओ जोग धिआन ॥
कबीर को सुआमी सभ समान ॥3॥1॥

हिन्दी अर्थ: कबीर जी घरु 1 सतिगुर प्रसादि ॥ धरती और आकाश (उसी की जोति के प्रकाश से) खिले हुए हैं। हरेक घट में उस परमात्मा का ही प्रकाश है। 1। (सारे जगत का मालिक) जोति-स्वरूप परमात्मा (अपने बनाए जगत में) अनेकों तरह से अपना प्रकाश कर रहा है। मैं जिधर देखता हूँ। उधर ही वह भरपूर (दिखता) है। 1। रहाउ। (सिर्फ धरती और आकाश ही नहीं) चारों वेद। स्मृतियाँ और कतेब (इस्लामी धर्म पुस्तकें) - यह सारे भी परमात्मा की ही ज्योति से प्रकट हुए हैं। 2। जेग-समाधि लगाने वाला शिव भी (प्रभू की जोति की बरकति से) खिला। (सिरे की बात यह कि) कबीर का मालिक (-प्रभू) सब जगह एक जैसा ही खिल रहा है। 3।

पंडित जन माते पड़ि॑ पुरान ॥

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पंडित जन माते पड़ि॑ पुरान ॥
जोगी माते जोग धिआन ॥
संनिआसी माते अहंमेव ॥
तपसी माते तप कै भेव ॥1॥
सभ मद माते कोऊ न जाग ॥
संग ही चोर घरु मुसन लाग ॥1॥ रहाउ ॥
जागै सुकदेउ अरु अकूरु ॥

हिन्दी अर्थ: पण्डित लोग पुराण (आदि धर्म-पुस्तकें) पढ़ के अहंकार में हैं; जोगी जोग-साधना के गुमान में मतवाले फिरते हैं। सन्यासी (सन्यास के) अहंकार में डूबे हुए हैं; तपस्वी इसलिए मस्ताए हुए हैं कि उन्होंने तप का भेद पा लिया है। 1। सब जीव (किसी ना किसी विकार में) मतवाले होए हुए हैं। कोई नहीं जागता (दिखाई देता)। और। इन जीवों के अंदर से ही (उठ के कामादिक) चोर इनका (हृदय-रूप) घर लूट रहे हैं। 1। रहाउ। (जगत में कोई विरले-विरले जागे। विरले-विरले मायश के प्रभाव से बचे); जागता रहा शुकदेव ऋषि और अक्रूर भगत;

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी; भगत कबीर जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ११९३ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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