साधना का मार्ग
श्लोक 43 से 50
सिद्धान्त तो समझ में आ गया। अब बारी आती है उतर कर चलने की। राम अपने भाई को बताते हैं कि जो साधक सचमुच ब्रह्म को जानना चाहता है, वह करे क्या।

राम यहाँ साधक के मुख में आत्मा की वह घोषणा रख देते हैं, जो सारी साधना का सार है। मैं प्रकाश-स्वरूप हूँ, मुझे कोई जन्म नहीं, मेरा कोई दूसरा नहीं। मैं सदा से भासता आया हूँ, अति निर्मल हूँ। मैं शुद्ध विज्ञान का घन हूँ, रोग और विकार से परे, पूर्ण, आनन्दमय, और हर क्रिया से अछूता। यही वह ‘मैं’ है जिसे पहचान लेना ही लक्ष्य है।
श्लोक 43 · प्रकाश-स्वरूप मैं
प्रकाशरूपोऽहमजोऽहमद्वयो असकृद्विभातोऽहमतीव निर्मलः।
विशुद्धविज्ञानघनो निरामयः सम्पूर्ण आनन्दमयोऽहमक्रियः ॥43॥
फिर राम उसी आत्मा की और गहराइयाँ खोलते हैं। मैं सदा से ही मुक्त हूँ, मेरी शक्ति विचार से परे है। मैं इन्द्रियों से अतीत ज्ञान-स्वरूप हूँ, मुझमें कोई विकार नहीं। मेरा न आर-पार है न अन्त। ज्ञानी जन रात-दिन अपने हृदय में मुझे ही भावते हैं, वेद के मर्म को जानने वाले मुझे ही पहचानते हैं।
श्लोक 44 · सदा मुक्त मैं
सदैव मुक्तोऽहमचिन्त्यशक्तिमानतीन्द्रियज्ञानमविक्रियात्मकः।
अनन्तपारोऽहमहर्निशं बुधैर्विभावितोऽहं हृदि वेदवादिभिः ॥44॥
राम बताते हैं कि इस प्रकार जो साधक अखण्ड वृत्ति से अपने को सदा आत्मा ही जान कर विचार करता रहता है, उसके भीतर एक विशुद्ध भावना जाग उठती है। और वही भावना उसकी अविद्या को शीघ्र ही नष्ट कर देती है। जैसे विधि-पूर्वक सेवन किया गया रसायन रोगों को हर लेता है, वैसे ही यह आत्म-विचार समस्त भ्रम को हर लेता है।
श्लोक 45 · अविद्या का नाश
एवं सदात्मानमखण्डितात्मना विचारमाणस्य विशुद्धभावना।
हन्यादविद्यामचिरेण कारकै रसायनं यद्वदुपासितं रुजः ॥45॥
अब राम उस साधना की बाहरी रीति बताते हैं। साधक एकान्त में जा बैठे, इन्द्रियों को विषयों से लौटा ले, मन को पूरी तरह जीत ले, और अपने अन्तःकरण को निर्मल कर ले। फिर वह बिना किसी और सहारे के, केवल विज्ञान-दृष्टि से, अपने ही स्वरूप में स्थिर हो कर उस एक तत्त्व को भावे।
श्लोक 46 · एकान्त साधना
विविक्त आसीन उपारतेन्द्रियो विनिर्जितात्मा विमलान्तराशयः।
विभावयेदेकमनन्यसाधनो विज्ञानदृक्केवल आत्मसंस्थितः ॥46॥
और यही वह बिन्दु है जहाँ सब कुछ एक में लय हो जाता है। यह जो सारा विश्व दिख रहा है, वह तो परमात्मा का ही दर्शन है। साधक इस सम्पूर्ण विश्व को उसी आत्मा में, जो सबका कारण है, लीन कर दे। तब वह पूर्ण, चिदानन्दमय हो कर ठहर जाता है। न उसे कोई बाहरी वस्तु रहती है, न कोई भीतरी।
श्लोक 47 · विश्व का लय
विश्वं यदेतत्परमात्मदर्शनं विलापयेदात्मनि सर्वकारणे।
पूर्णश्चिदानन्दमयोऽवतिष्ठते न वेद बाह्यं न च किञ्चिदान्तरम् ॥47॥
अब राम प्रणव की ओर मुड़ते हैं, उस ओंकार की ओर जो समाधि का द्वार है। समाधि से पहले साधक इस चराचर सम्पूर्ण जगत् को केवल ओंकार-मात्र मान कर चिन्तन करे। यह सारा विश्व वाच्य है, और प्रणव उसका वाचक। अज्ञान के कारण ही यह जगत् भिन्न-भिन्न भासता है, बोध हो जाने पर नहीं।
श्लोक 48 · ओंकार-मात्र जगत्
पूर्वं समाधेरखिलं विचिन्तयेदोङ्कारमात्रं सचराचरं जगत्।
तदेव वाच्यं प्रणवो हि वाचको विभाव्यतेऽज्ञानवशान्न बोधतः ॥48॥
फिर राम प्रणव की भीतरी रचना खोलते हैं। ‘अ’ कार वही पुरुष है जिसे विश्व कहते हैं, जागृत अवस्था का अभिमानी। ‘उ’ कार तैजस है, स्वप्न का अभिमानी, और यह क्रम से आता है। ‘म’ कार को सब जन प्राज्ञ कहते हैं, सुषुप्ति का अभिमानी। यह सारा भेद समाधि से पहले की दृष्टि का है, तत्त्व से देखें तो ऐसा कोई भेद है ही नहीं।
श्लोक 49 · अ-उ-म और तीन अवस्थाएँ
अकारसंज्ञः पुरुषो हि विश्वको ह्युकारकस्तैजस ईर्यते क्रमात्।
प्राज्ञो मकारः परिपठ्यतेऽखिलैः समाधिपूर्वं न तु तत्त्वतो भवेत् ॥49॥
और अन्त में राम वह लययोग बताते हैं, जिसकी ओर यह सारा खण्ड चलता आ रहा था। ‘अ’ कार रूप विश्व को, जो जागृति का पुरुष है, ‘उ’ कार में लीन कर दे, क्योंकि ‘उ’ कार ही अनेक रूपों में भीतर बसा है। फिर तैजस रूप ‘उ’ कार को ‘म’ कार में लीन कर दे, और इस तरह प्रणव के इस दूसरे वर्ण को उसके अन्तिम वर्ण में समेट ले।
श्लोक 50 · प्रणव में क्रमशः लय
विश्वं त्वकारं पुरुषं विलापयेदुकारमध्ये बहुधा व्यवस्थितम्।
ततो मकारे प्रविलाप्य तैजसं द्वितीयवर्णं प्रणवस्य चान्तिमे ॥50॥