मुक्त की दशा
The Liberated One · श्लोक 51 से 57
जीवन्मुक्त कैसा होता है? राम का portrait।
आत्म-ज्ञान-निरुद्धस्य न शोको न च मोहयेत्॥
ātma-jñāna-niruddhasya na śoko na ca mohayet
अर्थ“जीवन्मुक्त की निष्ठा, और मेरी ब्रह्म में स्थिति, आत्म-ज्ञान में निरुद्ध को, न शोक, न मोह।”
विदेह-मुक्तिमाप्नोति देह-त्यागान्न संशयः॥
videha-muktim āpnoti deha-tyāgān na saṁśayaḥ
अर्थ“देह-अभिमान से निर्मुक्त, ब्रह्म-होने के लिए कल्पित। देह-त्याग पर विदेह-मुक्ति, यह निश्चय।”
विद्या-दीपं समाश्रित्य आनन्दौघ-निमज्जति॥
vidyā-dīpaṁ samāśritya ānandaugha-nimajjati
अर्थ“वो अज्ञान-तिमिर से घिरा संसार तरता है। विद्या-दीप का आश्रय ले कर, आनन्द-धारा में निमग्न।”
तावन्तो जन्म-संख्याता ब्रह्मण्यपि न दुर्लभाः॥
tāvanto janma-saṁkhyātā brahmaṇy api na durlabhāḥ
अर्थ“जिसकी संसार में जितनी भोग-वासनाएँ, उतने जन्म ब्रह्म में भी (अनिवार्य)। मगर ज्ञानी को दुर्लभ नहीं (छूटना)।”
आत्म-निष्ठा सदा शान्तः समः सर्वत्र दृश्यते॥
ātma-niṣṭhā sadā śāntaḥ samaḥ sarvatra dṛśyate
अर्थ“मुक्त का लक्षण कहता हूँ, जिसे जान कर बन्ध से निवृत्ति। आत्म-निष्ठा, सदा शान्त, सब जगह सम।”
आत्मानन्द-समाविष्टो रमते स्व-स्वरूपिणि॥
ātmānanda-samāviṣṭo ramate sva-svarūpiṇi
अर्थ“कल्पना और संशय गए, व्यवहार में भी निःस्पृह। आत्म-आनन्द में समाविष्ट, अपने स्वरूप में रमण।”
सर्वारम्भ-परित्यागी गुणातीतः स उच्यते॥
sarvārambha-parityāgī guṇātītaḥ sa ucyate
अर्थ“मान-अपमान में शान्त, मित्र-शत्रु में तुल्य। सब आरम्भों का परित्यागी, वो गुणातीत कहा जाता है।”