श्री राम गीता · खण्ड 7: मुक्त की दशा

श्री राम गीता · खण्ड 7

मुक्त की दशा

The Liberated One · श्लोक 51 से 57

जीवन्मुक्त कैसा होता है? राम का portrait।

श्लोक 51
जीवन्मुक्तस्य या निष्ठा या च मे ब्रह्मणि स्थितिः।
आत्म-ज्ञान-निरुद्धस्य न शोको न च मोहयेत्॥
jīvan-muktasya yā niṣṭhā yā ca me brahmaṇi sthitiḥ
ātma-jñāna-niruddhasya na śoko na ca mohayet

अर्थ“जीवन्मुक्त की निष्ठा, और मेरी ब्रह्म में स्थिति, आत्म-ज्ञान में निरुद्ध को, न शोक, न मोह।”

सन्दर्भराम “मेरी ब्रह्म-स्थिति” बोलते हैं। मतलब जीवन्मुक्त का state और राम का state, same।
श्लोक 52
देहाभिमान-निर्मुक्तो ब्रह्म-भूयाय कल्पते।
विदेह-मुक्तिमाप्नोति देह-त्यागान्न संशयः॥
dehābhimāna-nirmukto brahma-bhūyāya kalpate
videha-muktim āpnoti deha-tyāgān na saṁśayaḥ

अर्थ“देह-अभिमान से निर्मुक्त, ब्रह्म-होने के लिए कल्पित। देह-त्याग पर विदेह-मुक्ति, यह निश्चय।”

श्लोक 53
स तरत्येव संसारमज्ञान-तिमिराऽऽवृतम्।
विद्या-दीपं समाश्रित्य आनन्दौघ-निमज्जति॥
sa taraty eva saṁsāram ajñāna-timirā”vṛtam
vidyā-dīpaṁ samāśritya ānandaugha-nimajjati

अर्थ“वो अज्ञान-तिमिर से घिरा संसार तरता है। विद्या-दीप का आश्रय ले कर, आनन्द-धारा में निमग्न।”

श्लोक 54
वासना यस्य संसारे यावन्तो भोग-वासना।
तावन्तो जन्म-संख्याता ब्रह्मण्यपि न दुर्लभाः॥
vāsanā yasya saṁsāre yāvanto bhoga-vāsanā
tāvanto janma-saṁkhyātā brahmaṇy api na durlabhāḥ

अर्थ“जिसकी संसार में जितनी भोग-वासनाएँ, उतने जन्म ब्रह्म में भी (अनिवार्य)। मगर ज्ञानी को दुर्लभ नहीं (छूटना)।”

श्लोक 55 · सम-दर्शिता
मुक्तस्य लक्षणं वक्ष्ये यद्ज्ञात्वा बन्धान्निवर्तते।
आत्म-निष्ठा सदा शान्तः समः सर्वत्र दृश्यते॥
muktasya lakṣaṇaṁ vakṣye yad jñātvā bandhān nivartate
ātma-niṣṭhā sadā śāntaḥ samaḥ sarvatra dṛśyate

अर्थ“मुक्त का लक्षण कहता हूँ, जिसे जान कर बन्ध से निवृत्ति। आत्म-निष्ठा, सदा शान्त, सब जगह सम।”

श्लोक 56
गत-कल्पन-संशीतिर्व्यवहारेऽपि निःस्पृहः।
आत्मानन्द-समाविष्टो रमते स्व-स्वरूपिणि॥
gata-kalpana-saṁśītir vyavahāre’pi niḥspṛhaḥ
ātmānanda-samāviṣṭo ramate sva-svarūpiṇi

अर्थ“कल्पना और संशय गए, व्यवहार में भी निःस्पृह। आत्म-आनन्द में समाविष्ट, अपने स्वरूप में रमण।”

श्लोक 57
मानापमानयोः शान्तस्तुल्य-मित्रारि-पक्षयोः।
सर्वारम्भ-परित्यागी गुणातीतः स उच्यते॥
mānāpamānayoḥ śāntas tulya-mitrāri-pakṣayoḥ
sarvārambha-parityāgī guṇātītaḥ sa ucyate

अर्थ“मान-अपमान में शान्त, मित्र-शत्रु में तुल्य। सब आरम्भों का परित्यागी, वो गुणातीत कहा जाता है।”

सन्दर्भभगवद् गीता 14.24-25 के समान वर्णन। गुणातीत = त्रिगुण से परे।
॥ मुक्त की दशा ॥