ज्ञान बनाम कर्म
Knowledge vs. Action · श्लोक 9 से 16
राम क्यों कह रहे हैं ज्ञान कर्म से बड़ा है? यह वेदान्त vs पूर्व-मीमांसा का प्राचीन विवाद है। यहाँ राम का stand स्पष्ट।
स्वर्गादि-फल-कामेन ज्ञानयोगं विना नराः॥
svargādi-phala-kāmena jñāna-yogaṁ vinā narāḥ
अर्थ“मूढ़ कर्म करते हैं, मोक्ष की आशा के पाश में बँधे, स्वर्ग आदि फल की कामना से, ज्ञान-योग के बिना।”
तन्निवृत्त्या भवेन्मुक्तिर्ज्ञानेनैव हि नान्यथा॥
tan-nivṛttyā bhaven muktir jñānenaiva hi nānyathā
अर्थ“पुण्य और पाप क्षीण होते समय, कर्म का शोषण होता है। उसकी निवृत्ति से मुक्ति, सिर्फ़ ज्ञान से, अन्यथा नहीं।”
अज्ञानेन कृतं कर्म सुकृतं वा कुकृत्यपि॥
ajñānena kṛtaṁ karma su-kṛtaṁ vā ku-kṛty api
अर्थ“सान्त (limited) के लिए कर्म करते हुए वो निश्चित मुक्त नहीं होता। अज्ञान से किया कर्म, अच्छा हो या बुरा।”
ज्ञानमेव यतस्तस्मादज्ञान-विनिवर्तकम्॥
jñānam eva yatas tasmād ajñāna-vinivartakam
अर्थ“कर्म अज्ञान से कल्पित है। उसका निवारक ज्ञान है, अज्ञान को हटाने वाला।”
तत्र मोक्षो भवेन्नूनं नान्यथेति विनिश्चयः॥
tatra mokṣo bhaven nūnaṁ nānyatheti viniścayaḥ
अर्थ“जहाँ अविद्या के अन्धकार का ज्ञान-दीप के प्रकाश से नाश हो, वहीं मोक्ष, अन्यथा नहीं, यह निश्चय।”
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन ज्ञानमेव विचारयेत्॥
tasmāt sarva-prayatnena jñānam eva vicārayet
अर्थ“मनुष्य कर्म से बँधता है, ज्ञान से छूटता है। इसलिए सब प्रयत्न से ज्ञान का ही विचार करे।”
एते त्रयोऽपि ज्ञानस्य साधनान्यतिमुख्यतः॥
ete trayo’pi jñānasya sādhanāny atimukhyataḥ
अर्थ“श्रवण, मनन, निदिध्यासन, यह तीनों ज्ञान के मुख्य साधन हैं।”
आत्मानमवबुध्येत मामेव जगदीश्वरम्॥
ātmānam avabudhyeta mām eva jagad-īśvaram
अर्थ“शास्त्र और आचार्य के उपदेश से, और परि-निश्चय से, सत्-शिष्य आत्मा को जाने, जो मैं ही, जगदीश्वर हूँ।”