श्री राम गीता · खण्ड 2: ज्ञान बनाम कर्म

श्री राम गीता · खण्ड 2

ज्ञान बनाम कर्म

Knowledge vs. Action · श्लोक 9 से 16

राम क्यों कह रहे हैं ज्ञान कर्म से बड़ा है? यह वेदान्त vs पूर्व-मीमांसा का प्राचीन विवाद है। यहाँ राम का stand स्पष्ट।

श्लोक 9
कर्म कुर्वन्ति मूढाश्च मोक्षाशा-पाश-बन्धनाः।
स्वर्गादि-फल-कामेन ज्ञानयोगं विना नराः॥
karma kurvanti mūḍhāś ca mokṣāśā-pāśa-bandhanāḥ
svargādi-phala-kāmena jñāna-yogaṁ vinā narāḥ

अर्थ“मूढ़ कर्म करते हैं, मोक्ष की आशा के पाश में बँधे, स्वर्ग आदि फल की कामना से, ज्ञान-योग के बिना।”

सन्दर्भ“मोक्षाशा-पाश”। मोक्ष की आशा भी पाश है। यानी “मोक्ष चाहना” भी एक तरह से बन्धन। ज्ञान में “चाहना” नहीं, “होना” है।
श्लोक 10
पुण्यापुण्ये क्षीयमाणे जायते कर्म-शोषणम्।
तन्निवृत्त्या भवेन्मुक्तिर्ज्ञानेनैव हि नान्यथा॥
puṇyāpuṇye kṣīyamāṇe jāyate karma-śoṣaṇam
tan-nivṛttyā bhaven muktir jñānenaiva hi nānyathā

अर्थ“पुण्य और पाप क्षीण होते समय, कर्म का शोषण होता है। उसकी निवृत्ति से मुक्ति, सिर्फ़ ज्ञान से, अन्यथा नहीं।”

सन्दर्भkarma-mechanics। पुण्य और पाप दोनों कर्म-bond हैं। दोनों ख़त्म होने पर मुक्ति। और दोनों ख़त्म ज्ञान से।
श्लोक 11
कर्म कुर्वन् हि सान्तानां नूनं नैव विमुच्यते।
अज्ञानेन कृतं कर्म सुकृतं वा कुकृत्यपि॥
karma kurvan hi sāntānāṁ nūnaṁ naiva vimucyate
ajñānena kṛtaṁ karma su-kṛtaṁ vā ku-kṛty api

अर्थ“सान्त (limited) के लिए कर्म करते हुए वो निश्चित मुक्त नहीं होता। अज्ञान से किया कर्म, अच्छा हो या बुरा।”

सन्दर्भ“अज्ञान से किया अच्छा कर्म भी”। यह key है। punya कर्म भी बन्धन है, अगर “मैं कर रहा हूँ” के अज्ञान से किया।
श्लोक 12
अज्ञान-कल्पितं वैतत्कर्म तस्य निवारकम्।
ज्ञानमेव यतस्तस्मादज्ञान-विनिवर्तकम्॥
ajñāna-kalpitaṁ vaitat karma tasya nivārakam
jñānam eva yatas tasmād ajñāna-vinivartakam

अर्थ“कर्म अज्ञान से कल्पित है। उसका निवारक ज्ञान है, अज्ञान को हटाने वाला।”

श्लोक 13
यत्र विद्या-तमो-नाशो ज्ञान-दीप-प्रकाशनात्।
तत्र मोक्षो भवेन्नूनं नान्यथेति विनिश्चयः॥
yatra vidyā-tamo-nāśo jñāna-dīpa-prakāśanāt
tatra mokṣo bhaven nūnaṁ nānyatheti viniścayaḥ

अर्थ“जहाँ अविद्या के अन्धकार का ज्ञान-दीप के प्रकाश से नाश हो, वहीं मोक्ष, अन्यथा नहीं, यह निश्चय।”

सन्दर्भ“दीप-दीप” का metaphor। अज्ञान अन्धकार है, ज्ञान दीप। दीप जलते ही अन्धकार गया। बिना action के।
श्लोक 14
कर्मणा गृह्यते बद्धो मुच्यते ज्ञानतो नरः।
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन ज्ञानमेव विचारयेत्॥
karmaṇā gṛhyate baddho mucyate jñānato naraḥ
tasmāt sarva-prayatnena jñānam eva vicārayet

अर्थ“मनुष्य कर्म से बँधता है, ज्ञान से छूटता है। इसलिए सब प्रयत्न से ज्ञान का ही विचार करे।”

श्लोक 15
श्रवणं मननं चैव निदिध्यासनमेव च।
एते त्रयोऽपि ज्ञानस्य साधनान्यतिमुख्यतः॥
śravaṇaṁ mananaṁ caiva nididhyāsanam eva ca
ete trayo’pi jñānasya sādhanāny atimukhyataḥ

अर्थ“श्रवण, मनन, निदिध्यासन, यह तीनों ज्ञान के मुख्य साधन हैं।”

सन्दर्भवेदान्त के तीन steps। श्रवण (सुनना), मनन (विचारना), निदिध्यासन (deeply contemplate)। एक के बाद एक deepen।
श्लोक 16
शास्त्राचार्योपदेशेन सत्शिष्यः परिनिश्चयात्।
आत्मानमवबुध्येत मामेव जगदीश्वरम्॥
śāstrācāryopadeśena sat-śiṣyaḥ pari-niścayāt
ātmānam avabudhyeta mām eva jagad-īśvaram

अर्थ“शास्त्र और आचार्य के उपदेश से, और परि-निश्चय से, सत्-शिष्य आत्मा को जाने, जो मैं ही, जगदीश्वर हूँ।”

सन्दर्भ“माम् एव”। राम identify कर रहे हैं अपने को आत्मा से। “मैं जो दिख रहा हूँ, मैं ही ब्रह्म।”
॥ ज्ञान बनाम कर्म ॥