अद्वैत-स्वरूप
The Non-Dual Self · श्लोक 27 से 34
अब राम साधक को बताते हैं वो “बच गया साक्षी” क्या है। एक, अद्वैत, सत्-चित्-आनन्द। यह वेदान्त का heart है।
एकता ब्रह्म-जीवस्य स्थिता वेदान्तसम्मता॥
ekatā brahma-jīvasya sthitā vedānta-sammatā
अर्थ“‘तत् त्वम् असि’ आदि वाक्यों के विचार और निश्चय से, ब्रह्म और जीव की एकता स्थापित। यह वेदान्त-सम्मत है।”
अहं ब्रह्मेति निश्चित्य निःशङ्को मुक्तिमृच्छति॥
ahaṁ brahmeti niścitya niḥśaṅko muktim ṛcchati
अर्थ“सब संग से मुक्त, ब्रह्म-आत्मा के दर्शन से जीव। ‘मैं ब्रह्म’, यह निश्चय कर के, निःशंक मुक्ति पाता है।”
तथा बाह्यार्थ-भिन्नात्मा न तदात्मेति निश्चयः॥
tathā bāhyārtha-bhinnātmā na tad-ātmeti niścayaḥ
अर्थ“जैसे शरीर भिन्न-शक्ति, ‘मैं शरीर हूँ’ यह बुद्धि नहीं। वैसे बाह्य-वस्तु से भिन्न आत्मा, ‘मैं वो हूँ’ यह निश्चय नहीं।”
तदेव चान्तरो जीवो विज्ञेयोऽन्योऽप्यनेकधा॥
tad eva cāntaro jīvo vijñeyo’nyo’py anekadhā
अर्थ“सत्य, ज्ञान, अनन्त, यही ब्रह्म, यह जानो। वही अन्तर्जीव। और अन्य अनेक रूपों में देखा जाता।”
नित्यः सर्वगतो व्यापी निर्विकारः स्वयं प्रभुः॥
nityaḥ sarva-gato vyāpī nirvikāraḥ svayaṁ prabhuḥ
अर्थ“एक ही सदा साक्षी, सबके अन्दर चित्। नित्य, सर्व-गत, व्यापी, निर्विकार, स्वयं प्रभु।”
घटाकाशवदेकोऽपि नाना-घटेषु संस्थितः॥
ghaṭākāśa-vad eko’pi nānā-ghaṭeṣu saṁsthitaḥ
अर्थ“अनेक शरीरों में रहते हुए, एक ही परमेश्वर है। जैसे घट-आकाश एक होते हुए, अनेक घटों में स्थित।”
आदित्यो न तु लिप्येत तथा साक्षी न लिप्यते॥
ādityo na tu lipyeta tathā sākṣī na lipyate
अर्थ“जैसे सूर्य पूरे लोक को तेज से प्रकाशित करते हुए, स्वयं लिप्त नहीं होता, वैसे साक्षी लिप्त नहीं।”
निर्विकारः परानन्द आत्मेति विद्धि निश्चयम्॥
nirvikāraḥ parānanda ātmeti viddhi niścayam
अर्थ“मैं सत्-चित्-आनन्द-रूप, नित्य, शुद्ध, असंग, अद्वय। निर्विकार, परम आनन्द। यह आत्मा है, निश्चित जान।”