श्री राम गीता · खण्ड 4: अद्वैत-स्वरूप

श्री राम गीता · खण्ड 4

अद्वैत-स्वरूप

The Non-Dual Self · श्लोक 27 से 34

अब राम साधक को बताते हैं वो “बच गया साक्षी” क्या है। एक, अद्वैत, सत्-चित्-आनन्द। यह वेदान्त का heart है।

श्लोक 27
तत्त्वमस्यादि-वाक्यानां विचारेण विनिश्चयात्।
एकता ब्रह्म-जीवस्य स्थिता वेदान्तसम्मता॥
tat tvam asy-ādi-vākyānāṁ vicāreṇa viniścayāt
ekatā brahma-jīvasya sthitā vedānta-sammatā

अर्थ“‘तत् त्वम् असि’ आदि वाक्यों के विचार और निश्चय से, ब्रह्म और जीव की एकता स्थापित। यह वेदान्त-सम्मत है।”

सन्दर्भ“तत् त्वम् असि”, छान्दोग्य उपनिषद् का महावाक्य। “वह तू है”। उद्दालक से श्वेतकेतु को। राम इसी को quote कर रहे हैं।
श्लोक 28
सर्वसङ्ग-विनिर्मुक्तो जीवो ब्रह्मात्म-दर्शनात्।
अहं ब्रह्मेति निश्चित्य निःशङ्को मुक्तिमृच्छति॥
sarva-saṅga-vinirmukto jīvo brahmātma-darśanāt
ahaṁ brahmeti niścitya niḥśaṅko muktim ṛcchati

अर्थ“सब संग से मुक्त, ब्रह्म-आत्मा के दर्शन से जीव। ‘मैं ब्रह्म’, यह निश्चय कर के, निःशंक मुक्ति पाता है।”

श्लोक 29
यथा देहो भिन्न-शक्तिर्न च देहोऽहमिति धीः।
तथा बाह्यार्थ-भिन्नात्मा न तदात्मेति निश्चयः॥
yathā deho bhinna-śaktir na ca deho’ham iti dhīḥ
tathā bāhyārtha-bhinnātmā na tad-ātmeti niścayaḥ

अर्थ“जैसे शरीर भिन्न-शक्ति, ‘मैं शरीर हूँ’ यह बुद्धि नहीं। वैसे बाह्य-वस्तु से भिन्न आत्मा, ‘मैं वो हूँ’ यह निश्चय नहीं।”

श्लोक 30
सत्यं ज्ञानमनन्तं तद् ब्रह्म इत्यवधार्यताम्।
तदेव चान्तरो जीवो विज्ञेयोऽन्योऽप्यनेकधा॥
satyaṁ jñānam anantaṁ tad brahma ity avadhāryatām
tad eva cāntaro jīvo vijñeyo’nyo’py anekadhā

अर्थ“सत्य, ज्ञान, अनन्त, यही ब्रह्म, यह जानो। वही अन्तर्जीव। और अन्य अनेक रूपों में देखा जाता।”

सन्दर्भ“सत्यं ज्ञानमनन्तं” तैत्तिरीय उपनिषद् का famous definition। राम वो उद्धरित कर रहे हैं।
श्लोक 31
एक एव सदा साक्षी सर्वेषामन्तरश्चितिः।
नित्यः सर्वगतो व्यापी निर्विकारः स्वयं प्रभुः॥
eka eva sadā sākṣī sarveṣām antaraś citiḥ
nityaḥ sarva-gato vyāpī nirvikāraḥ svayaṁ prabhuḥ

अर्थ“एक ही सदा साक्षी, सबके अन्दर चित्। नित्य, सर्व-गत, व्यापी, निर्विकार, स्वयं प्रभु।”

श्लोक 32
अनेक-शरीर-वासि एक एव परमेश्वरः।
घटाकाशवदेकोऽपि नाना-घटेषु संस्थितः॥
aneka-śarīra-vāsi eka eva parameśvaraḥ
ghaṭākāśa-vad eko’pi nānā-ghaṭeṣu saṁsthitaḥ

अर्थ“अनेक शरीरों में रहते हुए, एक ही परमेश्वर है। जैसे घट-आकाश एक होते हुए, अनेक घटों में स्थित।”

सन्दर्भघट-आकाश का classic metaphor। एक आकाश, अनेक घड़ों में। हर घड़े में “अलग” लगता है, मगर एक ही।
श्लोक 33
यथा सूर्यः सर्वलोकं तेजसा भासयन्नपि।
आदित्यो न तु लिप्येत तथा साक्षी न लिप्यते॥
yathā sūryaḥ sarva-lokaṁ tejasā bhāsayann api
ādityo na tu lipyeta tathā sākṣī na lipyate

अर्थ“जैसे सूर्य पूरे लोक को तेज से प्रकाशित करते हुए, स्वयं लिप्त नहीं होता, वैसे साक्षी लिप्त नहीं।”

श्लोक 34
सच्चिदानन्द-रूपोऽहं नित्यः शुद्धोऽसङ्गोऽद्वयः।
निर्विकारः परानन्द आत्मेति विद्धि निश्चयम्॥
sac-cid-ānanda-rūpo’haṁ nityaḥ śuddho’saṅgo’dvayaḥ
nirvikāraḥ parānanda ātmeti viddhi niścayam

अर्थ“मैं सत्-चित्-आनन्द-रूप, नित्य, शुद्ध, असंग, अद्वय। निर्विकार, परम आनन्द। यह आत्मा है, निश्चित जान।”

सन्दर्भआत्मा का full definition। आठ adjectives। राम का positive declaration।
॥ अद्वैत-स्वरूप ॥