अष्टावक्र गीता · प्रकरण 1: साक्षी

अष्टावक्र गीता · प्रकरण 1

साक्षी

Witness · 20 श्लोक

जनक के तीन प्रश्न: ज्ञान कैसे प्राप्त हो? मुक्ति कैसे हो? वैराग्य कैसे आए? अष्टावक्र का जवाब इसी प्रकरण में पूरा आ जाता है। बाक़ी 19 प्रकरण इसी एक उत्तर की व्याख्या हैं।

श्लोक 1
जनक उवाच
कथं ज्ञानमवाप्नोति कथं मुक्तिर्भविष्यति।
वैराग्यं च कथं प्राप्तं एतद् ब्रूहि मम प्रभो॥
kathaṁ jñānam avāpnoti kathaṁ muktir bhaviṣyati
vairāgyaṁ ca kathaṁ prāptaṁ etad brūhi mama prabho

अर्थजनक पूछते हैं: “हे प्रभु, ज्ञान कैसे प्राप्त होता है? मुक्ति कैसे होगी? और वैराग्य कैसे आएगा? यह मुझे बताइए।”

सन्दर्भजनक राजा हैं, ज्ञानी मानेजाते हैं, अपने आप में सिद्ध। फिर भी तीन प्रश्न। इन तीनों में एक छुपी सी मान्यता है: “मुझे कुछ चाहिए। कुछ मिलना बाक़ी है।” अष्टावक्र अगले श्लोक में इसी मान्यता को तोड़ते हैं।

पाठक के लिएतीनों प्रश्न आज भी वही हैं। हर साधक यही पूछता है, बस शब्द बदल जाते हैं। अष्टावक्र का जवाब सुनिए, मगर पहले प्रश्न को महसूस करिए। जनक का प्रश्न आपका भी है क्या?

श्लोक 2
अष्टावक्र उवाच
मुक्तिमिच्छसि चेत्तात विषयान् विषवत्त्यज।
क्षमार्जवदयातोषसत्यं पीयूषवद् भज॥
muktim icchasi cet tāta viṣayān viṣa-vat tyaja
kṣamārjava-dayā-toṣa-satyaṁ pīyūṣa-vad bhaja

अर्थअष्टावक्र कहते हैं: “बेटा, अगर तू मुक्ति चाहता है, तो विषयों को ज़हर की तरह छोड़ दे। और क्षमा, सरलता, दया, सन्तोष, और सत्य, इन्हें अमृत की तरह पी।”

सन्दर्भयह श्लोक पूरे text का foundation है। अष्टावक्र ने “ज्ञान” या “मुक्ति” की technique नहीं बताई। उन्होंने attitude बताया। विषय (sense objects) से distance और सद्गुणों से intimacy, बस यही प्रारंभिक step है। बाक़ी का काम अपने आप होता है।

पाठक के लिए“विषय” का मतलब चीज़ें नहीं, उन चीज़ों के पीछे की भूख है। मोबाइल बुरा नहीं, मोबाइल की भूख problem है। यह श्लोक कहता है, भूख को ज़हर समझो, और संतोष को दवा।

श्लोक 3
अष्टावक्र उवाच
न पृथ्वी न जलं नाग्निर्न वायुर्द्यौर्न वा भवान्।
एषां साक्षिणमात्मानं चिद्रूपं विद्धि मुक्तये॥
na pṛthvī na jalaṁ nāgnir na vāyur dyaur na vā bhavān
eṣāṁ sākṣiṇam ātmānaṁ cid-rūpaṁ viddhi muktaye

अर्थ“तू पृथ्वी नहीं, जल नहीं, अग्नि नहीं, वायु नहीं, आकाश भी नहीं। मुक्ति चाहिए तो जान, तू इन सबका साक्षी है, चिद्रूप आत्मा है।”

सन्दर्भयहाँ अष्टावक्र पंच-तत्व (five elements) का खण्डन करते हैं। शरीर इन्हीं पाँचों से बना है। जनक की पहचान, जैसे हम सबकी, शरीर के साथ है। अष्टावक्र कहते हैं, तू body नहीं, तू body को देखने वाला है।

पाठक के लिएएक experiment: अभी जो पढ़ रहा है, वो आँख है या आँख के पीछे कोई और? जो “मैं पढ़ रहा हूँ” का अनुभव कर रहा है, वो शरीर का कौनसा हिस्सा है? कोई हिस्सा नहीं। वो हिस्सों के परे है। वही साक्षी है।

श्लोक 4
अष्टावक्र उवाच
यदि देहं पृथक् कृत्य चिति विश्राम्य तिष्ठसि।
अधुनैव सुखी शान्तो बन्धमुक्तो भविष्यसि॥
yadi dehaṁ pṛthak kṛtya citi viśrāmya tiṣṭhasi
adhunaiva sukhī śānto bandha-mukto bhaviṣyasi

अर्थ“अगर तू देह को अलग करके चेतना में विश्राम कर के स्थित हो जाए, तो अभी इसी क्षण सुखी, शान्त, बन्धन-मुक्त हो जाएगा।”

सन्दर्भ“अधुनैव”, “अभी इसी क्षण”, यह अष्टावक्र की signature है। और कोई आचार्य process बताता है। अष्टावक्र कहते हैं, process नहीं, recognition। एक pause, एक shift in identification, बस।

पाठक के लिए“विश्राम” शब्द ध्यान देने योग्य है। कोई effort नहीं, कोई practice नहीं। बस आराम। जैसे थका हुआ आदमी कुर्सी पर बैठ जाता है। चेतना ही वो कुर्सी है।

श्लोक 5
अष्टावक्र उवाच
न त्वं विप्रादिको वर्णो नाश्रमी नाक्षगोचरः।
असङ्गोऽसि निराकारो विश्वसाक्षी सुखी भव॥
na tvaṁ viprādiko varṇo nāśramī nākṣa-gocaraḥ
asaṅgo’si nirākāro viśva-sākṣī sukhī bhava

अर्थ“तू न ब्राह्मण आदि वर्ण है, न किसी आश्रम का, न इन्द्रियों से दिखने वाला। तू असंग है, निराकार है, विश्व का साक्षी है। सुखी हो जा।”

सन्दर्भवर्ण और आश्रम, समाज की पहचान। इन्द्रिय-गोचर, शरीर की पहचान। अष्टावक्र दोनों को एक साथ काट देते हैं। “तू वो नहीं है जो लोग तुझे समझते हैं, और वो भी नहीं जो तू अपने आप को समझता है।”

पाठक के लिए“सुखी भव”, “सुखी हो जा”। यह command है, request नहीं। अष्टावक्र कह रहे हैं, सुख कोई achievement नहीं। बस पहचान बदलो, सुख already वहाँ है।

श्लोक 6
अष्टावक्र उवाच
धर्माधर्मौ सुखं दुःखं मानसानि न ते विभो।
न कर्तासि न भोक्तासि मुक्त एवासि सर्वदा॥
dharmādharmau sukhaṁ duḥkhaṁ mānasāni na te vibho
na kartāsi na bhoktāsi mukta evāsi sarvadā

अर्थ“धर्म-अधर्म, सुख-दुःख, ये सब मन के विषय हैं, तेरे नहीं। हे विभु, तू न कर्ता है, न भोक्ता। तू सदा से मुक्त ही है।”

सन्दर्भ“मुक्त एवासि सर्वदा”, “तू सदा से मुक्त ही है”। यह अष्टावक्र की दूसरी signature है। मुक्ति “होनी” नहीं, “है”। बस यह बात recognize नहीं हुई।

पाठक के लिए“कर्ता” का अहंकार सबसे गहरा है। “मैंने यह किया, मैंने वो किया।” अष्टावक्र कहते हैं, मन ने किया, इन्द्रियों ने किया, शरीर ने किया। तूने नहीं। तू बस गवाह है।

श्लोक 7
अष्टावक्र उवाच
एको द्रष्टासि सर्वस्य मुक्तप्रायोऽसि सर्वदा।
अयमेव हि ते बन्धो द्रष्टारं पश्यसीतरम्॥
eko draṣṭāsi sarvasya mukta-prāyo’si sarvadā
ayam eva hi te bandho draṣṭāraṁ paśyasītaram

अर्थ“तू अकेला सबका द्रष्टा है, सदा से लगभग-मुक्त ही है। तेरा बन्धन बस इतना है, कि तू द्रष्टा को कोई और समझ रहा है।”

सन्दर्भ“मुक्त-प्रायः”, “लगभग-मुक्त”, interesting शब्द है। पूरी तरह मुक्त क्यों नहीं? क्योंकि एक छोटी सी ग़लती बाक़ी है, द्रष्टा को कोई और समझना। यह ग़लती जिस moment ठीक हुई, मुक्ति है।

पाठक के लिए“द्रष्टारं पश्यसीतरम्”, “द्रष्टा को कोई और देख रहा है”। मतलब, हम अपने आप को object बना देते हैं। “मैं ऐसा हूँ, वैसा हूँ।” यह “मैं” objects की list बन जाता है। पर असली “मैं” तो list बनाने वाला है।

श्लोक 8
अष्टावक्र उवाच
अहं कर्तेत्यहंमानमहाकृष्णाहिदंशितः।
नाहं कर्तेति विश्वासामृतं पीत्वा सुखी भव॥
ahaṁ karteti ahaṁ-māna-mahā-kṛṣṇāhi-daṁśitaḥ
nāhaṁ karteti viśvāsāmṛtaṁ pītvā sukhī bhava

अर्थ“‘मैं कर्ता हूँ’, इस अहंकार रूपी बड़े काले साँप ने तुझे डँस लिया है। ‘मैं कर्ता नहीं’, इस विश्वास का अमृत पी कर सुखी हो जा।”

सन्दर्भ“महा-कृष्ण-अहि”, बड़ा काला साँप। अष्टावक्र का यह metaphor strong है। साँप एक ही बार डँसता है, और ज़हर पूरी देह में फैल जाता है। ठीक वैसे ही “मैं कर्ता हूँ” का छोटा सा विचार, पूरी ज़िंदगी को stress से भर देता है।

पाठक के लिए“विश्वास का अमृत”। यह practice नहीं, conviction है। मानने की बात है। “मैं कर्ता नहीं” यह सुनते ही resistance आता है, “तो काम कौन करेगा?” काम होता रहेगा, बस तू केन्द्र में नहीं रहेगा।

श्लोक 9
अष्टावक्र उवाच
एको विशुद्धबोधोऽहमिति निश्चयवह्निना।
प्रज्वाल्याज्ञानगहनं वीतशोकः सुखी भव॥
eko viśuddha-bodho’ham iti niścaya-vahninā
prajvālyājñāna-gahanaṁ vīta-śokaḥ sukhī bhava

अर्थ“‘मैं एक, विशुद्ध बोध हूँ’, इस निश्चय की आग से अज्ञान के घने जंगल को जला दे। शोक-रहित हो कर सुखी हो जा।”

सन्दर्भअज्ञान को “गहन” कहा, घना जंगल। यह metaphor accurate है। अज्ञान कोई एक बात नहीं, layers हैं। हर layer के नीचे एक और। और सब को एक साथ काटने का तरीक़ा? एक “निश्चय” की आग।

पाठक के लिए“विशुद्ध बोध”, pure awareness। अभी इस वाक्य को पढ़ते हुए जो awareness काम कर रही है, वो ही है। उसमें कोई content नहीं, बस पढ़ने की क्षमता। वही “मैं” है, बाक़ी सब content है।

श्लोक 10
अष्टावक्र उवाच
यत्र विश्वमिदं भाति कल्पितं रज्जुसर्पवत्।
आनन्दपरमानन्दः स बोधस्त्वं सुखं भव॥
yatra viśvam idaṁ bhāti kalpitaṁ rajju-sarpa-vat
ānanda-paramānandaḥ sa bodhas tvaṁ sukhaṁ bhava

अर्थ“जिसमें यह सारा संसार रस्सी पर साँप की तरह कल्पित होता है, वही आनन्द-परमानन्द बोध तू है। सुखी हो जा।”

सन्दर्भ“रज्जु-सर्प-वत्”, रस्सी पर साँप की तरह। यह वेदान्त का classic metaphor है। अँधेरे में रस्सी देख कर डर लग जाता है, “साँप!” रौशनी आते ही पता चलता है, रस्सी ही थी। ठीक वैसे ही, अज्ञान में यह संसार “real” लगता है। ज्ञान में वही चेतना का खेल है।

पाठक के लिएयह श्लोक नहीं कहता “संसार नहीं है”। यह कहता है, संसार वैसा नहीं है जैसा दिखता है। साँप दिखा था, रस्सी थी। दुःख दिख रहा है, उसके पीछे आनन्द है।

श्लोक 11
अष्टावक्र उवाच
मुक्ताभिमानी मुक्तो हि बद्धो बद्धाभिमान्यपि।
किंवदन्तीह सत्येयं या मतिः सा गतिर्भवेत्॥
muktābhimānī mukto hi baddho baddhābhimānyapi
kiṁvadantīha satyeyaṁ yā matiḥ sā gatir bhavet

अर्थ“जो अपने को मुक्त मानता है, वह मुक्त है। जो अपने को बद्ध मानता है, वह बद्ध। यह कहावत यहाँ सच है, जैसी मति, वैसी गति।”

सन्दर्भ“यथा मति तथा गति”, यह famous श्लोक है। अष्टावक्र कहते हैं, मुक्ति और बन्धन, दोनों मानसिक हैं। तू जिस position से अपने आप को देखता है, वही तेरी position बन जाती है।

पाठक के लिएयह श्लोक potentially misleading है, अगर सतही पढ़ा जाए। “मान लो कि तुम मुक्त हो” वाला positive-thinking नहीं है। यह कहता है, recognize करो कि तुम मुक्त हो। यह मानने की नहीं, देखने की बात है।

श्लोक 12
अष्टावक्र उवाच
आत्मा साक्षी विभुः पूर्ण एको मुक्तश्चिदक्रियः।
असङ्गो निःस्पृहः शान्तो भ्रमात्संसारवानिव॥
ātmā sākṣī vibhuḥ pūrṇa eko muktaś cid akriyaḥ
asaṅgo niḥspṛhaḥ śānto bhramāt saṁsāravān iva

अर्थ“आत्मा साक्षी है, विभु है, पूर्ण है, एक है, मुक्त है, चित् है, अक्रिय है। असंग, निःस्पृह, शान्त, बस भ्रम से संसारी जैसा दिखता है।”

सन्दर्भयह श्लोक आत्मा का definition है। दस विशेषण: साक्षी, विभु, पूर्ण, एक, मुक्त, चित्, अक्रिय, असंग, निःस्पृह, शान्त। और एक qualifier: “इव”, “जैसा”। यानी संसारी “जैसा” दिखता है, संसारी “है” नहीं।

पाठक के लिएदसों विशेषण remember करने की ज़रूरत नहीं। बस एक काफ़ी है, “साक्षी”। बाक़ी सब इसी से derive होते हैं। जो साक्षी है, वो शान्त भी है, अक्रिय भी, असंग भी।

श्लोक 13
अष्टावक्र उवाच
कूटस्थं बोधमद्वैतमात्मानं परिभावय।
आभासोऽहं भ्रमं मुक्त्वा भावं बाह्यमथान्तरम्॥
kūṭa-sthaṁ bodham advaitam ātmānaṁ paribhāvaya
ābhāso’haṁ bhramaṁ muktvā bhāvaṁ bāhyam athāntaram

अर्थ“कूटस्थ, अद्वैत बोध रूपी आत्मा का अनुसन्धान कर। ‘मैं आभास हूँ’ इस भ्रम को छोड़ कर बाहर और भीतर का भाव त्याग।”

सन्दर्भ“कूटस्थ” का अर्थ है, जो बदलता नहीं। चक्की का ऊपरी हिस्सा, जो अचल रहता है। आत्मा वैसी है। बाक़ी सब घूमता है, आत्मा वहीं है। और “आभास” वो “मैं” है जो situations के साथ बदलता है, “मैं ख़ुश हूँ, मैं उदास हूँ”। वो “मैं” आभास है, real नहीं।

पाठक के लिएएक test: सुबह की “मैं” और शाम की “मैं” same है? Mood बदल गया, thoughts बदल गए, energy बदल गयी। फिर “मैं” क्या बच रहा है? जो बच रहा है, वो कूटस्थ है। बाक़ी सब आभास।

श्लोक 14
अष्टावक्र उवाच
देहाभिमानपाशेन चिरं बद्धोऽसि पुत्रक।
बोधोऽहं ज्ञानखङ्गेन तन्निकृत्य सुखी भव॥
dehābhimāna-pāśena ciraṁ baddho’si putraka
bodho’haṁ jñāna-khaṅgena tan nikṛtya sukhī bhava

अर्थ“बेटा, देह के अभिमान के पाश से तू बहुत समय से बँधा है। ‘मैं बोध हूँ’, इस ज्ञान की तलवार से उसे काट कर सुखी हो जा।”

सन्दर्भ“पुत्रक”, बेटा। अष्टावक्र की आवाज़ tender है। यह scolding नहीं, parenting है। बच्चे को रस्सी से छुड़ाने वाले बाप की tone। और “ज्ञान-खङ्ग”, ज्ञान की तलवार, instrument है। तर्क नहीं, recognition।

पाठक के लिए“देहाभिमान”। यह सिर्फ़ vanity नहीं। यह वो default assumption है कि “मैं यह शरीर हूँ”। जब शरीर थक जाता है, हम थके हुए होते हैं। शरीर बीमार होता है, हम परेशान। यह पहचान कब बनी, याद नहीं। बस है।

श्लोक 15
अष्टावक्र उवाच
निःसङ्गो निष्क्रियोऽसि त्वं स्वप्रकाशो निरञ्जनः।
अयमेव हि ते बन्धः समाधिमनुतिष्ठसि॥
niḥsaṅgo niṣkriyo’si tvaṁ sva-prakāśo nirañjanaḥ
ayam eva hi te bandhaḥ samādhim anutiṣṭhasi

अर्थ“तू निःसंग, निष्क्रिय, स्वयं-प्रकाश, निरंजन है। तेरा बन्धन बस इतना है, कि तू समाधि का अनुष्ठान कर रहा है।”

सन्दर्भयह श्लोक चौंकाने वाला है। समाधि भी बन्धन? हाँ। क्योंकि समाधि करने वाला कोई है, और समाधि एक state है। state आती-जाती है। अष्टावक्र कहते हैं, तू state नहीं, तू stateless है। समाधि भी एक doing है। तू doer ही नहीं।

पाठक के लिएयह श्लोक meditators के लिए challenge है। ध्यान बुरा नहीं, पर ध्यान को “मार्ग” मानना भ्रम है। अष्टावक्र कहते हैं, तू already वो है जो ध्यान से मिलेगा। ध्यान करता है तो अच्छा, पर “ज़रूरी” नहीं।

श्लोक 16
अष्टावक्र उवाच
त्वया व्याप्तमिदं विश्वं त्वयि प्रोतं यथार्थतः।
शुद्धबुद्धस्वरूपस्त्वं मा गमः क्षुद्रचित्तताम्॥
tvayā vyāptam idaṁ viśvaṁ tvayi protaṁ yathārthataḥ
śuddha-buddha-svarūpas tvaṁ mā gamaḥ kṣudra-cittatām

अर्थ“यह सारा संसार तेरे से व्याप्त है, तेरे में पिरोया है, यथार्थतः। तू शुद्ध-बुद्ध स्वरूप है, क्षुद्र चित्त को मत प्राप्त हो।”

सन्दर्भ“मा गमः क्षुद्र-चित्ततां”, “क्षुद्र चित्त को मत प्राप्त हो”। यह warning है। चित्त small हो सकता है, अगर “मैं शरीर हूँ” मानता है। और chित्त बड़ा हो सकता है, अगर “मैं चेतना हूँ” recognize करता है।

पाठक के लिए“क्षुद्रता” अहंकार से नहीं आती, अहंकार के सम्बन्ध से आती है। जब “मेरा” बहुत बड़ा हो जाता है, “मैं” बहुत छोटा हो जाता है। अष्टावक्र कह रहे हैं, “मेरा” छोड़, “मैं” आप-से-आप बड़ा है।

श्लोक 17
अष्टावक्र उवाच
निरपेक्षो निर्विकारो निर्भरः शीतलाशयः।
अगाधबुद्धिरक्षुब्धो भव चिन्मात्रवासनः॥
nirapekṣo nirvikāro nirbharaḥ śītalāśayaḥ
agādha-buddhir akṣubdho bhava cin-mātra-vāsanaḥ

अर्थ“निरपेक्ष, निर्विकार, निर्भर, शीतल-आशय, अगाध-बुद्धि, अक्षुब्ध, बस चित्-मात्र में वास कर।”

सन्दर्भसात विशेषण लगातार। हर एक एक एक angle। निरपेक्ष, कुछ चाहिए नहीं। निर्विकार, बदलता नहीं। निर्भर, परिपूर्ण। शीतलाशय, ठंडा चित्त। अगाधबुद्धि, अथाह बुद्धि। अक्षुब्ध, अविचलित। और last, “चित्-मात्र-वासनः”, बस चेतना में वास।

पाठक के लिएयह सात विशेषण कहीं नहीं जाते। कहीं “बनना” नहीं है। यह तेरा already-स्वरूप है। बस वास कर, बस रह, उसी में।

श्लोक 18
अष्टावक्र उवाच
साकारमनृतं विद्धि निराकारं तु निश्चलम्।
एतत्तत्त्वोपदेशेन न पुनर्भवसम्भवः॥
sākāram anṛtaṁ viddhi nirākāraṁ tu niścalam
etat tattvopadeśena na punar bhava-sambhavaḥ

अर्थ“साकार को असत् जान, निराकार को निश्चल। इस तत्त्व के उपदेश से फिर जन्म नहीं होगा।”

सन्दर्भ“साकार” यानी जिसका रूप है, बदलता है, समाप्त होता है। शरीर साकार, mind साकार, संसार साकार। “निराकार”, आत्मा, चेतना। और मुक्ति का formula? साकार को असत् पहचानो, निराकार में स्थित हो।

पाठक के लिए“पुनर्भव-सम्भव”, पुनः जन्म की सम्भावना। अष्टावक्र अगले जन्म की बात कम, इसी जन्म के पुनर्जन्मों की बात ज़्यादा कर रहे हैं। हम रोज़ नये “मैं” पैदा करते हैं, हर ego-state एक new birth है। यह उपदेश उस chain को तोड़ता है।

श्लोक 19
अष्टावक्र उवाच
यथैवादर्शमध्यस्थे रूपेऽन्तः परितस्तु सः।
तथैवाऽस्मिन् शरीरेऽन्तः परितः परमेश्वरः॥
yathaivādarśa-madhya-sthe rūpe’ntaḥ paritas tu saḥ
tathaivāsmin śarīre’ntaḥ paritaḥ parameśvaraḥ

अर्थ“जैसे आईने में दिखने वाले रूप के अन्दर और बाहर, दोनों जगह वही आईना है, वैसे ही इस शरीर के अन्दर और बाहर, सब जगह वही परमेश्वर है।”

सन्दर्भआईने का metaphor। आईने में चेहरा दिखता है, पर आईना सिर्फ़ चेहरे के “अन्दर” नहीं, “बाहर” भी है, हर तरफ़। ठीक वैसे ही, चेतना सिर्फ़ शरीर के “अन्दर” नहीं, “बाहर” भी है, हर जगह। शरीर एक localized point नहीं, omnipresent चेतना का एक window है।

पाठक के लिएहम सोचते हैं चेतना दिमाग़ में है, “अन्दर”। पर “अन्दर” का concept “बाहर” के against बनता है। चेतना के लिए “अन्दर-बाहर” है ही नहीं। वो पूरी जगह है, और शरीर उसमें appear करता है, उसमें contain नहीं।

श्लोक 20
अष्टावक्र उवाच
एकं सर्वगतं व्योम बहिरन्तर्यथा घटे।
नित्यं निरन्तरं ब्रह्म सर्वभूतगणे तथा॥
ekaṁ sarva-gataṁ vyoma bahir antar yathā ghaṭe
nityaṁ nirantaraṁ brahma sarva-bhūta-gaṇe tathā

अर्थ“जैसे एक ही सर्वव्यापी आकाश घड़े के बाहर और अन्दर है, वैसे ही नित्य, निरन्तर ब्रह्म, सब प्राणियों में है।”

सन्दर्भघट-आकाश का metaphor। मिट्टी के घड़े में जो “अन्दर” का आकाश दिखता है, वो वही बाहर का आकाश है। बस घड़े की दीवारें भ्रम पैदा करती हैं। ठीक वैसे ही, हर शरीर एक घड़ा है। उसके अन्दर का “मैं” वही है जो दूसरे घड़े के अन्दर। और दोनों, और सब, सर्वव्यापी ब्रह्म।

पाठक के लिएप्रकरण 1 यहाँ समाप्त होता है। अष्टावक्र ने अपना पूरा उपदेश दे दिया, 20 श्लोकों में। तीन प्रश्नों के तीन उत्तर: ज्ञान? साक्षी की पहचान। मुक्ति? पहले से ही है। वैराग्य? विषयों को ज़हर समझ। अब आगे जनक की प्रतिक्रिया, प्रकरण 2 में।

॥ साक्षी ॥