साक्षी
Witness · 20 श्लोक
जनक के तीन प्रश्न: ज्ञान कैसे प्राप्त हो? मुक्ति कैसे हो? वैराग्य कैसे आए? अष्टावक्र का जवाब इसी प्रकरण में पूरा आ जाता है। बाक़ी 19 प्रकरण इसी एक उत्तर की व्याख्या हैं।
वैराग्यं च कथं प्राप्तं एतद् ब्रूहि मम प्रभो॥
vairāgyaṁ ca kathaṁ prāptaṁ etad brūhi mama prabho
अर्थजनक पूछते हैं: “हे प्रभु, ज्ञान कैसे प्राप्त होता है? मुक्ति कैसे होगी? और वैराग्य कैसे आएगा? यह मुझे बताइए।”
पाठक के लिएतीनों प्रश्न आज भी वही हैं। हर साधक यही पूछता है, बस शब्द बदल जाते हैं। अष्टावक्र का जवाब सुनिए, मगर पहले प्रश्न को महसूस करिए। जनक का प्रश्न आपका भी है क्या?
क्षमार्जवदयातोषसत्यं पीयूषवद् भज॥
kṣamārjava-dayā-toṣa-satyaṁ pīyūṣa-vad bhaja
अर्थअष्टावक्र कहते हैं: “बेटा, अगर तू मुक्ति चाहता है, तो विषयों को ज़हर की तरह छोड़ दे। और क्षमा, सरलता, दया, सन्तोष, और सत्य, इन्हें अमृत की तरह पी।”
पाठक के लिए“विषय” का मतलब चीज़ें नहीं, उन चीज़ों के पीछे की भूख है। मोबाइल बुरा नहीं, मोबाइल की भूख problem है। यह श्लोक कहता है, भूख को ज़हर समझो, और संतोष को दवा।
एषां साक्षिणमात्मानं चिद्रूपं विद्धि मुक्तये॥
eṣāṁ sākṣiṇam ātmānaṁ cid-rūpaṁ viddhi muktaye
अर्थ“तू पृथ्वी नहीं, जल नहीं, अग्नि नहीं, वायु नहीं, आकाश भी नहीं। मुक्ति चाहिए तो जान, तू इन सबका साक्षी है, चिद्रूप आत्मा है।”
पाठक के लिएएक experiment: अभी जो पढ़ रहा है, वो आँख है या आँख के पीछे कोई और? जो “मैं पढ़ रहा हूँ” का अनुभव कर रहा है, वो शरीर का कौनसा हिस्सा है? कोई हिस्सा नहीं। वो हिस्सों के परे है। वही साक्षी है।
अधुनैव सुखी शान्तो बन्धमुक्तो भविष्यसि॥
adhunaiva sukhī śānto bandha-mukto bhaviṣyasi
अर्थ“अगर तू देह को अलग करके चेतना में विश्राम कर के स्थित हो जाए, तो अभी इसी क्षण सुखी, शान्त, बन्धन-मुक्त हो जाएगा।”
पाठक के लिए“विश्राम” शब्द ध्यान देने योग्य है। कोई effort नहीं, कोई practice नहीं। बस आराम। जैसे थका हुआ आदमी कुर्सी पर बैठ जाता है। चेतना ही वो कुर्सी है।
असङ्गोऽसि निराकारो विश्वसाक्षी सुखी भव॥
asaṅgo’si nirākāro viśva-sākṣī sukhī bhava
अर्थ“तू न ब्राह्मण आदि वर्ण है, न किसी आश्रम का, न इन्द्रियों से दिखने वाला। तू असंग है, निराकार है, विश्व का साक्षी है। सुखी हो जा।”
पाठक के लिए“सुखी भव”, “सुखी हो जा”। यह command है, request नहीं। अष्टावक्र कह रहे हैं, सुख कोई achievement नहीं। बस पहचान बदलो, सुख already वहाँ है।
न कर्तासि न भोक्तासि मुक्त एवासि सर्वदा॥
na kartāsi na bhoktāsi mukta evāsi sarvadā
अर्थ“धर्म-अधर्म, सुख-दुःख, ये सब मन के विषय हैं, तेरे नहीं। हे विभु, तू न कर्ता है, न भोक्ता। तू सदा से मुक्त ही है।”
पाठक के लिए“कर्ता” का अहंकार सबसे गहरा है। “मैंने यह किया, मैंने वो किया।” अष्टावक्र कहते हैं, मन ने किया, इन्द्रियों ने किया, शरीर ने किया। तूने नहीं। तू बस गवाह है।
अयमेव हि ते बन्धो द्रष्टारं पश्यसीतरम्॥
ayam eva hi te bandho draṣṭāraṁ paśyasītaram
अर्थ“तू अकेला सबका द्रष्टा है, सदा से लगभग-मुक्त ही है। तेरा बन्धन बस इतना है, कि तू द्रष्टा को कोई और समझ रहा है।”
पाठक के लिए“द्रष्टारं पश्यसीतरम्”, “द्रष्टा को कोई और देख रहा है”। मतलब, हम अपने आप को object बना देते हैं। “मैं ऐसा हूँ, वैसा हूँ।” यह “मैं” objects की list बन जाता है। पर असली “मैं” तो list बनाने वाला है।
नाहं कर्तेति विश्वासामृतं पीत्वा सुखी भव॥
nāhaṁ karteti viśvāsāmṛtaṁ pītvā sukhī bhava
अर्थ“‘मैं कर्ता हूँ’, इस अहंकार रूपी बड़े काले साँप ने तुझे डँस लिया है। ‘मैं कर्ता नहीं’, इस विश्वास का अमृत पी कर सुखी हो जा।”
पाठक के लिए“विश्वास का अमृत”। यह practice नहीं, conviction है। मानने की बात है। “मैं कर्ता नहीं” यह सुनते ही resistance आता है, “तो काम कौन करेगा?” काम होता रहेगा, बस तू केन्द्र में नहीं रहेगा।
प्रज्वाल्याज्ञानगहनं वीतशोकः सुखी भव॥
prajvālyājñāna-gahanaṁ vīta-śokaḥ sukhī bhava
अर्थ“‘मैं एक, विशुद्ध बोध हूँ’, इस निश्चय की आग से अज्ञान के घने जंगल को जला दे। शोक-रहित हो कर सुखी हो जा।”
पाठक के लिए“विशुद्ध बोध”, pure awareness। अभी इस वाक्य को पढ़ते हुए जो awareness काम कर रही है, वो ही है। उसमें कोई content नहीं, बस पढ़ने की क्षमता। वही “मैं” है, बाक़ी सब content है।
आनन्दपरमानन्दः स बोधस्त्वं सुखं भव॥
ānanda-paramānandaḥ sa bodhas tvaṁ sukhaṁ bhava
अर्थ“जिसमें यह सारा संसार रस्सी पर साँप की तरह कल्पित होता है, वही आनन्द-परमानन्द बोध तू है। सुखी हो जा।”
पाठक के लिएयह श्लोक नहीं कहता “संसार नहीं है”। यह कहता है, संसार वैसा नहीं है जैसा दिखता है। साँप दिखा था, रस्सी थी। दुःख दिख रहा है, उसके पीछे आनन्द है।
किंवदन्तीह सत्येयं या मतिः सा गतिर्भवेत्॥
kiṁvadantīha satyeyaṁ yā matiḥ sā gatir bhavet
अर्थ“जो अपने को मुक्त मानता है, वह मुक्त है। जो अपने को बद्ध मानता है, वह बद्ध। यह कहावत यहाँ सच है, जैसी मति, वैसी गति।”
पाठक के लिएयह श्लोक potentially misleading है, अगर सतही पढ़ा जाए। “मान लो कि तुम मुक्त हो” वाला positive-thinking नहीं है। यह कहता है, recognize करो कि तुम मुक्त हो। यह मानने की नहीं, देखने की बात है।
असङ्गो निःस्पृहः शान्तो भ्रमात्संसारवानिव॥
asaṅgo niḥspṛhaḥ śānto bhramāt saṁsāravān iva
अर्थ“आत्मा साक्षी है, विभु है, पूर्ण है, एक है, मुक्त है, चित् है, अक्रिय है। असंग, निःस्पृह, शान्त, बस भ्रम से संसारी जैसा दिखता है।”
पाठक के लिएदसों विशेषण remember करने की ज़रूरत नहीं। बस एक काफ़ी है, “साक्षी”। बाक़ी सब इसी से derive होते हैं। जो साक्षी है, वो शान्त भी है, अक्रिय भी, असंग भी।
आभासोऽहं भ्रमं मुक्त्वा भावं बाह्यमथान्तरम्॥
ābhāso’haṁ bhramaṁ muktvā bhāvaṁ bāhyam athāntaram
अर्थ“कूटस्थ, अद्वैत बोध रूपी आत्मा का अनुसन्धान कर। ‘मैं आभास हूँ’ इस भ्रम को छोड़ कर बाहर और भीतर का भाव त्याग।”
पाठक के लिएएक test: सुबह की “मैं” और शाम की “मैं” same है? Mood बदल गया, thoughts बदल गए, energy बदल गयी। फिर “मैं” क्या बच रहा है? जो बच रहा है, वो कूटस्थ है। बाक़ी सब आभास।
बोधोऽहं ज्ञानखङ्गेन तन्निकृत्य सुखी भव॥
bodho’haṁ jñāna-khaṅgena tan nikṛtya sukhī bhava
अर्थ“बेटा, देह के अभिमान के पाश से तू बहुत समय से बँधा है। ‘मैं बोध हूँ’, इस ज्ञान की तलवार से उसे काट कर सुखी हो जा।”
पाठक के लिए“देहाभिमान”। यह सिर्फ़ vanity नहीं। यह वो default assumption है कि “मैं यह शरीर हूँ”। जब शरीर थक जाता है, हम थके हुए होते हैं। शरीर बीमार होता है, हम परेशान। यह पहचान कब बनी, याद नहीं। बस है।
अयमेव हि ते बन्धः समाधिमनुतिष्ठसि॥
ayam eva hi te bandhaḥ samādhim anutiṣṭhasi
अर्थ“तू निःसंग, निष्क्रिय, स्वयं-प्रकाश, निरंजन है। तेरा बन्धन बस इतना है, कि तू समाधि का अनुष्ठान कर रहा है।”
पाठक के लिएयह श्लोक meditators के लिए challenge है। ध्यान बुरा नहीं, पर ध्यान को “मार्ग” मानना भ्रम है। अष्टावक्र कहते हैं, तू already वो है जो ध्यान से मिलेगा। ध्यान करता है तो अच्छा, पर “ज़रूरी” नहीं।
शुद्धबुद्धस्वरूपस्त्वं मा गमः क्षुद्रचित्तताम्॥
śuddha-buddha-svarūpas tvaṁ mā gamaḥ kṣudra-cittatām
अर्थ“यह सारा संसार तेरे से व्याप्त है, तेरे में पिरोया है, यथार्थतः। तू शुद्ध-बुद्ध स्वरूप है, क्षुद्र चित्त को मत प्राप्त हो।”
पाठक के लिए“क्षुद्रता” अहंकार से नहीं आती, अहंकार के सम्बन्ध से आती है। जब “मेरा” बहुत बड़ा हो जाता है, “मैं” बहुत छोटा हो जाता है। अष्टावक्र कह रहे हैं, “मेरा” छोड़, “मैं” आप-से-आप बड़ा है।
अगाधबुद्धिरक्षुब्धो भव चिन्मात्रवासनः॥
agādha-buddhir akṣubdho bhava cin-mātra-vāsanaḥ
अर्थ“निरपेक्ष, निर्विकार, निर्भर, शीतल-आशय, अगाध-बुद्धि, अक्षुब्ध, बस चित्-मात्र में वास कर।”
पाठक के लिएयह सात विशेषण कहीं नहीं जाते। कहीं “बनना” नहीं है। यह तेरा already-स्वरूप है। बस वास कर, बस रह, उसी में।
एतत्तत्त्वोपदेशेन न पुनर्भवसम्भवः॥
etat tattvopadeśena na punar bhava-sambhavaḥ
अर्थ“साकार को असत् जान, निराकार को निश्चल। इस तत्त्व के उपदेश से फिर जन्म नहीं होगा।”
पाठक के लिए“पुनर्भव-सम्भव”, पुनः जन्म की सम्भावना। अष्टावक्र अगले जन्म की बात कम, इसी जन्म के पुनर्जन्मों की बात ज़्यादा कर रहे हैं। हम रोज़ नये “मैं” पैदा करते हैं, हर ego-state एक new birth है। यह उपदेश उस chain को तोड़ता है।
तथैवाऽस्मिन् शरीरेऽन्तः परितः परमेश्वरः॥
tathaivāsmin śarīre’ntaḥ paritaḥ parameśvaraḥ
अर्थ“जैसे आईने में दिखने वाले रूप के अन्दर और बाहर, दोनों जगह वही आईना है, वैसे ही इस शरीर के अन्दर और बाहर, सब जगह वही परमेश्वर है।”
पाठक के लिएहम सोचते हैं चेतना दिमाग़ में है, “अन्दर”। पर “अन्दर” का concept “बाहर” के against बनता है। चेतना के लिए “अन्दर-बाहर” है ही नहीं। वो पूरी जगह है, और शरीर उसमें appear करता है, उसमें contain नहीं।
नित्यं निरन्तरं ब्रह्म सर्वभूतगणे तथा॥
nityaṁ nirantaraṁ brahma sarva-bhūta-gaṇe tathā
अर्थ“जैसे एक ही सर्वव्यापी आकाश घड़े के बाहर और अन्दर है, वैसे ही नित्य, निरन्तर ब्रह्म, सब प्राणियों में है।”
पाठक के लिएप्रकरण 1 यहाँ समाप्त होता है। अष्टावक्र ने अपना पूरा उपदेश दे दिया, 20 श्लोकों में। तीन प्रश्नों के तीन उत्तर: ज्ञान? साक्षी की पहचान। मुक्ति? पहले से ही है। वैराग्य? विषयों को ज़हर समझ। अब आगे जनक की प्रतिक्रिया, प्रकरण 2 में।