प्रेम के रूप
Forms of Love · सूत्र 51-66
अब तक नारद ने बताया था कि प्रेम मिलता कैसे है। इस अध्याय में वे रुक कर एक और कठिन प्रश्न उठाते हैं, प्रेम है क्या। और फिर, मानो हाथ पकड़ कर, उसके एक-एक रूप को सामने रख देते हैं।

नारद पहले ही चेता देते हैं कि जिस वस्तु की वे बात करने जा रहे हैं, उसे शब्दों में बाँधा नहीं जा सकता। प्रेम का स्वरूप अनिर्वचनीय है, कहने को कुछ बचता ही नहीं। यह ठीक वैसा है जैसे कोई गूँगा मिठाई चखता है। स्वाद उसके भीतर भर जाता है, पूरा का पूरा, पर उसे बता पाने की कोई राह नहीं रहती। और यही प्रेम जब प्रकट होता है, तो जहाँ-तहाँ नहीं, किसी एक योग्य पात्र में ही अपनी ज्योति खोलता है।
फिर नारद उस अकथनीय वस्तु के लक्षण गिनाते हैं, मानो अँधेरे में किसी रत्न को छू कर उसकी बनावट बता रहे हों। यह प्रेम तीनों गुणों से परे है, किसी कामना की छाया उस पर नहीं। यह क्षण-क्षण बढ़ता जाता है, कभी टूटता नहीं, सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर है, और इसे केवल अनुभव में ही जाना जा सकता है। और जिसे यह एक बार मिल जाए, उसकी दशा देखिए, वह उसी एक को देखता है, उसी को सुनता है, उसी की बात करता है, उसी का चिन्तन करता है। चित्त के सारे द्वार एक ही ओर खुल जाते हैं।
अब नारद उस पूर्ण प्रेम से उतर कर उसके नीचे की सीढ़ियों पर आते हैं। एक गौणी भक्ति भी है, कारण से जन्मी भक्ति, और वह तीन प्रकार की होती है, कभी साधक के गुण–स्वभाव के भेद से, और कभी उस भेद से जो गीता में आर्त, अर्थार्थी और जिज्ञासु के नाम से कहा गया है। पर इन रूपों में एक क्रम छिपा है। बाद वाली सीढ़ी पहले वाली से श्रेष्ठ है, हर अगला पायदान पिछले से ऊँचा उठाता है। और इन सब मार्गों को आपस में तौलें तो एक बात उभर आती है, भक्ति का मार्ग सबसे सुलभ है।

यहाँ कोई पूछ सकता है कि इस भक्ति का प्रमाण क्या है। नारद का उत्तर साफ़ है, इसे किसी और प्रमाण की दरकार नहीं, यह स्वयं अपना प्रमाण है। भक्ति को सिद्ध करने बाहर जाना नहीं पड़ता, वह आप ही अपनी गवाही है। और इसका सबूत भी भीतर ही मिलता है, क्योंकि यह शान्ति-रूप है और परम-आनन्द-रूप है। जिसके हृदय में यह उतरी, वह स्वयं जान लेता है।
अब प्रश्न आता है संसार का, गृहस्थी का, कर्तव्यों का। नारद कहते हैं, सांसारिक कामों में जो हानि दिखे, उसकी चिन्ता न करें, क्योंकि भक्त ने तो अपनी आत्मा, अपना लोक और अपना वेद, सब कुछ ईश्वर को सौंप दिया है। पर इसे आलस्य की छूट न समझ लें। जब तक भक्ति पूरी तरह सिद्ध नहीं हुई, तब तक लोक-व्यवहार छोड़ने योग्य नहीं। बस इतना हो कि कर्म तो होता रहे, और उसके फल का त्याग, तथा उस त्याग का साधन साथ-साथ चलता रहे।
फिर नारद कुछ बहुत व्यावहारिक संकेत देते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि मन जिस सामग्री से भरता है, वैसा ही ढल जाता है। स्त्री, धन और नास्तिकों की कथाएँ कान में न उतारें, उनसे चित्त मलिन होता है। अभिमान, दम्भ और इस जाति के दोषों को छोड़ देने योग्य जानें। पर नारद यहीं नहीं रुकते, वे एक साहसी बात कहते हैं। अपने सारे आचरण को उसी को अर्पित कर दें, और यदि काम, क्रोध, अभिमान जैसे आवेग उठें भी, तो उन्हें भी रोक न पाएँ तो उसी एक की ओर मोड़ दें। भावना को दबाने के बजाय उसका मुख ईश्वर की ओर कर दें।
और अन्त में, इस अध्याय की चरम पंक्ति। नारद कहते हैं, स्वामी-सेवक, गुरु–शिष्य और मित्र, इन तीन रूपों के भेद को भी पार कर के, बस एक ही प्रेम साधने योग्य है, नित्य-दास का प्रेम या नित्य-प्रिया का भजन-रूप प्रेम। और इसे वे दोहरा कर मानो मुहर लगा देते हैं, प्रेम ही करने योग्य है, केवल प्रेम।