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नारद भक्ति सूत्र · अध्याय 4: प्रेम के रूप

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नारद भक्ति सूत्र · अध्याय 4

प्रेम के रूप

Forms of Love · सूत्र 51-66

अब तक नारद ने बताया था कि प्रेम मिलता कैसे है। इस अध्याय में वे रुक कर एक और कठिन प्रश्न उठाते हैं, प्रेम है क्या। और फिर, मानो हाथ पकड़ कर, उसके एक-एक रूप को सामने रख देते हैं।

अगर एक पंक्ति याद रखनी हो, तो वह यह है।

मुख्यतस्तु महत्कृपयैव भगवत्कृपालेशाद्वा ॥

मुख्यत: यह महान आत्माओं की कृपा से, या भगवान की थोड़ी-सी कृपा से (मिलती है)।

नारद भक्ति सूत्र 38

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नारद पहले ही चेता देते हैं कि जिस वस्तु की वे बात करने जा रहे हैं, उसे शब्दों में बाँधा नहीं जा सकता। प्रेम का स्वरूप अनिर्वचनीय है, कहने को कुछ बचता ही नहीं। यह ठीक वैसा है जैसे कोई गूँगा मिठाई चखता है। स्वाद उसके भीतर भर जाता है, पूरा का पूरा, पर उसे बता पाने की कोई राह नहीं रहती। और यही प्रेम जब प्रकट होता है, तो जहाँ-तहाँ नहीं, किसी एक योग्य पात्र में ही अपनी ज्योति खोलता है।

सूत्र 51
अनिर्वचनीयं प्रेम-स्वरूपम्॥
सूत्र 52
मूकास्वादनवत्॥
सूत्र 53
प्रकाशते क्वापि पात्रे॥

फिर नारद उस अकथनीय वस्तु के लक्षण गिनाते हैं, मानो अँधेरे में किसी रत्न को छू कर उसकी बनावट बता रहे हों। यह प्रेम तीनों गुणों से परे है, किसी कामना की छाया उस पर नहीं। यह क्षण-क्षण बढ़ता जाता है, कभी टूटता नहीं, सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर है, और इसे केवल अनुभव में ही जाना जा सकता है। और जिसे यह एक बार मिल जाए, उसकी दशा देखिए, वह उसी एक को देखता है, उसी को सुनता है, उसी की बात करता है, उसी का चिन्तन करता है। चित्त के सारे द्वार एक ही ओर खुल जाते हैं।

सूत्र 54
गुण-रहितं काम-रहितं प्रति-क्षण-वर्धमानमविच्छिन्नं सूक्ष्मतरमनुभव-रूपम्॥
सूत्र 55
तत्प्राप्य तदेवावलोकति, तदेव शृणोति, तदेव भाषयति, तदेव चिन्तयति॥

अब नारद उस पूर्ण प्रेम से उतर कर उसके नीचे की सीढ़ियों पर आते हैं। एक गौणी भक्ति भी है, कारण से जन्मी भक्ति, और वह तीन प्रकार की होती है, कभी साधक के गुणस्वभाव के भेद से, और कभी उस भेद से जो गीता में आर्त, अर्थार्थी और जिज्ञासु के नाम से कहा गया है। पर इन रूपों में एक क्रम छिपा है। बाद वाली सीढ़ी पहले वाली से श्रेष्ठ है, हर अगला पायदान पिछले से ऊँचा उठाता है। और इन सब मार्गों को आपस में तौलें तो एक बात उभर आती है, भक्ति का मार्ग सबसे सुलभ है।

सूत्र 56
गौणी त्रिधा गुण-भेदाद् आर्तादि-भेदाद्वा॥
सूत्र 57
उत्तरस्मादुत्तरस्मात्पूर्व-पूर्व-श्रेयाय भवति॥
सूत्र 58
अन्यस्मात् सौलभ्यं भक्तौ॥
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यहाँ कोई पूछ सकता है कि इस भक्ति का प्रमाण क्या है। नारद का उत्तर साफ़ है, इसे किसी और प्रमाण की दरकार नहीं, यह स्वयं अपना प्रमाण है। भक्ति को सिद्ध करने बाहर जाना नहीं पड़ता, वह आप ही अपनी गवाही है। और इसका सबूत भी भीतर ही मिलता है, क्योंकि यह शान्ति-रूप है और परम-आनन्द-रूप है। जिसके हृदय में यह उतरी, वह स्वयं जान लेता है।

सूत्र 59
प्रमाणान्तरस्यानपेक्षत्वात्स्वयं प्रमाणत्वात्॥
सूत्र 60
शान्ति-रूपात्परमानन्द-रूपाच्च॥

अब प्रश्न आता है संसार का, गृहस्थी का, कर्तव्यों का। नारद कहते हैं, सांसारिक कामों में जो हानि दिखे, उसकी चिन्ता न करें, क्योंकि भक्त ने तो अपनी आत्मा, अपना लोक और अपना वेद, सब कुछ ईश्वर को सौंप दिया है। पर इसे आलस्य की छूट न समझ लें। जब तक भक्ति पूरी तरह सिद्ध नहीं हुई, तब तक लोक-व्यवहार छोड़ने योग्य नहीं। बस इतना हो कि कर्म तो होता रहे, और उसके फल का त्याग, तथा उस त्याग का साधन साथ-साथ चलता रहे।

सूत्र 61
लोक-हानौ चिन्ता न कार्या निवेदितात्म-लोक-वेदत्वात्॥
सूत्र 62
न तदसिद्धौ लोक-व्यवहारो हेयः किन्तु फल-त्यागस्तत्साधनं च॥

फिर नारद कुछ बहुत व्यावहारिक संकेत देते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि मन जिस सामग्री से भरता है, वैसा ही ढल जाता है। स्त्री, धन और नास्तिकों की कथाएँ कान में न उतारें, उनसे चित्त मलिन होता है। अभिमान, दम्भ और इस जाति के दोषों को छोड़ देने योग्य जानें। पर नारद यहीं नहीं रुकते, वे एक साहसी बात कहते हैं। अपने सारे आचरण को उसी को अर्पित कर दें, और यदि काम, क्रोध, अभिमान जैसे आवेग उठें भी, तो उन्हें भी रोक न पाएँ तो उसी एक की ओर मोड़ दें। भावना को दबाने के बजाय उसका मुख ईश्वर की ओर कर दें।

सूत्र 63
स्त्री-धन-नास्तिक-चरित्रं न श्रवणीयम्॥
सूत्र 64
अभिमान-दम्भादिकं त्याज्यम्॥
सूत्र 65
तदर्पिताखिलाचारः सन् काम-क्रोधाभिमानादिकं तस्मिन्नेव करणीयम्॥

और अन्त में, इस अध्याय की चरम पंक्ति। नारद कहते हैं, स्वामी-सेवक, गुरुशिष्य और मित्र, इन तीन रूपों के भेद को भी पार कर के, बस एक ही प्रेम साधने योग्य है, नित्य-दास का प्रेम या नित्य-प्रिया का भजन-रूप प्रेम। और इसे वे दोहरा कर मानो मुहर लगा देते हैं, प्रेम ही करने योग्य है, केवल प्रेम।

सूत्र 66
त्रि-रूप-भङ्ग-पूर्वकं नित्य-दास-नित्य-कान्ता-भजनात्मकं प्रेम कार्यं प्रेमैव कार्यम्॥
॥ प्रेम के रूप ॥

विस्तार: यह अध्याय और गहरा

प्रेम के रूप: अध्याय 4 में नारद उन्नीस सूत्रों में भक्ति की विविधता खोल कर रखते हैं। रूप अनेक हैं। हर भक्त अपने स्वभाव के अनुसार किसी एक रूप की ओर सहज ही खिंच जाता है।

“महत्कृपयैव भगवत्कृपालेशाद्वा”: नारद कहते हैं, मुख्यत: यह महान आत्माओं की कृपा से मिलती है, या भगवान की थोड़ी-सी कृपा से, अपने प्रयास से नहीं। यह एक साहसी दावा है। बहुत-से पाठक इसे ग़लत समझ बैठते हैं, सोचते हैं कि बिना श्रम के मिल जाएगी। असल में श्रम तो लगता है, पर निर्णायक तत्त्व कृपा है, प्रयास नहीं।

“महत्संगस्तु दुर्लभोऽगम्योऽमोघश्च”: महान आत्माओं की संगति दुर्लभ है, अगम्य है, पर अमोघ है। अर्थात्, मिल जाए तो उसका प्रभाव निश्चित है। यह संगति की शक्ति को बाँधने वाला सूत्र है।

आज, दिल्ली में: पच्चीस साल बाद किसी गुरु से अचानक भेंट, जिसके एक वाक्य ने भीतर सब-कुछ हिला दिया। नारद कहते हैं, महत्-कृपा का यही ढंग है, बिना योजना, बिना यत्न के। यह दिल्ली में अक्सर होता है, किसी समारोह में, किसी गाड़ी में, किसी अनचाहे ठिकाने पर।

नारद का संकेत: वे कहते हैं, कोशिश तो कीजिए, पर परिणाम से बँध मत जाइए। प्रेम का रूप आपके लिए ही गढ़ा होगा, पूरा का पूरा ठीक होगा, पर वह गढ़न आपके चुनाव से नहीं आएगी।

एक कसौटी: यदि आपकी भक्ति-साधना में यह भाव उठ रहा है कि हम अच्छे भक्त बनते जा रहे हैं, तो वह अहंकार से चली है, भक्ति से नहीं। नारद इसी से सावधान करते हैं।