नारद भक्ति सूत्र · अध्याय 3
साधन
The Means · सूत्र 34-50
भक्ति कैसे आती है? नारद इस अध्याय में practice बताते हैं। मुख्यतः: विषय-त्याग, संग-त्याग, और सत्संग।
सूत्र 34
तस्याः साधनानि गायन्त्याचार्याः॥
tasyāḥ sādhanāni gāyantyācāryāḥ
अर्थ“उसके (भक्ति के) साधन आचार्य गाते हैं।”
सूत्र 35
तत्तु विषय-त्यागात्सङ्ग-त्यागाच्च॥
tat tu viṣaya-tyāgāt saṅga-tyāgāc ca
अर्थ“वह (भक्ति) विषय-त्याग से, और संग-त्याग से।”
सन्दर्भदो primary practices। sense-objects छोड़, और बुरी company छोड़।
सूत्र 36
अव्यावृत्त-भजनात्॥
avyāvṛtta-bhajanāt
अर्थ“अव्यावृत्त (निरन्तर) भजन से।”
सूत्र 37
लोकेऽपि भगवद्-गुण-श्रवण-कीर्तनात्॥
loke’pi bhagavad-guṇa-śravaṇa-kīrtanāt
अर्थ“लोक में भी, भगवान् के गुणों के श्रवण और कीर्तन से।”
सूत्र 38
मुख्यतस्तु महत्कृपयैव भगवत्कृपा-लेशाद्वा॥
mukhyatas tu mahat-kṛpayaiva bhagavat-kṛpā-leśād vā
अर्थ“मुख्यतः महात्माओं की कृपा से, या भगवान् की कृपा के लेश से।”
सन्दर्भfinal cause: साधना नहीं, कृपा। और कृपा “महात्माओं” से। यह सत्संग पर ज़ोर।
सूत्र 39
महत्सङ्गस्तु दुर्लभोऽगम्योऽमोघश्च॥
mahat-saṅgas tu durlabho’gamyo’moghaś ca
अर्थ“महात्माओं का संग दुर्लभ, अगम्य, और अमोघ है।”
सूत्र 40
लभ्यतेऽपि तत्कृपयैव॥
labhyate’pi tat-kṛpayaiva
अर्थ“प्राप्त भी उसी (भगवान्) की कृपा से होता है।”
सूत्र 41
तस्मिंस्तज्जने भेदाभावात्॥
tasmiṁs taj-jane bhedābhāvāt
अर्थ“उस (भगवान्) में और उसके भक्तों में भेद नहीं।”
सन्दर्भ“भगवान् और भक्त में कोई फ़र्क़ नहीं”। यह powerful statement है।
सूत्र 42
तदेव साध्यतां तदेव साध्यताम्॥
tad eva sādhyatāṁ tad eva sādhyatām
अर्थ“वही (सत्संग) साधा जाए, वही साधा जाए।”
सन्दर्भrepeat। यह emphasis है। सत्संग सबसे ज़रूरी।
सूत्र 43
दुःसङ्गः सर्वथैव त्याज्यः॥
duḥsaṅgaḥ sarvathaiva tyājyaḥ
अर्थ“दुःसंग सर्वथा त्याज्य।”
सूत्र 44
काम-क्रोध-मोह-स्मृति-भ्रंश-बुद्धिनाश-सर्वनाश-कारणत्वात्॥
kāma-krodha-moha-smṛti-bhraṁśa-buddhi-nāśa-sarva-nāśa-kāraṇatvāt
अर्थ“क्योंकि वो काम, क्रोध, मोह, स्मृति-भ्रंश, बुद्धि-नाश, सर्व-नाश का कारण है।”
सूत्र 45
तरङ्गायिता अपीमे सङ्गात्समुद्रायन्ते॥
taraṅgāyitā apīme saṅgāt samudrāyante
अर्थ“लहरों जैसे शुरुआती (दोष), संग से समुद्र हो जाते हैं।”
सन्दर्भछोटे दोष भी, बुरी company में, बड़े हो जाते हैं।
सूत्र 46
कस्तरति कस्तरति मायाम् यः सङ्गांस्त्यजति, यो महानुभावं सेवते, निर्ममो भवति॥
kas tarati kas tarati māyām yaḥ saṅgāṁs tyajati, yo mahānubhāvaṁ sevate, nirmamo bhavati
अर्थ“कौन माया को तरता है? वो जो संग छोड़ता है, महान् की सेवा करता है, निर्मम होता है।”
सूत्र 47
यो विविक्त-स्थानं सेवते, यो लोक-बन्ध-मुन्मूलयति, निस्त्रैगुण्यो भवति, योग-क्षेमं त्यजति॥
yo vivikta-sthānaṁ sevate, yo loka-bandham unmūlayati, nistraiguṇyo bhavati, yoga-kṣemaṁ tyajati
अर्थ“जो एकान्त-स्थान की सेवा करता, लोक-बन्धन उखाड़ता, निस्त्रैगुण्य होता, योग-क्षेम छोड़ता।”
सूत्र 48
यः कर्म-फलं त्यजति, कर्माणि सन्न्यस्यति, ततो निर्द्वन्द्वो भवति॥
yaḥ karma-phalaṁ tyajati, karmāṇi sannyasyati, tato nirdvandvo bhavati
अर्थ“जो कर्म-फल छोड़ता, कर्मों का सन्न्यास करता, फिर निर्द्वन्द्व होता।”
सूत्र 49
यो वेदानपि सन्न्यस्यति, केवलमविच्छिन्नानुरागं लभते॥
yo vedān api sannyasyati, kevalam avicchinnānurāgaṁ labhate
अर्थ“जो वेदों का भी सन्न्यास करता, केवल अविच्छिन्न (निरन्तर) अनुराग पाता।”
सन्दर्भradical। वेद भी छोड़ने हैं। क्योंकि वेद भी साधन। साध्य आ गया, साधन drop।
सूत्र 50
स तरति स तरति लोकांस्तारयति॥
sa tarati sa tarati lokāṁs tārayati
अर्थ“वह तरता है, वह तरता है, लोकों को भी तारता है।”
॥ साधन ॥