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नारद भक्ति सूत्र · अध्याय 3: साधन

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नारद भक्ति सूत्र · अध्याय 3

साधन

The Means · सूत्र 34-50

पहले दो अध्याय यह कहते रहे कि भक्ति क्या है और क्यों है। यहाँ नारद पहली बार हाथ पकड़ कर रास्ता दिखाते हैं। भक्ति आती कैसे है? विषय छूटें, संग छूटे, और सत्संग मिले। बस इन्हीं तीन धागों से वे पूरा अध्याय बुन देते हैं।

अगर एक पंक्ति याद रखनी हो, तो वह यह है।

तस्या ज्ञानमेव साधनम् इत्येके ॥

कुछ कहते हैं उसका साधन ज्ञान ही है।

नारद भक्ति सूत्र 28

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नारद शुरुआत बड़ी विनम्रता से करते हैं। वे यह नहीं कहते कि साधन हमने खोजा। वे कहते हैं, साधनों को तो आचार्य गा गए हैं, हम उसी गान को आगे रख रहे हैं। और फिर वे पहले दो साधन रखते हैं, जो आज तक हर साधक की कसौटी हैं। एक, विषयों का त्याग, यानी इन्द्रियों के भोगों से मन का खिंचना। दूसरा, संग का त्याग, यानी जो साथ मन को नीचे खींचे उसे छोड़ देना। इसके बाद तीसरा सूत्र और भी सीधा है, भजन में कोई दरार न आने दें, धारा को बहने दें बिना रुके। और चौथा यह कि भले संसार के बीच ही क्यों न रहें, भगवान् के गुणों का श्रवण और कीर्तन हाथ से न छूटे।

सूत्र 34 · 35 · 36 · 37

तस्याः साधनानि गायन्त्याचार्याः॥

तत्तु विषय-त्यागात्सङ्ग-त्यागाच्च॥

अव्यावृत्त-भजनात्॥

लोकेऽपि भगवद्-गुण-श्रवण-कीर्तनात्॥

अब नारद एक ऐसा मोड़ लेते हैं जो सारी साधना को सिर के बल खड़ा कर देता है। वे कहते हैं, असली कारण साधना नहीं, कृपा है। मुख्यतः तो भक्ति महात्माओं की कृपा से आती है, या भगवान् की कृपा के एक लेश-मात्र से। फिर वे महात्माओं के संग की महिमा खोलते हैं, वह संग दुर्लभ है, उस तक अपने बल से पहुँचा नहीं जा सकता, और जब मिल जाए तो कभी निष्फल नहीं जाता। और वह भी मिलता उसी प्रभु की कृपा से ही है। इसके बाद एक पंक्ति आती है जो पूरे अध्याय में सबसे चमकती है, उस भगवान् में और उसके भक्त में कोई भेद ही नहीं। इसीलिए नारद दोहरा कर ज़ोर देते हैं, वही सत्संग साधा जाए, वही साधा जाए।

सूत्र 38 · 39 · 40 · 41 · 42

मुख्यतस्तु महत्कृपयैव भगवत्कृपा-लेशाद्वा॥

महत्सङ्गस्तु दुर्लभोऽगम्योऽमोघश्च॥

लभ्यतेऽपि तत्कृपयैव॥

तस्मिंस्तज्जने भेदाभावात्॥

तदेव साध्यतां तदेव साध्यताम्॥

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जैसे सत्संग को नारद सिर-आँखों पर रखते हैं, वैसे ही दुःसंग को वे पूरी तरह त्याग देने को कहते हैं। और कारण भी गिनाते हैं, एक लंबी कड़ी में। बुरी संगति काम जगाती है, फिर क्रोध, फिर मोह, फिर स्मृति का भ्रंश, फिर बुद्धि का नाश, और अंत में सब कुछ का नाश। यह पतन का पूरा क्रम है। फिर वे एक सुंदर चित्र खींचते हैं, जो दोष शुरू में लहरों जैसे छोटे और काबू में लगते हैं, वही दुःसंग पा कर समुद्र बन जाते हैं। मन की छोटी हलचल भी गलत साथ में महासागर हो उठती है।

सूत्र 43 · 44 · 45

दुःसङ्गः सर्वथैव त्याज्यः॥

काम-क्रोध-मोह-स्मृति-भ्रंश-बुद्धिनाश-सर्वनाश-कारणत्वात्॥

तरङ्गायिता अपीमे सङ्गात्समुद्रायन्ते॥

अब नारद एक प्रश्न दो बार पूछते हैं, मानो साधक को झकझोर दें, इस माया को कौन तरता है, कौन तरता है? और स्वयं उत्तर देते हैं। वही तरता है जो संगों को छोड़ देता है, जो किसी महानुभाव की सेवा करता है, और जो ममता से रहित हो जाता है। फिर वे उस तरने वाले का पूरा चित्र खींचते हैं। वह एकांत स्थान को सेवता है, लोक के बंधन को जड़ से उखाड़ देता है, तीनों गुणों से परे हो जाता है, और योग-क्षेम की चिंता तक छोड़ देता है। कर्म के फल का मोह छूट जाता है, कर्मों का संन्यास हो जाता है, और तब वह द्वंद्वों से ऊपर उठ जाता है। यहाँ तक कि वेदों का भी संन्यास कर के, वह केवल एक अखंड अनुराग को पा लेता है, क्योंकि वेद भी अंततः साधन ही थे, और साध्य आ जाने पर साधन को थामे रखना क्यों। और अंत में वही पंक्ति, फिर दो बार, वह तरता है, वह तरता है, और साथ में सारे लोकों को भी तार ले जाता है।

सूत्र 46 · 47 · 48 · 49 · 50

कस्तरति कस्तरति मायाम् यः सङ्गांस्त्यजति, यो महानुभावं सेवते, निर्ममो भवति॥

यो विविक्त-स्थानं सेवते, यो लोक-बन्ध-मुन्मूलयति, निस्त्रैगुण्यो भवति, योग-क्षेमं त्यजति॥

यः कर्म-फलं त्यजति, कर्माणि सन्न्यस्यति, ततो निर्द्वन्द्वो भवति॥

यो वेदानपि सन्न्यस्यति, केवलमविच्छिन्नानुरागं लभते॥

स तरति स तरति लोकांस्तारयति॥

॥ साधन ॥

विस्तार: यह अध्याय और गहरा

भक्ति की साधना: अध्याय 3 में नारद 17 सूत्रों में बताते हैं, भक्ति कैसे practice करें। यह purely-practical section है। पहले 2 अध्याय “क्या” और “क्यों” थे, यह “कैसे” है।

“तस्या ज्ञानमेव साधनम् इत्येके”: कुछ कहते हैं ज्ञान ही भक्ति का साधन है। नारद इसको mention करते हैं, मगर एक specific objection भी देते हैं, सिर्फ़ ज्ञान से भक्ति नहीं आती, ज्ञान भी मगर “अव्यभिचारी” चाहिए (unwavering)। ज्ञान-driven भक्ति in mood-driven नहीं हो सकती।

दूसरा approach: “अन्ये त्वन्योन्याश्रयत्वम् इत्याहुः”: कुछ कहते हैं ज्ञान और भक्ति एक-दूसरे पर dependent हैं। पहले ज्ञान, फिर भक्ति, फिर deeper ज्ञान, फिर deeper भक्ति। यह spiral-model है।

तीसरा approach: “स्वयं फलरूपताया इति”: भक्ति अपने आप-में full है। कोई pre-requisite नहीं। यह नारद का अपना preferred view लगता है।

आज, दिल्ली में: IIT-MBA-वाले devotee जो rational-first हैं। उन्हें यह अध्याय speak करता है, क्योंकि नारद कह रहे हैं, आपके ज्ञानी-mode को भी भक्ति में संवैध करने का तरीक़ा है।

एक specific साधना नारद suggest करते हैं: “लोके अपि भगवद्-गुणश्रवण-कीर्तनात्”। यानी, संसार में भी रह कर, भगवद्-गुणों का श्रवण और कीर्तन। यह simple practice है, मगर sustained करना challenging।