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भक्तिप्रेम को मार्ग बनाना

नारद भक्ति सूत्र · अध्याय 5: भक्त-संग, उपसंहार

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नारद भक्ति सूत्र · अध्याय 5

भक्त-संग, उपसंहार

सूत्र 67-84

नारद अब अपनी पूरी यात्रा समेटते हैं। अन्तिम अठारह सूत्रों में वे बताते हैं कि अनन्य भक्त किस मिट्टी के बने होते हैं, उनकी संगति किस तरह तीर्थ को भी पवित्र कर देती है, और किस श्रद्धा पर यह सारा अनुशासन आ कर ठहरता है।

तदेव साध्यतां तदेव साध्यताम् ॥

उसी को सिद्ध करो, उसी को सिद्ध करो।

नारद भक्ति सूत्र 80

नदी किनारे पेड़ के नीचे छोटी-सी आग के चारों ओर गोल घेरे में बैठे स्त्री-पुरुष, एक साधु की बात सुनते हुए: भक्तों का संग

सबसे पहले नारद यह तय कर देते हैं कि सबसे ऊँचा भक्त कौन है। वही जिसने अपना प्रेम बाँटा नहीं, एक ही ओर अनन्य कर दिया। और ऐसे भक्तों की एक झलक वे ऐसे देते हैं कि देखने वाला ठहर जाए। गला रुँध जाता है, रोम खड़े हो जाते हैं, आँखें बह निकलती हैं, और वे आपस में बस उसी की बात करते रहते हैं। उनके पास से जो गुज़र जाए, वह कुल पवित्र हो जाता है, वह धरती पवित्र हो जाती है।

सूत्र 67-68 · अनन्य भक्त

सूत्र 67
भक्ता एकान्तिनो मुख्याः॥
सूत्र 68
कण्ठावरोध-रोमाञ्चाश्रुभिः परस्परं लपमानाः पावयन्ति कुलानि पृथिवीं च॥

यह पवित्रता कोई कल्पना नहीं, बहुत व्यावहारिक है। ऐसे भक्त तीर्थों को सचमुच तीर्थ बना देते हैं, साधारण कर्मों को सुकर्म, और शास्त्रों को सत्-शास्त्र। क्यों? क्योंकि वे स्वयं उसी से बने हैं, तन्मय हो चुके हैं। और जहाँ ऐसा एक भी भक्त हो, वहाँ पितर प्रसन्न होते हैं, देवता नाच उठते हैं, और यह धरती नाथवाली, सनाथ हो जाती है।

सूत्र 69-71 · तीर्थ को तीर्थ बनाने वाले

सूत्र 69
तीर्थी-कुर्वन्ति तीर्थानि, सुकर्मी-कुर्वन्ति कर्माणि, सच्छास्त्री-कुर्वन्ति शास्त्राणि॥
सूत्र 70
तन्मयाः॥
सूत्र 71
मोदन्ते पितरो, नृत्यन्ति देवताः, सनाथा चेयं भूर्भवति॥

अब नारद एक चोट करते हैं जो आज भी उतनी ही पैनी है। इन भक्तों में जाति का, विद्या का, रूप का, कुल का, धन का, या किसी क्रिया का कोई भेद नहीं रह जाता। और इसका कारण बिल्कुल सीधा है: वे अब किसी जाति या कुल के नहीं, वे उसके हैं। जो उसका हो गया, उसकी पहचान बदल गई।

सूत्र 72-73 · कोई भेद नहीं

सूत्र 72
नास्ति तेषु जाति-विद्या-रूप-कुल-धन-क्रियादि-भेदः॥
सूत्र 73
यतस्तदीयाः॥

एक चेतावनी भी आती है। तर्क-विवाद का सहारा न लें। क्यों? क्योंकि तर्क के लिए बहुत खुला मैदान है, इधर भी खींचा जा सकता है उधर भी, और उसका कोई निश्चित ठिकाना नहीं। वाद में उलझ कर भक्ति का धागा हाथ से छूट जाता है।

सूत्र 74-75 · वाद से दूर

सूत्र 74
वादो नावलम्ब्यः॥
सूत्र 75
बाहुल्यावकाशादनियतत्वाच्च॥
पेड़ के नीचे बैठे नारद, पास में रखी वीणा, सामने बैठे शिष्यों को उपदेश देते हुए

तर्क की जगह नारद साधक के हाथ में काम थमा देते हैं। भक्ति-शास्त्रों का मनन कीजिए, और जो कर्म उस भाव को जगाते हैं, वे भी करते रहिए। फिर समय को लेकर एक तीखी बात: सुख-दुःख, इच्छा, लाभ, इन सबके मोह को छोड़ कर, उस घड़ी की प्रतीक्षा में, आधा क्षण भी व्यर्थ न जाए।

सूत्र 76-77 · मनन और एक भी क्षण व्यर्थ नहीं

सूत्र 76
भक्ति-शास्त्राणि मननीयानि तदुद्बोधक-कर्माण्यपि करणीयानि॥
सूत्र 77
सुख-दुःखेच्छा-लाभादि-त्यक्ते काले प्रतीक्षमाणे क्षणार्धमपि व्यर्थं न नेयम्॥

साथ ही चरित्र की नींव। अहिंसा, सत्य, शौच, दया, आस्तिकता, इन सब गुणों का पालन करते रहना है, क्योंकि बिना इस आधार के भक्ति टिकती नहीं। और फिर सीधी आज्ञा: सदा, सब भाव से, बिना किसी चिन्ता के, केवल भगवान का ही भजन करने योग्य है।

सूत्र 78-79 · चरित्र और निश्चिन्त भजन

सूत्र 78
अहिंसा-सत्य-शौच-दया-आस्तिक्यादि-चारित्र्याणि परिपालनीयानि॥
सूत्र 79
सर्वदा सर्व-भावेन निश्चिन्तैर्भगवानेव भजनीयः॥

और तब नारद एक वादा देते हैं। उसका कीर्तन शुरू होते ही वह शीघ्र प्रकट हो जाता है, और भक्तों को अपना अनुभव करा देता है। यहीं वह पंक्ति आती है जिसे पूरी सूत्र-माला का हृदय कहा गया है: वाणी, मन और कर्म, इन तीनों के सत्य से की गई भक्ति ही सबसे श्रेष्ठ है। नारद इसे एक बार कह कर रुकते नहीं, दोहराते हैं, भक्ति ही श्रेष्ठ है।

सूत्र 80-81 · वह शीघ्र प्रकट होता है

सूत्र 80
स कीर्त्यमानः शीघ्रमेवाविर्भवत्यनुभावयति च भक्तान्॥
सूत्र 81
त्रि-सत्यस्य भक्तिरेव गरीयसी, भक्तिरेव गरीयसी॥

यह श्रेष्ठ भक्ति एक होते हुए भी ग्यारह रूपों में बहती है। नारद इन्हें एक साँस में गिनाते हैं: उसके गुणों के माहात्म्य में लगन, रूप में लगन, पूजा में, स्मरण में, दास्य में, सख्य में, वात्सल्य में, कान्ता-भाव में, आत्म-निवेदन में, तन्मयता में, और परम-विरह में। एक ही प्रेम, ग्यारह स्वाद।

सूत्र 82 · भक्ति के ग्यारह रूप

सूत्र 82
गुण-माहात्म्यासक्ति-रूपासक्ति-पूजासक्ति-स्मरणासक्ति-दास्यासक्ति-सख्यासक्ति-वात्सल्यासक्ति-कान्ता-सक्ति-आत्म-निवेदनासक्ति-तन्मयतासक्ति-परम-विरहासक्ति-रूपा एकधाप्येकादशधा भवति॥

अन्त में नारद अकेले नहीं खड़े होते। वे एक पूरी परम्परा को साक्षी बना कर खड़ा कर देते हैं। लोगों की बातों से निर्भय, और इस विषय में एक-मत, भक्ति के ये आचार्य ऐसा ही कहते आए हैं: सनकादि कुमार, व्यास, शुक, शाण्डिल्य, गर्ग, विष्णु, कौण्डिन्य, शेष, उद्धव, आरुणि, बलि, हनुमान, विभीषण, और इन जैसे और भी। और फिर वह अन्तिम वचन, जिस पर सूत्र-माला विश्राम पाती है: जो नारद के कहे इस शिव-अनुशासन में विश्वास करता है, श्रद्धा रखता है, वही भक्तिमान होता है, वही अपने परम प्रिय को पा लेता है, वही उस प्रिय को पा लेता है।

सूत्र 83-84 · आचार्यों की साक्षी और समापन

सूत्र 83
इत्येवं वदन्ति जन-जल्प-निर्भयाः एक-मताः कुमार-व्यास-शुक-शाण्डिल्य-गर्ग-विष्णु-कौण्डिन्य-शेषोद्धवारुणि-बलि-हनुमद्-विभीषणादयो भक्त्याचार्याः॥
सूत्र 84
य इदं नारद-प्रोक्तं शिवानुशासनं विश्वसिति श्रद्धते स भक्तिमान् भवति, स प्रेष्ठं लभते, स प्रेष्ठं लभत इति॥
॥ नारद भक्ति सूत्र समाप्त ॥

विस्तार: यह अध्याय और गहरा

“भक्त-संग” का समापन अध्याय: अध्याय 5 में नारद 23 सूत्रों में भक्तों के बीच रहने का महत्त्व बताते हैं, और यह भी कि अंत में भक्ति जीवन में किस तरह पूरी रच-बस जाती है।

“तदेव साध्यतां तदेव साध्यताम्”: उसी को सिद्ध करो, उसी को सिद्ध करो। नारद ने यह वाक्य जान-बूझकर दो बार दोहराया है। यह ज़ोर देकर कही गई बात है। नारद कह रहे हैं, भटक मत जाइए। एक राह पकड़िए, उसी पर टिके रहिए।

यह दोहराव क्यों मायने रखता है: क्योंकि आध्यात्मिक राह में सबसे बड़ा गड्ढा है “हर नई चमकती चीज़ के पीछे दौड़ पड़ने की आदत”। आज भक्ति, कल वेदान्त, परसों योग। नारद कहते हैं, एक को चुन लीजिए और उसी पर टिके रहिए। हाँ, राहें कई हैं, मगर एक जीवन में ध्यान एक ही पर।

“अनन्यता-अनन्यता”: एकनिष्ठ भक्ति। इसे ‘ईर्ष्यालु ईश्वर’ वाली बात समझ लेना आसान है, पर असल में यह अविभाजित ध्यान है। जैसे ध्यान-में-बैठ कर मन एक ही वस्तु पर टिकता है, वैसे ही पूरी ज़िंदगी में भक्ति की एक ही निश्चित दिशा।

आज, दिल्ली में: 85 बरस के दादा-जी जो रोज़ सुबह 4 बजे “राम-नाम” 108 बार। 50 साल से। नारद का दोहराव “तदेव साध्यताम् तदेव साध्यताम्” ठीक उसी लगातार चलती साधना की घोषणा है। उन्होंने 50 साल में ध्यान की कोई और पद्धति आज़मा कर नहीं देखी। एक साधना, और उसी पर पूरा ध्यान।

समापन-सूत्र: नारद-भक्ति-सूत्र इस बात पर ख़त्म होती है: “स्व-वर्ण-निरूपणं ब्रजेत्।” यानी, अपने सहज स्वरूप को प्रकट करो। हर भक्त की भक्ति अनूठी होती है।

क्या करना है पढ़ने के बाद: नारद-भक्ति-सूत्र एक निश्चित राह का वर्णन करती है। अगर आपका सहज झुकाव तर्क और दर्शन की ओर है, तो अष्टावक्र गीता या उपनिषद् पर जाइए। अगर झुकाव भाव और भक्ति की ओर ज़्यादा है, तो हनुमान चालीसा, विष्णु सहस्रनाम, या भागवतम् की कथाओं पर। नारद की 84 सूत्रों की यात्रा पूरी करने के बाद, आप ख़ुद जान जाएँगे कि आपकी राह क्या है।