भक्त-संग, उपसंहार
Company of Devotees, Closing · सूत्र 67-84
नारद अब अपनी पूरी यात्रा समेटते हैं। अन्तिम अठारह सूत्रों में वे बताते हैं कि अनन्य भक्त किस मिट्टी के बने होते हैं, उनकी संगति किस तरह तीर्थ को भी पवित्र कर देती है, और किस श्रद्धा पर यह सारा अनुशासन आ कर ठहरता है।

सबसे पहले नारद यह तय कर देते हैं कि सबसे ऊँचा भक्त कौन है। वही जिसने अपना प्रेम बाँटा नहीं, एक ही ओर अनन्य कर दिया। और ऐसे भक्तों की एक झलक वे ऐसे देते हैं कि देखने वाला ठहर जाए। गला रुँध जाता है, रोम खड़े हो जाते हैं, आँखें बह निकलती हैं, और वे आपस में बस उसी की बात करते रहते हैं। उनके पास से जो गुज़र जाए, वह कुल पवित्र हो जाता है, वह धरती पवित्र हो जाती है।
सूत्र 67-68 · अनन्य भक्त
यह पवित्रता कोई कल्पना नहीं, बहुत व्यावहारिक है। ऐसे भक्त तीर्थों को सचमुच तीर्थ बना देते हैं, साधारण कर्मों को सुकर्म, और शास्त्रों को सत्-शास्त्र। क्यों? क्योंकि वे स्वयं उसी से बने हैं, तन्मय हो चुके हैं। और जहाँ ऐसा एक भी भक्त हो, वहाँ पितर प्रसन्न होते हैं, देवता नाच उठते हैं, और यह धरती नाथवाली, सनाथ हो जाती है।
सूत्र 69-71 · तीर्थ को तीर्थ बनाने वाले
अब नारद एक चोट करते हैं जो आज भी उतनी ही पैनी है। इन भक्तों में जाति का, विद्या का, रूप का, कुल का, धन का, या किसी क्रिया का कोई भेद नहीं रह जाता। और इसका कारण बिल्कुल सीधा है: वे अब किसी जाति या कुल के नहीं, वे उसके हैं। जो उसका हो गया, उसकी पहचान बदल गई।
सूत्र 72-73 · कोई भेद नहीं
एक चेतावनी भी आती है। तर्क-विवाद का सहारा न लें। क्यों? क्योंकि तर्क के लिए बहुत खुला मैदान है, इधर भी खींचा जा सकता है उधर भी, और उसका कोई निश्चित ठिकाना नहीं। वाद में उलझ कर भक्ति का धागा हाथ से छूट जाता है।
सूत्र 74-75 · वाद से दूर

तर्क की जगह नारद साधक के हाथ में काम थमा देते हैं। भक्ति-शास्त्रों का मनन कीजिए, और जो कर्म उस भाव को जगाते हैं, वे भी करते रहिए। फिर समय को लेकर एक तीखी बात: सुख-दुःख, इच्छा, लाभ, इन सबके मोह को छोड़ कर, उस घड़ी की प्रतीक्षा में, आधा क्षण भी व्यर्थ न जाए।
सूत्र 76-77 · मनन और एक भी क्षण व्यर्थ नहीं
साथ ही चरित्र की नींव। अहिंसा, सत्य, शौच, दया, आस्तिकता, इन सब गुणों का पालन करते रहना है, क्योंकि बिना इस आधार के भक्ति टिकती नहीं। और फिर सीधी आज्ञा: सदा, सब भाव से, बिना किसी चिन्ता के, केवल भगवान का ही भजन करने योग्य है।
सूत्र 78-79 · चरित्र और निश्चिन्त भजन
और तब नारद एक वादा देते हैं। उसका कीर्तन शुरू होते ही वह शीघ्र प्रकट हो जाता है, और भक्तों को अपना अनुभव करा देता है। यहीं वह पंक्ति आती है जिसे पूरी सूत्र-माला का हृदय कहा गया है: वाणी, मन और कर्म, इन तीनों के सत्य से की गई भक्ति ही सबसे श्रेष्ठ है। नारद इसे एक बार कह कर रुकते नहीं, दोहराते हैं, भक्ति ही श्रेष्ठ है।
सूत्र 80-81 · वह शीघ्र प्रकट होता है
यह श्रेष्ठ भक्ति एक होते हुए भी ग्यारह रूपों में बहती है। नारद इन्हें एक साँस में गिनाते हैं: उसके गुणों के माहात्म्य में लगन, रूप में लगन, पूजा में, स्मरण में, दास्य में, सख्य में, वात्सल्य में, कान्ता-भाव में, आत्म-निवेदन में, तन्मयता में, और परम-विरह में। एक ही प्रेम, ग्यारह स्वाद।
सूत्र 82 · भक्ति के ग्यारह रूप
अन्त में नारद अकेले नहीं खड़े होते। वे एक पूरी परम्परा को साक्षी बना कर खड़ा कर देते हैं। लोगों की बातों से निर्भय, और इस विषय में एक-मत, भक्ति के ये आचार्य ऐसा ही कहते आए हैं: सनकादि कुमार, व्यास, शुक, शाण्डिल्य, गर्ग, विष्णु, कौण्डिन्य, शेष, उद्धव, आरुणि, बलि, हनुमान, विभीषण, और इन जैसे और भी। और फिर वह अन्तिम वचन, जिस पर सूत्र-माला विश्राम पाती है: जो नारद के कहे इस शिव-अनुशासन में विश्वास करता है, श्रद्धा रखता है, वही भक्तिमान होता है, वही अपने परम प्रिय को पा लेता है, वही उस प्रिय को पा लेता है।