भक्ति की महिमा
The Glory of Devotion · सूत्र 15-33
भक्ति किसमें बसती है, इस पर ऋषियों के अलग-अलग मत हैं। नारद उन सबको सुनते हैं, फिर अपना वचन रखते हैं, और अंत में भक्ति को कर्म, ज्ञान और योग, इन सबसे ऊपर ठहरा देते हैं।
पिछले अध्याय में नारद ने भक्ति का स्वरूप कह दिया था। अब प्रश्न यह उठता है कि वह भक्ति पहचानी किससे जाए, उसके लक्षण क्या हैं। यहाँ नारद किसी एक उत्तर पर नहीं रुकते। वे पहले उन आचार्यों के मत रखते हैं जो उनसे पहले इस विषय पर बोल चुके हैं। उनका कहना है कि भक्ति के लक्षण अनेक हैं, क्योंकि अलग-अलग मनीषियों ने उसे अलग-अलग ढंग से देखा है। व्यास, पराशर के पुत्र, उसे पूजा आदि में बसे अनुराग में पहचानते हैं। गर्ग ऋषि उसे भगवान की कथा सुनने और कहने के प्रेम में देखते हैं। और शाण्डिल्य की दृष्टि गहरी जाती है, उनके लिए भक्ति वह प्रेम है जो आत्मा के अपने आनंद से टकराता नहीं, बल्कि उसी के साथ बहता है।

सूत्र 15 · 16 · 17 · 18
इन सब मतों को सिर झुका कर सुनने के बाद नारद अपना वचन रखते हैं, और उनका लक्षण सबसे ऊँचा उठ जाता है। उनके लिए भक्ति यह है कि अपना सारा आचरण, हर कर्म, हर साँस उसी एक प्रभु को अर्पित हो जाए; और यदि एक क्षण को भी वह विस्मृत हो जाए, तो भीतर ऐसी व्याकुलता उठे जिसे शब्दों में बाँधना कठिन है। यही नारद की अपनी परिभाषा है, यही इस पूरे ग्रंथ का हृदय है। फिर वे स्वयं ही उस पर मुहर लगाते हैं, ऐसा ही है, बिलकुल ऐसा ही।
सूत्र 19 · 20
इस परम-व्याकुलता का जीता-जागता उदाहरण कहाँ मिलेगा, इस पर भी नारद चुप नहीं रहते। वे व्रज की गोपियों की ओर इशारा करते हैं। कृष्ण को एक पल भूल जाएँ तो उनकी जो दशा होती थी, वही नारद की कही हुई परम-व्याकुलता का साकार रूप है। पर यहाँ एक बारीक बात है जिसे नारद छूटने नहीं देते। गोपियों के उस प्रेम में भी भगवान के माहात्म्य का, उनकी महानता का ज्ञान कभी ओझल नहीं हुआ। यह जान लेना ज़रूरी है, क्योंकि यदि वह माहात्म्य-ज्ञान न हो, तो वही प्रेम साधारण आसक्ति की तरह गिर सकता है। माहात्म्य-ज्ञान से रहित प्रेम और भक्ति के प्रेम में यही भेद है।
सूत्र 21 · 22 · 23
वह भेद और स्पष्ट हो जाता है जब हम पूछें कि सुख कहाँ से उठता है। आसक्ति में अपना ही सुख खोजा जाता है, प्रिय का सुख वहाँ अपना सुख नहीं बनता। भक्ति इसके ठीक विपरीत है, वहाँ प्रिय का सुख ही भक्त का सुख है। इसी कसौटी पर नारद अपना सबसे साहसी वचन रखते हैं, यह भक्ति कर्म से भी, ज्ञान से भी, योग से भी अधिक है। शास्त्र की उस परंपरा में, जहाँ कर्म और ज्ञान को परम माना जाता रहा, यह कहना छोटी बात नहीं थी।
सूत्र 24 · 25
पर नारद ऐसा क्यों कहते हैं, इसका कारण भी वे एक ही शब्द में रख देते हैं। कर्म फल देता है, ज्ञान फल देता है, योग फल देता है; ये सब साधन हैं, किसी और चीज़ तक पहुँचने के रास्ते। भक्ति इनसे अलग है, क्योंकि वह स्वयं फल है। उसे पाने के बाद कुछ और पाने को शेष नहीं रहता। और इसका एक और कारण है जो भीतर तक जाता है। ज्ञान-मार्ग में एक सूक्ष्म अहंकार बैठ सकता है, मैंने जान लिया, यह भाव। भक्ति में दीनता है, मैं कुछ भी नहीं। और भगवान को यही दीनता प्रिय है, अभिमान उन्हें रुचता नहीं।
सूत्र 26 · 27
यहाँ एक पुराना विवाद भी सामने आता है, और नारद उसे छिपाते नहीं। कुछ आचार्य कहते हैं कि भक्ति का साधन तो ज्ञान ही है, ज्ञान के बिना भक्ति उपजे कैसे। कुछ और इससे आगे जाते हैं और कहते हैं कि दोनों एक-दूसरे के आश्रित हैं, ज्ञान से भक्ति और भक्ति से ज्ञान, दोनों मिल कर चलते हैं। पर सनकादि ब्रह्म-कुमारों का मत, जिसे नारद अपना अंतिम ठहराव बनाते हैं, यह है कि भक्ति किसी का साधन नहीं, वह स्वयं ही फल-रूप है। उसे किसी और चीज़ से पाने की बात ही नहीं, वही पाने योग्य है।
सूत्र 28 · 29 · 30
इस बात को नारद एक सीधे-सादे दृष्टांत से बैठा देते हैं। राज-महल का वर्णन सुन लेने भर से राजा प्रसन्न नहीं हो जाता, और भोजन की कथा कह देने भर से किसी की भूख नहीं मिटती। राज-भवन और भोजन में जो तृप्ति है, वह वर्णन में नहीं, अनुभव में है। ठीक वैसे ही भक्ति का केवल वर्णन सुन लेना उसका स्वाद नहीं है। इसीलिए, नारद कहते हैं, जो मुक्ति के अभिलाषी हैं, उन्हें कोरे शब्दों में नहीं उलझना चाहिए; उन्हें स्वयं उस भक्ति को ही ग्रहण करना चाहिए, उसे जी कर देखना चाहिए।