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नारद भक्ति सूत्र · अध्याय 2: भक्ति की महिमा

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नारद भक्ति सूत्र · अध्याय 2

भक्ति की महिमा

The Glory of Devotion · सूत्र 15-33

भक्ति किसमें बसती है, इस पर ऋषियों के अलग-अलग मत हैं। नारद उन सबको सुनते हैं, फिर अपना वचन रखते हैं, और अंत में भक्ति को कर्म, ज्ञान और योग, इन सबसे ऊपर ठहरा देते हैं।

अगर एक पंक्ति याद रखनी हो, तो वह यह है।

फलरूपत्वात् ॥

क्योंकि वह स्वयं फल है।

नारद भक्ति सूत्र 26

पिछले अध्याय में नारद ने भक्ति का स्वरूप कह दिया था। अब प्रश्न यह उठता है कि वह भक्ति पहचानी किससे जाए, उसके लक्षण क्या हैं। यहाँ नारद किसी एक उत्तर पर नहीं रुकते। वे पहले उन आचार्यों के मत रखते हैं जो उनसे पहले इस विषय पर बोल चुके हैं। उनका कहना है कि भक्ति के लक्षण अनेक हैं, क्योंकि अलग-अलग मनीषियों ने उसे अलग-अलग ढंग से देखा है। व्यास, पराशर के पुत्र, उसे पूजा आदि में बसे अनुराग में पहचानते हैं। गर्ग ऋषि उसे भगवान की कथा सुनने और कहने के प्रेम में देखते हैं। और शाण्डिल्य की दृष्टि गहरी जाती है, उनके लिए भक्ति वह प्रेम है जो आत्मा के अपने आनंद से टकराता नहीं, बल्कि उसी के साथ बहता है।

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सूत्र 15 · 16 · 17 · 18

तल्लक्षणानि वाच्यन्ते नाना-मत-भेदात्॥
पूजादिष्व् अनुराग इति पाराशर्यः॥
कथादिष्व् इति गर्गः॥
आत्म-रति-अविरोधेन इति शाण्डिल्यः॥

इन सब मतों को सिर झुका कर सुनने के बाद नारद अपना वचन रखते हैं, और उनका लक्षण सबसे ऊँचा उठ जाता है। उनके लिए भक्ति यह है कि अपना सारा आचरण, हर कर्म, हर साँस उसी एक प्रभु को अर्पित हो जाए; और यदि एक क्षण को भी वह विस्मृत हो जाए, तो भीतर ऐसी व्याकुलता उठे जिसे शब्दों में बाँधना कठिन है। यही नारद की अपनी परिभाषा है, यही इस पूरे ग्रंथ का हृदय है। फिर वे स्वयं ही उस पर मुहर लगाते हैं, ऐसा ही है, बिलकुल ऐसा ही।

सूत्र 19 · 20

नारदस्तु तदर्पिताखिलाचारता तद्विस्मरणे परम-व्याकुलतेति॥
अस्त्येवमेवम्॥

इस परम-व्याकुलता का जीता-जागता उदाहरण कहाँ मिलेगा, इस पर भी नारद चुप नहीं रहते। वे व्रज की गोपियों की ओर इशारा करते हैं। कृष्ण को एक पल भूल जाएँ तो उनकी जो दशा होती थी, वही नारद की कही हुई परम-व्याकुलता का साकार रूप है। पर यहाँ एक बारीक बात है जिसे नारद छूटने नहीं देते। गोपियों के उस प्रेम में भी भगवान के माहात्म्य का, उनकी महानता का ज्ञान कभी ओझल नहीं हुआ। यह जान लेना ज़रूरी है, क्योंकि यदि वह माहात्म्य-ज्ञान न हो, तो वही प्रेम साधारण आसक्ति की तरह गिर सकता है। माहात्म्य-ज्ञान से रहित प्रेम और भक्ति के प्रेम में यही भेद है।

सूत्र 21 · 22 · 23

यथा व्रजगोपिकानाम्॥
तत्रापि न माहात्म्य-ज्ञान-विस्मृत्यपवादः॥
तद्विहीनं जाराणामिव॥

वह भेद और स्पष्ट हो जाता है जब हम पूछें कि सुख कहाँ से उठता है। आसक्ति में अपना ही सुख खोजा जाता है, प्रिय का सुख वहाँ अपना सुख नहीं बनता। भक्ति इसके ठीक विपरीत है, वहाँ प्रिय का सुख ही भक्त का सुख है। इसी कसौटी पर नारद अपना सबसे साहसी वचन रखते हैं, यह भक्ति कर्म से भी, ज्ञान से भी, योग से भी अधिक है। शास्त्र की उस परंपरा में, जहाँ कर्म और ज्ञान को परम माना जाता रहा, यह कहना छोटी बात नहीं थी।

सूत्र 24 · 25

नास्त्येव तस्मिंस्तत्सुखसुखित्वम्॥
सा तु कर्म-ज्ञान-योगेभ्योऽप्यधिकतरा॥

पर नारद ऐसा क्यों कहते हैं, इसका कारण भी वे एक ही शब्द में रख देते हैं। कर्म फल देता है, ज्ञान फल देता है, योग फल देता है; ये सब साधन हैं, किसी और चीज़ तक पहुँचने के रास्ते। भक्ति इनसे अलग है, क्योंकि वह स्वयं फल है। उसे पाने के बाद कुछ और पाने को शेष नहीं रहता। और इसका एक और कारण है जो भीतर तक जाता है। ज्ञान-मार्ग में एक सूक्ष्म अहंकार बैठ सकता है, मैंने जान लिया, यह भाव। भक्ति में दीनता है, मैं कुछ भी नहीं। और भगवान को यही दीनता प्रिय है, अभिमान उन्हें रुचता नहीं।

सूत्र 26 · 27

फल-रूपत्वात्॥
ईश्वरस्याप्यभिमानद्वेषित्वाद् दैन्य-प्रियत्वाच्च॥

यहाँ एक पुराना विवाद भी सामने आता है, और नारद उसे छिपाते नहीं। कुछ आचार्य कहते हैं कि भक्ति का साधन तो ज्ञान ही है, ज्ञान के बिना भक्ति उपजे कैसे। कुछ और इससे आगे जाते हैं और कहते हैं कि दोनों एक-दूसरे के आश्रित हैं, ज्ञान से भक्ति और भक्ति से ज्ञान, दोनों मिल कर चलते हैं। पर सनकादि ब्रह्म-कुमारों का मत, जिसे नारद अपना अंतिम ठहराव बनाते हैं, यह है कि भक्ति किसी का साधन नहीं, वह स्वयं ही फल-रूप है। उसे किसी और चीज़ से पाने की बात ही नहीं, वही पाने योग्य है।

सूत्र 28 · 29 · 30

तस्या ज्ञानमेव साधनमित्येके॥
अन्योन्याश्रयत्वमित्यन्ये॥
स्वयं फल-रूपतेति ब्रह्मकुमाराः॥

इस बात को नारद एक सीधे-सादे दृष्टांत से बैठा देते हैं। राज-महल का वर्णन सुन लेने भर से राजा प्रसन्न नहीं हो जाता, और भोजन की कथा कह देने भर से किसी की भूख नहीं मिटती। राज-भवन और भोजन में जो तृप्ति है, वह वर्णन में नहीं, अनुभव में है। ठीक वैसे ही भक्ति का केवल वर्णन सुन लेना उसका स्वाद नहीं है। इसीलिए, नारद कहते हैं, जो मुक्ति के अभिलाषी हैं, उन्हें कोरे शब्दों में नहीं उलझना चाहिए; उन्हें स्वयं उस भक्ति को ही ग्रहण करना चाहिए, उसे जी कर देखना चाहिए।

सूत्र 31 · 32 · 33

राजगृह-भोजनादिषु तथैव दृष्टत्वात्॥
न तेन राज-परितोषः क्षुच्छान्तिर्वा॥
तस्मात्सैव ग्राह्या मुमुक्षुभिः॥
॥ भक्ति की महिमा ॥

विस्तार: यह अध्याय और गहरा

भक्ति की महिमा कहाँ-कहाँ: नारद इस अध्याय के सूत्रों में भक्ति की महानता सिद्ध करते हैं। एक केंद्रीय वचन यह है कि भक्ति, कर्म और ज्ञान दोनों से ऊँची है। शास्त्र की उस परंपरा में, जहाँ कर्म-मीमांसा और ज्ञान-मीमांसा दोनों परम मानी जाती थीं, यह वचन बहुत बड़ा था।

“फलरूपत्वात्”: क्योंकि भक्ति स्वयं फल है। कर्म फल देता है, ज्ञान फल देता है, पर भक्ति स्वयं फल है। यही इस पूरे अध्याय का निचोड़ है।

कर्म और भक्ति का अंतर: कर्म-योगी कर्म इस आशा में करता है कि कुछ मिलेगा, कोई परम-पद, कोई शांति। भक्त के लिए वह क्रिया ही पूरा अनुभव है। उसे उससे अलग कुछ नहीं चाहिए।

आज, घर बैठे: एक घंटा हनुमान-चालीसा का पाठ करने वाला कोई व्यक्ति। पाठ के बाद उसे कुछ नहीं चाहिए, कोई परिणाम नहीं चाहिए। पाठ ही पूरा अनुभव है। नारद का “फलरूपत्वात्” यही कहता है।

भक्ति “महान” क्यों: क्योंकि वह सबके लिए खुली है। कर्म-योग किसी विशेष कौशल की माँग करता है। ज्ञान-योग किसी विशेष बौद्धिक क्षमता की माँग करता है। भक्ति केवल हृदय की दिशा माँगती है। यानी कोई भी, किसी भी उम्र में, किसी भी पृष्ठभूमि से, इसे कर सकता है।

एक व्यावहारिक बात: यदि किसी की ज़िंदगी में औपचारिक ध्यान के लिए दस मिनट भी न बचते हों, तब भी वह चलते-फिरते मन ही मन नाम-जप कर सकता है। भक्ति की यह सहजता ही उसकी “महिमा” का एक हिस्सा है।