नारद भक्ति सूत्र · अध्याय 2
भक्ति की महिमा
The Glory of Devotion · सूत्र 15-33
कर्म, ज्ञान, योग, इन सब से भक्ति का सम्बन्ध। और भक्ति के अनेक रूप।
सूत्र 15
तल्लक्षणानि वाच्यन्ते नाना-मत-भेदात्॥
tal-lakṣaṇāni vācyante nānā-mata-bhedāt
अर्थ“उसके लक्षण अनेक मतों के भेद से कहे जाते हैं।”
सूत्र 16
पूजादिष्व् अनुराग इति पाराशर्यः॥
pūjādiṣv anurāga iti pārāśaryaḥ
अर्थ“पूजा आदि में अनुराग, ऐसा पराशर-पुत्र (व्यास) का मत।”
सूत्र 17
कथादिष्व् इति गर्गः॥
kathādiṣv iti gargaḥ
अर्थ“कथा आदि में (अनुराग), ऐसा गर्ग का मत।”
सूत्र 18
आत्म-रति-अविरोधेन इति शाण्डिल्यः॥
ātma-rati-avirodhena iti śāṇḍilyaḥ
अर्थ“आत्म-रति से अविरोध, ऐसा शाण्डिल्य का मत।”
सूत्र 19
नारदस्तु तदर्पिताखिलाचारता तद्विस्मरणे परम-व्याकुलतेति॥
nāradas tu tad-arpitākhilācāratā tad-vismaraṇe parama-vyākulateti
अर्थ“नारद का मत: सब आचार उसको अर्पित, और उसके विस्मरण में परम-व्याकुलता।”
सन्दर्भनारद की अपनी definition। यह core है। हर action ईश्वर को अर्पित, और एक moment भी “भूल” जाएँ, तो beyond words का दुःख।
सूत्र 20
अस्त्येवमेवम्॥
asty evam evam
अर्थ“ऐसा ही है।”
सूत्र 21
यथा व्रजगोपिकानाम्॥
yathā vraja-gopikānām
अर्थ“जैसे व्रज की गोपियों की।”
सन्दर्भnāराद का highest example: गोपियाँ। उनकी कृष्ण-भक्ति परम। “उसको भूले तो परम-व्याकुलता”, यह exactly गोपियों की state।
सूत्र 22
तत्रापि न माहात्म्य-ज्ञान-विस्मृत्यपवादः॥
tatrāpi na māhātmya-jñāna-vismṛty-apavādaḥ
अर्थ“वहाँ भी (गोपियों में) माहात्म्य के ज्ञान के विस्मरण का अपवाद नहीं।”
सूत्र 23
तद्विहीनं जाराणामिव॥
tad-vihīnaṁ jārāṇām iva
अर्थ“उसके विहीन (बिना), जारों (व्यभिचारी) जैसा।”
सन्दर्भwarning। माहात्म्य-ज्ञान के बिना “प्रेम” गिर सकता है।
सूत्र 24
नास्त्येव तस्मिंस्तत्सुखसुखित्वम्॥
nāsty eva tasmiṁs tat-sukha-sukhitvam
अर्थ“उस (जारों के प्रेम) में, उसके (प्रिय के) सुख से सुख-मानने का भाव नहीं।”
सूत्र 25
सा तु कर्म-ज्ञान-योगेभ्योऽप्यधिकतरा॥
sā tu karma-jñāna-yogebhyo’py adhikatarā
अर्थ“वह (भक्ति) कर्म, ज्ञान, योग से भी अधिक है।”
सन्दर्भनारद का bold claim। भक्ति highest path।
सूत्र 26
फल-रूपत्वात्॥
phala-rūpatvāt
अर्थ“क्योंकि वह फल-रूप है।”
सन्दर्भकर्म-ज्ञान-योग साधन। भक्ति साध्य।
सूत्र 27
ईश्वरस्याप्यभिमानद्वेषित्वाद् दैन्य-प्रियत्वाच्च॥
īśvarasyāpy abhimāna-dveṣitvād dainya-priyatvāc ca
अर्थ“और ईश्वर भी अभिमान-द्वेषी और दैन्य-प्रिय हैं।”
सन्दर्भज्ञान-मार्ग में सूक्ष्म “मैंने जाना” का अहंकार। भक्ति में दैन्य (“मैं कुछ नहीं”)। ईश्वर को दैन्य पसन्द।
सूत्र 28
तस्या ज्ञानमेव साधनमित्येके॥
tasyā jñānam eva sādhanam ity eke
अर्थ“कुछ कहते हैं, उसका (भक्ति का) साधन ज्ञान है।”
सूत्र 29
अन्योन्याश्रयत्वमित्यन्ये॥
anyonyāśrayatvam ity anye
अर्थ“दूसरे कहते हैं, परस्पर-आश्रित।”
सूत्र 30
स्वयं फल-रूपतेति ब्रह्मकुमाराः॥
svayaṁ phala-rūpateti brahma-kumārāḥ
अर्थ“भक्ति स्वयं ही फल-रूप है, यह ब्रह्म-कुमारों (सनकादि) का मत।”
सन्दर्भनारद का अन्तिम position। भक्ति अपने आप में result, साधन नहीं।
सूत्र 31
राजगृह-भोजनादिषु तथैव दृष्टत्वात्॥
rāja-gṛha-bhojanādiṣu tathaiva dṛṣṭatvāt
अर्थ“क्योंकि राज-महल में, भोजन में, ऐसा ही (तृप्ति-रूप) देखा जाता है।”
सूत्र 32
न तेन राज-परितोषः क्षुच्छान्तिर्वा॥
na tena rāja-paritoṣaḥ kṣuc-chāntir vā
अर्थ“उससे (केवल वर्णन से) राजा का तोष नहीं, न भूख की शान्ति।”
सूत्र 33
तस्मात्सैव ग्राह्या मुमुक्षुभिः॥
tasmāt saiva grāhyā mumukṣubhiḥ
अर्थ“इसलिए वह (भक्ति) ही ग्रहण करने योग्य मुमुक्षुओं द्वारा।”
॥ भक्ति की महिमा ॥