नारद भक्ति सूत्र · अध्याय 4
प्रेम के रूप
Forms of Love · सूत्र 51-66
प्रेम क्या है? नारद इसे define करते हैं, और इसके अनेक रूप दिखाते हैं।
सूत्र 51
अनिर्वचनीयं प्रेम-स्वरूपम्॥
anirvacanīyaṁ prema-svarūpam
अर्थ“प्रेम का स्वरूप अनिर्वचनीय (शब्दों से परे) है।”
सूत्र 52
मूकास्वादनवत्॥
mūkāsvādanavat
अर्थ“गूँगे के स्वाद के समान।”
सन्दर्भगूँगा खाता है, स्वाद लेता है, मगर बता नहीं सकता। प्रेम वैसा।
सूत्र 53
प्रकाशते क्वापि पात्रे॥
prakāśate kvāpi pātre
अर्थ“किसी पात्र (योग्य व्यक्ति) में प्रकाशित होता है।”
सूत्र 54
गुण-रहितं काम-रहितं प्रति-क्षण-वर्धमानमविच्छिन्नं सूक्ष्मतरमनुभव-रूपम्॥
guṇa-rahitaṁ kāma-rahitaṁ prati-kṣaṇa-vardhamānam avicchinnaṁ sūkṣmataram anubhava-rūpam
अर्थ“गुण-रहित, काम-रहित, प्रति-क्षण बढ़ता, अविच्छिन्न, सूक्ष्मतर, अनुभव-रूप।”
सन्दर्भप्रेम के 6 गुण। हर एक important।
सूत्र 55
तत्प्राप्य तदेवावलोकति, तदेव शृणोति, तदेव भाषयति, तदेव चिन्तयति॥
tat prāpya tad evāvalokati, tad eva śṛṇoti, tad eva bhāṣayati, tad eva cintayati
अर्थ“वो (प्रेम) पा कर, बस उसी को देखता, उसी को सुनता, उसी की बात करता, उसी का सोचता।”
सूत्र 56
गौणी त्रिधा गुण-भेदाद् आर्तादि-भेदाद्वा॥
gauṇī tridhā guṇa-bhedād ārtādi-bhedād vā
अर्थ“गौणी (secondary) भक्ति तीन प्रकार की: गुण-भेद से, या आर्त आदि के भेद से।”
सन्दर्भ“गौणी” यानी कारणिक भक्ति। भगवद् गीता 7.16 के “आर्त, अर्थार्थी, जिज्ञासु, ज्ञानी” का concept।
सूत्र 57
उत्तरस्मादुत्तरस्मात्पूर्व-पूर्व-श्रेयाय भवति॥
uttarasmād uttarasmāt pūrva-pūrva-śreyāya bhavati
अर्थ“बाद के बाद वाला, पहले-पहले से श्रेष्ठ है।”
सूत्र 58
अन्यस्मात् सौलभ्यं भक्तौ॥
anyasmāt saulabhyaṁ bhaktau
अर्थ“अन्य (मार्गों) से, भक्ति में सुलभता है।”
सूत्र 59
प्रमाणान्तरस्यानपेक्षत्वात्स्वयं प्रमाणत्वात्॥
pramāṇāntarasyānapekṣatvāt svayaṁ pramāṇatvāt
अर्थ“क्योंकि (भक्ति को) अन्य प्रमाण की अपेक्षा नहीं, स्वयं प्रमाण है।”
सन्दर्भself-evident। भक्ति को defend नहीं करनी, वो अपने आप प्रमाण।
सूत्र 60
शान्ति-रूपात्परमानन्द-रूपाच्च॥
śānti-rūpāt paramānanda-rūpāc ca
अर्थ“शान्ति-रूप, और परम-आनन्द-रूप के कारण।”
सूत्र 61
लोक-हानौ चिन्ता न कार्या निवेदितात्म-लोक-वेदत्वात्॥
loka-hānau cintā na kāryā niveditātma-loka-vedatvāt
अर्थ“लोक की हानि में चिन्ता न करे, क्योंकि आत्मा, लोक, वेद, सब (ईश्वर को) निवेदित।”
सूत्र 62
न तदसिद्धौ लोक-व्यवहारो हेयः किन्तु फल-त्यागस्तत्साधनं च॥
na tad-asiddhau loka-vyavahāro heyaḥ kintu phala-tyāgas tat-sādhanaṁ ca
अर्थ“उसकी (भक्ति की) असिद्धि में, लोक-व्यवहार त्याज्य नहीं, फल-त्याग, और उसके साधन ज़रूरी।”
सूत्र 63
स्त्री-धन-नास्तिक-चरित्रं न श्रवणीयम्॥
strī-dhana-nāstika-caritraṁ na śravaṇīyam
अर्थ“स्त्री, धन, नास्तिकों की कथाएँ नहीं सुननी।”
सन्दर्भpractical guidance। mind-content matters।
सूत्र 64
अभिमान-दम्भादिकं त्याज्यम्॥
abhimāna-dambhādikaṁ tyājyam
अर्थ“अभिमान, दम्भ आदि त्याज्य।”
सूत्र 65
तदर्पिताखिलाचारः सन् काम-क्रोधाभिमानादिकं तस्मिन्नेव करणीयम्॥
tad-arpitākhilācāraḥ san kāma-krodhābhimānādikaṁ tasminn eva karaṇīyam
अर्थ“सब आचार उसको अर्पित कर, काम, क्रोध, अभिमान आदि (अगर हों) उसी में करना।”
सन्दर्भradical approach। अगर emotions न रोक पाएँ, तो उन्हें भी ईश्वर की तरफ़ direct करो।
सूत्र 66
त्रि-रूप-भङ्ग-पूर्वकं नित्य-दास-नित्य-कान्ता-भजनात्मकं प्रेम कार्यं प्रेमैव कार्यम्॥
tri-rūpa-bhaṅga-pūrvakaṁ nitya-dāsa-nitya-kāntā-bhajanātmakaṁ prema kāryaṁ premaiva kāryam
अर्थ“तीन-रूप (स्वामी-सेवक, गुरु-शिष्य, मित्र) के भङ्ग पूर्वक, नित्य-दास या नित्य-कान्ता-भजन रूप प्रेम ही करने योग्य।”
॥ प्रेम के रूप ॥