लुल्ला परिवारLulla Family
English
← संग्रह
क्रियाएँ
गीतासंकट के बीच संवाद

अध्याय 15: पुरुषोत्तम योग

इस पृष्ठ पर

पढ़ने में लगभग 15 मिनट

अध्याय 15: पुरुषोत्तम योग के लिए सांकेतिक चित्र
दृश्य-द्वार · अध्याय 15: पुरुषोत्तम योग

श्रीकृष्ण एक बहुत पुराने चित्र से बात शुरू करते हैं। वे कहते हैं, इस संसार को एक उल्टे पीपल के पेड़ की तरह देखिए, जिसकी जड़ें ऊपर हैं और शाखाएँ नीचे की ओर फैली हुई हैं। यह अजीब सा पेड़ ही यह सारा जगत है। और इसे काटने का एक ही औज़ार है, वैराग्य की तेज़ कुल्हाड़ी।

उल्टा पेड़, जड़ें ऊपर

सोचिए, हर पेड़ की जड़ नीचे मिट्टी में होती है और शाखाएँ ऊपर आकाश की ओर। पर श्रीकृष्ण जिस पेड़ की बात कर रहे हैं, वह उल्टा है। उसकी जड़ ऊपर है, उस परम सत्य में, और शाखाएँ नीचे की ओर, इस दिखने वाले संसार में फैली हुई हैं। इस पेड़ को गुण सींचते हैं, इसकी कोंपलें विषय-भोग हैं, और इसकी कुछ जड़ें नीचे तक उतर कर मनुष्य को कर्मों से बाँधती जाती हैं।

ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् ।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥

ऊपर जड़ और नीचे शाखाओं वाले इस अश्वत्थ को अविनाशी कहा गया है। इसकी पत्तियाँ वेद के छंद हैं, और जो इस पेड़ को सचमुच जान ले, वही असली वेद का जानकार है। (गीता 15.1)

यहाँ खड़े-खड़े हमें इस पेड़ का न सिरा दिखता है, न छोर, न वह ज़मीन जिस पर यह टिका है। श्रीकृष्ण कहते हैं, इस गहरी जमी हुई जड़ को वैराग्य की मज़बूत कुल्हाड़ी से काट डालिए। एक बार जड़ कट जाए, तो सारी शाखाएँ अपने आप झर जाती हैं। और तब उस परम पुरुष की शरण खोजिए, जिससे यह सारा पुराना विस्तार बहा है, और जहाँ पहुँच कर फिर लौटना नहीं होता।

वह धाम जहाँ से लौटना नहीं

श्रीकृष्ण उस धाम का एक अनूठा वर्णन देते हैं। वे कहते हैं, वहाँ न सूरज की रौशनी पहुँचती है, न चाँद की, न आग की। जो वहाँ एक बार पहुँच गया, वह फिर इस चक्कर में नहीं लौटता। वही मेरा परम धाम है। जो अभिमान और मोह से छूट गया, जिसने लगाव को जीत लिया, जो सदा अपने भीतर के सत्य में बसा रहता है, और जिसकी सारी चाहें शांत हो चुकी हैं, वह इसी अटल धाम तक पहुँच जाता है।

हर जीव उसी का एक अंश

अब श्रीकृष्ण एक बहुत आत्मीय बात कहते हैं। वे कहते हैं, इस जीव-लोक में जो जीव भटक रहा है, वह और कोई नहीं, मेरा ही सनातन अंश है।

ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ।
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥

इस जीव-लोक में जीव के रूप में मेरा ही एक सनातन अंश है। प्रकृति में टिकी हुई पाँच इन्द्रियों को और छठे मन को यही अंश अपनी ओर खींचता है। (गीता 15.7)

यानी हर प्राणी उन्हीं का एक टुकड़ा है, पूरा नहीं, बस एक नन्हा हिस्सा। यह अंश जब कोई देह पकड़ता है और जब उसे छोड़ता है, तो अपने साथ इन इन्द्रियों और मन को वैसे ही ले चलता है जैसे हवा फूलों की महक को एक जगह से उठा कर दूसरी जगह ले जाती है। कान, आँख, त्वचा, जीभ और नाक, इन सब के सहारे यही अंश इस संसार का सारा रस चखता रहता है। पर जिनकी आँख पर मोह का परदा पड़ा है, वे इस आते-जाते, भोगते हुए अंश को देख नहीं पाते। जो ज्ञान की आँख खोल लेते हैं, वही इसे पहचानते हैं।

सब हृदयों में बैठा हुआ

फिर श्रीकृष्ण अपनी व्यापकता खोल कर रख देते हैं। वे कहते हैं, सूरज में जो तेज़ सारे संसार को रौशन करता है, चाँद में और आग में जो रौशनी है, वह सब मेरी ही है। मैं ही धरती में समा कर सब प्राणियों को अपनी शक्ति से थामे रहता हूँ, और चाँद जैसा रस बन कर सारी वनस्पति को पालता हूँ। मैं ही हर देह में जठर की आग बन कर, प्राण और अपान से जुड़ कर, खाए हुए अन्न को पचाता हूँ। और सब से भीतर की बात वे इस तरह कहते हैं।

सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च ।
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् ॥

मैं सब के हृदय में बैठा हूँ। याद रखना, जानना और भूल जाना, ये सब मुझी से होते हैं। सारे वेद अंत में मुझे ही जानने के लिए हैं, वेदान्त का रचने वाला भी मैं हूँ और वेद को जानने वाला भी मैं। (गीता 15.15)

क्षर, अक्षर और पुरुषोत्तम

अंत में श्रीकृष्ण वह भेद खोलते हैं जिससे इस अध्याय का नाम बना है। वे कहते हैं, इस संसार में दो पुरुष हैं। एक क्षर है, यानी वह सब कुछ जो बदलता और मिटता रहता है, सारे शरीर, सारे नाम-रूप। और दूसरा अक्षर है, वह जो कभी नहीं बदलता। पर इन दोनों से परे एक तीसरा है, उत्तम पुरुष, जिसे परमात्मा कहते हैं, जो तीनों लोकों में समा कर सब को थामे हुए है। श्रीकृष्ण कहते हैं, क्योंकि मैं इस मिटने वाले क्षर से परे हूँ और उस न मिटने वाले अक्षर से भी ऊँचा हूँ, इसीलिए संसार और वेद, दोनों मुझे पुरुषोत्तम के नाम से जानते हैं। जो बिना किसी भ्रम के मुझे इस पुरुषोत्तम रूप में पहचान लेता है, वह मानो सब कुछ जान लेता है, और अपने पूरे मन से मेरी ओर ढल जाता है।

तो इस अध्याय को एक साँस में कहें, तो बात यह है, यह संसार एक उल्टा पेड़ है जिसकी असली जड़ ऊपर उस परम सत्य में है, और हम सब उसी परम के छोटे-छोटे अंश हैं। जड़ को पहचान लीजिए, और यह पेड़ अपने आप हल्का हो जाएगा।

आधार: श्रीमद्भगवद्गीता

श्लोक-दर-श्लोक

इस अध्याय के सभी 20 श्लोक: देवनागरी मूल, रोमन लिप्यन्तरण, पदच्छेद, अन्वय और सीधा अर्थ। हर श्लोक की अपनी कड़ी है, जैसे lulla.net/bhagavad-gita/15/1/। ऊपर की कथा-व्याख्या पढ़ने के बाद यहाँ मूल तक उतरिए।

15.1ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्

श्रीभगवानुवाच

ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् ।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥1॥

ūrdhvamūlam adhaḥśākham aśvatthaṃ prāhur avyayam |
chandāṃsi yasya parṇāni yas taṃ veda sa vedavit

ऊर्ध्वमूलम्
ऊपर की ओर मूल वाला
अधःशाखम्
नीचे की ओर शाखाओं वाला
अश्वत्थम्
अश्वत्थ वृक्ष को
प्राहुः
कहते हैं
अव्ययम्
अविनाशी
छन्दांसि
वेद
यस्य
जिसके
पर्णानि
पत्ते हैं
यः
जो
तम्
उसको
वेद
जानता है
सः
वह
वेदवित्
वेद का जानने वाला

अन्वय: ऊर्ध्वमूलम् अधःशाखम् अव्ययम् अश्वत्थम् प्राहुः, यस्य छन्दांसि पर्णानि; यः तम् वेद सः वेदवित्।

जिसका मूल ऊपर और शाखाएँ नीचे हैं, उस अश्वत्थ को अविनाशी कहते हैं, और वेद जिसके पत्ते हैं। जो उसको जानता है, वह वेद का जानने वाला है।

15.2अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः

अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः ।
अधश्च मूलान्यनुसंततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ॥2॥

adhaś cordhvaṃ prasṛtās tasya śākhā guṇapravṛddhā viṣayapravālāḥ |
adhaś ca mūlāny anusaṃtatāni karmānubandhīni manuṣyaloke

अधः
नीचे
च
और
ऊर्ध्वम्
ऊपर
प्रसृताः
फैली हुई
तस्य
उसकी
शाखाः
शाखाएँ
गुणप्रवृद्धाः
गुणों से बढ़ी हुई
विषयप्रवालाः
विषय ही जिनकी कोंपलें हैं
अधः
नीचे
च
और
मूलानि
जड़ें
अनुसंततानि
फैली हुई हैं
कर्मानुबन्धीनि
कर्मों से बाँधने वाली
मनुष्यलोके
मनुष्य लोक में

अन्वय: तस्य गुणप्रवृद्धाः विषयप्रवालाः शाखाः अधः च ऊर्ध्वम् प्रसृताः; मनुष्यलोके च कर्मानुबन्धीनि मूलानि अधः अनुसंततानि।

उस वृक्ष की गुणों से बढ़ी हुई शाखाएँ, जिनकी कोंपलें विषय हैं, नीचे और ऊपर फैली हुई हैं। और मनुष्य लोक में कर्मों से बाँधने वाली जड़ें नीचे की ओर फैली हुई हैं।

15.3न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च संप्रतिष्ठा

न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च संप्रतिष्ठा ।
अश्वत्थमेनं सुविरूढमूलमसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा ॥3॥

na rūpam asyeha tathopalabhyate nānto na cādir na ca saṃpratiṣṭhā |
aśvattham enaṃ suvirūḍhamūlam asaṅgaśastreṇa dṛḍhena chittvā

न
नहीं
रूपम्
रूप
अस्य
इसका
इह
यहाँ
तथा
वैसा
उपलभ्यते
पाया जाता है
न
न
अन्तः
अन्त
न
न
च
और
आदिः
आदि
न
न
च
और
संप्रतिष्ठा
स्थिति
अश्वत्थम्
अश्वत्थ को
एनम्
इस
सुविरूढमूलम्
दृढ़ जड़ों वाले
असङ्गशस्त्रेण
असंगता रूपी शस्त्र से
दृढेन
दृढ़
छित्त्वा
काटकर

अन्वय: इह अस्य रूपम् तथा न उपलभ्यते, न अन्तः, न च आदिः, न च संप्रतिष्ठा। एनम् सुविरूढमूलम् अश्वत्थम् दृढेन असङ्गशस्त्रेण छित्त्वा।

इस वृक्ष का रूप यहाँ वैसा पाया नहीं जाता, न इसका अन्त है, न आदि है और न स्थिति है। दृढ़ जड़ों वाले इस अश्वत्थ को असंगता रूपी दृढ़ शस्त्र से काटकर।

15.4ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः

ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः ।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी ॥4॥

tataḥ padaṃ tatparimārgitavyaṃ yasmin gatā na nivartanti bhūyaḥ |
tam eva cādyaṃ puruṣaṃ prapadye yataḥ pravṛttiḥ prasṛtā purāṇī

ततः
उसके बाद
पदम्
पद को
तत्
उस
परिमार्गितव्यम्
खोजना चाहिए
यस्मिन्
जिसमें
गताः
गये हुए
न
नहीं
निवर्तन्ति
लौटते
भूयः
फिर
तम्
उस
एव
ही
च
और
आद्यम्
आदि
पुरुषम्
पुरुष की
प्रपद्ये
मैं शरण लेता हूँ
यतः
जिससे
प्रवृत्तिः
प्रवृत्ति
प्रसृता
फैली है
पुराणी
पुरातन

अन्वय: ततः तत् पदम् परिमार्गितव्यम्, यस्मिन् गताः भूयः न निवर्तन्ति। यतः पुराणी प्रवृत्तिः प्रसृता, तम् एव च आद्यम् पुरुषम् प्रपद्ये।

उसके बाद उस पद को खोजना चाहिए, जिसमें गये हुए लोग फिर नहीं लौटते। जिससे यह पुरातन प्रवृत्ति फैली है, उसी आदि पुरुष की मैं शरण लेता हूँ।

15.5निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः

निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः ।
द्वंद्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत् ॥5॥

nirmānamohā jitasaṅgadoṣā adhyātmanityā vinivṛttakāmāḥ |
dvaṃdvair vimuktāḥ sukhaduḥkhasaṃjñair gacchanty amūḍhāḥ padam avyayaṃ tat

निर्मानमोहाः
मान और मोह से रहित
जितसङ्गदोषाः
आसक्ति के दोष को जीते हुए
अध्यात्मनित्याः
अध्यात्म में नित्य स्थित
विनिवृत्तकामाः
कामनाओं से पूर्ण निवृत्त
द्वंद्वैः
द्वन्द्वों से
विमुक्ताः
मुक्त
सुखदुःखसंज्ञैः
सुख दुःख नामक
गच्छन्ति
जाते हैं
अमूढाः
मोहरहित जन
पदम्
पद को
अव्ययम्
अविनाशी
तत्
उस

अन्वय: निर्मानमोहाः जितसङ्गदोषाः अध्यात्मनित्याः विनिवृत्तकामाः सुखदुःखसंज्ञैः द्वंद्वैः विमुक्ताः अमूढाः तत् अव्ययम् पदम् गच्छन्ति।

जो मान और मोह से रहित हैं, जिन्होंने आसक्ति के दोष को जीत लिया है, जो अध्यात्म में नित्य स्थित हैं और कामनाओं से पूरी तरह निवृत्त हैं, जो सुख दुःख नामक द्वन्द्वों से मुक्त हैं, वे मोहरहित जन उस अविनाशी पद को जाते हैं।

15.6न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः

न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः ।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥6॥

na tad bhāsayate sūryo na śaśāṅko na pāvakaḥ |
yad gatvā na nivartante tad dhāma paramaṃ mama

न
नहीं
तत्
उसको
भासयते
प्रकाशित करता है
सूर्यः
सूर्य
न
न
शशाङ्कः
चन्द्रमा
न
न
पावकः
अग्नि
यत्
जिसको
गत्वा
जाकर
न
नहीं
निवर्तन्ते
लौटते
तत्
वह
धाम
धाम
परमम्
परम
मम
मेरा

अन्वय: तत् सूर्यः न भासयते, न शशाङ्कः, न पावकः; यत् गत्वा न निवर्तन्ते, तत् मम परमम् धाम।

उसको न सूर्य प्रकाशित करता है, न चन्द्रमा और न अग्नि। जहाँ जाकर लोग लौटते नहीं, वह मेरा परम धाम है।

15.7ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः

ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ।
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥7॥

mamaivāṃśo jīvaloke jīvabhūtaḥ sanātanaḥ |
manaḥṣaṣṭhānīndriyāṇi prakṛtisthāni karṣati

मम
मेरा
एव
ही
अंशः
अंश
जीवलोके
जीव लोक में
जीवभूतः
जीव बना हुआ
सनातनः
सनातन
मनःषष्ठानि
मन सहित छह
इन्द्रियाणि
इन्द्रियों को
प्रकृतिस्थानि
प्रकृति में स्थित
कर्षति
खींचता है

अन्वय: जीवलोके सनातनः जीवभूतः मम एव अंशः प्रकृतिस्थानि मनःषष्ठानि इन्द्रियाणि कर्षति।

जीव लोक में जीव रूप हुआ यह सनातन अंश मेरा ही है। वह प्रकृति में स्थित मन सहित छह इन्द्रियों को अपनी ओर खींचता है।

15.8शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः

शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः ।
गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात् ॥8॥

śarīraṃ yad avāpnoti yac cāpy utkrāmatīśvaraḥ |
gṛhītvaitāni saṃyāti vāyur gandhān ivāśayāt

शरीरम्
शरीर को
यत्
जब
अवाप्नोति
प्राप्त करता है
यत्
जब
च
और
अपि
भी
उत्क्रामति
छोड़कर जाता है
ईश्वरः
देह का स्वामी जीव
गृहीत्वा
ग्रहण करके
एतानि
इन्हें
संयाति
जाता है
वायुः
वायु
गन्धान्
गन्धों को
इव
जैसे
आशयात्
आश्रय स्थान से

अन्वय: ईश्वरः यत् शरीरम् अवाप्नोति यत् च अपि उत्क्रामति, आशयात् गन्धान् वायुः इव एतानि गृहीत्वा संयाति।

जैसे वायु गन्ध के आश्रय स्थान से गन्धों को ले जाती है, वैसे ही देह का स्वामी जीव, जब शरीर पाता है और जब उसे छोड़ता है, तब इन्हें ग्रहण करके साथ ले जाता है।

15.9श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च

श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च ।
अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते ॥9॥

śrotraṃ cakṣuḥ sparśanaṃ ca rasanaṃ ghrāṇam eva ca |
adhiṣṭhāya manaś cāyaṃ viṣayān upasevate

श्रोत्रम्
कान
चक्षुः
आँख
स्पर्शनम्
त्वचा
च
और
रसनम्
जिह्वा
घ्राणम्
नासिका
एव
भी
च
और
अधिष्ठाय
आश्रय लेकर
मनः
मन
च
और
अयम्
यह जीव
विषयान्
विषयों को
उपसेवते
भोगता है

अन्वय: अयम् श्रोत्रम् चक्षुः स्पर्शनम् च रसनम् घ्राणम् एव च मनः च अधिष्ठाय विषयान् उपसेवते।

यह जीव कान, आँख, त्वचा, जिह्वा, नासिका और मन का आश्रय लेकर विषयों को भोगता है।

15.10उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम्

उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् ।
विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः ॥10॥

utkrāmantaṃ sthitaṃ vāpi bhuñjānaṃ vā guṇānvitam |
vimūḍhā nānupaśyanti paśyanti jñānacakṣuṣaḥ

उत्क्रामन्तम्
शरीर छोड़कर जाते हुए
स्थितम्
शरीर में स्थित
वा
या
अपि
भी
भुञ्जानम्
भोगते हुए
वा
या
गुणान्वितम्
गुणों से युक्त
विमूढाः
मोहित जन
न
नहीं
अनुपश्यन्ति
देखते
पश्यन्ति
देखते हैं
ज्ञानचक्षुषः
ज्ञान के नेत्र वाले

अन्वय: उत्क्रामन्तम् वा अपि स्थितम् वा भुञ्जानम् गुणान्वितम् विमूढाः न अनुपश्यन्ति, ज्ञानचक्षुषः पश्यन्ति।

शरीर छोड़कर जाते हुए, शरीर में स्थित या भोगते हुए गुणों से युक्त इस जीव को मोहित जन नहीं देखते। ज्ञान के नेत्र वाले ही इसे देखते हैं।

15.11यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम्

यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् ।
यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः ॥11॥

yatanto yoginaś cainaṃ paśyanty ātmany avasthitam |
yatanto ’py akṛtātmāno nainaṃ paśyanty acetasaḥ

यतन्तः
प्रयत्न करते हुए
योगिनः
योगी
च
और
एनम्
इसको
पश्यन्ति
देखते हैं
आत्मनि
अपने भीतर
अवस्थितम्
स्थित
यतन्तः
प्रयत्न करते हुए
अपि
भी
अकृतात्मानः
अशुद्ध अन्तःकरण वाले
न
नहीं
एनम्
इसको
पश्यन्ति
देखते
अचेतसः
विवेकहीन

अन्वय: यतन्तः योगिनः च आत्मनि अवस्थितम् एनम् पश्यन्ति; अकृतात्मानः अचेतसः यतन्तः अपि एनम् न पश्यन्ति।

प्रयत्न करते हुए योगी अपने भीतर स्थित इस आत्मा को देखते हैं। जिनका अन्तःकरण शुद्ध नहीं हुआ, वे विवेकहीन जन प्रयत्न करते हुए भी इसको नहीं देखते।

15.12यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम्

यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् ।
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥12॥

yad ādityagataṃ tejo jagad bhāsayate ’khilam |
yac candramasi yac cāgnau tat tejo viddhi māmakam

यत्
जो
आदित्यगतम्
सूर्य में स्थित
तेजः
तेज
जगत्
जगत को
भासयते
प्रकाशित करता है
अखिलम्
सम्पूर्ण
यत्
जो
चन्द्रमसि
चन्द्रमा में
यत्
जो
च
और
अग्नौ
अग्नि में
तत्
उस
तेजः
तेज को
विद्धि
जानिए
मामकम्
मेरा

अन्वय: यत् आदित्यगतम् तेजः अखिलम् जगत् भासयते, यत् चन्द्रमसि, यत् च अग्नौ, तत् तेजः मामकम् विद्धि।

सूर्य में स्थित जो तेज सम्पूर्ण जगत को प्रकाशित करता है, जो चन्द्रमा में है और जो अग्नि में है, उस तेज को मेरा ही जानिए।

15.13गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा

गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा ।
पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः ॥13॥

gām āviśya ca bhūtāni dhārayāmy aham ojasā |
puṣṇāmi cauṣadhīḥ sarvāḥ somo bhūtvā rasātmakaḥ

गाम्
पृथ्वी में
आविश्य
प्रवेश करके
च
और
भूतानि
प्राणियों को
धारयामि
धारण करता हूँ
अहम्
मैं
ओजसा
अपनी शक्ति से
पुष्णामि
पोषण करता हूँ
च
और
औषधीः
औषधियों को
सर्वाः
सब
सोमः
चन्द्रमा
भूत्वा
होकर
रसात्मकः
रस स्वरूप

अन्वय: अहम् च गाम् आविश्य ओजसा भूतानि धारयामि, रसात्मकः सोमः च भूत्वा सर्वाः औषधीः पुष्णामि।

मैं ही पृथ्वी में प्रवेश करके अपनी शक्ति से प्राणियों को धारण करता हूँ। और रस स्वरूप चन्द्रमा होकर सब औषधियों का पोषण करता हूँ।

15.14अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः

अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः ।
प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ॥14॥

ahaṃ vaiśvānaro bhūtvā prāṇināṃ deham āśritaḥ |
prāṇāpānasamāyuktaḥ pacāmy annaṃ caturvidham

अहम्
मैं
वैश्वानरः
वैश्वानर अग्नि
भूत्वा
होकर
प्राणिनाम्
प्राणियों के
देहम्
देह में
आश्रितः
स्थित
प्राणापानसमायुक्तः
प्राण और अपान से युक्त
पचामि
पचाता हूँ
अन्नम्
अन्न को
चतुर्विधम्
चार प्रकार के

अन्वय: अहम् वैश्वानरः भूत्वा प्राणिनाम् देहम् आश्रितः प्राणापानसमायुक्तः चतुर्विधम् अन्नम् पचामि।

मैं ही वैश्वानर अग्नि होकर प्राणियों के देह में स्थित हूँ। प्राण और अपान से युक्त होकर मैं चार प्रकार के अन्न को पचाता हूँ।

15.15सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च

सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च ।
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् ॥15॥

sarvasya cāhaṃ hṛdi saṃniviṣṭo mattaḥ smṛtir jñānam apohanaṃ ca |
vedaiś ca sarvair aham eva vedyo vedāntakṛd vedavid eva cāham

सर्वस्य
सबके
च
और
अहम्
मैं
हृदि
हृदय में
संनिविष्टः
स्थित हूँ
मत्तः
मुझसे
स्मृतिः
स्मृति
ज्ञानम्
ज्ञान
अपोहनम्
उनका विस्मरण
च
और
वेदैः
वेदों से
च
और
सर्वैः
सब
अहम्
मैं
एव
ही
वेद्यः
जानने योग्य
वेदान्तकृत्
वेदान्त का कर्ता
वेदवित्
वेद का जानने वाला
एव
ही
च
और
अहम्
मैं

अन्वय: अहम् च सर्वस्य हृदि संनिविष्टः; मत्तः स्मृतिः ज्ञानम् अपोहनम् च। सर्वैः वेदैः च अहम् एव वेद्यः; वेदान्तकृत् वेदवित् एव च अहम्।

मैं ही सबके हृदय में स्थित हूँ, और मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और उनका विस्मरण होता है। सब वेदों से जानने योग्य मैं ही हूँ, वेदान्त का कर्ता और वेद का जानने वाला भी मैं ही हूँ।

15.16द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च

द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥16॥

dvāv imau puruṣau loke kṣaraś cākṣara eva ca |
kṣaraḥ sarvāṇi bhūtāni kūṭastho ’kṣara ucyate

द्वौ
दो
इमौ
ये
पुरुषौ
पुरुष
लोके
लोक में
क्षरः
क्षर, नाशवान
च
और
अक्षरः
अक्षर, अविनाशी
एव
ही
च
और
क्षरः
क्षर
सर्वाणि
सब
भूतानि
भूत
कूटस्थः
कूटस्थ, अचल
अक्षरः
अक्षर
उच्यते
कहा जाता है

अन्वय: लोके इमौ द्वौ पुरुषौ, क्षरः च अक्षरः एव च। सर्वाणि भूतानि क्षरः, कूटस्थः अक्षरः उच्यते।

इस लोक में क्षर और अक्षर, ये दो पुरुष हैं। सब भूत क्षर हैं और कूटस्थ अक्षर कहा जाता है।

15.17उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः

उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥17॥

uttamaḥ puruṣas tv anyaḥ paramātmety udāhṛtaḥ |
yo lokatrayam āviśya bibharty avyaya īśvaraḥ

उत्तमः
उत्तम
पुरुषः
पुरुष
तु
तो
अन्यः
दूसरा ही
परमात्मा
परमात्मा
इति
इस नाम से
उदाहृतः
कहा गया है
यः
जो
लोकत्रयम्
तीनों लोकों में
आविश्य
प्रवेश करके
बिभर्ति
धारण करता है
अव्ययः
अविनाशी
ईश्वरः
ईश्वर

अन्वय: उत्तमः पुरुषः तु अन्यः, परमात्मा इति उदाहृतः, यः अव्ययः ईश्वरः लोकत्रयम् आविश्य बिभर्ति।

उत्तम पुरुष तो दूसरा ही है, जो परमात्मा नाम से कहा गया है। वह अविनाशी ईश्वर तीनों लोकों में प्रवेश करके उन्हें धारण करता है।

15.18यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः

यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः ।
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥18॥

yasmāt kṣaram atīto ’ham akṣarād api cottamaḥ |
ato ’smi loke vede ca prathitaḥ puruṣottamaḥ

यस्मात्
क्योंकि
क्षरम्
क्षर से
अतीतः
परे
अहम्
मैं
अक्षरात्
अक्षर से
अपि
भी
च
और
उत्तमः
उत्तम
अतः
इसलिए
अस्मि
हूँ
लोके
लोक में
वेदे
वेद में
च
और
प्रथितः
प्रसिद्ध
पुरुषोत्तमः
पुरुषोत्तम

अन्वय: यस्मात् अहम् क्षरम् अतीतः अक्षरात् अपि च उत्तमः, अतः लोके वेदे च पुरुषोत्तमः प्रथितः अस्मि।

क्योंकि मैं क्षर से परे हूँ और अक्षर से भी उत्तम हूँ, इसलिए लोक में और वेद में मैं पुरुषोत्तम नाम से प्रसिद्ध हूँ।

15.19यो मामेवमसंमूढो जानाति पुरुषोत्तमम्

यो मामेवमसंमूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।
स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ॥19॥

yo mām evam asaṃmūḍho jānāti puruṣottamam |
sa sarvavid bhajati māṃ sarvabhāvena bhārata

यः
जो
माम्
मुझको
एवम्
इस प्रकार
असंमूढः
मोहरहित होकर
जानाति
जानता है
पुरुषोत्तमम्
पुरुषोत्तम
सः
वह
सर्ववित्
सब कुछ जानने वाला
भजति
भजता है
माम्
मुझको
सर्वभावेन
सम्पूर्ण भाव से
भारत
हे भारत

अन्वय: भारत, यः असंमूढः एवम् माम् पुरुषोत्तमम् जानाति, सः सर्ववित् सर्वभावेन माम् भजति।

हे भारत, जो मोहरहित होकर मुझे इस प्रकार पुरुषोत्तम जानता है, वह सब कुछ जानने वाला है और सम्पूर्ण भाव से मुझे भजता है।

15.20इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ

इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ ।
एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत ॥20॥

iti guhyatamaṃ śāstram idam uktaṃ mayānagha |
etad buddhvā buddhimān syāt kṛtakṛtyaś ca bhārata

इति
इस प्रकार
गुह्यतमम्
अत्यन्त गोपनीय
शास्त्रम्
शास्त्र
इदम्
यह
उक्तम्
कहा गया
मया
मेरे द्वारा
अनघ
हे निष्पाप
एतत्
इसको
बुद्ध्वा
जानकर
बुद्धिमान्
बुद्धिमान
स्यात्
हो जाता है
कृतकृत्यः
कृतकृत्य
च
और
भारत
हे भारत

अन्वय: अनघ, इति इदम् गुह्यतमम् शास्त्रम् मया उक्तम्। भारत, एतत् बुद्ध्वा बुद्धिमान् कृतकृत्यः च स्यात्।

हे निष्पाप, इस प्रकार यह अत्यन्त गोपनीय शास्त्र मैंने कहा। हे भारत, इसे जानने वाला बुद्धिमान और कृतकृत्य हो जाता है।