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अध्याय 14: गुणत्रय विभाग योग

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अध्याय 14: गुणत्रय विभाग योग के लिए सांकेतिक चित्र
दृश्य-द्वार · अध्याय 14: गुणत्रय विभाग योग

श्रीकृष्ण एक ऐसी बात दोहराने बैठते हैं जिसे जान कर बड़े-बड़े मुनि पूर्णता तक पहुँचे। वे कहते हैं, हे अर्जुन, हर मनुष्य तीन रस्सियों से बँधा हुआ है। इन रस्सियों को गुण कहते हैं, सत्त्व, रजस और तमस। इन तीनों को पहचान लेना, और फिर तीनों के पार चले जाना, यही इस अध्याय का सारा मर्म है।

तीन रस्सियाँ जो सब को बाँधती हैं

श्रीकृष्ण एक सुंदर चित्र खींचते हैं। वे कहते हैं, यह सारी प्रकृति मानो एक कोख है, और मैं उसमें जीवन का बीज रखता हूँ। इसी मेल से सब प्राणी जन्म लेते हैं। प्रकृति मानो माँ है, और मैं पिता। पर इसी प्रकृति से तीन गुण भी उपजते हैं, और यही तीन गुण देह में बैठे उस अविनाशी आत्मा को बाँध लेते हैं।

सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः ।
निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् ॥

सत्त्व, रजस और तमस, ये तीनों गुण प्रकृति से जन्मते हैं, हे महाबाहु, और देह में बसे उस अविनाशी आत्मा को यही बाँध लेते हैं। (गीता 14.5)

ध्यान दीजिए, आत्मा तो अविनाशी है, फिर भी बँध जाती है, मानो कोई खुला पंछी किसी रेशमी डोर से बँध जाए। तीनों रस्सियाँ हम सब के भीतर हैं, फ़र्क़ बस इतना कि किस समय किसकी पकड़ ज़्यादा कस जाती है।

तीनों गुणों का अपना-अपना रंग

सत्त्व निर्मल है, हल्का है, रौशनी जैसा। जब यह भीतर बढ़ता है, तो मन शांत होता है, विवेक जागता है, समझ साफ़ होती है। पर श्रीकृष्ण सावधान भी करते हैं, यही सत्त्व सुख और ज्ञान के अपने ही रस से चिपका कर भी बाँध लेता है। रजस भीतर की आग है, चाह और लगाव से भरी हुई। जब यह चढ़ता है, तो बेचैनी आती है, लोभ आता है, और एक के बाद एक काम में जुते रहने की आदत। यह कर्म से चिपका कर बाँधता है। और तमस अँधेरा है, अज्ञान से जन्मा। जब यह छा जाता है, तो आलस्य, बहुत ज़्यादा नींद, प्रमाद और मोह घेर लेते हैं, और बुद्धि पर मानो धुँध बैठ जाती है। तीनों आपस में होड़ करते रहते हैं, कभी एक ऊपर, कभी दूसरा।

कौन सा गुण चढ़ रहा है

श्रीकृष्ण पहचान के चिह्न भी बताते हैं। जब देह के हर द्वार से, हर इन्द्रिय से, समझ की एक कोमल रौशनी छलकने लगे, तो जानिए सत्त्व बढ़ा है। जब लोभ, भाग-दौड़, नए-नए कामों की धुन और बेचैनी उठे, तो रजस। और जब भीतर धुँधलापन, सुस्ती, प्रमाद और मोह भर जाए, तो तमस। और यह भी वे कहते हैं कि प्राणी जिस गुण में डूबा हुआ देह छोड़ता है, वैसी ही आगे की राह पाता है। सत्त्व में जाने वाला निर्मल लोकों तक पहुँचता है, रजस में जाने वाला कर्म से बँधे लोगों के बीच लौटता है, और तमस में डूबा हुआ मोह भरी योनियों में गिर जाता है। सत्त्व से ज्ञान उपजता है, रजस से लोभ, और तमस से प्रमाद तथा अज्ञान।

तीनों के पार जाना

पर इन तीनों रस्सियों के आगे भी एक जगह है। श्रीकृष्ण कहते हैं, जिस दिन साधक यह साफ़ देख लेता है कि सारा करना-धरना तो इन्हीं गुणों का खेल है, और वह स्वयं इन गुणों से परे किसी और तत्त्व को पहचान लेता है, उसी दिन वह उनके स्वरूप की ओर बढ़ने लगता है। और तब आती है वह पंक्ति जो इस अध्याय का दीपक है।

गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान् ।
जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते ॥

देह में बसा जीव जब देह से ही जन्मे इन तीनों गुणों को लाँघ जाता है, तब वह जन्म, मृत्यु, बुढ़ापे और दुख से छूट कर अमृत का स्वाद पा लेता है। (गीता 14.20)

यह सुन कर अर्जुन के मन में एक सहज प्रश्न उठता है। वे पूछते हैं, हे प्रभु, जो इन तीनों गुणों के पार चला गया, उसे पहचानें कैसे? उसका रहन-सहन कैसा होता है, और वह इन गुणों को लाँघता किस तरह है? श्रीकृष्ण का उत्तर बहुत कोमल है। वे कहते हैं, ऐसा मनुष्य सत्त्व की रौशनी, रजस की हलचल और तमस के मोह, तीनों के आने पर उनसे चिढ़ता नहीं, और उनके चले जाने पर उन्हें वापस नहीं माँगता। वह किसी उदासीन दर्शक की तरह बैठा रहता है, यह जानते हुए कि गुण ही गुणों में बरत रहे हैं, और स्वयं ज़रा भी नहीं डिगता। सुख हो या दुख, मिट्टी हो या सोना, अपना हो या पराया, निंदा हो या तारीफ़, मान हो या अपमान, उसके भीतर एक सी शांति बनी रहती है। और जो ऐसा साधक अटूट, अनन्य भक्ति से उन्हीं की सेवा में लगा रहता है, वह इन गुणों को पार कर ब्रह्म बनने के योग्य हो जाता है, क्योंकि श्रीकृष्ण कहते हैं, उस ब्रह्म का, उस अमरता का, उस सनातन धर्म का और उस पूरे सुख का घर मैं ही हूँ।

तो इस अध्याय को एक साँस में कहें, तो बात यह है, अपने भीतर की तीन रस्सियों को पहचानिए, सत्त्व, रजस और तमस, और फिर इनके आने-जाने के केवल दर्शक बन जाइए। यही गुणों के पार जाना है, यही मुक्ति है।

आधार: श्रीमद्भगवद्गीता

श्लोक-दर-श्लोक

इस अध्याय के सभी 27 श्लोक: देवनागरी मूल, रोमन लिप्यन्तरण, पदच्छेद, अन्वय और सीधा अर्थ। हर श्लोक की अपनी कड़ी है, जैसे lulla.net/bhagavad-gita/14/1/। ऊपर की कथा-व्याख्या पढ़ने के बाद यहाँ मूल तक उतरिए।

14.1परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम्

श्रीभगवानुवाच

परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् ।
यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः ॥1॥

paraṃ bhūyaḥ pravakṣyāmi jñānānāṃ jñānam uttamam |
yaj jñātvā munayaḥ sarve parāṃ siddhim ito gatāḥ

परम्
परम, श्रेष्ठ
भूयः
फिर से
प्रवक्ष्यामि
मैं कहूँगा
ज्ञानानाम्
सब ज्ञानों में
ज्ञानम्
ज्ञान
उत्तमम्
उत्तम
यत्
जिसको
ज्ञात्वा
जानकर
मुनयः
मुनि
सर्वे
सब
पराम्
परम
सिद्धिम्
सिद्धि को
इतः
इस संसार से
गताः
प्राप्त हुए

अन्वय: ज्ञानानाम् उत्तमम् परम् ज्ञानम् भूयः प्रवक्ष्यामि, यत् ज्ञात्वा सर्वे मुनयः इतः पराम् सिद्धिम् गताः।

सब ज्ञानों में उत्तम उस परम ज्ञान को मैं फिर कहूँगा, जिसे जानकर सब मुनि इस संसार से परम सिद्धि को प्राप्त हुए हैं।

14.2इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः

इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।
सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥2॥

idaṃ jñānam upāśritya mama sādharmyam āgatāḥ |
sarge ’pi nopajāyante pralaye na vyathanti ca

इदम्
इस
ज्ञानम्
ज्ञान का
उपाश्रित्य
आश्रय लेकर
मम
मेरे
साधर्म्यम्
स्वरूप को
आगताः
प्राप्त हुए पुरुष
सर्गे
सृष्टि के आदि में
अपि
भी
न
नहीं
उपजायन्ते
जन्म लेते
प्रलये
प्रलय में
न
नहीं
व्यथन्ति
व्यथित होते
च
और

अन्वय: इदम् ज्ञानम् उपाश्रित्य मम साधर्म्यम् आगताः सर्गे अपि न उपजायन्ते, प्रलये च न व्यथन्ति।

इस ज्ञान का आश्रय लेकर जो मेरे स्वरूप को प्राप्त हो गए हैं, वे सृष्टि के आदि में भी जन्म नहीं लेते और प्रलय में भी व्यथित नहीं होते।

14.3मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम्

मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम् ।
संभवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥3॥

mama yonir mahad brahma tasmin garbhaṃ dadhāmy aham |
saṃbhavaḥ sarvabhūtānāṃ tato bhavati bhārata

मम
मेरी
योनिः
योनि, गर्भस्थान
महत्
महान्
ब्रह्म
ब्रह्म, मूल प्रकृति
तस्मिन्
उसमें
गर्भम्
गर्भ को
दधामि
स्थापित करता हूँ
अहम्
मैं
संभवः
उत्पत्ति
सर्वभूतानाम्
सब प्राणियों की
ततः
उससे
भवति
होती है
भारत
हे भारत

अन्वय: हे भारत, महत् ब्रह्म मम योनिः, तस्मिन् अहम् गर्भम् दधामि, ततः सर्वभूतानाम् संभवः भवति।

हे भारत, महान् ब्रह्म मेरी योनि है और उसमें मैं गर्भ स्थापित करता हूँ। उससे सब प्राणियों की उत्पत्ति होती है।

14.4सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः संभवन्ति याः

सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः संभवन्ति याः ।
तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥4॥

sarvayoniṣu kaunteya mūrtayaḥ saṃbhavanti yāḥ |
tāsāṃ brahma mahad yonir ahaṃ bījapradaḥ pitā

सर्वयोनिषु
सब योनियों में
कौन्तेय
हे कुन्तीपुत्र
मूर्तयः
शरीर
संभवन्ति
उत्पन्न होते हैं
याः
जो
तासाम्
उन सबकी
ब्रह्म
ब्रह्म, मूल प्रकृति
महत्
महान्
योनिः
योनि, माता
अहम्
मैं
बीजप्रदः
बीज देने वाला
पिता
पिता

अन्वय: हे कौन्तेय, सर्वयोनिषु याः मूर्तयः संभवन्ति, तासाम् महत् ब्रह्म योनिः, अहम् बीजप्रदः पिता।

हे कुन्तीपुत्र, सब योनियों में जो शरीर उत्पन्न होते हैं, उन सबकी योनि महान् ब्रह्म है और बीज देने वाला पिता मैं हूँ।

14.5सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवाः

सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवाः ।
निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् ॥5॥

sattvaṃ rajas tama iti guṇāḥ prakṛtisaṃbhavāḥ |
nibadhnanti mahābāho dehe dehinam avyayam

सत्त्वम्
सत्त्वगुण
रजः
रजोगुण
तमः
तमोगुण
इति
ये
गुणाः
गुण
प्रकृतिसंभवाः
प्रकृति से उत्पन्न
निबध्नन्ति
बाँधते हैं
महाबाहो
हे महाबाहु
देहे
देह में
देहिनम्
देही को
अव्ययम्
अविनाशी

अन्वय: हे महाबाहो, सत्त्वम् रजः तमः इति प्रकृतिसंभवाः गुणाः अव्ययम् देहिनम् देहे निबध्नन्ति।

हे महाबाहु, सत्त्व, रज और तम, ये प्रकृति से उत्पन्न गुण अविनाशी देही को देह में बाँधते हैं।

14.6तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम्

तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम् ।
सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ ॥6॥

tatra sattvaṃ nirmalatvāt prakāśakam anāmayam |
sukhasaṅgena badhnāti jñānasaṅgena cānagha

तत्र
उनमें
सत्त्वम्
सत्त्वगुण
निर्मलत्वात्
निर्मल होने से
प्रकाशकम्
प्रकाश करने वाला
अनामयम्
निर्विकार, दोषरहित
सुखसङ्गेन
सुख की आसक्ति से
बध्नाति
बाँधता है
ज्ञानसङ्गेन
ज्ञान की आसक्ति से
च
और
अनघ
हे निष्पाप

अन्वय: हे अनघ, तत्र सत्त्वम् निर्मलत्वात् प्रकाशकम् अनामयम्, सुखसङ्गेन ज्ञानसङ्गेन च बध्नाति।

हे निष्पाप, उनमें सत्त्वगुण निर्मल होने से प्रकाश करने वाला और निर्विकार है। वह सुख की आसक्ति से और ज्ञान की आसक्ति से बाँधता है।

14.7रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम्

रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम् ।
तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम् ॥7॥

rajo rāgātmakaṃ viddhi tṛṣṇāsaṅgasamudbhavam |
tan nibadhnāti kaunteya karmasaṅgena dehinam

रजः
रजोगुण को
रागात्मकम्
रागरूप
विद्धि
जानिए
तृष्णासङ्गसमुद्भवम्
तृष्णा और आसक्ति से उत्पन्न
तत्
वह
निबध्नाति
बाँधता है
कौन्तेय
हे कुन्तीपुत्र
कर्मसङ्गेन
कर्मों की आसक्ति से
देहिनम्
देही को

अन्वय: हे कौन्तेय, रजः रागात्मकम् तृष्णासङ्गसमुद्भवम् विद्धि, तत् कर्मसङ्गेन देहिनम् निबध्नाति।

हे कुन्तीपुत्र, रजोगुण को रागरूप और तृष्णा तथा आसक्ति से उत्पन्न जानिए। वह देही को कर्मों की आसक्ति से बाँधता है।

14.8तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम्

तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम् ।
प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत ॥8॥

tamas tv ajñānajaṃ viddhi mohanaṃ sarvadehinām |
pramādālasyanidrābhis tan nibadhnāti bhārata

तमः
तमोगुण को
तु
और
अज्ञानजम्
अज्ञान से उत्पन्न
विद्धि
जानिए
मोहनम्
मोहित करने वाला
सर्वदेहिनाम्
सब देहधारियों को
प्रमादालस्यनिद्राभिः
प्रमाद, आलस्य और निद्रा से
तत्
वह
निबध्नाति
बाँधता है
भारत
हे भारत

अन्वय: हे भारत, तमः तु अज्ञानजम् सर्वदेहिनाम् मोहनम् विद्धि, तत् प्रमादालस्यनिद्राभिः निबध्नाति।

हे भारत, तमोगुण को अज्ञान से उत्पन्न और सब देहधारियों को मोहित करने वाला जानिए। वह प्रमाद, आलस्य और निद्रा से बाँधता है।

14.9सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत

सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत ।
ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत ॥9॥

sattvaṃ sukhe sañjayati rajaḥ karmaṇi bhārata |
jñānam āvṛtya tu tamaḥ pramāde sañjayaty uta

सत्त्वम्
सत्त्वगुण
सुखे
सुख में
सञ्जयति
लगाता है
रजः
रजोगुण
कर्मणि
कर्म में
भारत
हे भारत
ज्ञानम्
ज्ञान को
आवृत्य
ढककर
तु
और
तमः
तमोगुण
प्रमादे
प्रमाद में
सञ्जयति
लगाता है
उत
निश्चय ही

अन्वय: हे भारत, सत्त्वम् सुखे सञ्जयति, रजः कर्मणि, तमः तु ज्ञानम् आवृत्य प्रमादे उत सञ्जयति।

हे भारत, सत्त्वगुण सुख में लगाता है और रजोगुण कर्म में। तमोगुण ज्ञान को ढककर प्रमाद में ही लगाता है।

14.10रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत

रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत ।
रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा ॥10॥

rajas tamaś cābhibhūya sattvaṃ bhavati bhārata |
rajaḥ sattvaṃ tamaś caiva tamaḥ sattvaṃ rajas tathā

रजः
रजोगुण को
तमः
तमोगुण को
च
और
अभिभूय
दबाकर
सत्त्वम्
सत्त्वगुण
भवति
बढ़ता है
भारत
हे भारत
रजः
रजोगुण
सत्त्वम्
सत्त्वगुण को
तमः
तमोगुण को
च
और
एव
ही
तमः
तमोगुण
सत्त्वम्
सत्त्वगुण को
रजः
रजोगुण को
तथा
वैसे ही

अन्वय: हे भारत, रजः तमः च अभिभूय सत्त्वम् भवति, सत्त्वम् तमः च एव अभिभूय रजः भवति, तथा सत्त्वम् रजः च अभिभूय तमः भवति।

हे भारत, रजोगुण और तमोगुण को दबाकर सत्त्वगुण बढ़ता है, सत्त्वगुण और तमोगुण को दबाकर रजोगुण बढ़ता है, वैसे ही सत्त्वगुण और रजोगुण को दबाकर तमोगुण बढ़ता है।

14.11सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते

सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते ।
ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत ॥11॥

sarvadvāreṣu dehe ’smin prakāśa upajāyate |
jñānaṃ yadā tadā vidyād vivṛddhaṃ sattvam ity uta

सर्वद्वारेषु
सब द्वारों में
देहे
देह में
अस्मिन्
इस
प्रकाशः
प्रकाश
उपजायते
उत्पन्न होता है
ज्ञानम्
ज्ञान
यदा
जब
तदा
तब
विद्यात्
जानना चाहिए
विवृद्धम्
बढ़ा हुआ
सत्त्वम्
सत्त्वगुण
इति
ऐसा
उत
निश्चय ही

अन्वय: यदा अस्मिन् देहे सर्वद्वारेषु प्रकाशः ज्ञानम् उपजायते, तदा सत्त्वम् विवृद्धम् इति उत विद्यात्।

जब इस देह के सब द्वारों में प्रकाश और ज्ञान उत्पन्न होता है, तब जानना चाहिए कि सत्त्वगुण बढ़ा हुआ है।

14.12लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा

लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा ।
रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ ॥12॥

lobhaḥ pravṛttir ārambhaḥ karmaṇām aśamaḥ spṛhā |
rajasy etāni jāyante vivṛddhe bharatarṣabha

लोभः
लोभ
प्रवृत्तिः
प्रवृत्ति
आरम्भः
आरम्भ
कर्मणाम्
कर्मों का
अशमः
अशान्ति
स्पृहा
लालसा
रजसि
रजोगुण के
एतानि
ये
जायन्ते
उत्पन्न होते हैं
विवृद्धे
बढ़ने पर
भरतर्षभ
हे भरतश्रेष्ठ

अन्वय: हे भरतर्षभ, रजसि विवृद्धे लोभः प्रवृत्तिः कर्मणाम् आरम्भः अशमः स्पृहा एतानि जायन्ते।

हे भरतश्रेष्ठ, रजोगुण के बढ़ने पर लोभ, प्रवृत्ति, कर्मों का आरम्भ, अशान्ति और लालसा, ये सब उत्पन्न होते हैं।

14.13अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च

अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च ।
तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन ॥13॥

aprakāśo ’pravṛttiś ca pramādo moha eva ca |
tamasy etāni jāyante vivṛddhe kurunandana

अप्रकाशः
अप्रकाश, विवेक का अभाव
अप्रवृत्तिः
अप्रवृत्ति
च
और
प्रमादः
प्रमाद
मोहः
मोह
एव
भी
च
और
तमसि
तमोगुण के
एतानि
ये
जायन्ते
उत्पन्न होते हैं
विवृद्धे
बढ़ने पर
कुरुनन्दन
हे कुरुनन्दन

अन्वय: हे कुरुनन्दन, तमसि विवृद्धे अप्रकाशः अप्रवृत्तिः च प्रमादः मोहः एव च एतानि जायन्ते।

हे कुरुनन्दन, तमोगुण के बढ़ने पर अप्रकाश, अप्रवृत्ति, प्रमाद और मोह, ये सब उत्पन्न होते हैं।

14.14यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत्

यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत् ।
तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते ॥14॥

yadā sattve pravṛddhe tu pralayaṃ yāti dehabhṛt |
tadottamavidāṃ lokān amalān pratipadyate

यदा
जब
सत्त्वे
सत्त्वगुण के
प्रवृद्धे
बढ़ने पर
तु
और
प्रलयम्
मृत्यु को
याति
प्राप्त होता है
देहभृत्
देहधारी
तदा
तब
उत्तमविदाम्
उत्तम तत्त्व को जानने वालों के
लोकान्
लोकों को
अमलान्
निर्मल
प्रतिपद्यते
प्राप्त होता है

अन्वय: यदा तु सत्त्वे प्रवृद्धे देहभृत् प्रलयम् याति, तदा उत्तमविदाम् अमलान् लोकान् प्रतिपद्यते।

जब देहधारी सत्त्वगुण के बढ़ने पर मृत्यु को प्राप्त होता है, तब वह उत्तम तत्त्व को जानने वालों के निर्मल लोकों को प्राप्त होता है।

14.15रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते

रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते ।
तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते ॥15॥

rajasi pralayaṃ gatvā karmasaṅgiṣu jāyate |
tathā pralīnas tamasi mūḍhayoniṣu jāyate

रजसि
रजोगुण में
प्रलयम्
मृत्यु को
गत्वा
प्राप्त होकर
कर्मसङ्गिषु
कर्मों में आसक्त मनुष्यों में
जायते
जन्म लेता है
तथा
वैसे ही
प्रलीनः
मरा हुआ
तमसि
तमोगुण में
मूढयोनिषु
मूढ़ योनियों में
जायते
जन्म लेता है

अन्वय: रजसि प्रलयम् गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते, तथा तमसि प्रलीनः मूढयोनिषु जायते।

रजोगुण में मृत्यु को प्राप्त होकर वह कर्मों में आसक्त मनुष्यों में जन्म लेता है, वैसे ही तमोगुण में मरा हुआ मूढ़ योनियों में जन्म लेता है।

14.16कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम्

कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम् ।
रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम् ॥16॥

karmaṇaḥ sukṛtasyāhuḥ sāttvikaṃ nirmalaṃ phalam |
rajasas tu phalaṃ duḥkham ajñānaṃ tamasaḥ phalam

कर्मणः
कर्म का
सुकृतस्य
शुभ, पुण्य
आहुः
कहते हैं
सात्त्विकम्
सात्त्विक
निर्मलम्
निर्मल
फलम्
फल
रजसः
रजोगुण का
तु
और
फलम्
फल
दुःखम्
दुःख
अज्ञानम्
अज्ञान
तमसः
तमोगुण का
फलम्
फल

अन्वय: सुकृतस्य कर्मणः सात्त्विकम् निर्मलम् फलम् आहुः, रजसः तु फलम् दुःखम्, तमसः फलम् अज्ञानम्।

शुभ कर्म का फल सात्त्विक और निर्मल कहा गया है, रजोगुण का फल दुःख और तमोगुण का फल अज्ञान है।

14.17सत्त्वात्संजायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च

सत्त्वात्संजायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च ।
प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च ॥17॥

sattvāt saṃjāyate jñānaṃ rajaso lobha eva ca |
pramādamohau tamaso bhavato ’jñānam eva ca

सत्त्वात्
सत्त्वगुण से
संजायते
उत्पन्न होता है
ज्ञानम्
ज्ञान
रजसः
रजोगुण से
लोभः
लोभ
एव
ही
च
और
प्रमादमोहौ
प्रमाद और मोह
तमसः
तमोगुण से
भवतः
होते हैं
अज्ञानम्
अज्ञान
एव
भी
च
और

अन्वय: सत्त्वात् ज्ञानम् संजायते, रजसः च लोभः एव, तमसः प्रमादमोहौ अज्ञानम् एव च भवतः।

सत्त्वगुण से ज्ञान उत्पन्न होता है और रजोगुण से लोभ ही। तमोगुण से प्रमाद और मोह होते हैं और अज्ञान भी।

14.18ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः

ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः ।
जघन्यगुणवृत्तस्था अधो गच्छन्ति तामसाः ॥18॥

ūrdhvaṃ gacchanti sattvasthā madhye tiṣṭhanti rājasāḥ |
jaghanyaguṇavṛttasthā adho gacchanti tāmasāḥ

ऊर्ध्वम्
ऊपर के लोकों को
गच्छन्ति
जाते हैं
सत्त्वस्थाः
सत्त्वगुण में स्थित
मध्ये
मध्य में, मनुष्यलोक में
तिष्ठन्ति
रहते हैं
राजसाः
राजस पुरुष
जघन्यगुणवृत्तस्थाः
निकृष्ट गुण की वृत्ति में स्थित
अधः
नीचे
गच्छन्ति
जाते हैं
तामसाः
तामस पुरुष

अन्वय: सत्त्वस्थाः ऊर्ध्वम् गच्छन्ति, राजसाः मध्ये तिष्ठन्ति, जघन्यगुणवृत्तस्थाः तामसाः अधः गच्छन्ति।

सत्त्वगुण में स्थित पुरुष ऊपर के लोकों को जाते हैं और राजस पुरुष मध्य में रहते हैं। निकृष्ट गुण की वृत्ति में स्थित तामस पुरुष नीचे जाते हैं।

14.19नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति

नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति ।
गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति ॥19॥

nānyaṃ guṇebhyaḥ kartāraṃ yadā draṣṭānupaśyati |
guṇebhyaś ca paraṃ vetti madbhāvaṃ so ’dhigacchati

न
नहीं
अन्यम्
अन्य किसी को
गुणेभ्यः
गुणों के सिवा
कर्तारम्
कर्ता
यदा
जब
द्रष्टा
द्रष्टा
अनुपश्यति
देखता है
गुणेभ्यः
गुणों से
च
और
परम्
परे तत्त्व को
वेत्ति
जानता है
मद्भावम्
मेरे भाव को
सः
वह
अधिगच्छति
प्राप्त होता है

अन्वय: यदा द्रष्टा गुणेभ्यः अन्यम् कर्तारम् न अनुपश्यति, गुणेभ्यः च परम् वेत्ति, सः मद्भावम् अधिगच्छति।

जब द्रष्टा गुणों के सिवा अन्य किसी को कर्ता नहीं देखता और गुणों से परे तत्त्व को जानता है, तब वह मेरे भाव को प्राप्त होता है।

14.20गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान्

गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान् ।
जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते ॥20॥

guṇān etān atītya trīn dehī dehasamudbhavān |
janmamṛtyujarāduḥkhair vimukto ’mṛtam aśnute

गुणान्
गुणों को
एतान्
इन
अतीत्य
लाँघकर
त्रीन्
तीन
देही
देही
देहसमुद्भवान्
देह की उत्पत्ति के कारणरूप
जन्ममृत्युजरादुःखैः
जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था और दुःखों से
विमुक्तः
मुक्त होकर
अमृतम्
अमृत को
अश्नुते
भोगता है

अन्वय: देही देहसमुद्भवान् एतान् त्रीन् गुणान् अतीत्य जन्ममृत्युजरादुःखैः विमुक्तः अमृतम् अश्नुते।

देही देह की उत्पत्ति के कारणरूप इन तीन गुणों को लाँघकर जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था और दुःखों से मुक्त होकर अमृत को भोगता है।

14.21कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो

अर्जुन उवाच

कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो ।
किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते ॥21॥

kair liṅgais trīn guṇān etān atīto bhavati prabho |
kimācāraḥ kathaṃ caitāṃs trīn guṇān ativartate

कैः
किन
लिङ्गैः
लक्षणों से
त्रीन्
तीन
गुणान्
गुणों को
एतान्
इन
अतीतः
लाँघा हुआ
भवति
होता है
प्रभो
हे प्रभु
किमाचारः
किस आचरण वाला
कथम्
कैसे
च
और
एतान्
इन
त्रीन्
तीन
गुणान्
गुणों को
अतिवर्तते
लाँघ जाता है

अन्वय: हे प्रभो, एतान् त्रीन् गुणान् अतीतः कैः लिङ्गैः भवति, किमाचारः च, कथम् एतान् त्रीन् गुणान् अतिवर्तते।

हे प्रभु, इन तीन गुणों को लाँघा हुआ पुरुष किन लक्षणों से युक्त होता है और किस आचरण वाला होता है? और वह इन तीन गुणों को कैसे लाँघ जाता है?

14.22प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव

श्रीभगवानुवाच

प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव ।
न द्वेष्टि संप्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति ॥22॥

prakāśaṃ ca pravṛttiṃ ca moham eva ca pāṇḍava |
na dveṣṭi saṃpravṛttāni na nivṛttāni kāṅkṣati

प्रकाशम्
प्रकाश को
च
और
प्रवृत्तिम्
प्रवृत्ति को
च
और
मोहम्
मोह को
एव
भी
च
और
पाण्डव
हे पाण्डव
न
नहीं
द्वेष्टि
द्वेष करता
संप्रवृत्तानि
प्रवृत्त होने पर
न
नहीं
निवृत्तानि
निवृत्त होने पर
काङ्क्षति
इच्छा करता

अन्वय: हे पाण्डव, प्रकाशम् च प्रवृत्तिम् च मोहम् एव च संप्रवृत्तानि न द्वेष्टि, निवृत्तानि न काङ्क्षति।

हे पाण्डव, जो प्रकाश, प्रवृत्ति और मोह के प्रवृत्त होने पर उनसे द्वेष नहीं करता और उनके निवृत्त होने पर उनकी इच्छा नहीं करता।

14.23उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते

उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते ।
गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते ॥23॥

udāsīnavad āsīno guṇair yo na vicālyate |
guṇā vartanta ity eva yo ’vatiṣṭhati neṅgate

उदासीनवत्
उदासीन के समान
आसीनः
स्थित
गुणैः
गुणों से
यः
जो
न
नहीं
विचाल्यते
विचलित किया जाता
गुणाः
गुण ही
वर्तन्ते
बर्तते हैं
इति
ऐसा
एव
ही
यः
जो
अवतिष्ठति
स्थित रहता है
न
नहीं
इङ्गते
चलायमान होता

अन्वय: यः उदासीनवत् आसीनः गुणैः न विचाल्यते, गुणाः वर्तन्ते इति एव यः अवतिष्ठति न इङ्गते।

जो उदासीन के समान स्थित होकर गुणों से विचलित नहीं किया जाता, और गुण ही बर्त रहे हैं, ऐसा समझकर जो स्थित रहता है और चलायमान नहीं होता।

14.24समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः

समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः ।
तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः ॥24॥

samaduḥkhasukhaḥ svasthaḥ samaloṣṭāśmakāñcanaḥ |
tulyapriyāpriyo dhīras tulyanindātmasaṃstutiḥ

समदुःखसुखः
सुख और दुःख में सम
स्वस्थः
अपने स्वरूप में स्थित
समलोष्टाश्मकाञ्चनः
मिट्टी, पत्थर और सोने में सम
तुल्यप्रियाप्रियः
प्रिय और अप्रिय में तुल्य
धीरः
धीर, ज्ञानी
तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः
अपनी निन्दा और स्तुति में तुल्य

अन्वय: समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः तुल्यप्रियाप्रियः तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः धीरः।

जो सुख और दुःख में सम है, अपने स्वरूप में स्थित है, मिट्टी, पत्थर और सोने में सम है, प्रिय और अप्रिय में तुल्य है, धीर है और अपनी निन्दा तथा स्तुति में तुल्य है।

14.25मानावमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः

मानावमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः ।
सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते ॥25॥

mānāvamānayos tulyas tulyo mitrāripakṣayoḥ |
sarvārambhaparityāgī guṇātītaḥ sa ucyate

मानावमानयोः
मान और अपमान में
तुल्यः
तुल्य
तुल्यः
तुल्य
मित्रारिपक्षयोः
मित्र और शत्रु के पक्ष में
सर्वारम्भपरित्यागी
सब आरम्भों का त्यागी
गुणातीतः
गुणातीत
सः
वह
उच्यते
कहा जाता है

अन्वय: मानावमानयोः तुल्यः, मित्रारिपक्षयोः तुल्यः, सर्वारम्भपरित्यागी सः गुणातीतः उच्यते।

जो मान और अपमान में तुल्य है, मित्र और शत्रु के पक्ष में तुल्य है, और सब कर्मों के आरम्भ का त्यागी है, वह गुणातीत कहा जाता है।

14.26मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते

मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते ।
स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥26॥

māṃ ca yo ’vyabhicāreṇa bhaktiyogena sevate |
sa guṇān samatītyaitān brahmabhūyāya kalpate

माम्
मुझको
च
और
यः
जो
अव्यभिचारेण
अविचल
भक्तियोगेन
भक्तियोग से
सेवते
सेवा करता है
सः
वह
गुणान्
गुणों को
समतीत्य
भली प्रकार लाँघकर
एतान्
इन
ब्रह्मभूयाय
ब्रह्म होने के
कल्पते
योग्य होता है

अन्वय: यः च माम् अव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते, सः एतान् गुणान् समतीत्य ब्रह्मभूयाय कल्पते।

और जो अविचल भक्तियोग से मेरी सेवा करता है, वह इन गुणों को भली प्रकार लाँघकर ब्रह्म होने के योग्य होता है।

14.27ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च

ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च ।
शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च ॥27॥

brahmaṇo hi pratiṣṭhāham amṛtasyāvyayasya ca |
śāśvatasya ca dharmasya sukhasyaikāntikasya ca

ब्रह्मणः
ब्रह्म का
हि
क्योंकि
प्रतिष्ठा
आश्रय
अहम्
मैं
अमृतस्य
अमृत का
अव्ययस्य
अविनाशी का
च
और
शाश्वतस्य
शाश्वत
च
और
धर्मस्य
धर्म का
सुखस्य
सुख का
ऐकान्तिकस्य
एकान्तिक, अखण्ड
च
और

अन्वय: हि अहम् अमृतस्य अव्ययस्य च ब्रह्मणः, शाश्वतस्य धर्मस्य च, ऐकान्तिकस्य सुखस्य च प्रतिष्ठा।

क्योंकि उस अमृत और अविनाशी ब्रह्म का, शाश्वत धर्म का और एकान्तिक सुख का आश्रय मैं ही हूँ।