‘निर्वेद’ नौवाँ-प्रकरण है। निर्वेद का अर्थ है ‘विषयों से उदासीनता’, मगर यह उदासीनता हताशा नहीं है। बौद्ध-धर्म के ‘निब्बिदा’ से यह शब्द-सम्बन्ध रखता है, मगर भाव-अर्थ में अन्तर है। बौद्ध-निब्बिदा एक तरह की ‘विरक्ति’ है, अष्टावक्र-निर्वेद एक तरह की ‘सहज-असंलग्नता’। आधुनिक-काल में अल्बेर कामू (Albert Camus, 1913-1960) ने अपने ‘द मिथ ऑफ़ सिसिफ़ोस’ (1942) में जिस ‘absurd-awareness’ की बात की, वह अष्टावक्र के निर्वेद से दूर है, क्योंकि कामू-निर्वेद-में एक tragic का स्वर है, अष्टावक्र में एक-शान्त-तटस्थता।पाठ्य-संगति
निर्वेद
Detachment · 8 श्लोक
मोक्ष की पहचान करा चुकने के बाद अष्टावक्र अब उतर आते हैं उस सीधी राह पर, जहाँ वैराग्य किसी व्रत से नहीं, सिर्फ़ देखने और समझने से उतरता है। आठ श्लोकों में वे जनक को यही दिखाते हैं कि निर्वेद कोई उदासी नहीं, संसार से एक सहज विमुखता है।

अष्टावक्र पहला ही प्रश्न ऐसा रखते हैं जिसका उत्तर देने में हर मन हार जाता है। किया और न-किया, यह जो द्वन्द्व मन को रात-दिन मथता रहता है, वह आख़िर किसका और कब शान्त हुआ? हर ‘कर लिया’ के पीछे एक नया ‘करना अभी बाक़ी है’ खड़ा मिलता है, यह कभी न रुकने वाला फेरा है। यही जान लेने से, आप किसी व्रत के बन्धन में बँधे बिना ही त्याग की ओर सहज ढल जाते हैं। साधक संकल्प लेते हैं, यह करूँगा, यह नहीं करूँगा; अष्टावक्र कहते हैं, संकल्प की ज़रूरत ही नहीं, निर्वेद अपने-आप उतरे, तो व्रत ख़ुद-ब-ख़ुद घटित हो जाते हैं।
श्लोक 1
कृताकृते च द्वन्द्वानि कदा शान्तानि कस्य वा।
एवं ज्ञात्वेह निर्वेदाद्भव त्यागपरोऽव्रती॥
फिर अष्टावक्र स्नेह से बेटा कह कर बुलाते हैं और एक दुर्लभ बात बताते हैं। किसी विरले धन्य पुरुष की तो बस दुनिया की दौड़-भाग देख लेने भर से तीनों इच्छाएँ ठंडी पड़ जाती हैं, जीने की लालसा, भोग की भूख और जानने की प्यास। बाज़ार में जाइए और लोगों को देखिए, हर कोई दौड़ रहा है, परेशान है, खीझा हुआ है; यह सब देख कर ही किसी धन्य मन में सहज उतर आता है कि यह आख़िर किस बात की भागम-भाग है। और जानने की इच्छा भी थम जाती है, क्योंकि ज्ञानी के लिए अब जानने को कुछ बचता ही नहीं।
श्लोक 2
कस्यापि तात धन्यस्य लोकचेष्टावलोकनात्।
जीवितेच्छा बुभुक्षा च बुभुत्सोपशमः गताः॥
यह सब जो दिख रहा है, अष्टावक्र कहते हैं, अनित्य है, तीन तापों से दूषित है, निःसार है, निन्दित है और छोड़ देने योग्य है; यही निश्चय हो जाए, तो साधक शान्त हो जाता है। ये तीन ताप हैं, अपने ही भीतर से उठने वाला आध्यात्मिक, दूसरों से मिलने वाला आधिभौतिक, और प्रकृति की मार से आने वाला आधिदैविक। कोई भी सुख इन तीनों में से किसी न किसी से दूषित मिलेगा, कोई निर्मल सुख है ही नहीं। किसी भी अच्छे लगने वाले अवसर को सोचिए और देखिए उसमें कौन-सा ताप मिला है, हर खुशी में कहीं न कहीं एक पकड़ छिपी रहती है।
श्लोक 3
अनित्यं सर्वमेवेदं तापत्रितयदूषितम्।
असारं निन्दितं हेयमिति निश्चित्य शाम्यति॥
अब अष्टावक्र उस भ्रम को तोड़ते हैं कि कभी कोई ऐसा समय आएगा जब द्वन्द्व अपने-आप शान्त हो जाएँगे। वह कौन-सा काल है, कौन-सी उम्र है, जिसमें मनुष्यों के द्वन्द्व न हों? बचपन के अपने द्वन्द्व, जवानी के अपने, बुढ़ापे के अपने; हर उम्र अपना संघर्ष साथ लाती है। इसलिए उनकी उपेक्षा कर के, जो मिले उसी में रहने वाला साधक सिद्धि पा लेता है। यह उपेक्षा तिरस्कार नहीं है, बस उनसे उलझना छोड़ देना है, और जो सामने आए उसी में टिक जाना है। द्वन्द्व के ख़त्म होने का इन्तज़ार छोड़िए और अभी से उन्हें अनदेखा करना सीख लीजिए।
श्लोक 4
कोऽसौ कालो वयः किं वा यत्र द्वन्द्वानि नो नृणाम्।
तान्युपेक्ष्य यथाप्राप्तवर्ती सिद्धिमवाप्नुयात्॥
साधक प्रायः एक मत ढूँढ़ता रहता है, सोचता है यही सच्चाई है। पर अष्टावक्र एक बारीक बात की ओर ले जाते हैं। महर्षियों के, साधुओं के, योगियों के मत आपस में कितने अलग-अलग हैं; यह देख कर जिस मनुष्य को निर्वेद उतर आए, वह भला शान्त क्यों न होगा। हर गुरु, हर शिक्षक, हर ग्रन्थ कुछ और ही कह रहा है, और पहली नज़र में यह उलझन-भरा लगता है। मगर यही उलझन सबसे बड़ी शिक्षा है, क्योंकि यह बता देती है कि उत्तर बाहर किसी मत में नहीं, भीतर अपने ही अनुभव में मिलेगा।
श्लोक 5
नाना मतं महर्षीणां साधूनां योगिनां तथा।
दृष्ट्वा निर्वेदमापन्नः को न शाम्यति मानवः॥
यहाँ गुरु की पहचान भी और साफ़ हो जाती है। जो चैतन्य का सच्चा परिज्ञान करा दे, और निर्वेद तथा समता की युक्ति से जो संसार के पार उतार दे, क्या वही सच्चा गुरु नहीं? गुरु वह नहीं जो केवल कर्मकाण्ड सिखा दे; गुरु वह है जो चेतना का बोध करा कर समता की राह से इस आवागमन से तार दे। और यह युक्ति हर शिष्य के लिए अलग होती है, किसी को कथा से, किसी को ध्यान से, किसी को सीधी आत्म-जिज्ञासा से; सही गुरु हर शिष्य के लिए ठीक वही उपाय चुन लेता है।
श्लोक 6
कृत्वा मूर्तिपरिज्ञानं चैतन्यस्य न किं गुरुः।
निर्वेदसमतायुक्त्या यस्तारयति संसृतेः॥
अब अष्टावक्र एक ऐसी दृष्टि देते हैं जो उसी क्षण मुक्त कर सकती है। भूत-विकारों को, यानी पंच-तत्वों के इन तमाम रूपान्तरों को, आप यथार्थ रूप में सिर्फ़ तत्व-मात्र देख लीजिए, और उसी क्षण बन्धन से छूट कर अपने स्वरूप में स्थित हो जाएँगे। एक मेज़ को देखिए, वह लकड़ी है, लकड़ी पेड़ है, पेड़ मिट्टी और पानी और धूप का जोड़ है, अन्ततः पाँच तत्वों की एक सजावट भर है। यही दृष्टि अपने शरीर पर डालिए, उसे ‘मैं’ मत मानिए, बस तत्वों का एक ठहराव समझिए, और फिर यही देखना बाक़ी हर चीज़ पर ले जाइए।
श्लोक 7
पश्य भूतविकारांस्त्वं भूतमात्रान्यथार्थतः।
तत्क्षणाद्बन्धनिर्मुक्तः स्वरूपस्थो भविष्यसि॥
और अन्त में अष्टावक्र पूरे प्रकरण की धुरी रख देते हैं। वासनाएँ ही संसार हैं, यह जान कर उन सबको छोड़ दीजिए; वासना के त्याग से ही संसार का त्याग सध जाता है, फिर आज जैसे भी रहना हो, वैसे रहिए। बाहर का संसार तो बस परिणाम है, असली ताना-बाना तो भीतर बैठी वासनाएँ हैं, यही जड़ हैं। इसीलिए बाहर का कुछ बदलना ज़रूरी नहीं, भीतर का खिसक जाना ज़रूरी है। यही इस प्रकरण का केन्द्रीय स्वर है, निर्वेद किसी बल या जबरदस्ती से नहीं, बस समझ से उतरता है; दुनिया को, द्वन्द्व को, मतों के भेद को और अनित्यता को पहचान लीजिए, और वैराग्य अपने-आप चला आएगा।
श्लोक 8
वासना एव संसार इति सर्वा विमुञ्च ताः।
तत्त्यागो वासनात्यागात्स्थितिरद्य यथा तथा॥