Lulla Family

अष्टावक्र गीता · प्रकरण 8: मोक्ष

पढ़ने में लगभग 5 मिनट · 686 शब्द

पाठ्य-संगति

‘मोक्ष’ आठवाँ-प्रकरण है। अष्टावक्र का मोक्ष-दर्शन क्रान्तिकारी है, क्योंकि वह कहते हैं कि मोक्ष कोई ‘फल’ नहीं है जिसे प्राप्त करना हो। मोक्ष पहले-से उपलब्ध है, सिर्फ़ अज्ञान का पर्दा हटाना है। यह स्थापना आदि शंकराचार्य के ‘अद्यैव-मोक्ष-वाद’ (मोक्ष यहीं-अभी है) का दार्शनिक-पूर्व-सूचक है।

आधुनिक-दर्शन में हाइडेगर (Martin Heidegger) की ‘अनकवर्डनेस’ (Unverborgenheit) की अवधारणा अष्टावक्र के मोक्ष-दर्शन से तुलनीय है। दोनों में सत्य ‘खोजी जाती’ नहीं है, बल्कि ‘खुलती’ है।

अष्टावक्र गीता · प्रकरण 8

मोक्ष

Liberation · 4 श्लोक

अष्टावक्र मात्र चार श्लोकों में बन्धन और मोक्ष का definition दे देते हैं।behavioral है। चित्त की एक state बन्धन है, दूसरी state मोक्ष। बस।

आठवाँ प्रकरण “मोक्ष” की अष्टावक्र-व्याख्या रखता है। मोक्ष कोई-स्थान या स्थिति नहीं, बल्कि अपने-स्वरूप की recognition। यह position बादरायण-व्यास के ब्रह्म-सूत्रों के चौथे अध्याय से अद्भुत-तौर पर मेल खाती है, हालाँकि अष्टावक्र-गीता की रचना ब्रह्म-सूत्रों से शायद पुरानी है।

अब तक

शान्ति के बाद, मोक्ष। यह मोक्ष पहले से मौजूद है, इसे कहीं से लाना नहीं पड़ता।

← प्रकरण 7  ·  सब प्रकरण

Panel for ag/ag-panel-08-bondage-illusion.jpg
श्लोक 1
अष्टावक्र उवाच
तदा बन्धो यदा चित्तं किञ्चिद् वाञ्छति शोचति।
किञ्चिन्मुञ्चति गृह्णाति किञ्चिद्दृष्यति कुप्यति॥
tadā bandho yadā cittaṁ kiñcid vāñchati śocati
kiñcin muñcati gṛhṇāti kiñcid dṛṣyati kupyati

अर्थ“तब बन्धन है जब चित्त कुछ चाहता है, कुछ शोक करता है, कुछ छोड़ता है, कुछ पकड़ता है, कुछ देख कर खुश होता है, कुछ देख कर क्रुद्ध।”

सन्दर्भछह actions list की गयीं: चाहना, शोक, छोड़ना, पकड़ना, खुश होना, क्रोध। यह सब verbs हैं, ego के signs। जब तक यह actions चित्त में चल रहे हैं, “मैं” अपने आप को doer मान रहा है। यही बन्धन।

पाठक के लिएएक check-list बना सकते हैं। आज क्या-क्या किया? “कुछ चाहा? हाँ। शोक किया? हाँ। पकड़ा? हाँ।” तो आज बँधे थे। साधना यह है, इन actions को कम करना नहीं, observe करना। कौन कर रहा है? क्यों?

श्लोक 2
अष्टावक्र उवाच
तदा मुक्तिर्यदा चित्तं न वाञ्छति न शोचति।
न मुञ्चति न गृह्णाति न हृष्यति न कुप्यति॥
tadā muktir yadā cittaṁ na vāñchati na śocati
na muñcati na gṛhṇāti na hṛṣyati na kupyati

अर्थ“तब मुक्ति है जब चित्त न चाहता है, न शोक करता है, न छोड़ता है, न पकड़ता है, न खुश होता है, न क्रुद्ध।”

सन्दर्भपिछले श्लोक का mirror। हर “हाँ” अब “नहीं”। यहाँ कुछ दबाया नहीं जा रहा, बस एक natural calm खुद से आ जाती है। जब “मैं” doer नहीं, तो इन actions का base नहीं। तो वो उठते ही नहीं।

पाठक के लिएयह श्लोक misleading लग सकता है, “तो मोक्ष यानी कुछ feel ही न करना?” नहीं। ख़ुशी आती है, मगर “मैं ख़ुश” का sense नहीं। क्रोध आता है, मगर “मैं क्रुद्ध” का sense नहीं। बस energy flow करती है, “मैं” उसमें fix नहीं होता।

श्लोक 3
अष्टावक्र उवाच
तदा बन्धो यदा चित्तं सक्तं काश्वपि दृष्टिषु।
तदा मोक्षो यदा चित्तमसक्तं सर्वदृष्टिषु॥
tadā bandho yadā cittaṁ saktaṁ kāśv api dṛṣṭiṣu
tadā mokṣo yadā cittam asaktaṁ sarva-dṛṣṭiṣu

अर्थ“तब बन्धन है जब चित्त किसी भी experience में आसक्त। तब मोक्ष है जब चित्त सब experiences में अनासक्त।”

सन्दर्भ“दृष्टि” यानी sense-experience। “kāś” का अर्थ है “any one”। यानी एक experience में भी अगर stuck हुआ, बन्धन। और “sarva” यानी “all”। सब में, मतलब हर एक में, untouched।

पाठक के लिएआप दिन भर अनेक experiences से gua़रते हैं। हर experience में थोड़ी देर पकड़ बनती है। यह कॉफ़ी अच्छी, यह वातावरण ख़राब। यह “थोड़ी देर की पकड़” ही बन्धन है। release होना ज़रूरी।

श्लोक 4
अष्टावक्र उवाच
यदा नाहं तदा मोक्षो यदाहं बन्धनं तदा।
मत्वेति हेलया किञ्चिन्मा गृहाण विमुञ्च मा॥
yadā nāhaṁ tadā mokṣo yadāhaṁ bandhanaṁ tadā
matveti helayā kiñcin mā gṛhāṇa vimuñca mā

अर्थ“जब ‘मैं’ नहीं, तब मोक्ष। जब ‘मैं’ है, तब बन्धन। यह मान कर, हल्के से, कुछ भी न पकड़, न छोड़।”

सन्दर्भ“हेलया”, “हल्के से”। यह अष्टावक्र का signature touch है। साधना heavy नहीं। ज़बरदस्ती नहीं। एक हल्की सी shift। और “किञ्चित् मा गृहाण विमुञ्च मा”, “कुछ भी न पकड़, न छोड़”। दोनों action हैं। दोनों से बचो।

पाठक के लिएप्रकरण 8 ख़त्म। चार श्लोकों का formula simple है। जब “मैं” reduce होता है, मोक्ष। जब “मैं” expand होता है, बन्धन। साधना यह है: “मैं” को न पकड़ना, न ज़बरदस्ती मिटाना। बस उसे observe करना, हल्के से।

॥ मोक्ष ॥