पाठ्य-संगति
‘मोक्ष’ आठवाँ-प्रकरण है। अष्टावक्र का मोक्ष-दर्शन क्रान्तिकारी है, क्योंकि वह कहते हैं कि मोक्ष कोई ‘फल’ नहीं है जिसे प्राप्त करना हो। मोक्ष पहले-से उपलब्ध है, सिर्फ़ अज्ञान का पर्दा हटाना है। यह स्थापना आदि शंकराचार्य के ‘अद्यैव-मोक्ष-वाद’ (मोक्ष यहीं-अभी है) का दार्शनिक-पूर्व-सूचक है।
आधुनिक-दर्शन में मार्टिन हाइडेगर की ‘अनावृतता’ की अवधारणा अष्टावक्र के मोक्ष-दर्शन से तुलनीय है। दोनों में सत्य ‘खोजी जाती’ नहीं है, बल्कि ‘खुलती’ है।
मोक्ष
4 श्लोक
अष्टावक्र मात्र चार श्लोकों में बन्धन और मोक्ष की परिभाषा दे देते हैं, और यह परिभाषा व्यवहार की है। चित्त की एक अवस्था बन्धन है, दूसरी अवस्था मोक्ष। बस।
आठवाँ प्रकरण “मोक्ष” की अष्टावक्र-व्याख्या रखता है। मोक्ष कोई-स्थान या स्थिति नहीं, बल्कि अपने-स्वरूप की पहचान। यह धारणा बादरायण-व्यास के ब्रह्म-सूत्रों के चौथे अध्याय से अद्भुत-तौर पर मेल खाती है, हालाँकि अष्टावक्र-गीता की रचना ब्रह्म-सूत्रों से शायद पुरानी है।
अब तक
शान्ति के बाद, मोक्ष। यह मोक्ष पहले से मौजूद है, इसे कहीं से लाना नहीं पड़ता।

किञ्चिन्मुञ्चति गृह्णाति किञ्चिद्धृष्यति कुप्यति॥
kiñcin muñcati gṛhṇāti kiñcid dhṛṣyati kupyati
अर्थ“तब बन्धन है जब चित्त कुछ चाहता है, कुछ शोक करता है, कुछ छोड़ता है, कुछ पकड़ता है, किसी बात पर हर्षित होता है, किसी पर क्रुद्ध।”
पाठक के लिएएक सूची बना सकते हैं। आज क्या-क्या किया? “कुछ चाहा? हाँ। शोक किया? हाँ। पकड़ा? हाँ।” तो आज बँधे थे। साधना यह है, इन क्रियाओं को कम करना नहीं, उन्हें देखना। कौन कर रहा है? क्यों?
न मुञ्चति न गृह्णाति न हृष्यति न कुप्यति॥
na muñcati na gṛhṇāti na hṛṣyati na kupyati
अर्थ“तब मुक्ति है जब चित्त न चाहता है, न शोक करता है, न छोड़ता है, न पकड़ता है, न खुश होता है, न क्रुद्ध।”
पाठक के लिएयह श्लोक भ्रम में डाल सकता है, “तो मोक्ष यानी कुछ महसूस ही न करना?” नहीं। ख़ुशी आती है, मगर “मैं ख़ुश” का भाव नहीं। क्रोध आता है, मगर “मैं क्रुद्ध” का भाव नहीं। बस ऊर्जा बहती है, “मैं” उसमें अटकता नहीं।
तदा मोक्षो यदा चित्तमसक्तं सर्वदृष्टिषु॥
tadā mokṣo yadā cittam asaktaṁ sarva-dṛṣṭiṣu
अर्थ“तब बन्धन है जब चित्त किसी भी अनुभव में आसक्त। तब मोक्ष है जब चित्त सब अनुभवों में अनासक्त।”
पाठक के लिएआप दिन भर अनेक अनुभवों से गुज़रते हैं। हर अनुभव में थोड़ी देर पकड़ बनती है। यह कॉफ़ी अच्छी, यह वातावरण ख़राब। यह “थोड़ी देर की पकड़” ही बन्धन है। इससे छूटना ज़रूरी है।
मत्वेति हेलया किञ्चिन्मा गृहाण विमुञ्च मा॥
matveti helayā kiñcin mā gṛhāṇa vimuñca mā
अर्थ“जब ‘मैं’ नहीं, तब मोक्ष। जब ‘मैं’ है, तब बन्धन। यह मान कर, हल्के से, कुछ भी न पकड़, न छोड़।”
पाठक के लिएप्रकरण 8 ख़त्म। चार श्लोकों का सूत्र सीधा है। जब “मैं” घटता है, मोक्ष। जब “मैं” फैलता है, बन्धन। साधना यह है: “मैं” को न पकड़ना, न ज़बरदस्ती मिटाना। बस उसे देखते रहना, हल्के से।