वैराग्य
Dispassion · 8 श्लोक
निर्वेद की elaboration। आठ श्लोकों में अष्टावक्र practical detachment की बात करते हैं। यह “रोज़ की detachment” का manual है, philosophy नहीं।
धर्ममप्येतयोर्हेतुं सर्वत्रादरमुत्सृज॥
dharmam apy etayor hetuṁ sarvatrādaram utsṛja
अर्थ“शत्रु काम (इच्छा) को छोड़, अनर्थ-संकुल अर्थ (धन) को छोड़। और इन दोनों के कारणभूत धर्म को भी छोड़। सब जगह से ‘आदर’ का भाव त्याग।”
पाठक के लिए“आदर उत्सृज”, आदर छोड़। आदर पाने की चाह भी एक trap है। इज़्ज़त, respect, यह सब chase करने पर समाप्त नहीं होता। ज्ञानी respect का भी चाहना छोड़ देता है।
मित्रक्षेत्रधनागारदारदायादिसम्पदः॥
mitra-kṣetra-dhanāgāra-dāra-dāyādi-sampadaḥ
अर्थ“मित्र, खेत, धन, घर, पत्नी, सम्बन्धी, यह सब सम्पदा सिर्फ़ तीन या पाँच दिन के लिए, स्वप्न और इन्द्रजाल की तरह देख।”
पाठक के लिएएक exercise। अपनी सब “important” चीज़ें list करो। अब सोचो, यह सब 100 साल बाद कहाँ होंगी? 1000 साल बाद? जब scale बदलती है, perspective बदलता है। फिर भी रोज़मर्रा में यह सब “ज़रूरी” लगता है। यही माया का काम है।
प्रौढवैराग्यमाश्रित्य वीततृष्णः सुखी भव॥
prauḍha-vairāgyam āśritya vīta-tṛṣṇaḥ sukhī bhava
अर्थ“जहाँ-जहाँ तृष्णा हो, वहाँ-वहाँ संसार जान। प्रौढ़ वैराग्य का आश्रय ले कर, वीत-तृष्ण हो कर, सुखी हो।”
पाठक के लिए“प्रौढ़ वैराग्य”। यह कच्ची विरक्ति नहीं, mature dispassion है। यह thought नहीं, recognition है। बार-बार बहुत observations से, बहुत dissatisfactions से, यह आता है।
भवासंसक्तिमात्रेण प्राप्तितुष्टिर्मुहुर्मुहुः॥
bhavāsaṁsakti-mātreṇa prāpti-tuṣṭir muhur muhuḥ
अर्थ“बन्धन सिर्फ़ तृष्णा का स्वरूप है। उसके नाश को ही मोक्ष कहते हैं। संसार में आसक्त न होने मात्र से ही, बार-बार प्राप्ति की तुष्टि होती है।”
पाठक के लिए“प्राप्ति-तुष्टि”। कुछ “पाने” का सुख। जब आसक्ति नहीं, तब हर moment “पाया” लगता है। क्योंकि “मिला” वो जो already था। साँस, life, awareness।
अविद्यापि न किञ्चित्सा का बुभुत्सा तथापि ते॥
avidyāpi na kiñcit sā kā bubhutsā tathāpi te
अर्थ“तू एक, चेतन, शुद्ध है। यह विश्व जड़ है, और असत्। अविद्या भी कुछ नहीं। फिर भी तेरी ‘जानने’ की इच्छा कैसी?”
पाठक के लिए“बुभुत्सा” यानी curiosity, knowing-desire। पढ़ते-पढ़ते एक point आता है जहाँ “और जानने” की चाह ख़ुद obstacle बन जाती है। आख़िर में “जानना” भी छोड़ना पड़ता है। बस होना।
संसक्तस्यापि नष्टानि तव जन्मनि जन्मनि॥
saṁsaktasyāpi naṣṭāni tava janmani janmani
अर्थ“राज्य, बेटे, पत्नियाँ, शरीर, और सुख, यह सब, चाहे तू कितना भी आसक्त रहा हो, तेरे जन्म-जन्म में नष्ट हुए हैं।”
पाठक के लिएएक memory exercise। बचपन की वो toys जो “मेरी” थीं, अब कहाँ? वो दोस्त जो “ज़रूरी” थे, अब कहाँ? वो relationships, jobs, dreams, कितने ख़त्म हुए। और हर बार लगा “इस बार वाला permanent है”। हर बार ग़लत।
एभ्यः संसारकान्तारे न विश्रान्तमभून्मनः॥
ebhyaḥ saṁsāra-kāntāre na viśrāntam abhūn manaḥ
अर्थ“बस, अब अर्थ से, काम से, और सुकृत कर्मों से भी काफ़ी। इनसे संसार रूपी जंगल में मन को विश्राम नहीं मिला।”
पाठक के लिए“विश्रान्तम् अभून् मनः”। मन को विश्राम नहीं मिला। यह key word है। हम कितना भी पाएँ, मन rest नहीं पाता। अगला goal आ जाता है। यही proof है कि goals से शान्ति नहीं मिलेगी।
दुःखमायासदं कर्म तदद्याप्युपरम्यताम्॥
duḥkham āyāsa-daṁ karma tad adyāpy uparamyatām
अर्थ“कितने जन्मों में किया? शरीर से, मन से, वाणी से। और दुःखदायी, थका देने वाला कर्म। आज अब उसे रोक।”
पाठक के लिएप्रकरण 10 ख़त्म। यह श्लोक beat है, “अब बस”। हम बार-बार “अब last time” बोलते हैं, फिर repeat करते हैं। अष्टावक्र कहते हैं, सच में “बस” का moment अभी है। अभी doing से being में shift।