अष्टावक्र गीता · प्रकरण 10: वैराग्य

अष्टावक्र गीता · प्रकरण 10

वैराग्य

Dispassion · 8 श्लोक

निर्वेद की elaboration। आठ श्लोकों में अष्टावक्र practical detachment की बात करते हैं। यह “रोज़ की detachment” का manual है, philosophy नहीं।

श्लोक 1
अष्टावक्र उवाच
विहाय वैरिणं काममर्थं चानर्थसंकुलम्।
धर्ममप्येतयोर्हेतुं सर्वत्रादरमुत्सृज॥
vihāya vairiṇaṁ kāmam arthaṁ cānartha-saṅkulam
dharmam apy etayor hetuṁ sarvatrādaram utsṛja

अर्थ“शत्रु काम (इच्छा) को छोड़, अनर्थ-संकुल अर्थ (धन) को छोड़। और इन दोनों के कारणभूत धर्म को भी छोड़। सब जगह से ‘आदर’ का भाव त्याग।”

सन्दर्भयह radical है। अष्टावक्र काम और अर्थ तो छुड़ाते ही हैं, साथ में धर्म भी। क्यों? क्योंकि “धर्म” करते हैं तो काम-अर्थ का base बना रहता है (पुण्य से अगले जन्म में और अच्छा भोग)। अष्टावक्र कहते हैं, चारों पुरुषार्थों को छोड़, सिर्फ़ “साक्षी” बच।

पाठक के लिए“आदर उत्सृज”, आदर छोड़। आदर पाने की चाह भी एक trap है। इज़्ज़त, respect, यह सब chase करने पर समाप्त नहीं होता। ज्ञानी respect का भी चाहना छोड़ देता है।

श्लोक 2
अष्टावक्र उवाच
स्वप्नेन्द्रजालवत्पश्य दिनानि त्रीणि पञ्च वा।
मित्रक्षेत्रधनागारदारदायादिसम्पदः॥
svapnendrajāla-vat paśya dināni trīṇi pañca vā
mitra-kṣetra-dhanāgāra-dāra-dāyādi-sampadaḥ

अर्थ“मित्र, खेत, धन, घर, पत्नी, सम्बन्धी, यह सब सम्पदा सिर्फ़ तीन या पाँच दिन के लिए, स्वप्न और इन्द्रजाल की तरह देख।”

सन्दर्भ“तीन या पाँच दिन”। यह specific नहीं, यह “अल्प कुछ समय” के लिए metaphor है। 80 साल भी, time-scale से देखो, बहुत छोटा है। हर रिश्ता, हर property, हर achievement, सब कुछ समय के लिए।

पाठक के लिएएक exercise। अपनी सब “important” चीज़ें list करो। अब सोचो, यह सब 100 साल बाद कहाँ होंगी? 1000 साल बाद? जब scale बदलती है, perspective बदलता है। फिर भी रोज़मर्रा में यह सब “ज़रूरी” लगता है। यही माया का काम है।

श्लोक 3
अष्टावक्र उवाच
यत्र यत्र भवेत्तृष्णा संसारं विद्धि तत्र वै।
प्रौढवैराग्यमाश्रित्य वीततृष्णः सुखी भव॥
yatra yatra bhavet tṛṣṇā saṁsāraṁ viddhi tatra vai
prauḍha-vairāgyam āśritya vīta-tṛṣṇaḥ sukhī bhava

अर्थ“जहाँ-जहाँ तृष्णा हो, वहाँ-वहाँ संसार जान। प्रौढ़ वैराग्य का आश्रय ले कर, वीत-तृष्ण हो कर, सुखी हो।”

सन्दर्भ“संसार” geographic नहीं, mental है। बाहर का संसार छोड़ कर ध्यान-कक्ष में बैठो, मगर वहाँ भी तृष्णा है, तो वहीं संसार है। और जो आदमी बाज़ार में बैठा है, वीत-तृष्ण, उसका वहीं मोक्ष।

पाठक के लिए“प्रौढ़ वैराग्य”। यह कच्ची विरक्ति नहीं, mature dispassion है। यह thought नहीं, recognition है। बार-बार बहुत observations से, बहुत dissatisfactions से, यह आता है।

श्लोक 4
अष्टावक्र उवाच
तृष्णामात्रात्मको बन्धस्तन्नाशो मोक्ष उच्यते।
भवासंसक्तिमात्रेण प्राप्तितुष्टिर्मुहुर्मुहुः॥
tṛṣṇā-mātrātmako bandhas tan-nāśo mokṣa ucyate
bhavāsaṁsakti-mātreṇa prāpti-tuṣṭir muhur muhuḥ

अर्थ“बन्धन सिर्फ़ तृष्णा का स्वरूप है। उसके नाश को ही मोक्ष कहते हैं। संसार में आसक्त न होने मात्र से ही, बार-बार प्राप्ति की तुष्टि होती है।”

सन्दर्भयह formula है। बन्धन = तृष्णा। मोक्ष = तृष्णा का abode। और एक twist: “मुहुर्मुहुः”, “बार-बार”। यानी तृष्णा कभी नहीं भी मिटे, हर moment की detachment ही प्राप्ति की तुष्टि देती है।

पाठक के लिए“प्राप्ति-तुष्टि”। कुछ “पाने” का सुख। जब आसक्ति नहीं, तब हर moment “पाया” लगता है। क्योंकि “मिला” वो जो already था। साँस, life, awareness।

श्लोक 5
अष्टावक्र उवाच
त्वमेकश्चेतनः शुद्धो जडं विश्वमसत्तथा।
अविद्यापि न किञ्चित्सा का बुभुत्सा तथापि ते॥
tvam ekaś cetanaḥ śuddho jaḍaṁ viśvam asat tathā
avidyāpi na kiñcit sā kā bubhutsā tathāpi te

अर्थ“तू एक, चेतन, शुद्ध है। यह विश्व जड़ है, और असत्। अविद्या भी कुछ नहीं। फिर भी तेरी ‘जानने’ की इच्छा कैसी?”

सन्दर्भ“अविद्या भी कुछ नहीं”। यह advanced point है। साधक सोचता है, “अविद्या को हटाना है”। पर अविद्या तो illusion ही है। उसे हटाने के लिए effort, ख़ुद अविद्या को confirm कर देता है। बस “जानने” की चाह छोड़ो।

पाठक के लिए“बुभुत्सा” यानी curiosity, knowing-desire। पढ़ते-पढ़ते एक point आता है जहाँ “और जानने” की चाह ख़ुद obstacle बन जाती है। आख़िर में “जानना” भी छोड़ना पड़ता है। बस होना।

श्लोक 6
अष्टावक्र उवाच
राज्यं सुताः कलत्राणि शरीराणि सुखानि च।
संसक्तस्यापि नष्टानि तव जन्मनि जन्मनि॥
rājyaṁ sutāḥ kalatrāṇi śarīrāṇi sukhāni ca
saṁsaktasyāpi naṣṭāni tava janmani janmani

अर्थ“राज्य, बेटे, पत्नियाँ, शरीर, और सुख, यह सब, चाहे तू कितना भी आसक्त रहा हो, तेरे जन्म-जन्म में नष्ट हुए हैं।”

सन्दर्भpunarjanma-context। हर जन्म में यह same list आती है, और हर जन्म में सब नष्ट होता है। तो इस बार attach होने का क्या मतलब? यह श्लोक जो punarjanma नहीं मानते, उनके लिए भी काम का है: इस एक जन्म में भी, अनगिनत बार “मेरा” आया, गया।

पाठक के लिएएक memory exercise। बचपन की वो toys जो “मेरी” थीं, अब कहाँ? वो दोस्त जो “ज़रूरी” थे, अब कहाँ? वो relationships, jobs, dreams, कितने ख़त्म हुए। और हर बार लगा “इस बार वाला permanent है”। हर बार ग़लत।

श्लोक 7
अष्टावक्र उवाच
अलमर्थेन कामेन सुकृतेनापि कर्मणा।
एभ्यः संसारकान्तारे न विश्रान्तमभून्मनः॥
alam arthena kāmena sukṛtenāpi karmaṇā
ebhyaḥ saṁsāra-kāntāre na viśrāntam abhūn manaḥ

अर्थ“बस, अब अर्थ से, काम से, और सुकृत कर्मों से भी काफ़ी। इनसे संसार रूपी जंगल में मन को विश्राम नहीं मिला।”

सन्दर्भ“सुकृत कर्म” यानी अच्छे कर्म, पुण्य। यह भी रास्ता नहीं। बहुत लोग सोचते हैं “अच्छा बनो, मोक्ष मिलेगा”। अष्टावक्र कहते हैं, अच्छा बनना भी एक “करना” है। और “करना” बन्धन है।

पाठक के लिए“विश्रान्तम् अभून् मनः”। मन को विश्राम नहीं मिला। यह key word है। हम कितना भी पाएँ, मन rest नहीं पाता। अगला goal आ जाता है। यही proof है कि goals से शान्ति नहीं मिलेगी।

श्लोक 8
अष्टावक्र उवाच
कृतं न कति जन्मानि कायेन मनसा गिरा।
दुःखमायासदं कर्म तदद्याप्युपरम्यताम्॥
kṛtaṁ na kati janmāni kāyena manasā girā
duḥkham āyāsa-daṁ karma tad adyāpy uparamyatām

अर्थ“कितने जन्मों में किया? शरीर से, मन से, वाणी से। और दुःखदायी, थका देने वाला कर्म। आज अब उसे रोक।”

सन्दर्भ“उपरम्यताम्”, “रोक”। यह command है, weak suggestion नहीं। और timing “आज”। कल नहीं, अभी। क्योंकि “कल” वो कर्म फिर continue हो जाएगा।

पाठक के लिएप्रकरण 10 ख़त्म। यह श्लोक beat है, “अब बस”। हम बार-बार “अब last time” बोलते हैं, फिर repeat करते हैं। अष्टावक्र कहते हैं, सच में “बस” का moment अभी है। अभी doing से being में shift।

॥ वैराग्य ॥