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अष्टावक्र गीता · प्रकरण 10: वैराग्य

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पाठ्य-संगति

वैराग्य’ दसवाँ प्रकरण है। पतंजलि के योग-सूत्रों में अभ्यास और वैराग्य साथ-साथ चलते हैं, मगर अष्टावक्र वैराग्य को अकेला छोड़ देते हैं। यहाँ साधना का बल नहीं माँगा जाता, बस विराग पर्याप्त है।

यही दृष्टि आगे रामकृष्ण-परमहंस के सहज-वैराग्य में फिर सुनाई देती है, जहाँ विराग कोई कमाई हुई वस्तु नहीं, बल्कि अपने ही स्वरूप का स्वाभाविक प्रकाश है।

अष्टावक्र गीता · प्रकरण 10

वैराग्य

विराग · 8 श्लोक

निर्वेद के बाद अब विराग का विस्तार। आठ श्लोकों में अष्टावक्र रोज़ की उस छुटकारे की बात करते हैं जो किसी दर्शन से नहीं, सीधे देखने से उतरती है।

परम्परा में विराग पाँच प्रकार का माना गया, जैसा रूप-गोस्वामी ने भक्ति-रसामृत-सिन्धु में रखा। अष्टावक्र का विराग इन पाँचों से अलग है, क्योंकि वह लक्षण के तल पर नहीं, स्व-स्वरूप के तल पर टिका है।

अब तक

निर्वेद के बाद अब विराग। उदासी नहीं, बल्कि सहज स्वतंत्रता।

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गुरु शिष्य के सामने सीधे चोट करते हैं। पहले वैरी काम को छोड़ने को कहते हैं, फिर अनर्थों से भरे धन को, और फिर वह बात जो चौंका देती है, इन दोनों का मूल कारण जो धर्म है, उसे भी छोड़ देने को। क्योंकि पुण्य भी अगले भोग का बीज बो जाता है। और बात यहीं नहीं रुकती, हर जगह से आदर पाने की चाह तक त्याग देने का आदेश आता है। इसके बाद वे संसार को नापने का एक छोटा-सा पैमाना थमा देते हैं। मित्र, खेत, धन, घर, परिवार, यह सारी सम्पदा वैसे ही देखिए जैसे तीन-पाँच दिन का कोई सपना हो, इन्द्रजाल का खेल हो। अस्सी बरस की उमर भी समय की तराज़ू पर रखिए तो पल-भर है।

श्लोक 1 · 2

विहाय वैरिणं काममर्थं चानर्थसंकुलम्।
धर्ममप्येतयोर्हेतुं सर्वत्रादरमुत्सृज॥

स्वप्नेन्द्रजालवत्पश्य दिनानि त्रीणि पञ्च वा।
मित्रक्षेत्रधनागारदारदायादिसम्पदः॥

अब अष्टावक्र संसार की जड़ की ओर इशारा करते हैं। जहाँ-जहाँ तृष्णा है, वहीं-वहीं संसार है, यह पहचान लीजिए। बाहर का सब छोड़ कर ध्यान-कक्ष में बैठा साधक भी, यदि वहाँ तृष्णा पाले बैठा है, तो वहीं संसार ढो रहा है; और बाज़ार के बीच बैठा वीततृष्ण मनुष्य वहीं मुक्त है। इसलिए प्रौढ़ विराग का आश्रय लीजिए, तृष्णा से रहित हो कर सुखी हो जाइए। फिर गुरु एक सीधा सूत्र खोल देते हैं। बन्धन और कुछ नहीं, बस तृष्णा का ही रूप है; उसी का नाश मोक्ष कहलाता है। और एक मोड़ इसमें छिपा है, संसार में आसक्त न होने मात्र से, बार-बार, हर क्षण, कुछ पा लेने की वही तृप्ति भीतर उतरती रहती है।

श्लोक 3 · 4

यत्र यत्र भवेत्तृष्णा संसारं विद्धि तत्र वै।
प्रौढवैराग्यमाश्रित्य वीततृष्णः सुखी भव॥

तृष्णामात्रात्मको बन्धस्तन्नाशो मोक्ष उच्यते।
भवासंसक्तिमात्रेण प्राप्तितुष्टिर्मुहुर्मुहुः॥

अब गुरु शिष्य की ओर सीधे मुड़ते हैं। आप एक हैं, चेतन हैं, शुद्ध हैं; यह सारा जड़ विश्व असत् है, और जिसे अविद्या कहते हैं वह भी कुछ नहीं। अविद्या को हटाने का प्रयास तो उसी को सच मान बैठने जैसा है। फिर भला और जान लेने की यह चाह कैसी? जानने की प्यास ही अंत में बाधा बन जाती है, बस होना शेष रह जाता है। और गुरु स्मृति की एक खिड़की खोल देते हैं। राज्य, पुत्र, पत्नियाँ, अनेक शरीर और सब सुख, आप चाहे जितने भी इनसे बँधे रहे हों, जन्म-जन्म में यह सब नष्ट होते आए हैं। हर जन्म में वही सूची आई, हर बार सब छूट गया, और हर बार यही भ्रम रहा कि इस बार वाला स्थायी है।

श्लोक 5 · 6

त्वमेकश्चेतनः शुद्धो जडं विश्वमसत्तथा।
अविद्यापि न किञ्चित्सा का बुभुत्सा तथापि ते॥

राज्यं सुताः कलत्राणि शरीराणि सुखानि च।
संसक्तस्यापि नष्टानि तव जन्मनि जन्मनि॥

अब प्रकरण अपने शिखर पर पहुँचता है, मानो गुरु लम्बी थकान के बाद एक गहरी साँस लें। बस, अब धन से, काम से, और तो और पुण्य कर्मों से भी बहुत हो गया; इस संसार रूपी जंगल में इन सबसे भटकते हुए मन को कभी विश्राम नहीं मिला। अच्छा बनना भी एक करना है, और हर करना अपने साथ बेचैनी का अगला लक्ष्य ले आता है। फिर अंतिम वाक्य किसी कोमल सलाह जैसा नहीं, एक स्पष्ट आदेश जैसा गिरता है। न जाने कितने जन्मों से शरीर, मन और वाणी से वह दुखदायी, थका देने वाला कर्म होता आया है; आज, अभी, उसे रोक दीजिए। कल नहीं, क्योंकि कल वही पहिया फिर घूमने लगेगा। करने से होने में उतर आइए।

श्लोक 7 · 8

अलमर्थेन कामेन सुकृतेनापि कर्मणा।
एभ्यः संसारकान्तारे न विश्रान्तमभून्मनः॥

कृतं न कति जन्मानि कायेन मनसा गिरा।
दुःखमायासदं कर्म तदद्याप्युपरम्यताम्॥

॥ वैराग्य ॥