मोक्ष
Liberation · 4 श्लोक
अष्टावक्र मात्र चार श्लोकों में बन्धन और मोक्ष का definition दे देते हैं। यह definition philosophical नहीं, behavioral है। चित्त की एक state बन्धन है, दूसरी state मोक्ष। बस।
किञ्चिन्मुञ्चति गृह्णाति किञ्चिद्दृष्यति कुप्यति॥
kiñcin muñcati gṛhṇāti kiñcid dṛṣyati kupyati
अर्थ“तब बन्धन है जब चित्त कुछ चाहता है, कुछ शोक करता है, कुछ छोड़ता है, कुछ पकड़ता है, कुछ देख कर खुश होता है, कुछ देख कर क्रुद्ध।”
पाठक के लिएएक check-list बना सकते हैं। आज क्या-क्या किया? “कुछ चाहा? हाँ। शोक किया? हाँ। पकड़ा? हाँ।” तो आज बँधे थे। साधना यह है, इन actions को कम करना नहीं, observe करना। कौन कर रहा है? क्यों?
न मुञ्चति न गृह्णाति न हृष्यति न कुप्यति॥
na muñcati na gṛhṇāti na hṛṣyati na kupyati
अर्थ“तब मुक्ति है जब चित्त न चाहता है, न शोक करता है, न छोड़ता है, न पकड़ता है, न खुश होता है, न क्रुद्ध।”
पाठक के लिएयह श्लोक misleading लग सकता है, “तो मोक्ष यानी कुछ feel ही न करना?” नहीं। ख़ुशी आती है, मगर “मैं ख़ुश” का sense नहीं। क्रोध आता है, मगर “मैं क्रुद्ध” का sense नहीं। बस energy flow करती है, “मैं” उसमें fix नहीं होता।
तदा मोक्षो यदा चित्तमसक्तं सर्वदृष्टिषु॥
tadā mokṣo yadā cittam asaktaṁ sarva-dṛṣṭiṣu
अर्थ“तब बन्धन है जब चित्त किसी भी experience में आसक्त। तब मोक्ष है जब चित्त सब experiences में अनासक्त।”
पाठक के लिएआप दिन भर अनेक experiences से gua़रते हैं। हर experience में थोड़ी देर पकड़ बनती है। यह कॉफ़ी अच्छी, यह वातावरण ख़राब। यह “थोड़ी देर की पकड़” ही बन्धन है। release होना ज़रूरी।
मत्वेति हेलया किञ्चिन्मा गृहाण विमुञ्च मा॥
matveti helayā kiñcin mā gṛhāṇa vimuñca mā
अर्थ“जब ‘मैं’ नहीं, तब मोक्ष। जब ‘मैं’ है, तब बन्धन। यह मान कर, हल्के से, कुछ भी न पकड़, न छोड़।”
पाठक के लिएप्रकरण 8 ख़त्म। चार श्लोकों का formula simple है। जब “मैं” reduce होता है, मोक्ष। जब “मैं” expand होता है, बन्धन। साधना यह है: “मैं” को न पकड़ना, न ज़बरदस्ती मिटाना। बस उसे observe करना, हल्के से।