निर्वेद
Detachment · 8 श्लोक
अष्टावक्र अब practical mode में आ जाते हैं। आठ श्लोकों में detachment कैसे आता है, इसका road-map। यह विरक्ति बल से नहीं, समझ से आती है, यह उनका मुख्य point है।
एवं ज्ञात्वेह निर्वेदाद्भव त्यागपरोऽव्रती॥
evaṁ jñātvā iha nirvedād bhava tyāga-paro’vratī
अर्थ“किया-नहीं किया, यह द्वन्द्व कब किसके शान्त हुए? यह जान कर, निर्वेद से, त्याग-पर हो जा, बिना किसी व्रत के।”
पाठक के लिए“कब किसके शान्त हुए?” यह rhetorical है। द्वन्द्व कभी ख़त्म नहीं होते। हर “किया” के बाद नया “करना” बाक़ी है। यह endless loop है। इसी realization से dispassion आता है।
जीवितेच्छा बुभुक्षा च बुभुत्सोपशमः गताः॥
jīvitecchā bubhukṣā ca bubhutsopaśamaḥ gatāḥ
अर्थ“बेटा, किसी विरले धन्य पुरुष की, लोगों की चेष्टाएँ देख कर ही, जीने की इच्छा, भोग की इच्छा, और जानने की इच्छा शान्त हो जाती हैं।”
पाठक के लिएतीन इच्छाएँ list की गयीं: जीने की, भोग की, जानने की। जानने की इच्छा भी? हाँ। curiosity भी एक pursuit है। ज्ञानी की curiosity भी एक तरह से थम जाती है, “जानने” को कुछ बचा ही नहीं।
असारं निन्दितं हेयमिति निश्चित्य शाम्यति॥
asāraṁ ninditaṁ heyam iti niścitya śāmyati
अर्थ“यह सब अनित्य है, तीन तापों से दूषित, निःसार, निन्दित, छोड़ने योग्य, यह निश्चय कर के साधक शान्त हो जाता है।”
पाठक के लिएएक small exercise। कोई भी “अच्छा” event सोचो। उसमें कौनसा ताप mixed है? Wedding में finance की चिन्ता (आध्यात्मिक), guests को manage करना (आधिभौतिक), barish हो जाए तो (आधिदैविक)। हर खुशी में कोई न कोई पकड़ है।
तान्युपेक्ष्य यथाप्राप्तवर्ती सिद्धिमवाप्नुयात्॥
tāny upekṣya yathā-prāpta-vartī siddhim avāpnuyāt
अर्थ“वह कौन सा समय है, कौन सी उम्र है, जब मनुष्यों के द्वन्द्व न हों? उनकी उपेक्षा कर के, जो मिले उसी में रहने वाला, सिद्धि पाता है।”
पाठक के लिएद्वन्द्व ख़त्म होने का इन्तज़ार करना समय की बर्बादी है। बचपन में बचपन के द्वन्द्व, जवानी में जवानी के, बुढ़ापे में बुढ़ापे के। हर age का अपना struggle। अष्टावक्र कहते हैं, द्वन्द्व ख़त्म होने का इन्तज़ार छोड़, अभी से ignore करना सीख।
दृष्ट्वा निर्वेदमापन्नः को न शाम्यति मानवः॥
dṛṣṭvā nirvedam āpannaḥ ko na śāmyati mānavaḥ
अर्थ“महर्षियों, साधुओं, योगियों के अनेक मत देख कर, निर्वेद को प्राप्त, कौन मनुष्य शान्त नहीं हो जाता?”
पाठक के लिएआज के context में: हर guru, हर teacher, हर book, अलग बातें कह रहे हैं। एक confusing लगता है। मगर यह confusion ही सबसे बड़ा teacher है, “बाहर answer नहीं है”। अन्दर देखो।
निर्वेदसमतायुक्त्या यस्तारयति संसृतेः॥
nirveda-samatā-yuktyā yas tārayati saṁsṛteḥ
अर्थ“चैतन्य का सच्चा परिज्ञान करा कर, और निर्वेद-समता की युक्ति से जो संसार से तार दे, क्या वो गुरु नहीं?”
पाठक के लिए“युक्ति” यानी skillful means। एक तरीक़ा। हर शिष्य के लिए अलग। कुछ को कथा से, कुछ को meditation से, कुछ को direct inquiry से। अच्छा गुरु right युक्ति choose करता है।
तत्क्षणाद्बन्धनिर्मुक्तः स्वरूपस्थो भविष्यसि॥
tat-kṣaṇād bandha-nirmuktaḥ svarūpa-stho bhaviṣyasi
अर्थ“तू भूत-विकारों को सिर्फ़ भूत मात्र देख, यथार्थतः। उसी क्षण बन्ध से मुक्त हो कर स्वरूप में स्थित हो जाएगा।”
पाठक के लिएएक मेज़ देखो। यह क्या है? लकड़ी। लकड़ी क्या है? पेड़। पेड़ क्या है? मिट्टी + पानी + सूरज। यानी मेज़, ultimate analysis में, पाँच elements की एक arrangement। अब अपने शरीर के बारे में same exercise। फिर बाक़ी सब।
तत्त्यागो वासनात्यागात्स्थितिरद्य यथा तथा॥
tat-tyāgo vāsanā-tyāgāt sthitir adya yathā tathā
अर्थ“वासनाएँ ही संसार हैं, यह जान कर सब को छोड़। वासना के त्याग से ही संसार का त्याग होता है। आज जैसे भी रहना है, रह।”
पाठक के लिएप्रकरण 9 ख़त्म। केन्द्रीय message: निर्वेद बल से नहीं, समझ से। दुनिया देखो, द्वन्द्व देखो, मतों की भिन्नता देखो, अनित्यता देखो। यह सब recognize होता है, तो dispassion अपने आप आता है। उसे force करने की ज़रूरत नहीं।