अष्टावक्र गीता · प्रकरण 9: निर्वेद

अष्टावक्र गीता · प्रकरण 9

निर्वेद

Detachment · 8 श्लोक

अष्टावक्र अब practical mode में आ जाते हैं। आठ श्लोकों में detachment कैसे आता है, इसका road-map। यह विरक्ति बल से नहीं, समझ से आती है, यह उनका मुख्य point है।

श्लोक 1
अष्टावक्र उवाच
कृताकृते च द्वन्द्वानि कदा शान्तानि कस्य वा।
एवं ज्ञात्वेह निर्वेदाद्भव त्यागपरोऽव्रती॥
kṛtākṛte ca dvandvāni kadā śāntāni kasya vā
evaṁ jñātvā iha nirvedād bhava tyāga-paro’vratī

अर्थ“किया-नहीं किया, यह द्वन्द्व कब किसके शान्त हुए? यह जान कर, निर्वेद से, त्याग-पर हो जा, बिना किसी व्रत के।”

सन्दर्भ“अव्रती” शब्द key है। साधक vows लेते हैं, “यह करूँगा”, “यह नहीं करूँगा”। अष्टावक्र कहते हैं, vows की ज़रूरत नहीं। निर्वेद ख़ुद आ जाए, vows ख़ुद-ब-ख़ुद घटित हो जाते हैं।

पाठक के लिए“कब किसके शान्त हुए?” यह rhetorical है। द्वन्द्व कभी ख़त्म नहीं होते। हर “किया” के बाद नया “करना” बाक़ी है। यह endless loop है। इसी realization से dispassion आता है।

श्लोक 2
अष्टावक्र उवाच
कस्यापि तात धन्यस्य लोकचेष्टावलोकनात्।
जीवितेच्छा बुभुक्षा च बुभुत्सोपशमः गताः॥
kasyāpi tāta dhanyasya loka-ceṣṭāvalokanāt
jīvitecchā bubhukṣā ca bubhutsopaśamaḥ gatāḥ

अर्थ“बेटा, किसी विरले धन्य पुरुष की, लोगों की चेष्टाएँ देख कर ही, जीने की इच्छा, भोग की इच्छा, और जानने की इच्छा शान्त हो जाती हैं।”

सन्दर्भ“लोक-चेष्टा-अवलोकन”, “दुनिया की हरकतें देखना”। बाज़ार जाओ, लोगों को देखो। हर कोई दौड़ रहा है, परेशान, irritated। यह देख कर कुछ “धन्य” लोगों को detached realization आती है, “यह क्या भागम-भाग है?” यह natural disenchantment है।

पाठक के लिएतीन इच्छाएँ list की गयीं: जीने की, भोग की, जानने की। जानने की इच्छा भी? हाँ। curiosity भी एक pursuit है। ज्ञानी की curiosity भी एक तरह से थम जाती है, “जानने” को कुछ बचा ही नहीं।

श्लोक 3
अष्टावक्र उवाच
अनित्यं सर्वमेवेदं तापत्रितयदूषितम्।
असारं निन्दितं हेयमिति निश्चित्य शाम्यति॥
anityaṁ sarvam evedaṁ tāpa-tritaya-dūṣitam
asāraṁ ninditaṁ heyam iti niścitya śāmyati

अर्थ“यह सब अनित्य है, तीन तापों से दूषित, निःसार, निन्दित, छोड़ने योग्य, यह निश्चय कर के साधक शान्त हो जाता है।”

सन्दर्भ“तीन ताप”: आध्यात्मिक (अपने अन्दर का), आधिभौतिक (दूसरों से मिला), आधिदैविक (प्राकृतिक events से)। हर सुख इन तीनों में से किसी से दूषित है। कोई “pure” सुख नहीं। यह देखो, तो dispassion अपने आप।

पाठक के लिएएक small exercise। कोई भी “अच्छा” event सोचो। उसमें कौनसा ताप mixed है? Wedding में finance की चिन्ता (आध्यात्मिक), guests को manage करना (आधिभौतिक), barish हो जाए तो (आधिदैविक)। हर खुशी में कोई न कोई पकड़ है।

श्लोक 4
अष्टावक्र उवाच
कोऽसौ कालो वयः किं वा यत्र द्वन्द्वानि नो नृणाम्।
तान्युपेक्ष्य यथाप्राप्तवर्ती सिद्धिमवाप्नुयात्॥
ko’sau kālo vayaḥ kiṁ vā yatra dvandvāni no nṛṇām
tāny upekṣya yathā-prāpta-vartī siddhim avāpnuyāt

अर्थ“वह कौन सा समय है, कौन सी उम्र है, जब मनुष्यों के द्वन्द्व न हों? उनकी उपेक्षा कर के, जो मिले उसी में रहने वाला, सिद्धि पाता है।”

सन्दर्भ“यथा-प्राप्त-वर्ती”। जो मिले, उसी में रहने वाला। यह key phrase है। planning नहीं, acceptance। और “उपेक्षा” यानी ignore करना, dismissive sense में नहीं, simply not engaging with।

पाठक के लिएद्वन्द्व ख़त्म होने का इन्तज़ार करना समय की बर्बादी है। बचपन में बचपन के द्वन्द्व, जवानी में जवानी के, बुढ़ापे में बुढ़ापे के। हर age का अपना struggle। अष्टावक्र कहते हैं, द्वन्द्व ख़त्म होने का इन्तज़ार छोड़, अभी से ignore करना सीख।

श्लोक 5
अष्टावक्र उवाच
नाना मतं महर्षीणां साधूनां योगिनां तथा।
दृष्ट्वा निर्वेदमापन्नः को न शाम्यति मानवः॥
nānā mataṁ maharṣīṇāṁ sādhūnāṁ yogināṁ tathā
dṛṣṭvā nirvedam āpannaḥ ko na śāmyati mānavaḥ

अर्थ“महर्षियों, साधुओं, योगियों के अनेक मत देख कर, निर्वेद को प्राप्त, कौन मनुष्य शान्त नहीं हो जाता?”

सन्दर्भयह interesting श्लोक है। साधक एक mat ढूँढ़ते हैं, सोचते हैं “यही सच्चाई है”। अष्टावक्र कहते हैं, सब महर्षियों, साधुओं के मत अलग-अलग। तो “सच्चाई” mat में नहीं। फिर कहाँ? Direct realization में।

पाठक के लिएआज के context में: हर guru, हर teacher, हर book, अलग बातें कह रहे हैं। एक confusing लगता है। मगर यह confusion ही सबसे बड़ा teacher है, “बाहर answer नहीं है”। अन्दर देखो।

श्लोक 6
अष्टावक्र उवाच
कृत्वा मूर्तिपरिज्ञानं चैतन्यस्य न किं गुरुः।
निर्वेदसमतायुक्त्या यस्तारयति संसृतेः॥
kṛtvā mūrti-parijñānaṁ caitanyasya na kiṁ guruḥ
nirveda-samatā-yuktyā yas tārayati saṁsṛteḥ

अर्थ“चैतन्य का सच्चा परिज्ञान करा कर, और निर्वेद-समता की युक्ति से जो संसार से तार दे, क्या वो गुरु नहीं?”

सन्दर्भगुरु का definition refine हो रहा है। गुरु वो नहीं जो rituals सिखाता है। गुरु वो है जो “चैतन्य का परिज्ञान” करा देता है, और “निर्वेद-समता” की युक्ति से संसार से उठा देता है। यह specific है।

पाठक के लिए“युक्ति” यानी skillful means। एक तरीक़ा। हर शिष्य के लिए अलग। कुछ को कथा से, कुछ को meditation से, कुछ को direct inquiry से। अच्छा गुरु right युक्ति choose करता है।

श्लोक 7
अष्टावक्र उवाच
पश्य भूतविकारांस्त्वं भूतमात्रान्यथार्थतः।
तत्क्षणाद्बन्धनिर्मुक्तः स्वरूपस्थो भविष्यसि॥
paśya bhūta-vikārāṁs tvaṁ bhūta-mātrān yathārthataḥ
tat-kṣaṇād bandha-nirmuktaḥ svarūpa-stho bhaviṣyasi

अर्थ“तू भूत-विकारों को सिर्फ़ भूत मात्र देख, यथार्थतः। उसी क्षण बन्ध से मुक्त हो कर स्वरूप में स्थित हो जाएगा।”

सन्दर्भ“भूत-विकार” यानी elements के transformations। पंच-तत्व से बनी हर चीज़ बस “transformation” है। शरीर भी एक transformation। उसे “मैं” मत समझो, बस “elements का arrangement” समझो।

पाठक के लिएएक मेज़ देखो। यह क्या है? लकड़ी। लकड़ी क्या है? पेड़। पेड़ क्या है? मिट्टी + पानी + सूरज। यानी मेज़, ultimate analysis में, पाँच elements की एक arrangement। अब अपने शरीर के बारे में same exercise। फिर बाक़ी सब।

श्लोक 8
अष्टावक्र उवाच
वासना एव संसार इति सर्वा विमुञ्च ताः।
तत्त्यागो वासनात्यागात्स्थितिरद्य यथा तथा॥
vāsanā eva saṁsāra iti sarvā vimuñca tāḥ
tat-tyāgo vāsanā-tyāgāt sthitir adya yathā tathā

अर्थ“वासनाएँ ही संसार हैं, यह जान कर सब को छोड़। वासना के त्याग से ही संसार का त्याग होता है। आज जैसे भी रहना है, रह।”

सन्दर्भ“वासना”, desire-traces, subconscious tendencies। यह संसार का असली fabric हैं। बाहर का संसार consequence है, वासनाएँ cause। और “स्थितिरद्य यथा तथा”, “आज जैसे भी रहो”। यानी outer change ज़रूरी नहीं, inner shift ज़रूरी।

पाठक के लिएप्रकरण 9 ख़त्म। केन्द्रीय message: निर्वेद बल से नहीं, समझ से। दुनिया देखो, द्वन्द्व देखो, मतों की भिन्नता देखो, अनित्यता देखो। यह सब recognize होता है, तो dispassion अपने आप आता है। उसे force करने की ज़रूरत नहीं।

॥ निर्वेद ॥