अष्टावक्र गीता · प्रकरण 7: शान्ति

अष्टावक्र गीता · प्रकरण 7

शान्ति

Peace · 5 श्लोक

जनक पाँच श्लोक बोलते हैं। पहले तीन एक ही phrase से शुरू, “मय्य् अनन्त-महा-अम्भोधौ”, “मुझ अनन्त महा-समुद्र में”। यह deep peace की declaration है, बिना किसी पंडित-ज्ञान के, सिर्फ़ being से।

श्लोक 1
जनक उवाच
मय्यनन्तमहाम्भोधौ विश्वपोत इतस्ततः।
भ्रमति स्वान्तवातेन न ममास्त्यसहिष्णुता॥
mayy ananta-mahāmbhodhau viśva-pota itastataḥ
bhramati svānta-vātena na mamāsty asahiṣṇutā

अर्थ“मुझ अनन्त महा-समुद्र में, विश्व रूपी नौका, अपने मन की हवा से इधर-उधर भटकती है। मुझे कोई असहिष्णुता नहीं।”

सन्दर्भ“असहिष्णुता” यानी impatience। समुद्र को नौका के साथ कोई problem नहीं। नौका इधर जाए, उधर जाए, समुद्र वहीं है। जनक कह रहे हैं, मैं समुद्र हूँ, संसार नौका। संसार जो करे, मैं calm हूँ।

पाठक के लिए“स्वान्त-वात”, “अपने मन की हवा”। संसार के moves random नहीं, हर इन्सान के मन की हवा से conducted होते हैं। जिसका मन शान्त, उसका संसार भी थोड़ा settle।

श्लोक 2
जनक उवाच
मय्यनन्तमहाम्भोधौ जगद्वीचिः स्वभावतः।
उदेतु वास्तमायातु न मे वृद्धिर्न च क्षतिः॥
mayy ananta-mahāmbhodhau jagad-vīciḥ svabhāvataḥ
udetu vāstam āyātu na me vṛddhir na ca kṣatiḥ

अर्थ“मुझ अनन्त महा-समुद्र में, जगत रूपी लहर स्वभाव से उठती है, या अस्त होती है। मेरी न वृद्धि, न क्षति।”

सन्दर्भ“वृद्धि-क्षति”, growth-loss। यह सबसे fundamental anxiety है। “मेरा कुछ बढ़ रहा है तो खुशी, कम हो रहा है तो दुःख”। जनक कहते हैं, मुझ में कुछ बढ़ता-घटता ही नहीं।

पाठक के लिएआप का bank balance बढ़ता-घटता है। आपका वज़न बढ़ता-घटता है। आपकी reputation बढ़ती-घटती है। मगर “आप”? वो वही है। यह श्लोक उस “आप” पर focus करवाता है।

श्लोक 3
जनक उवाच
मय्यनन्तमहाम्भोधौ विश्वं नाम विकल्पना।
अतिशान्तो निराकार एतदेवाहमास्थितः॥
mayy ananta-mahāmbhodhau viśvaṁ nāma vikalpanā
ati-śānto nirākāra etad evāham āsthitaḥ

अर्थ“मुझ अनन्त महा-समुद्र में, विश्व नाम की कल्पना है। मैं अति-शान्त, निराकार, इसी में स्थित हूँ।”

सन्दर्भ“विश्वं नाम विकल्पना”, “विश्व नाम की कल्पना”। यह बहुत strong statement है। विश्व “है” नहीं कहा, “नाम” है, “विकल्पना” है। मतलब, विश्व existence नहीं, mental construct है।

पाठक के लिएयह philosophical claim नहीं, lived realization है। जनक यह “मानते” नहीं, “देखते” हैं। ज्ञानी की state में “विश्व” idea reality की तरह नहीं, बल्कि एक theatrical play की तरह दिखता है।

श्लोक 4
जनक उवाच
नात्मा भावेषु नो भावस्तत्रानन्ते निरञ्जने।
इत्यसक्तोऽस्पृहः शान्त एतदेवाहमास्थितः॥
nātmā bhāveṣu no bhāvas tatrānante nirañjane
ity asakto’spṛhaḥ śānta etad evāham āsthitaḥ

अर्थ“न आत्मा भावों में, न भाव उस अनन्त निरंजन में। ऐसे ही असक्त, निःस्पृह, शान्त, मैं इसी में स्थित हूँ।”

सन्दर्भ“भाव” यानी mental states, emotions। आत्मा emotions के “अन्दर” नहीं, और emotions आत्मा के “अन्दर” भी नहीं। दोनों different planes पर हैं। आत्मा substrate, emotions surface ripples।

पाठक के लिएहम सोचते हैं “मैं ख़ुश हूँ”, “मैं उदास हूँ”। जनक का position अलग है। ख़ुशी आती है, चलती है, जाती है। उदासी आती है, चलती है, जाती है। आती-जाती चीज़ें “मैं” कैसे हो सकती हैं?

श्लोक 5
जनक उवाच
अहो चिन्मात्रमेवाहमिन्द्रजालोपमं जगत्।
इति मम कथं कुत्र हेयोपादेयकल्पना॥
aho cin-mātram evāham indrajālopamaṁ jagat
iti mama kathaṁ kutra heyopādeya-kalpanā

अर्थ“ओह! मैं चित्-मात्र ही हूँ, जगत इन्द्रजाल (जादू) जैसा है। तो मेरी कैसी और कहाँ हेय-उपादेय की कल्पना?”

सन्दर्भ“इन्द्रजाल” यानी magic show। जादूगर ट्रिक्स करता है, audience चौंकती है। पर audience जानती है, “यह जादू है, real नहीं”। फिर भी enjoy करती है। जनक का संसार ऐसा ही है। दिख रहा है, चल रहा है, मगर “real” नहीं।

पाठक के लिएप्रकरण 7 ख़त्म। “हेय-उपादेय” (छोड़ने योग्य, पकड़ने योग्य) ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा है। हम constantly decide कर रहे हैं, “यह रखूँ कि छोड़ूँ”। जनक की position से, यह सब magic show में कौनसी ट्रिक “ज़्यादा अच्छी” की बहस जैसा है।

॥ शान्ति ॥