शान्ति
Peace · 5 श्लोक
जनक पाँच श्लोक बोलते हैं। पहले तीन एक ही phrase से शुरू, “मय्य् अनन्त-महा-अम्भोधौ”, “मुझ अनन्त महा-समुद्र में”। यह deep peace की declaration है, बिना किसी पंडित-ज्ञान के, सिर्फ़ being से।
भ्रमति स्वान्तवातेन न ममास्त्यसहिष्णुता॥
bhramati svānta-vātena na mamāsty asahiṣṇutā
अर्थ“मुझ अनन्त महा-समुद्र में, विश्व रूपी नौका, अपने मन की हवा से इधर-उधर भटकती है। मुझे कोई असहिष्णुता नहीं।”
पाठक के लिए“स्वान्त-वात”, “अपने मन की हवा”। संसार के moves random नहीं, हर इन्सान के मन की हवा से conducted होते हैं। जिसका मन शान्त, उसका संसार भी थोड़ा settle।
उदेतु वास्तमायातु न मे वृद्धिर्न च क्षतिः॥
udetu vāstam āyātu na me vṛddhir na ca kṣatiḥ
अर्थ“मुझ अनन्त महा-समुद्र में, जगत रूपी लहर स्वभाव से उठती है, या अस्त होती है। मेरी न वृद्धि, न क्षति।”
पाठक के लिएआप का bank balance बढ़ता-घटता है। आपका वज़न बढ़ता-घटता है। आपकी reputation बढ़ती-घटती है। मगर “आप”? वो वही है। यह श्लोक उस “आप” पर focus करवाता है।
अतिशान्तो निराकार एतदेवाहमास्थितः॥
ati-śānto nirākāra etad evāham āsthitaḥ
अर्थ“मुझ अनन्त महा-समुद्र में, विश्व नाम की कल्पना है। मैं अति-शान्त, निराकार, इसी में स्थित हूँ।”
पाठक के लिएयह philosophical claim नहीं, lived realization है। जनक यह “मानते” नहीं, “देखते” हैं। ज्ञानी की state में “विश्व” idea reality की तरह नहीं, बल्कि एक theatrical play की तरह दिखता है।
इत्यसक्तोऽस्पृहः शान्त एतदेवाहमास्थितः॥
ity asakto’spṛhaḥ śānta etad evāham āsthitaḥ
अर्थ“न आत्मा भावों में, न भाव उस अनन्त निरंजन में। ऐसे ही असक्त, निःस्पृह, शान्त, मैं इसी में स्थित हूँ।”
पाठक के लिएहम सोचते हैं “मैं ख़ुश हूँ”, “मैं उदास हूँ”। जनक का position अलग है। ख़ुशी आती है, चलती है, जाती है। उदासी आती है, चलती है, जाती है। आती-जाती चीज़ें “मैं” कैसे हो सकती हैं?
इति मम कथं कुत्र हेयोपादेयकल्पना॥
iti mama kathaṁ kutra heyopādeya-kalpanā
अर्थ“ओह! मैं चित्-मात्र ही हूँ, जगत इन्द्रजाल (जादू) जैसा है। तो मेरी कैसी और कहाँ हेय-उपादेय की कल्पना?”
पाठक के लिएप्रकरण 7 ख़त्म। “हेय-उपादेय” (छोड़ने योग्य, पकड़ने योग्य) ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा है। हम constantly decide कर रहे हैं, “यह रखूँ कि छोड़ूँ”। जनक की position से, यह सब magic show में कौनसी ट्रिक “ज़्यादा अच्छी” की बहस जैसा है।