‘शान्ति’ सातवाँ-प्रकरण है। शान्ति एक अवस्था है, मगर अष्टावक्र इसे अवस्था नहीं मानते, बल्कि स्व-स्वरूप। यह विभेद बहुत-महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि अवस्था आती-जाती है, स्वरूप नहीं। यह दार्शनिक-निर्णय आगे चलकर रमण-महर्षि के ‘सहज-समाधि’ की अवधारणा का आधार बना। आधुनिक-काल में जे. कृष्णमूर्ति (1895-1986) ने अपनी ‘फ़र्स्ट एण्ड लास्ट फ़्रीडम’ (1954) में अष्टावक्र-शैली का बार-बार सन्दर्भ दिया। उनकी ‘निर्विकल्प जागरूकता’ और अष्टावक्र की ‘साक्षी-शान्ति’ दार्शनिक-स्तर पर लगभग एक हैं।पाठ्य-संगति
शान्ति
Peace · 5 श्लोक
जनक अब बोलते हैं, और पाँच ही श्लोकों में अपनी पूरी अवस्था खोल देते हैं। पहले तीन एक ही पुकार से उठते हैं, “मय्य् अनन्त-महा-अम्भोधौ”, “हम अनन्त महा-समुद्र हैं”। यह किसी पंडित-ज्ञान की घोषणा नहीं, सिर्फ़ होने भर से उपजी गहरी शान्ति की।
सातवें प्रकरण में जनक की उसी शान्त-अवस्था का वर्णन है। यहाँ शान्ति कोई-अभ्यास-प्राप्त उपलब्धि नहीं, बल्कि स्व-स्वरूप का सहज-गुण है। यही इसे आधुनिक मन–साधना की उस धारा से अलग करता है जहाँ शान्ति को पाया जाता है। अष्टावक्र कहते हैं, शान्ति को पाना नहीं, शान्ति आप स्वयं हैं।
अब तक
चित् की पहचान के बाद, शान्ति। मगर शान्ति बाहर से नहीं, चित् के स्वरूप से।

जनक अपनी बात एक विशाल चित्र से खोलते हैं। वे कहते हैं, हम कोई छोटी बूँद नहीं, हम तो वह अनन्त महा-समुद्र हैं जिसमें यह सारा विश्व एक नौका की तरह तैर रहा है। वह नौका अपने ही मन की हवा के झोंकों से कभी इधर बहती है, कभी उधर। पर समुद्र को इससे कोई व्यग्रता नहीं, कोई अधीरता नहीं। नौका जहाँ जाए जाए, समुद्र तो अपनी जगह स्थिर है। जनक यही कह रहे हैं, संसार जो करे करे, हम शान्त हैं, क्योंकि हम ही वह आधार हैं जिस पर यह सब डोलता है।
श्लोक 1
मय्यनन्तमहाम्भोधौ विश्वपोत इतस्ततः।
भ्रमति स्वान्तवातेन न ममास्त्यसहिष्णुता॥
उसी समुद्र में, जनक कहते हैं, यह जगत एक लहर की तरह है। लहर अपने स्वभाव से कभी उठती है, कभी अस्त हो जाती है। पर इससे समुद्र की न कोई वृद्धि होती है, न कोई क्षति। यही तो हर इन्सान की सबसे गहरी बेचैनी है, कुछ बढ़े तो सुख, कुछ घटे तो दुःख। बैंक में जमा-राशि घटती-बढ़ती है, देह का भार घटता-बढ़ता है, लोक में मान घटता-बढ़ता है। पर वह जो इन सबको देख रहा है, वह “आप”, न बढ़ता है न घटता है। जनक की दृष्टि उसी अडोल “आप” पर टिकी है, जिसमें लहरें आती-जाती रहती हैं और वह ज्यों का त्यों बना रहता है।
श्लोक 2
मय्यनन्तमहाम्भोधौ जगद्वीचिः स्वभावतः।
उदेतु वास्तमायातु न मे वृद्धिर्न च क्षतिः॥
अब जनक एक और गहरी बात कहते हैं। उस अनन्त समुद्र में यह विश्व “है” भी नहीं, यह तो बस “नाम” है, एक कल्पना है, मन का बुना हुआ ताना-बाना। और जो इस कल्पना को देख रहा है, वह अति-शान्त है, निराकार है, और उसी अपने स्वरूप में स्थित है। यह कोई पढ़ी-सुनी बात नहीं, यह जनक की जीई हुई अनुभूति है। वे इस विश्व को वैसे ही देखते हैं जैसे कोई किसी नाटक के दृश्य को देखता है, चलता हुआ, घटता हुआ, पर अपने से अलग।
श्लोक 3
मय्यनन्तमहाम्भोधौ विश्वं नाम विकल्पना।
अतिशान्तो निराकार एतदेवाहमास्थितः॥
फिर जनक भावों और आत्मा के सम्बन्ध को खोलते हैं। न आत्मा भावों के भीतर बसती है, न भाव उस अनन्त निरंजन के भीतर समाते हैं। दोनों मानो अलग-अलग धरातल पर हैं, एक नीचे का स्थिर आधार, दूसरे ऊपर की क्षणिक तरंगें। इसी बोध में जनक असक्त हैं, निःस्पृह हैं, शान्त हैं, और इसी में स्थित हैं। हम कहते रहते हैं, “हम ख़ुश हैं”, “हम उदास हैं”, पर जनक की दृष्टि और है। सुख आता है, ठहरता है, चला जाता है; दुःख आता है, ठहरता है, चला जाता है। जो इस तरह आती-जाती रहे, वह भला “हम” कैसे हो सकती है।
श्लोक 4
नात्मा भावेषु नो भावस्तत्रानन्ते निरञ्जने।
इत्यसक्तोऽस्पृहः शान्त एतदेवाहमास्थितः॥
और अन्त में जनक के भीतर से एक विस्मय भरी पुकार उठती है। ओह! हम तो बस चित्-मात्र हैं, और यह सारा जगत किसी इन्द्रजाल जैसा, किसी जादू के खेल जैसा है। जादूगर अपनी कलाएँ दिखाता है, दर्शक चौंकते हैं, और फिर भी जानते हैं कि यह सब असली नहीं। जनक के लिए संसार ऐसा ही है, दिखता हुआ, चलता हुआ, पर सत्य नहीं। तो फिर इसमें छोड़ने योग्य और पकड़ने योग्य की कल्पना कहाँ टिके, किस आधार पर टिके। हमारी पूरी ज़िंदगी इसी चुनाव में बीतती है, यह रखें कि छोड़ें। जनक की दृष्टि से यह उस बहस जैसा है कि जादू के खेल में कौन-सी ट्रिक “ज़्यादा अच्छी” थी। इसी विस्मय पर प्रकरण सात पूरा होता है।
श्लोक 5
अहो चिन्मात्रमेवाहमिन्द्रजालोपमं जगत्।
इति मम कथं कुत्र हेयोपादेयकल्पना॥