अष्टावक्र गीता · प्रकरण 6: चित्

अष्टावक्र गीता · प्रकरण 6

चित्

Consciousness · 4 श्लोक

जनक चार श्लोक बोलते हैं। हर एक का अन्त एक ही phrase से, “न त्यागो न ग्रहो लयः”, “न त्याग, न ग्रहण, न लय”। यह उस ज्ञान की declaration है जो अब करने को कुछ नहीं छोड़ता।

श्लोक 1
जनक उवाच
आकाशवदनन्तोऽहं घटवत्प्राकृतं जगत्।
इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः॥
ākāśa-vad ananto’haṁ ghaṭa-vat prākṛtaṁ jagat
iti jñānaṁ tathaitasya na tyāgo na graho layaḥ

अर्थ“आकाश की तरह अनन्त हूँ मैं, घड़े की तरह यह प्राकृत जगत। यह ज्ञान है। ऐसे ज्ञानी का न त्याग, न ग्रहण, न लय।”

सन्दर्भघट-आकाश पहले आ चुका। मगर यहाँ एक नया angle है। जब “मैं अनन्त आकाश हूँ” recognition पक्की है, तो “करने” को कुछ नहीं रहता। त्याग? किसका? ग्रहण? किसका? लय? कहाँ? सब questions ख़त्म।

पाठक के लिए“न त्यागो न ग्रहो”। यह सबसे beautiful position है। साधक “त्याग” करते हैं या “ग्रहण” करते हैं। यह आधा गला घुटा हुआ effort है। ज्ञानी दोनों से बाहर। बस रहता है। चीज़ें आती हैं, जाती हैं, वो वही।

श्लोक 2
जनक उवाच
महोदधिरिवाहं स प्रपञ्चो वीचिसन्निभः।
इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः॥
mahodadhir ivāhaṁ sa prapañco vīci-sannibhaḥ
iti jñānaṁ tathaitasya na tyāgo na graho layaḥ

अर्थ“मैं बड़े समुद्र की तरह हूँ, वह प्रपञ्च (संसार) लहर की तरह। यह ज्ञान है। ऐसे ज्ञानी का न त्याग, न ग्रहण, न लय।”

सन्दर्भलहर-समुद्र फिर से। मगर यहाँ “लय” का concept refine हो रहा है। साधक सोचते हैं, “लहर समुद्र में लय हो जाएगी”। जनक कहते हैं, लय भी नहीं। क्योंकि लहर “अलग” कभी थी ही नहीं। लय कोई अलग event नहीं, हमेशा से लय थी ही।

पाठक के लिएहम सोचते हैं “मरने के बाद” आत्मा ब्रह्म में मिल जाएगी। यह concept इस श्लोक में टूटता है। मिलने को कुछ है ही नहीं। हमेशा से मिली थी।

श्लोक 3
जनक उवाच
अहं स शुक्तिसङ्काशो रूप्यवद् विश्वकल्पना।
इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः॥
ahaṁ sa śukti-saṅkāśo rūpyavad viśva-kalpanā
iti jñānaṁ tathaitasya na tyāgo na graho layaḥ

अर्थ“मैं वैसा हूँ जैसे सीप, और विश्व-कल्पना चाँदी की तरह। यह ज्ञान है। ऐसे ज्ञानी का न त्याग, न ग्रहण, न लय।”

सन्दर्भसीप-चाँदी फिर से। तीसरी बार यह metaphor आया है। मतलब अष्टावक्र-जनक चाहते हैं यह बात पक्के से बैठे। संसार चाँदी जैसा “लगता है”, सच सीप है। और सीप कुछ “करता” नहीं। लोग चाँदी समझते हैं, सीप का problem नहीं।

पाठक के लिएसंसार में लोग आपको कुछ-कुछ “मानते” हैं। समझदार, बेवक़ूफ़, अच्छा, बुरा। यह सब उनकी “चाँदी” है। सीप वही है। आपकी असलियत किसी की राय पर नहीं टिकती।

श्लोक 4
जनक उवाच
अहं वा सर्वभूतेषु सर्वभूतान्यथो मयि।
इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः॥
ahaṁ vā sarva-bhūteṣu sarva-bhūtāny atho mayi
iti jñānaṁ tathaitasya na tyāgo na graho layaḥ

अर्थ“या तो मैं सब प्राणियों में हूँ, या सब प्राणी मुझ में। यह ज्ञान है। ऐसे ज्ञानी का न त्याग, न ग्रहण, न लय।”

सन्दर्भदो angles। पहला: “मैं सब में हूँ”। दूसरा: “सब मुझ में हैं”। दोनों एक ही बात कह रहे हैं। एक macro-perspective से, दूसरा micro से। फ़र्क़ शब्दों में, sense में नहीं।

पाठक के लिएप्रकरण 6 ख़त्म। चार श्लोक, एक ही declaration। “न त्यागो न ग्रहो लयः”। यह life-stance है। अगर साधक यह position पकड़ ले, बाक़ी काम अपने आप होगा।

॥ चित् ॥