चित्
Consciousness · 4 श्लोक
जनक चार श्लोक बोलते हैं। हर एक का अन्त एक ही phrase से, “न त्यागो न ग्रहो लयः”, “न त्याग, न ग्रहण, न लय”। यह उस ज्ञान की declaration है जो अब करने को कुछ नहीं छोड़ता।
इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः॥
iti jñānaṁ tathaitasya na tyāgo na graho layaḥ
अर्थ“आकाश की तरह अनन्त हूँ मैं, घड़े की तरह यह प्राकृत जगत। यह ज्ञान है। ऐसे ज्ञानी का न त्याग, न ग्रहण, न लय।”
पाठक के लिए“न त्यागो न ग्रहो”। यह सबसे beautiful position है। साधक “त्याग” करते हैं या “ग्रहण” करते हैं। यह आधा गला घुटा हुआ effort है। ज्ञानी दोनों से बाहर। बस रहता है। चीज़ें आती हैं, जाती हैं, वो वही।
इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः॥
iti jñānaṁ tathaitasya na tyāgo na graho layaḥ
अर्थ“मैं बड़े समुद्र की तरह हूँ, वह प्रपञ्च (संसार) लहर की तरह। यह ज्ञान है। ऐसे ज्ञानी का न त्याग, न ग्रहण, न लय।”
पाठक के लिएहम सोचते हैं “मरने के बाद” आत्मा ब्रह्म में मिल जाएगी। यह concept इस श्लोक में टूटता है। मिलने को कुछ है ही नहीं। हमेशा से मिली थी।
इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः॥
iti jñānaṁ tathaitasya na tyāgo na graho layaḥ
अर्थ“मैं वैसा हूँ जैसे सीप, और विश्व-कल्पना चाँदी की तरह। यह ज्ञान है। ऐसे ज्ञानी का न त्याग, न ग्रहण, न लय।”
पाठक के लिएसंसार में लोग आपको कुछ-कुछ “मानते” हैं। समझदार, बेवक़ूफ़, अच्छा, बुरा। यह सब उनकी “चाँदी” है। सीप वही है। आपकी असलियत किसी की राय पर नहीं टिकती।
इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः॥
iti jñānaṁ tathaitasya na tyāgo na graho layaḥ
अर्थ“या तो मैं सब प्राणियों में हूँ, या सब प्राणी मुझ में। यह ज्ञान है। ऐसे ज्ञानी का न त्याग, न ग्रहण, न लय।”
पाठक के लिएप्रकरण 6 ख़त्म। चार श्लोक, एक ही declaration। “न त्यागो न ग्रहो लयः”। यह life-stance है। अगर साधक यह position पकड़ ले, बाक़ी काम अपने आप होगा।