पाठ्य-संगति
‘चित्’ का छठवाँ-प्रकरण चेतना-तत्त्व पर है। संस्कृत में ‘चित्’ एक मूल-धातु है, जिसका अर्थ है ‘जानना’ या ‘चेतन-होना’। आधुनिक-अंग्रेज़ी में ‘कॉन्शियसनेस’ शब्द सबसे-निकट है, मगर ‘चित्’ में एक सक्रिय-विशेषता है जो ‘कॉन्शियसनेस’ में अधिक निष्क्रिय है।
विज्ञान-दर्शन में डेविड चाल्मर्स ने 1995 में ‘हार्ड प्रॉब्लम ऑफ़ कॉन्शियसनेस’ की अवधारणा रखी, जो आज भी तंत्रिका-विज्ञान का अनसुलझा-प्रश्न है। अष्टावक्र का ‘चित्’-तत्त्व इस कठिन समस्या का एक प्राचीन-समाधान-प्रयास है, हालाँकि दोनों अलग-दार्शनिक-स्थिति पर खड़े हैं।
चित्
4 श्लोक
जनक चार श्लोक बोलते हैं। हर एक का अन्त एक ही वाक्यांश से, “न त्यागो न ग्रहो लयः”, “न त्याग, न ग्रहण, न लय”। यह उस ज्ञान की घोषणा है जो अब करने को कुछ नहीं छोड़ता।
छठा प्रकरण “चित्” यानी शुद्ध-चेतना पर केन्द्रित है। शंकराचार्य से पाँच-सौ साल पहले ही अष्टावक्र चेतना को सत्-चित्-आनन्द की मध्य-इकाई के रूप में पहचानते हैं। यह तीन-शब्द-तत्त्व बाद के अद्वैत-वेदान्त का आधार-सूत्र बना, और तैत्तिरीय-उपनिषद् की दूसरी वल्ली में इसका पूर्व-रूप मिलता है।

इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः॥
iti jñānaṁ tathaitasya na tyāgo na graho layaḥ
अर्थ“आकाश की तरह अनन्त हूँ मैं, घड़े की तरह यह प्राकृत जगत। यह ज्ञान है। इस (जगत) का न त्याग है, न ग्रहण, न लय।”
पाठक के लिए“न त्यागो न ग्रहो”। यह सबसे सुन्दर स्थिति है। साधक “त्याग” करते हैं या “ग्रहण” करते हैं। यह आधा गला घुटा हुआ प्रयास है। ज्ञानी दोनों से बाहर। बस रहता है। चीज़ें आती हैं, जाती हैं, वो वही।
इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः॥
iti jñānaṁ tathaitasya na tyāgo na graho layaḥ
अर्थ“मैं बड़े समुद्र की तरह हूँ, वह प्रपञ्च (संसार) लहर की तरह। यह ज्ञान है। इस (जगत) का न त्याग है, न ग्रहण, न लय।”
पाठक के लिएहम सोचते हैं “मरने के बाद” आत्मा ब्रह्म में मिल जाएगी। यह अवधारणा इस श्लोक में टूटता है। मिलने को कुछ है ही नहीं। हमेशा से मिली थी।
इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः॥
iti jñānaṁ tathaitasya na tyāgo na graho layaḥ
अर्थ“मैं वैसा हूँ जैसे सीप, और विश्व-कल्पना चाँदी की तरह। यह ज्ञान है। इस (जगत) का न त्याग है, न ग्रहण, न लय।”
पाठक के लिएसंसार में लोग आपको कुछ-कुछ “मानते” हैं। समझदार, बेवक़ूफ़, अच्छा, बुरा। यह सब उनकी “चाँदी” है। सीप वही है। आपकी असलियत किसी की राय पर नहीं टिकती।
इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः॥
iti jñānaṁ tathaitasya na tyāgo na graho layaḥ
अर्थ“मैं सब प्राणियों में हूँ, और सब प्राणी मुझ में। यह ज्ञान है। इस (जगत) का न त्याग है, न ग्रहण, न लय।”
पाठक के लिएप्रकरण 6 ख़त्म। चार श्लोक, एक ही घोषणा। “न त्यागो न ग्रहो लयः”। यह जीवन की स्थिति है। अगर साधक यह स्थिति पकड़ ले, बाक़ी काम अपने आप होंगे।