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अष्टावक्र गीता · प्रकरण 4: सर्वत्र

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पाठ्य-संगति

‘सर्वत्र’ का चौथा-प्रकरण आत्म-तत्त्व की सर्व-व्यापकता पर है। यह विषय गीता के ‘सर्व-भूत-स्थित’ (6.29) मन्त्र से और कठोपनिषद् के ‘अणोरणीयान् महतो महीयान्’ (1.2.20) से सीधा-जुड़ता है। दोनों में एक ही दर्शन है, आत्मा हर-जगह है, मगर कहीं स्थानीय नहीं।

आधुनिक-गणित में जॉर्ज कैन्टर (Georg Cantor, 1845-1918) के अनन्त-समूह-सिद्धान्त (set theory) में यह विरोधाभास भी मिलता है, अनन्त एक ‘सब-जगह-है’ मगर कोई-स्थानीय-सीमा नहीं रखता।

अष्टावक्र गीता · प्रकरण 4

सर्वत्र

Everywhere · 6 श्लोक

जनक अब बोलते हैं। छह छोटे श्लोक, हर एक एक मोती। ज्ञानी सब जगह आत्मा को देखता है, और कोई भी परिस्थिति उसे विचलित नहीं कर सकती। यह छोटा सा प्रकरण पूरे ग्रन्थ का स्वर थिर कर देता है।

चौथे प्रकरण में जनक की अवस्था और सघन हो जाती है। “सर्वत्र” अर्थात् “सब जगह”, आत्मा सर्व-व्यापी। यह विश्वास भगवद् गीता के तेरहवें अध्याय के “सर्वतः पाणि-पादम्” श्लोक के बहुत क़रीब है। जनक का दार्शनिक-संवाद अष्टावक्र के साथ रामायण-कालीन है, अनुमानतः नवीं-आठवीं सदी ईसा-पूर्व के क़रीब।

अब तक

आत्मा एक (अद्वय)। अब अष्टावक्र दिखाते हैं, यह “सर्वत्र” है। हर जगह, हर समय।

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अब जनक स्वयं बोलते हैं, और उनका स्वर पहले से और गहरा है। हाँ, वे कहते हैं, सोच कर देखिए, एक आत्म-ज्ञानी धीर पुरुष भोग की लीला से ऐसे खेलता है जैसे कोई बालक खेल में रमा हो। और संसार के बोझ को कन्धों पर ढोते उन मूढ़ों से उसकी कोई समानता नहीं। बाहर से देखिए तो दोनों वही काम कर रहे हैं, मगर एक के लिए वह खेल है और दूसरे के लिए लदा हुआ भार। ज्ञानी की लीला है, बाक़ी सबका बोझ। फिर वे एक और दृश्य दिखाते हैं। जिस पद को पाने के लिए इन्द्र से ले कर सब देवता तक दीन हो कर तरसते हैं, ओह, उसी पद में थिर बैठा योगी हर्षित तक नहीं होता। देवता इसलिए दीन है कि वह अब भी चाह रहा है, और योगी इसलिए शान्त है कि उसे पता है यह तो सबकी सहज अवस्था ही है, इसमें कोई उपलब्धि जैसी बात है ही नहीं।

श्लोक 1 · 2

हन्तात्मज्ञानस्य धीरस्य खेलतो भोगलीलया।
न हि संसारवाहीकैर्मूढैः सह समानता॥

यत्पदं प्रेप्सवो दीनाः शक्राद्याः सर्वदेवताः।
अहो तत्र स्थितो योगी न हर्षमुपगच्छति॥

इसके बाद जनक एक ऐसी छवि उठाते हैं जो मन में ठहर जाती है, आकाश और धुएँ की। उस आत्म-ज्ञानी के भीतर पुण्य और पाप का स्पर्श तक नहीं होता। जैसे धुआँ आकाश में फैलता है और देखने में लगता है मानो दोनों मिल गए हों, मगर सच में आकाश का धुएँ से कोई संग नहीं। धुआँ बिखर जाता है, आकाश वैसा का वैसा रहता है, अछूता। ठीक वैसे ही पुण्य-पाप ज्ञानी के मन में आते-जाते हैं, मगर असली “मैं” उनसे रंगा नहीं जाता। और यहीं से वे अगली बात खोलते हैं। जिस महात्मा ने यह जान लिया कि यह सारा जगत आत्मा ही है, वह अनायास, बिना किसी योजना के बहता है। ऐसे को कौन रोक सकेगा, जब वह किसी दिशा में जा ही नहीं रहा, बस हो रहा है।

श्लोक 3 · 4

तज्ज्ञस्य पुण्यपापाभ्यां स्पर्शो ह्यन्तर्न जायते।
न ह्याकाशस्य धूमेन दृश्यमानापि सङ्गतिः॥

आत्मैवेदं जगत्सर्वं ज्ञातं येन महात्मना।
यदृच्छया वर्तमानं तं निषेद्धुं क्षमेत कः॥

अन्त में जनक प्राणियों के पूरे विस्तार पर दृष्टि डालते हैं। ब्रह्मा से ले कर तृण के तिनके तक, चार प्रकार के सब प्राणियों में, केवल ज्ञानी में ही यह सामर्थ्य है कि वह इच्छा और अनिच्छा दोनों को छोड़ दे। ये दोनों दिखने में आमने-सामने लगते हैं, पर हैं एक ही सिक्के के दो पहलू, चाह और ना-चाह, और ज्ञानी इन दोनों खेलों से बाहर खड़ा है। फिर वे प्रकरण की सबसे दुर्लभ बात कहते हैं। कोई बिरला ही आत्मा को अद्वय और जगदीश्वर रूप में पहचानता है। और जो पहचान लेता है, वह जो जानता है वही करता है, उसे फिर कहीं भय नहीं रहता। पहचान पक्की हो जाए तो ज्ञान और कर्म अलग नहीं रहते, कर्म अपने-आप उसी जानने में से बहने लगता है।

श्लोक 5 · 6

आब्रह्मस्तम्बपर्यन्ते भूतग्रामे चतुर्विधे।
विज्ञस्यैव हि सामर्थ्यमिच्छानिच्छाविवर्जने॥

आत्मानमद्वयं कश्चिज्जानाति जगदीश्वरम्।
यद्वेत्ति तत्स कुरुते न भयं तस्य कुत्रचित्॥

॥ सर्वत्र ॥