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अष्टावक्र गीता · प्रकरण 3: आत्मा-अद्वय

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पाठ्य-संगति

‘आत्मा-अद्वय’ का तीसरा-प्रकरण अद्वैत-स्थापना को कसता है। ‘अद्वय’ का अर्थ है ‘दो-नहीं’, यानी एक भी नहीं, क्योंकि ‘एक’ की पहचान ‘दो’ के सापेक्ष होती है। यह सूक्ष्म-दार्शनिक-स्थिति गौड़पाद की माण्डूक्य-कारिका से सीधा-जुड़ता है, जहाँ ‘अजाति-वाद’ (कुछ उत्पन्न ही नहीं हुआ) की स्थापना की गयी है।

आधुनिक-काल में रमण-महर्षि (1879-1950) ने अरुणाचलम् में अष्टावक्र के इस-प्रकरण को बार-बार उद्धृत किया था, और अपनी प्रसिद्ध आत्म-जिज्ञासा ‘हम कौन हैं’ का दार्शनिक-आधार इसी प्रकरण को बताया। पॉल ब्रंटन की 1934 की ‘अ सर्च इन सीक्रेट इण्डिया’ में रमण के साथ हुई एक-बातचीत में यह सन्दर्भ मिलता है।

अष्टावक्र गीता · प्रकरण 3

आत्मा-अद्वय

आत्मा अद्वय है · 14 श्लोक

जनक अभी-अभी अपने आश्चर्य से उबरे ही थे कि अष्टावक्र ने एक तीखा प्रश्न रख दिया। जब आप अविनाशी, एक आत्मा को सचमुच पहचान चुके हैं, तो फिर छोटी-छोटी चीज़ों में आपका मन आज भी क्यों उलझता है। यह प्रकरण उसी पहेली का है, ज्ञान आ जाने के बाद बची रह जाने वाली पुरानी आदतों की।

तीसरे प्रकरण में अद्वय-तत्त्व पर अष्टावक्र अधिक-सघन रूप से जोर देते हैं। अद्वय का अर्थ है “जिसमें दूसरा नहीं”, और यह शंकराचार्य की आठवीं-सदी की “अद्वैत” शब्दावली का पूर्व-रूप है। आदि शंकर ने अपनी “विवेकचूड़ामणि” में अष्टावक्र-गीता का प्रत्यक्ष-उद्धरण न देते हुए भी कई जगह इसकी प्रतिध्वनि की।

अब तक

जनक के “आश्चर्य” के बाद, अष्टावक्र समझाते हैं, यह आत्मा अद्वय (एक) है। पिछले दो प्रकरणों का यह स्वाभाविक अगला चरण है।

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अष्टावक्र जनक की ओर देखते हैं और सीधे मर्म पर हाथ रखते हैं। आपने उस आत्मा को तत्त्व से जान लिया है जो कभी नष्ट नहीं होती और जो एक ही है। फिर हे धीर, आप जैसे आत्मज्ञानी को धन कमाने की लालसा कैसे रह जाती है। और यह जो खिंचाव बचा है, वह कहाँ से आता है। अष्टावक्र कहते हैं, यह बस आत्मा के अज्ञान से आता है। उसी अनजानेपन से मन विषयों के झूठे जगत में प्रीति बाँध लेता है, ठीक वैसे ही जैसे सीप को न पहचानने पर कोई उसमें चाँदी देख कर लोभ में पड़ जाता है।

श्लोक 1 · 2

अविनाशिनमात्मानमेकं विज्ञाय तत्त्वतः।
तवात्मज्ञानस्य धीरस्य कथमर्थार्जने रतिः॥

आत्माज्ञानादहो प्रीतिर्विषयभ्रमगोचरे।
शुक्तेरज्ञानतो लोभो यथा रजतविभ्रमे॥

फिर अष्टावक्र समुद्र की ओर इशारा करते हैं। यह सारा विश्व जिसमें लहरों की तरह उठता है, वही आप हैं। ‘वही मैं हूँ’ यह जान कर भी आप किसी दीन-दुखी की तरह इधर-उधर क्यों दौड़ते हैं। जब आप ही समुद्र हैं, तो लहरें पराई कहाँ रहीं, और जाने को बचा ही क्या। पर चेतावनी भी देते हैं। उस अति-सुन्दर शुद्ध चैतन्य आत्मा को सुन लेने पर भी जो शरीर के भोग में डूबा रहता है, उसकी चेतना मलिन हो जाती है, ज्ञान की निर्मलता खो जाती है। बात भोग की नहीं, उससे बँध जाने की है।

श्लोक 3 · 4

विश्वं स्फुरति यत्रेदं तरङ्गा इव सागरे।
सोऽहमस्मीति विज्ञाय किं दीन इव धावसि॥

श्रुत्वापि शुद्धचैतन्यमात्मानमतिसुन्दरम्।
उपस्थेऽत्यन्तसंसक्तो मालिन्यमधिगच्छति॥

अब अष्टावक्र की वाणी में एक हलकी हैरानी उतर आती है। सब प्राणियों में आत्मा को और सब प्राणियों को आत्मा में जान लेने वाले मुनि का ‘मेरापन’ अब भी चलता रहे, यह तो अचरज की बात है। परम अद्वैत में टिका हुआ, मोक्ष की साधना में लगा हुआ साधक भी जब काम के वश में आ कर खेल-तमाशे की ओर डगमगा जाए, यह भी अचरज है। और जो काम को ज्ञान का सबसे बड़ा शत्रु जान चुका है, जिसकी देह दुर्बल पड़ चुकी है और अन्त-समय पास आ खड़ा है, वही फिर उसी काम को चाहे, इससे बड़ा अचरज और क्या होगा।

श्लोक 5 · 6 · 7

सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
मुनेर्जानत आश्चर्यं ममत्वमनुवर्तते॥

आस्थितः परमाद्वैतं मोक्षार्थेऽपि व्यवस्थितः।
आश्चर्यं कामवशगो विकलः केलिशिक्षया॥

उद्भूतं ज्ञानदुर्मित्रमवधार्यातिदुर्बलः।
आश्चर्यं काममाकाङ्क्षेत् कालमन्तमनुश्रितः॥

एक आख़िरी अचरज अष्टावक्र गिनाते हैं, जो सबसे सूक्ष्म है। इस लोक और परलोक दोनों से विरक्त, नित्य और अनित्य का विवेक रखने वाला, मोक्ष का अभिलाषी साधक भी जब मोक्ष से ही डरने लगे, यह सबसे गहरी पहेली है। सब छोड़ने के बाद छोड़ने वाला भी छूट जाएगा, यही भय आख़िरी रुकावट है। फिर अष्टावक्र आलोचना से हट कर वर्णन पर आते हैं। धीर पुरुष ऐसा होता है कि चाहे उसे भोगा जा रहा हो, चाहे पीड़ा दी जा रही हो, वह सदा केवल आत्मा को देखता है, न तृप्त होता है न क्रुद्ध।

श्लोक 8 · 9

इहामुत्र विरक्तस्य नित्यानित्यविवेकिनः।
आश्चर्यं मोक्षकामस्य मोक्षाद् एव विभीषिका॥

धीरस्तु भोज्यमानोऽपि पीड्यमानोऽपि सर्वदा।
आत्मानं केवलं पश्यन्न तुष्यति न कुप्यति॥

वह अपने ही चलते-फिरते शरीर को इस तरह देखता है मानो वह किसी दूसरे का शरीर हो। फिर प्रशंसा हो या निन्दा, ऐसा महाशय भला क्षुब्ध क्यों होगा। जिसका शरीर ही पराया लगता हो, उस पर पड़ा कोई ताना किसको लगे। और यह सारा विश्व माया-मात्र है, यह देख कर जिसका कौतूहल शान्त हो चुका है, मृत्यु पास आ जाने पर भी वह स्थिर-बुद्धि भला क्यों काँपे। माया का अर्थ ‘है ही नहीं’ नहीं है, अर्थ है ‘जैसा दिखता है वैसा नहीं’। मृत्यु भी उसके लिए आते-जाते अनेक प्रसंगों में से एक प्रसंग भर है।

श्लोक 10 · 11

चेष्टमानं शरीरं स्वं पश्यत्यन्यशरीरवत्।
संस्तवे चापि निन्दायां कथं क्षुभ्येत् महाशयः॥

मायामात्रमिदं विश्वं पश्यन् विगतकौतुकः।
अपि सन्निहिते मृत्यौ कथं त्रस्यति धीरधीः॥

फिर अष्टावक्र एक ऐसी ऊँचाई की ओर ले चलते हैं जहाँ कोई तुलना ठहरती ही नहीं। जिसका मन निःस्पृह है, जो निराशा में भी इच्छा-रहित रहता है, उस आत्म-ज्ञान से तृप्त महात्मा की भला किससे तुलना हो। साधारणतः निराशा गहरी इच्छा से ही उपजती है, पर जिसमें इच्छा थी ही नहीं, वह निराशा में भी डोलता नहीं। और जो अपने स्वभाव से ही यह जान चुका है कि यह सारा दृश्य कुछ भी नहीं है, वह स्थिर-बुद्धि धीर ‘यह ग्रहण करने योग्य, यह त्याग करने योग्य’, ऐसा भेद किसमें देखे। जब लेने-छोड़ने की रेखा ही मिट गई, तो जो आता है उसे आने दो, जो जाता है उसे जाने दो।

श्लोक 12 · 13

निःस्पृहं मानसं यस्य नैराश्येऽपि महात्मनः।
तस्यात्मज्ञानतृप्तस्य तुलना केन जायते॥

स्वभावादेव जानानो दृश्यमेतन्न किञ्चन।
इदं ग्राह्यमिदं त्याज्यं स किं पश्यति धीरधीः॥

और अन्त में अष्टावक्र पूरे प्रकरण को एक शान्त छवि में समेट देते हैं। जिसने भीतर से सारे कषाय, सारे राग-रंग के दाग छोड़ दिए, जो द्वन्द्व से परे है और जिसमें कोई कामना शेष नहीं, उसके पास जब कोई भोग अपने-आप, बिना खींचे, चला आता है, तो वह न उसे दुःख देता है न सुख। ज्ञानी भोग को ठुकराता भी नहीं और उसके पीछे दौड़ता भी नहीं। जो स्वयं आ गया, ले लेता है, पर ‘मैं इसका भोक्ता हूँ’ का भाव उसमें उठता ही नहीं। यही इस प्रकरण का सार है, ज्ञान को गहराते जाइए, आदतें अपने-आप शान्त होती जाएँगी।

श्लोक 14

अन्तस्त्यक्तकषायस्य निर्द्वन्द्वस्य निराशिषः।
यदृच्छयागतो भोगो न दुःखाय न तुष्टये॥

॥ आत्मा-अद्वय ॥