अष्टावक्र गीता · प्रकरण 5: लय

अष्टावक्र गीता · प्रकरण 5

लय

Dissolution · 4 श्लोक

सिर्फ़ चार श्लोक। हर एक का अन्त एक ही phrase से, “एवमेव लयं व्रज”, “इसी तरह लय को प्राप्त हो”। अष्टावक्र चार-चार methods बता कर कह रहे हैं, अब विसर्जित हो जा।

श्लोक 1
अष्टावक्र उवाच
न ते सङ्गोऽस्ति केनापि किं शुद्धस्त्यक्तुमिच्छसि।
सङ्घातविलयं कुर्वन्नेवमेव लयं व्रज॥
na te saṅgo’sti kenāpi kiṁ śuddhas tyaktum icchasi
saṅghāta-vilayaṁ kurvann evam eva layaṁ vraja

अर्थ“तेरा किसी से कोई सङ्ग (attachment) नहीं है। तू शुद्ध है, क्या छोड़ना चाहता है? पंच-संघात (शरीर) को विसर्जित करते हुए, इसी तरह लय को प्राप्त हो।”

सन्दर्भपहली method: realize करो कि सङ्ग था ही नहीं। “त्यागना” तब possible है जब कुछ “मिला हुआ” हो। चेतना को कुछ कभी मिला ही नहीं, तो छोड़ने का क्या? यह paradox है, मगर deep है।

पाठक के लिए“शुद्धस्त्यक्तुमिच्छसि?” “शुद्ध हो कर क्या छोड़ना चाहता है?” यह वो moment है जब साधक “त्याग” के पीछे भागना छोड़ता है। त्याग भी एक action है। ज्ञानी action में नहीं, recognition में रहता है।

श्लोक 2
अष्टावक्र उवाच
उदेति भवतो विश्वं वारिधेरिव बुद्बुदः।
इति ज्ञात्वैकमात्मानमेवमेव लयं व्रज॥
udeti bhavato viśvaṁ vāridher iva budbudaḥ
iti jñātvaikam ātmānam evam eva layaṁ vraja

अर्थ“तुझसे विश्व उठता है, जैसे समुद्र से बुलबुला। आत्मा को एक जान कर, इसी तरह लय को प्राप्त हो।”

सन्दर्भदूसरी method: देखो कि सब कुछ तुम्हीं से निकल रहा है। बुलबुला अलग नहीं, पानी ही है। यह सोचना नहीं, देखना है। एक direct seeing।

पाठक के लिएएक experiment। यह screen को देख रहे हैं। यह “उठ” कब रहा है? इसी moment, चेतना में। अगर चेतना न हो, screen “नहीं” है। तो screen का “होना” चेतना पर depend है। तो screen चेतना का बुलबुला है।

श्लोक 3
अष्टावक्र उवाच
प्रत्यक्षमप्यवस्तुत्वाद्विश्वं नास्त्यमले त्वयि।
रज्जुसर्प इव व्यक्तमेवमेव लयं व्रज॥
pratyakṣam apy avastutvād viśvaṁ nāsty amale tvayi
rajju-sarpa iva vyaktam evam eva layaṁ vraja

अर्थ“प्रत्यक्ष होते हुए भी, अ-वस्तुत्व के कारण, विश्व निर्मल तुझ में नहीं है। जैसे रस्सी पर साँप दिखता हो, इसी तरह लय को प्राप्त हो।”

सन्दर्भतीसरी method: देखो कि जो दिख रहा है, वो “real” नहीं। “प्रत्यक्षम्” का मतलब “आँख से दिखना”। पर आँख से दिखना real का प्रमाण नहीं। सपने में भी दिखता है, mirage में भी।

पाठक के लिए“रज्जु-सर्प”। अँधेरे में रस्सी, साँप जैसी। रौशनी आते ही साँप गायब। साँप कहाँ गया? वो कहीं था ही नहीं। बस mistake थी। संसार वैसा ही है, ज्ञान की रौशनी आते ही “साँप” गायब, बस “रस्सी” बचती है।

श्लोक 4
अष्टावक्र उवाच
समदुःखसुखः पूर्ण आशानैराश्ययोः समः।
समजीवितमृत्युः सन्नेवमेव लयं व्रज॥
sama-duḥkha-sukhaḥ pūrṇa āśā-nairāśyayoḥ samaḥ
sama-jīvita-mṛtyuḥ sann evam eva layaṁ vraja

अर्थ“सुख-दुःख में सम, पूर्ण, आशा-निराशा में सम, जीवन-मृत्यु में सम हो कर, इसी तरह लय को प्राप्त हो।”

सन्दर्भचौथी method: equanimity। यह सबसे practical है। तीन pairs में सम। यह करना नहीं, होना है। यह बल से नहीं आता, ज्ञान से आता है। जब पता है “मैं” चेतना है, तो pairs अपने आप बराबर लगते हैं।

पाठक के लिए“समजीवितमृत्युः”। जीवन-मृत्यु को बराबर देखना। यह सबसे tough है, क्योंकि शरीर instinctively जीवन की तरफ़ खींचता है। पर ज्ञान deepen हो, तो यह instinct भी loose हो जाता है। मृत्यु शत्रु नहीं, एक event है।

प्रकरण 5 ख़त्म। चार पंक्तियों में चार methods। हर एक के अन्त में “एवमेव लयं व्रज”। मतलब, बस इसी तरह घुल जा। कुछ करना नहीं, कुछ बनना नहीं। बस melt हो जा।

॥ लय ॥